कांग्रेस सरकार का बनाया NIA ऐक्ट क्या है, जिसके ख़िलाफ़ उन्हीं के भूपेश बघेल SC पहुंच गए हैं
क्या NIA ऐक्ट राज्य सरकार को कमज़ोर करता है?
Advertisement

26 नवंबर, 2008 को मुंबई के ताज पैलेस होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, नरीमन हाउस पर आतंकी हमला हुआ था. तब की UPA सरकार आतंकी हमलों से निपटने के लिए NIA ऐक्ट लाई थी. अब उन्हीं के एक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (बायीं तरफ) इसका विरोध कर रहे हैं. सभी फोटो: India Today
Quick AI Highlights
Click here to view more
26/11. मुंबई का आतंकी हमला. देश की सुरक्षा पर हमला.
इस बैकड्रॉप में नैशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) बनाई गई. इसका काम देश के किसी भी हिस्से में आतंक को रोकना, निगरानी रखना और ऐसे मामलों की जांच करना है. अमेरिका की FBI की तर्ज़ पर इसे बनाया गया. 2008 में जांच एजेंसी बनाने लिए NIA ऐक्ट बना. UPA के समय में. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और पी चिंदबरम गृह मंत्री थे. 2009 में एजेंसी ठीक से अस्तित्व में आई. NIA ऐक्ट पूरे देश के लिए था. जब जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 नहीं हटा था, तब भी ये ऐक्ट वहां लागू होता था. जम्मू-कश्मीर में NIA जांच और छापेमारी की ख़बरें आती रहती हैं. बाद में 2019 में इस ऐक्ट में संशोधन हुए, जिसने NIA के दांत और नाखून और भी नुकीले कर दिए.
NIA ऐक्ट की चर्चा क्यों हो रही है?
क्योंकि छत्तीसगढ़ सरकार ने NIA ऐक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है. ये ऐक्ट यूपीए सरकार लेकर आई थी, ऐसे में कांग्रेस सीएम इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? इस पर भूपेश बघेल का कहना है,
का सहारा लिया है. आर्टिकल 131 केंद्र और राज्य या दो राज्यों के बीच हुए विवाद से डील करता है. ये आर्टिकल ऐसे विवाद में सुप्रीम कोर्ट को फैसला देने का एक्सक्लूसिव अधिकार देता है. इसमें केस की सबसे पहले सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में ही होती है.
अभी केंद्र से लड़ाई की वजह क्या है?
छत्तीसगढ़ सरकार दो मामलों में NIA जांच को लेकर केंद्र से भिड़ी हुई है. 2013 का झीरम घाटी हत्याकांड और अप्रैल, 2019 में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या.
बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई, 2013 को नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर दिया था. इसमें तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, तब के नेता विपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला सहित 32 लोगों की मौत हो गई थी. कांग्रेस की पूरी फ्रंटलाइन खत्म हो गई थी. इसे NIA ने सिर्फ़ एक नक्सली हमला माना था. लेकिन राज्य में कांग्रेस सरकार आते ही इसकी जांच के लिए SIT बनाई गई. SIT ने NIA से अपनी जांच की डीटेल्स शेयर करने को कहा. लेकिन NIA ने ऐसा नहीं किया. सरकार का कहना है कि उनके पास 59 ऐसे केस हैं जो NIA ले सकती थी. इनमें कई मामले ऐसे हैं जिसमें नक्सल लिंक है, लेकिन NIA केस चुनने में सेलेक्टिव रही.

झीरम हत्याकांड में NIA ने नक्सली देवजी और गणेश उइके पर सात-सात लाख रुपए का इनाम रखा था. फोटो: India Today
8 अप्रैल, 2019 को दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने भाजपा विधायक भीमा मंडावी के साथ 5 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके लिए विधायक के काफि़ले पर हमला किया गया था. NIA इसकी जांच कर रही है. इसमें बिलासपुर हाई कोर्ट में NIA जांच के ख़िलाफ़ एक शख्स ने याचिका दायर कर रखी है. कांग्रेस सरकार को इस जांच से दिक्कत है. बीजेपी ने इस मामले पर भूपेश बघेल सरकार को कंफ्यूज़न से भरा बताया है.

भीमा मंडावी मामले में देश में पहली बार NIA के ख़िलाफ केस दर्ज़ किया गया. फोटो: Social Media
क्या है NIA ऐक्ट?
NIA का असली काम आतंक से जुड़े मामलों की जांच करना है. नीचे दिए गए ऐक्ट के तहत आने वाले अपराधों की जांच NIA कर सकती है.
NIA (अमेंडमेंट) ऐक्ट, 2019 से NIA और ताकतवर हो गई. इस ऐक्ट में उसकी जांच का दायरा बढ़ा दिया गया. अब वो इन मामलों की भी जांच कर सकती है-
2008 के ऐक्ट में जल्दी ट्रायल निपटाने के लिए केंद्र को स्पेशल कोर्ट बनाने का अधिकार है. संशोधन के बाद केंद्र सरकार सेशंस कोर्ट भी बना सकती है. सेशंस कोर्ट के पास ज़्यादा शक्ति होती है. ये कोर्ट ज़ुर्माना लगाने से लेकर मौत की सज़ा दे सकती है.
फिर आता है UAPA का संशोधन
2019 में एक और कानून में संशोधन हुआ. UAPA. यानी Unlawful Activities (Prevention) Amendment Act, 2019. इसमें किसी को शक के आधार पर आतंकी माना जा सकता है. इसने NIA की ताकत बढ़ाने में 'कैटलिस्ट' का काम किया. ये ऐक्ट NIA अधिकारियों को संदिग्ध लोगों के यहां छापेमारी करने, उनकी प्रॉपर्टी ज़ब्त करने का अधिकार देता है. इसके लिए किसी राज्य के डीजी या किसी आला पुलिस अधिकारी से परमिशन लेने की ज़रूरत नहीं है. इसके लिए बस NIA के डीजी को हां में सिर हिलाना होता है. ये इस टकराव की बड़ी वजह है.
जाते-जाते ऐडिशनल जानकारी ये कि NIA के पहले डीजी राधा विनोद राजू थे. इसके बाद शरद चंद्र सिन्हा फिर शरद कुमार डीजी बने. फिलहाल योगेश चंद्र मोदी NIA के डीजी हैं.
यूएपीए एक्ट राज्यसभा में हुआ पास, NIA मजबूत हुई या मोदी सरकार का जोर बढ़ा?
इस बैकड्रॉप में नैशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) बनाई गई. इसका काम देश के किसी भी हिस्से में आतंक को रोकना, निगरानी रखना और ऐसे मामलों की जांच करना है. अमेरिका की FBI की तर्ज़ पर इसे बनाया गया. 2008 में जांच एजेंसी बनाने लिए NIA ऐक्ट बना. UPA के समय में. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और पी चिंदबरम गृह मंत्री थे. 2009 में एजेंसी ठीक से अस्तित्व में आई. NIA ऐक्ट पूरे देश के लिए था. जब जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 नहीं हटा था, तब भी ये ऐक्ट वहां लागू होता था. जम्मू-कश्मीर में NIA जांच और छापेमारी की ख़बरें आती रहती हैं. बाद में 2019 में इस ऐक्ट में संशोधन हुए, जिसने NIA के दांत और नाखून और भी नुकीले कर दिए.
NIA ऐक्ट की चर्चा क्यों हो रही है?
क्योंकि छत्तीसगढ़ सरकार ने NIA ऐक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है. ये ऐक्ट यूपीए सरकार लेकर आई थी, ऐसे में कांग्रेस सीएम इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? इस पर भूपेश बघेल का कहना है,
ये कानून (NIA ऐक्ट) संविधान के तहत राज्य को दिए गए अधिकारों का हनन करता है. इसीलिए हमने इसे चुनौती देने का निर्णय लिया.छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि ये ऐक्ट राज्य की शक्ति को कमज़ोर करता है और पुलिस व्यवस्था में हस्तक्षेप करता है. पुलिस संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य का विषय है लेकिन इस ऐक्ट से केंद्र को ज़्यादा ताकत मिल जाती है. सरकार का कहना है कि ऐक्ट में राज्यों से समन्वय और उनकी सहमति की शर्त नहीं है, जो संघीय ढांचे के ख़िलाफ़ है. इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने आर्टिकल 131
का सहारा लिया है. आर्टिकल 131 केंद्र और राज्य या दो राज्यों के बीच हुए विवाद से डील करता है. ये आर्टिकल ऐसे विवाद में सुप्रीम कोर्ट को फैसला देने का एक्सक्लूसिव अधिकार देता है. इसमें केस की सबसे पहले सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में ही होती है.
एनआईए कानून संविधान के तहत राज्य को दिए गए अधिकारों का हनन करता है। इसीलिए हमने इसे चुनौती देने का निर्णय लिया। https://t.co/h1l474xtzh
— Bhupesh Baghel (@bhupeshbaghel) January 15, 2020
अभी केंद्र से लड़ाई की वजह क्या है?
छत्तीसगढ़ सरकार दो मामलों में NIA जांच को लेकर केंद्र से भिड़ी हुई है. 2013 का झीरम घाटी हत्याकांड और अप्रैल, 2019 में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या.
बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई, 2013 को नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर दिया था. इसमें तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, तब के नेता विपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला सहित 32 लोगों की मौत हो गई थी. कांग्रेस की पूरी फ्रंटलाइन खत्म हो गई थी. इसे NIA ने सिर्फ़ एक नक्सली हमला माना था. लेकिन राज्य में कांग्रेस सरकार आते ही इसकी जांच के लिए SIT बनाई गई. SIT ने NIA से अपनी जांच की डीटेल्स शेयर करने को कहा. लेकिन NIA ने ऐसा नहीं किया. सरकार का कहना है कि उनके पास 59 ऐसे केस हैं जो NIA ले सकती थी. इनमें कई मामले ऐसे हैं जिसमें नक्सल लिंक है, लेकिन NIA केस चुनने में सेलेक्टिव रही.

झीरम हत्याकांड में NIA ने नक्सली देवजी और गणेश उइके पर सात-सात लाख रुपए का इनाम रखा था. फोटो: India Today
8 अप्रैल, 2019 को दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने भाजपा विधायक भीमा मंडावी के साथ 5 लोगों की हत्या कर दी थी. इसके लिए विधायक के काफि़ले पर हमला किया गया था. NIA इसकी जांच कर रही है. इसमें बिलासपुर हाई कोर्ट में NIA जांच के ख़िलाफ़ एक शख्स ने याचिका दायर कर रखी है. कांग्रेस सरकार को इस जांच से दिक्कत है. बीजेपी ने इस मामले पर भूपेश बघेल सरकार को कंफ्यूज़न से भरा बताया है.

भीमा मंडावी मामले में देश में पहली बार NIA के ख़िलाफ केस दर्ज़ किया गया. फोटो: Social Media
क्या है NIA ऐक्ट?
NIA का असली काम आतंक से जुड़े मामलों की जांच करना है. नीचे दिए गए ऐक्ट के तहत आने वाले अपराधों की जांच NIA कर सकती है.
गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) ऐक्ट, 1967 एटॉमिक एनर्जी ऐक्ट, 1962 एंटी-हाईजैकिंग ऐक्ट, 1982 Suppression of Unlawful Acts Against Safety of Maritime Navigation and Fixed Platforms on Continental Shelf Act, 2002अब आता है 2019 का संशोधन
NIA (अमेंडमेंट) ऐक्ट, 2019 से NIA और ताकतवर हो गई. इस ऐक्ट में उसकी जांच का दायरा बढ़ा दिया गया. अब वो इन मामलों की भी जांच कर सकती है-
मानव तस्करी साइबर क्राइम नकली नोट से जुड़े केस अवैध हथियार बनाना विस्फोटक चीज़ें बनाना या बेचनापहले NIA भारत में होने वाले ही अपराधों की जांच कर सकती थी. संशोधन के बाद भारत से बाहर भी जांच की जा सकती है. मतलब अगर बाहर किसी हमले से किसी तरह भारतीय प्रभावित होते हों तो NIA मामले को अपने हाथ में ले सकती है. लेकिन इसके लिए संबंधित देश से भारत की कोई संधि पहले से होनी चाहिए. यहां डिप्लोमेसी की ज़रूरत होती है.
2008 के ऐक्ट में जल्दी ट्रायल निपटाने के लिए केंद्र को स्पेशल कोर्ट बनाने का अधिकार है. संशोधन के बाद केंद्र सरकार सेशंस कोर्ट भी बना सकती है. सेशंस कोर्ट के पास ज़्यादा शक्ति होती है. ये कोर्ट ज़ुर्माना लगाने से लेकर मौत की सज़ा दे सकती है.
फिर आता है UAPA का संशोधन
2019 में एक और कानून में संशोधन हुआ. UAPA. यानी Unlawful Activities (Prevention) Amendment Act, 2019. इसमें किसी को शक के आधार पर आतंकी माना जा सकता है. इसने NIA की ताकत बढ़ाने में 'कैटलिस्ट' का काम किया. ये ऐक्ट NIA अधिकारियों को संदिग्ध लोगों के यहां छापेमारी करने, उनकी प्रॉपर्टी ज़ब्त करने का अधिकार देता है. इसके लिए किसी राज्य के डीजी या किसी आला पुलिस अधिकारी से परमिशन लेने की ज़रूरत नहीं है. इसके लिए बस NIA के डीजी को हां में सिर हिलाना होता है. ये इस टकराव की बड़ी वजह है.
जाते-जाते ऐडिशनल जानकारी ये कि NIA के पहले डीजी राधा विनोद राजू थे. इसके बाद शरद चंद्र सिन्हा फिर शरद कुमार डीजी बने. फिलहाल योगेश चंद्र मोदी NIA के डीजी हैं.
यूएपीए एक्ट राज्यसभा में हुआ पास, NIA मजबूत हुई या मोदी सरकार का जोर बढ़ा?

