महाराष्ट्र में राजनैतिक संकट है. आज से पहले ये लाइन इतनी बार कही जा चुकी है किघिसने लगी थी. महाविकास अघाड़ी सरकार ने जब शपथ भी नहीं ली थी, तभी उसके गिरने कीखबर आई, जब अचानक अजीत पवार के समर्थन के साथ देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ले ली. इसकेबाद भी कभी किसी हवाई अड्डे के नाम पर तो कभी पंचायत चुनाव में हार-जीत की बात परखबर आती रही कि मुंबई में सरकार गिरने वाली है. लेकिन हमेशा बात पत्रकारों की गॉसिपऔर संपादकीय टिप्पणियों तक ही महदूद रही. लेकिन इस बार महाराष्ट्र का राजनैतिक संकटवाकई असली है. महाविकास अघाड़ी सरकार के तकरीबन दो दर्जन विधायक, गुजरात भाजपाअध्यक्ष सीआर पाटील के शहर सूरत चले गए हैं. और ये टूट महाविकास अघाड़ी की सबसेमज़बूत कड़ी मानी जाने वाली शिवसेना में हुई है. आज दिन भर लगातार मुंबई और दिल्लीमें हलचल होती रही.भारत में सरकार सिर्फ चुनाव से ही नहीं बनती. मैनेजमेंट से भी बनती है. और उसके लिएज़रूरत पड़ती है एक अदद होटल या रिज़ॉर्ट की. ''सरकार और रिज़ॉर्ट और संकट'' - येतीन शब्द जब एक वाक्य में आ जाते हैं, तो दर्शक भी समझ जाते हैं कि कहानी क्या होनेवाली है. बस सूबे का नाम, पार्टियों के नाम और नेताओं के नाम बदलते रहते हैं. आपनेरिज़ॉर्ट पॉलिटिक्स नाम की इस वेब सीरीज़ के कई एपिसोड देखे हैं - कर्नाटक,राजस्थान, मध्यप्रदेश, आदि. ताज़ा एपिसोड एयर हो रहा है महाराष्ट्र से.विधायकों के बाड़ेबंद होने की खबर भले आज आई हो, लेकिन महाराष्ट्र में राजनैतिकसंकट की आहट बीते दिनों में ही मिलने लगी थी. 20 जून को महाराष्ट्र विधान परिषद केलिए चुनाव हुए. कुल 10 सीटों पर परिषद के सदस्य चुने जाने थे. महाविकास अघाड़ी केतीनों दलों - शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने दो-दो उम्मीदवारों को खड़ा किया. औरभाजपा ने पांच उम्मीदवारों को उतारा.शिवसेना के दोनों उम्मीदवार आसानी से जीत गए. एनसीपी के भी दोनों उम्मीदवार जीत गए.लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवारों को द्वितीय वरीयता मतों की ज़रूरत पड़ गई. बावजूदइसके पार्टी का दलित चेहरा माने जाने वाले चंद्रकांत हंदोरे हार गए. दूसरी तरफभाजपा ने अपने पांचों उम्मीदवार जिता लिए. जब सारा गणित सामने आया, तो मालूम चला कि106 विधायकों वाली भाजपा को कुल 133 मत मिले थे. और इनमें महाराष्ट्र के निर्दलीयविधायकों और छोटी पार्टियों से इतर कम से कम 6 वोट महाविकास अघाड़ी के विधायकों केथे - 3 शिवसेना के और 3 कांग्रेस के.इससे पहले 10 जून के रोज़ भी यही नज़ारा देखने को मिला था. भाजपा अपने बूते सिर्फदो उम्मीदवारों को राज्यसभा चुनाव जिता सकती थी. दूसरी तरफ महाविकास अघाड़ी,निर्दलीय और छोटी पार्टियों के समर्थन से 4 उम्मीदवारों को राज्यसभा भेजना चाहतीथी. लेकिन जब वोटिंग हुई, तो भाजपा के तीनों उम्मीदवार जीत गए. शिवसेना के एकउम्मीदवार - संजय पवार को हार का सामना करना पड़ा. तब भाजपा को कुल 123 वोट मिलेथे. इसका मतलब, पार्टी ने 10 दिनों के भीतर 10 और विधायकों का समर्थन जुटा लिया.आज के घटनाक्रम को इन दो चुनावों और उनके नतीजों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए.आपको सारा खेल और उसके पीछे की राजनीति समझ आए, इसीलिए ज़रूरी है कि आप महाराष्ट्रविधानसभा में पार्टियों की मौजूदा स्थिति जान लें.भाजपा - 106शिव सेना - 55राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी - 53कांग्रेस - 44बहुजन विकास अघाड़ी - 3सपा - 2AIMIM - 2प्रहार जनशक्ति पार्टी - 2निर्दलीय - 13सात पार्टियां ऐसी हैं, जिनके एक-एक विधायक हैं -> भाकपा > पेज़ेंट्स एंड वर्कर्ज़ पार्टी ऑफ इंडिया> महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना > स्वाभिमान पक्ष > राष्ट्रीय समाज पार्टी> जनसुराज्य पार्टी > क्रांतिकारी शेतकरीफिलहाल एक सीट रिक्त है.ध्यान दीजिए, कि महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सदस्य होते हैं और बहुमत काआंकड़ा है 144. लेकिन चूंकि एक सीट रिक्त है और दो विधायक फिलहाल जेल में हैं,इसीलिए सदन में मौजूद सदस्यों की संख्या है 285. इस लिहाज़ से बहुमत का आंकड़ा होजाता है 143. महाविकास अघाड़ी सरकार के पास अपने तीन घटक दलों में कुल 152 विधायकहैं. इसके अलावा सरकार को कुछ छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी मिलाहुआ है. लेकिन जैसा कि दर्शक जानते ही हैं, छोटे दल और निर्दलीय विधायकों के मामलेमें अंतरात्मा की आवाज़ कभी भी सुर बदल लेती है.अब इन आंकड़ों के संदर्भ में आज दिन भर हुई हलचल को समझिए. सुबह-सुबह खबर आती है किशिवसेना के कुछ विधायक सूरत के ली मेरिडियन होटल में हैं. और होटल के बाहर गुजरातपुलिस का सख्त पहरा है. पहले संख्या दो दर्जन बताई गई. दोपहर में संख्या 35 के ऊपरगई. लेकिन शाम तक 30 का आंकड़ा चलने लगा. बताया गया कि इस 30 की संख्या में तीनमहाराष्ट्र कैबिनेट के मंत्री भी हैं.कौन हैं एकनाथ शिंदे अब इतना तो आप जानते ही हैं कि फौज में जब बगावत होती है, तो उसकी कमान एक बाग़ीजनरल के हाथ में ही होती है. तो शिवसेना में हुई बगावत के जनरल थे, एकनाथ संभाजीशिंदे. अब ये लाज़मी है कि आप पूछें कि ये एकनाथ शिंदे कौन हैं?उद्धव कैबिनेट में एकनाथ शिंदे को शहरी विकास और लोक निर्माण विभाग PWD कीज़िम्मेदारी दी गई. देश के दूसरे सूबों की तरह महाराष्ट्र में भी हर ज़िले के लिएप्रभारी मंत्री बनाए जाते हैं, जिन्हें पालक मंत्री कहा जाता है. शिंदे, ठाणे औरगडचिरोली ज़िले के पालक मंत्री हैं. साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले शिंदे एक पुरानेशिवसैनिक हैं. मूल रूप से महाराष्ट्र के सतारा के हैं और अब मुंबई के करीब पड़नेवाले ठाणे ज़िले में मज़बूत पकड़ रखते हैं. शुरुआत शाखा प्रमुख रहते हुए की और फिरपार्षद बने. तब तक ठाणे ज़िले के दबंग शिवसैनिक आनंद दिघे का हाथ सिर पर आ गया था.2001 में दिघे की असमय मृत्यु हुई तो पार्टी ने ठाणे की बागडोर एकनाथ शिंदे को देदी.शिंदे ठाणे की कोपरी - पाच पाखडी सीट से चार बार के विधायक हैं. 2014 के विधानसभाचुनाव में भाजपा और शिवसेना अलग-अलग लड़े थे. तब उद्धव ठाकरे शिंदे को नेताप्रतिपक्ष बनाने वाले थे. लेकिन दोनों पार्टियों ने साथ में सरकार बना ली और एकनाथशिंदे मंत्री बन गए. माना जाता है कि 2014 में शिंदे उन नेताओं में थे, जो भाजपा केसाथ गठबंधन के पक्षधर थे. 2019 में भी एकनाथ शिंदे भाजपा के साथ सरकार बनाने केपक्षधर थे. शिवसेना ने उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया था और माना जा रहा थाकि शिंदे सीएम तक हो सकते हैं. लेकिन वो सीएम बन नहीं पाए. क्यों?याद कीजिए, 2019 में भाजपा और शिवसेना ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव साथ-साथ लड़ाथा. और महायुति गठबंध ने शानदार जीत भी दर्ज की थी. सबको यही लगा कि सरकार पहले कीतरह चलती रहेगी. और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने रहेंगे. लेकिन तभी शिवसेना नेये कहकर सबको चौंका दिया कि भाजपा को अपना वादा निभाना चाहिए. शिवसेना की तरफ सेदावा किया गया कि एक बंद कमरे में भाजपा के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार अमित शाह नेवादा किया था कि मुख्यमंत्री पद पर रोटेशन होगा. ढाई-ढाई साल के लिए शिवसेना औरभाजपा को मौका मिलेगा.जैसा कि हमने कहा, ये शिवसेना का दावा था. बंद कमरे में हुई इस बैठक की कोई तस्वीरया वीडियो सामने नहीं आए. बावजूद इसके शिवसेना ज़िद पर अड़ी रही. क्योंकि पार्टी केसामने अस्तित्व का प्रश्न था. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा 2014 के मुकाबलेकम सीटें जीती थी. लेकिन केंद्र में उसके हाथ मज़बूत हुए थे. इसीलिए शिवसेना को येडर था कि भविष्य में वो एक जूनियर पार्टनर बनकर रह जाएगी. इसीलिए पार्टी नेमुख्यमंत्री पद पर रोटेशन वाली बात को इतना तूल दिया और अंत में धुर विरोधीकांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने की बात तक कह डाली. ये ऐलान हुआ 22 नवंबर2019 को.इधर बातचीत से बात नहीं बनी, तो भाजपा ने सरकार बनाने की एक कोशिश और की. 23 नवंबरकी सुबह जब पूरा भारत सो रहा था, सुबह-सुबह देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद कीशपथ ले ली. खबर आई कि भाजपा को अजित पवार के नेतृत्व में बाग़ी एनसीपी विधायकों कासमर्थन मिल गया है. और अजित पवार को डिप्टी सीएम बनाया जाएगा. लेकिन दोपहर होतेहोते शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें शरद पवार नेकह दिया कि NCP के विधायक लौट आएंगे.शपथ ग्रहण का मामला देखते-देखते सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. 24 नवंबर को सुनवाई हुई.और 25 नवंबर को शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मुंबई के एक 5 स्टार होटल में 162विधायकों की परेड करवा दी.26 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिया कि 27 नवंबर को महाराष्ट्र विधानसभा मेंफडनवीस सरकार विश्वास मत हासिल करे. लेकिन इसकी नौबत आई नहीं और देवेंद्र फडणवीस नेखुद ही इस्तीफा दे दिया.यहां से शिवसेना - कांग्रेस - एनसीपी की महाविकास अघाड़ी सरकार के बनने का रास्तासाफ हुआ. लेकिन एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री नहीं बने. क्योंकि शरद पवार का कहना था किगठबंधन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व बेहतर काम करेगा. शिंदे ने इस फैसले को एक आदर्शशिवसैनिक की तरह लिया और कैबिनेट में शामिल हुए. बीते ढाई सालों में जब-जबमहाराष्ट्र सरकार के सामने कोई संकट आया, तब एकनाथ शिंदे ने उद्धव के दाएं हाथ कीतरह काम किया.जब इस पूरे संकट में एकनाथ शिंदे की भूमिका पर सवालों की संख्या काफी बड़ी हो गई,तो उन्होंने एक ट्वीट किया, जो मराठी में था. हम उसका अनुवाद आपको बता देते हैं. ‘’हम बाला साहेब के कट्टर शिवसैनिक हैं. बाला साहब ने हमें हिंदुत्व की शिक्षा दीहै. सत्ता के लिए हमने बाला साहेब के विचार और धर्मवीर आनंद दिघे की शिक्षा से कभीसमझौता नहीं किया और न ही भविष्य में करेंगे.''आम्ही बाळासाहेबांचे कट्टर शिवसैनिक आहोत... बाळासाहेबांनी आम्हाला हिंदुत्वाचीशिकवण दिली आहे.. बाळासाहेबांचे विचार आणि धर्मवीर आनंद दिघे साहेबांची शिकवणयांच्याबाबत आम्ही सत्तेसाठी कधीही प्रतारणा केली नाही आणि करणार नाही— Eknath Shinde - एकनाथ शिंदे (@mieknathshinde) June 21, 2022एकनाथ शिंदे ने इस ट्वीट के ज़रिए शिवसेना के उस भावुक काडर को संबोधित किया था,जिसके लिए बाल ठाकरे एक आइकन हैं और वफादारी सबसे बड़ा मूल्य. एकनाथ शिंदे ने अपनेट्वीट में दो लोगों का ज़िक्र किया. एक हैं बाल ठाकरे, जिनसे दर्शक पहले से परिचितहैं. हम आपको यहां आनंद दिघे के बारे में कुछ बातें बता देते हैं. दिघे, शिवसेना केएक बाहुबली नेता थे, जिनकी ठाणे ज़िले में बड़ी पकड़ थी. वो अपना ''दरबार'' तकचलाते थे, जिसमें लोगों की छोटी-मोटी शिकायतों का ''त्वरित'' निवारण किया जाता था.2001 में जिस अस्पताल में उनकी हृदयघात से मौत हुई, उसे शिव सैनिकों ने जला दियाथा. फ्रंटलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक शिव सैनिकों के उत्पात के चलते जब लाइफसपोर्ट मशीनों ने काम करना बंद कर दिया, तब एक छह महीने के बच्चे और एक 65 साल केबुज़ुर्ग की भी जान चली गई.शिंदे ने जिस तरह बाल ठाकरे और आनंद दिघे का ज़िक्र किया है, उसने शिवसेना में कुछसमय से चली आ रही असहजा की तरफ संकेत किया है. हिंदुत्व सुनते ही आज हमारे दिमागमें भाजपा की तस्वीर आती है. लेकिन बाल ठाकरे के हिंदुत्व में जो उग्रता थी, उसकेचलते वो हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने लगे. उनके बरअक्स उद्धव ठाकरे का हिंदुत्वव्यावहारिक ज़्यादा है और भावुक कम. ये चीज़ और उभरकर आई जब शिवसेना ने राष्ट्रवादीकांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली.भाजपा ने इस चीज़ को तुरंत भांप लिया था और पार्टी सरकार बनने के बाद से हीहिंदुत्व की लाइन पर शिवसेना को ललकारती रही. चाहे कोरोना काल में मंदिर खुलवाने कीज़िद हो या फिर राणा दंपति द्वारा मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा पढ़ने की चुनौती.हर बार ये शिवसैनिकों के लिए दिल और दिमाग के बीच की लड़ाई बनती रही. यही कारण हैकि बाल ठाकरे के बेटे से अलग जाने वाले शिंदे, पार्टी काडर को बाल ठाकरे की ही याददिला रहे हैं.अब तक हमने इतिहास भूगोल खूब बतिया लिया गया. अब आपको ये बताते हैं कि ढाई साल मेंभाजपा ने दूसरी बार सरकार बनाने की कोशिश किस रणनीति के तहत की. इसके लिए हमनेइंडिया टुडे टीवी में एडिटर, कमलेश सुतार से बात की. सुतार ने 2019 की घटनाओं कोकरीब से कवर किया था और वो आज भी मौके से रिपोर्टिंग कर रहे हैं. उन्होंने भाजपा कीरणनीति के बारे में बताया,"एकनाथ शिंदे के खेमे में ये दावा किया जा रहा है कि उनके साथ शिवसेना के 36 विधायकहैं. ये आंकड़ा इसलिए अहम है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के 55 विधायक हैं, और इसकादो तिहाई 36 के करीब होता है. अगर शिंदे ने ये आंकड़ा जुटा लिया तो आगे की कार्रवाईकी जाएगी. इससे पहले बीजेपी एक बार ये सीन अजित पवार के साथ देख चुकी है इसलिए अभीकुछ नहीं कह रही, जब वो पूरी तरह से संतुष्ट हो जाएगी तभी कुछ घोषणा होगी." दर्शक जानते हैं कि 2019 में एनसीपी विधायकों को वापस लाने में शरद पवार की बड़ीभूमिका थी. इस बार ये काम उद्धव ठाकरे को करना है. क्या उद्धव ठाकरे भी शरद पवार कीतरह अपने कुनबे को दोबारा समेट सकते हैं, इसपर कमलेश सुतार का कहना है, "इस बार पार्टी में दो चीजों को लेकर बगावत है. पहली उद्धव ठाकरे के नेतृत्व कोलेकर और दूसरी मौजूदा सरकार में तीन अलग-अलग विचारधाराओं का होना. इस बार शरद पावरकुछ नहीं कर सकते क्योंकि सरकार शिवसेना की वजह से गिर रही है और विधायक भी शिवसेनाके ही हैं. इस बार शिंदे ने वही आरोप लगाया है जो पिछले ढाई साल से भाजपा शिवसेनापर लगा रही थी कि पार्टी हिंदुत्व से दूर जा रही है. ये लड़ाई उद्धव ठाकरे के लिएआसान नहीं होगी."शिवसेना लगातार इस संकट से पार पाने के रास्ते तलाश रही है. आज पार्टी ने अपने दोनेताओं, रवि पाठक और मिलिंद नार्वेकर को सूरत भी भेजा. और दूसरी तरफ संजय राउतप्रेस से ये कहते रहे कि ये संकट उतना बड़ा भी नहीं है. शिवसेना की एक समस्या ये भीहै कि NCP इस सब में अपने हाथ नहीं जलाना चाह रही है. आज दोपहर में शरद पवार ने कहभी दिया कि सीएम कौन बने, ये शिवसेना का आंतरिक मामला है. शरद पवार ने हमेशा संयमकी राजनीति की है. लेकिन कांग्रेस की तरफ से पृथ्वीराज चौहान ने खुलकर आरोप लगाए.आज का पूरा दिन मुंबई और दिल्ली में ताबड़तोड़ अपडेट्स का रहा. कभी खबर आती किभाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह से मिले हैं, तो कभी खबर आती किदेवेंद्र फडणवीस को दिल्ली बुला लिया गया. फिर ये मालूम चलता कि कांग्रेस ने आनेवाले दिनों में होने वाली हलचल को देखते हुए कमल नाथ को AICC ऑब्ज़र्वर बनाकरमहाराष्ट्र भेज दिया है. रही बात शिवसेना की, तो उसने एकनाथ शिंदे को सदन मेंविधायक दल के नेता के पद से हटा दिया है और अपने पार्टी कार्यालय पर समर्थकों काशक्ति प्रदर्शन भी करवा लिया है. लेकिन इस संकट का कोई ठोस हल उसके पास है, अब तकऐसे संकेत मिले नहीं हैं. दूसरी तरफ भाजपा इस बार गच्चा खाने के मूड में नहीं हैं.इसीलिए फूंक-फूंक के कदम रख रही है.