आपको ‘दो बीघा ज़मीन’ फ़िल्म याद है! अगर याद है तो बहुत बढ़िया. नहीं है तो हम याददिला देते हैं. दो बीघा ज़मीन 1953 में आई थी. इसकी कहानी कुछ यूं है. एक सीधा-सादाकिसान शंभू महतो अपने बूढ़े पिता, पत्नी पारो और बेटे के साथ गांव में रहता है. उसकेपास दो बीघा खेत हैं. जिस पर ये परिवार गुजारा करता है. अकाल के कुछ अरसा बाद बरसातहोती है तो हालात सुधरने लगते हैं. गांव का जमींदार पूंजीवादी आदमी है. वो शहर केएक कारोबारी के साथ मिलकर गांव में फ़ैक्ट्री लगाने की फ़िराक़ में है. लेकिन उसकेमुनाफे की राह में शंभू की जम़ीन अटकी है. वो शंभू को ज़मीन का सौदा करने के लिएबुलाता है. शंभू ज़मीन बेचने से मना कर देता है. नाराज ज़मींदार एक दिन में साराकर्ज चुकाने को कहता है. शंभू हिसाब लगाता है. उसे 65 रुपये देने हैं. लेकिन येकर्ज 235 रुपये का बना दिया जाता है. सूद की रकम जोड़कर. शंभू के पिता गंगू ने कर्जके बदले जमींदार के यहां मजदूरी की थी लेकिन उसे शामिल नहीं किया जाता. बेचारा शंभूकोर्ट भी जाता है. लड़ता है लेकिन हार जाता है. अदालत बोलती है पूरे पैसे चुकाओ. वोभी तीन महीने में. नहीं तो घर-बार नीलाम हो जाएगा. शंभू ज़ल्दी पैसे कमाने के लिएशहर जाता है. बहुत कोशिश करने के बाद भी वो समय पर क़र्ज़ नहीं चुका पाता. उसकीज़मीन बिक जाती है. अंत में उसे अपनी ज़मीन की मिट्टी तक नसीब नहीं होती. अगर इसउदाहरण को अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर फ़िट किया जाए तो ये आज के दौर में चीन औरश्रीलंका की कहानी बन जाएगी. इस कहानी में लाचार किसान श्रीलंका है. और, सूदखोरज़मींदार चीन है. चीन ने पिछले कुछ समय में श्रीलंका को भरपूर क़र्ज़ दिया. अब उसेचुकाने की मियाद पूरी हो रही है. लेकिन श्रीलंका इस हालत में नहीं है. वो चीन केआगे गिड़गिड़ा रहा है. थोड़ी सी मोहलत के लिए. क़र्ज़ अदायगी में रियायत के लिए.लेकिन पूरी कहानी इतनी भी सीधी नहीं है. श्रीलंका ने चीन से क़र्ज़ क्यों लिया था?वो चीन से किस बात की गुहार लगा रहा है? और, इसका श्रीलंका पर क्या असर पड़ने वालाहै? शुरुआत इतिहास से करते हैं. साल 1957. तारीख़ सात फ़रवरी. श्रीलंका ने पीपुल्सरिपब्लिक ऑफ़ चाइना को आधिकारिक तौर पर मान्यता दे दी. उस समय तक अमेरिका औरयूनाइटेड नेशंस तक ने चीन को आधिकारिक दर्ज़ा नहीं दिया था. श्रीलंका और चीन केसंबंध लंबे समय तक ठंडे पड़े रहे. फिर जुलाई 1983 में श्रीलंका में सिविल वॉर शुरूहो गया. सिविल वॉर 26 सालों तक चला. सिविल वॉर के दौरान चीन श्रीलंका सरकार का सबसेबड़ा मददगार बनकर उभरा. उसने भारी संख्या में घातक हथियार सप्लाई किए. 2005 मेंमहिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति बने. उनके कुर्सी पर आते ही चीन का दखलअचानक से बढ़ गया. महिंदा अपने गृह जिले हमबनटोटा में एक विशाल बंदरगाह बनाना चाहतेथे. जानकारों ने कहा कि श्रीलंका के पास कोलंबो में एक बंदरगाह पहले से है. उसेबढ़ाने का स्कोप बाकी है. दूसरे बंदरगाह की कोई ज़रूरत नहीं है. महिंदा नहीं माने.न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने पहले भारत की तरफ़ हाथ बढ़ाया.भारतीय कंपनियों ने इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी लेने से मना कर दिया. इसके बादमहिंदा चीन की तरफ़ गए. चीन हंसी-खुशी से राज़ी हो गया. 2007 में प्रोजेक्ट शुरू होगया. श्रीलंका ने पोर्ट के लिए पहला बड़ा क़र्ज़ चीन के एग्ज़िम बैंक से लिया. चीनक़र्ज़ देने के लिए तैयार था. उसने शर्त ये रखी कि पैसे चाहिए तो प्रोजेक्ट का ठेकाहमारी पसंद की कंपनी को देना होगा. इस तरह से चाइना हार्बर नाम की कंपनी कोहमबनटोटा बंदरगाह बनाने का ठेका मिल गया. 2009 में श्रीलंका का सिविल वॉर खत्म होगया. फिर विक्ट्री परेड निकली. इसमें श्रीलंकाई सेना ने अपने हथियारों का भव्यप्रदर्शन किया. तब पता चला कि इस सिविल वॉर में चीन का दखल हद से ज़्यादा था. 2010में हमबनटोटा बंदरगाह बनकर तैयार हो गया. श्रीलंका की सत्ता में राजपक्षे परिवार कादबदबा बना रहा. और, चीन से उनकी नज़दीकियां भी. 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में चीनीकंपनियों ने महिंदा राजपक्षे के कैंपेन का खर्च भी उठाया. बदले में उनके ऊपर सरकारका वरदहस्त बना रहा. 2015 के चुनाव में महिंदा हार गए. श्रीलंका में नई सरकार आई.चीनी कंपनियों ने अपना क़र्ज़ मांगना शुरू किया. सरकार के पास पैसे थे नहीं.आख़िरकार, दिसंबर 2017 में उसे हमबनटोटा बंदरगाह और आस-पास की 15 हज़ार एकड़ ज़मीन99 साल की लीज़ पर चीन को देनी पड़ी. इस बलिदान के बावजूद क़र्ज़ कम होने का नामनहीं ले रहा. श्रीलंका सरकार ने पिछले कुछ सालों में चीन से ख़ूब सारा लोन लिया.सड़क, एयरपोर्ट और आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए. लेकिन इसका इस्तेमाल ढंग कीजगह पर नहीं हो पाया. इस वजह से सही रिटर्न नहीं मिला. जिसके चलते क़र्ज़ का भुगतानसमय पर नहीं किया जा सका. बाकी देनदारों की तुलना में चीनी क़र्ज़ के भुगतान की दरकाफी अधिक है. जिस वज से श्रीलंका के ऊपर लदे क़र्ज़ का बोझ लगातार बढ़ता जा रहाहै. ये अब श्रीलंका की जीडीपी से कई गुणा अधिक हो चुका है. इस क़र्ज़ के चलतेविदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है. इससे ईंधन और दवाई जैसीबुनियादी वस्तुओं के आयात पर भारी असर पड़ेगा. सरकार इससे बचने के लिए नए-नए उपायअपना रही है. मसलन, श्रीलंका को ईरान को 25 करोड़ डॉलर का भुगतान करना है. तेल केलिए. लेकिन पैसे की कमी के चलते सरकार चाय भेजकर क़र्ज़ चुका रही है. श्रीलंका हरमहीने ईरान को 50 लाख डॉलर की कीमत की चाय भेजेगी. जानकार बताते हैं कि इससे स्थायीसमाधान नहीं मिल सकता. लोन संकट से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे. श्रीलंका केलोन संकट की चर्चा की वजह क्या है? इस समय श्रीलंका आर्थिक मोर्चे पर पस्त हो रहाहै. उसके पास सिर्फ़ डेढ़ अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है. आर्थिक विशेषज्ञबताते हैं कि इस रकम से अधिकतम एक महीने की ज़रूरत भर का सामान ही आयात किया जासकता है. संकट का क्या असर पड़ा है? बिजली बनाने और सप्लाई करने वाली कंपनी सीलोनइलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (CEB) ने राशनिंग शुरू कर दी है. CEB का कहना है कि उसके पासतेल खरीदने के लिए डॉलर्स नहीं हैं. श्रीलंका के कुल बिजली उत्पादन का नौ प्रतिशतहिस्सा तेल पर टिका है. कमी के चलते कुछ पॉवर स्टेशन्स को अनिश्चितकाल के लिए बंदकर दिया गया है. श्रीलंका में बिजली की कटौती भी काफी बढ़ गई है. श्रीलंका के ऊर्जामंत्री उदया गमानपिला ने एक और बात कही है. उदया ने बताया कि जनवरी महीने के तीसरेहफ़्ते तक ट्रांसपोर्ट के लिए रखे पेट्रोल और डीजल का स्टॉक भी खत्म हो जाएगा. अगरआयात नहीं हो पाया तो गाड़ियां रुक जाएंगी. दो हफ़्ते पहले ही सरकार ने तेल कीकीमतें बढ़ाईं थी. इरादा ये था कि इससे खपत घटेगी और बहुत ज़रूरत होने पर ही तेल कीखरीद होगी. हालांकि, इस बढ़ोत्तरी का कोई फायदा नहीं हुआ. इन सबके बीच बुनियादीचीज़ों के दाम आसमान छूने लगे हैं. दिसंबर महीने में महंगाई दर 22 प्रतिशत तक पहुंचगया. अगस्त 2021 में श्रीलंका सरकार ने खाद्य आपातकाल लगाया था. इसके तहत, सरकारीअधिकारी ज़माखोरों को अरेस्ट कर सकते थे. उन्हें स्टॉक ज़ब्त करने और चीज़ों कोरियायती दर पर बेचने का अधिकर भी मिल गया था. आसान भाषा में कहें तो सरकारखरीद-बिक्री के काम में लग गई. उससे पहले तक ये काम निजी क्षेत्र का था. सामान्यदिनों में बाज़ार के हिसाब से दाम निर्धारित होते हैं. लेकिन किल्लत के टाइम इस बातका डर था कि ज़माखोरी बढ़ सकती है. हालांकि, सरकार के लगाए आपातकाल का कोई खास असरनहीं हुआ. महंगाई बढ़ती गई. अब तो गैस, मिल्क पाउडर, चीनी और सीमेंट की राशनिंग भीशुरू हो चुकी है. लोगों को अपना घर चलाने तक में मुश्किल आ रही है. अगर श्रीलंका कोबाहर से मदद नहीं मिली तो वो महीने-दो महीने में दीवालिया हो सकता है. जनता के पासखाने की कमी है. महंगाई दिन-रात बढ़ रही है. बुनियादी सुविधाएं एक-एक कर कम होती जारहीं है. बेरोज़गारी चरम पर है. भुगतान नहीं करने पर आईटी सिस्टम ठप पड़ सकता है.अगर ये सारे कारण एक साथ हावी हुए तो श्रीलंका में सिविल वॉर की स्थिति पैदा होसकती है. सरकार ने दस हज़ार करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा ज़रूर की है. लेकिनये पर्याप्त नहीं है. श्रीलंका की ये हालत क्यों हुई? इसकी पहली वजह कोरोना महामारीहै. महामारी के कारण पर्यटन उद्योग रेंग रहा है. श्रीलंका भी इससे अछूता नहीं है.2019 में श्रीलंका की जीडीपी का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा पर्यटन से आया था. येइंडस्ट्री श्रीलंका के लिए सबसे अधिक विदेशी मुद्रा लाने वाले स्रोतों में से एकथी. लेकिन जब से लॉकडाउन और यात्रा की बंदिशें चालू हुईं है, पर्यटकों का आना लगभगबंद हो चुका है. इसके चलते विदेशी मुद्रा की आमद में कमी आई. ओमिक्रॉन वेरिएंट नेइस दुख को और लंबा खींच दिया है. दूसरी वजह है, ऑर्गेनिक खेती. श्रीलंका से निर्यातहोने वाले सामानों की लिस्ट में चाय सबसे ऊपर है. चाय विदेशों में बेची जाती है.उससे विदेशी मुद्रा आती है. निर्यात से होने वाली आमदनी का लगभग दस फीसदी हिस्साचाय की बिक्री से आता है. 2019 में जब गोटाबाया राजपक्षे रैलियां कर रहे थे, तबउन्होंने वादा किया था कि रासायनिक खाद के आयात पर सब्सिडी दी जाएगी. गोटाबायाचुनाव जीत गए. लेकिन वो अपने वादे से मुकर गए. उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि इसखाद से लोगों तक ज़हर पहुंच रहा है. 2021 में उन्होंने इसके आयात पर रोक लगा दी.गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका को सौ फीसदी ऑर्गेनिक खेती करने वाला पहला देश बनानाचाहते थे. इसलिए उन्होंने खाद के आयात पर रोक लगाई थी. लेकिन उनके इस कदम का उलटापरिणाम निकला. ऑर्गेनिक खेती में सामान्य खेती की तुलना में दस गुणा अधिक खर्च आताहै. वहीं, ऑर्गेनिक फ़ूड का मार्केट भी बेहद सीमित है. इसके चलते श्रीलंका केजमे-जमाए बिजनेस पर असर पड़ा. अक्टूबर 2021 में सरकार ने थोड़ी ढील दी. लेकिन तब तकनुकसान हो चुका था. तीसरी बड़ी वजह है भरोसे की कमी. श्रीलंका ने विदेश से भारीक़र्ज़ उठाया है. सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा क़र्ज़ की रकम अदा करने में खर्च होरहा है. इसके बावजूद क़र्ज़ कम होने का नाम नहीं ले रहा. जब श्रीलंका, चीन का दियापैसा नहीं लौटा पाया तो उसे हमबनटोटा बंदरगाह लीज पर देना पड़ा था. श्रीलंकाडिफ़ॉल्टर होने की तरफ़ बढ़ रहा है. यानी उसे दिया गया क़र्ज़ वापस मिलने कीसंभावना कम है. ऐसे में शायद ही कोई देश या संस्था श्रीलंका को लोन देने के लिएतैयार होगी. आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं? दरअसल, 8 जनवरी को चीन के विदेशमंत्री वांग यी श्रीलंका के दौरे पर पहुंचे थे. श्रीलंका सरकार ने चीन से लगभग 40हज़ार करोड़ रुपये का लोन ले रखा है. अगर सरकारी संस्थाओं और सेंट्रल बैंक को जोड़दिया जाए तो क़र्ज़ का आंकड़ा बढ़ जाता है. 09 जनवरी को वांग यी ने श्रीलंका केराष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे से मुलाक़ात की. इस दौरान राजपक्षे ने चीन से क़र्ज़के भुगतान में रियायत देने की अपील की. उन्होंने कहा कि श्रीलंका भारी संकट के दौरसे गुज़र रहा है. अगर चीन क़र्ज़ लेने में थोड़ी सी नरमी बरते तो बड़ी राहत होगी.चीन, श्रीलंका का चौथा सबसे बड़ा क़र्ज़दाता है. पहले तीन नंबर पर आते हैं -अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार, एशियन डेवलपमेंट बैंक और जापान. श्रीलंका के ऊपरलगभग 26 अरब डॉलर का लोन लदा है. उसे 2022 में साढ़े चार अरब डॉलर चुकाना है. इसमेंसे डेढ़-दो अरब डॉलर चीन को जाएगा. चीन का ब्याज दर बाकियों की तुलना में दोगुने सेभी अधिक है. अगर उसका क़र्ज़ नहीं चुकाया गया तो बोझ बढ़ता चला जाएगा. 2017 में इसीआधार पर चीन ने श्रीलंका का हमबनटोटा बंदरगाह भी क़ब्ज़ा लिया था. श्रीलंका सरकारइस स्थिति से बचना चाहती है. इसलिए, वो बार-बार चीन से छूट देने की अपील कर रही है.श्रीलंका सरकार चीनी पर्यटकों को एंट्री देने के लिए भी राज़ी हो गई है. बशर्ते वेकोविड प्रोटोकॉल्स का पालन करें. महामारी से पहले तक चीनी पर्यटक बड़ी संख्या मेंश्रीलंका आते थे. महामारी के बाद उनकी आवक लगभग बंद है. श्रीलंका के प्रस्ताव परअभी तक चीन का जवाब नहीं आया है. हालांकि, चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स नेवांग की श्रीलंका यात्रा पर एक रिपोर्ट पब्लिश की है. इस रिपोर्ट में चीन कीदयाशीलता और उदारता का जमकर बखान किया गया है. इसमें ये भी कहा गया है कि श्रीलंकामें चीन के प्रोजेक्ट्स को सफ़ेद हाथी कहने की बात बिल्कुल ही ग़लत है. श्रीलंका,चीन का साझेदार था, है और बना रहेगा. ग्लोबल टाइम्स ने ये भी लिखा कि चीन श्रीलंकाके क़र्ज़ के भार को कम करने के लिए हरसंभव कोशिश करेगा. इस कोशिश में कितना छलछिपा होगा, ये देखने वाली बात होगी.