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ये SCO क्या है, जिसके सम्मेलन में भारत पाकिस्तान को बुलाने जा रहा है

2019 की समिट में पीएम मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर इमरान खान को खूब सुनाया था.

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17 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 17 जनवरी 2020, 10:46 AM IST)
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2019 में किर्गिस्तान के बिश्केक सम्मेलन में इमरान खान और पीएम मोदी शामिल हुए थे. इसमें मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर राज्य प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा उठाया था. फोटो: AP
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दुनियाभर के कई देश कुछ मसलों में एक-दूसरे की मदद करते हैं या इसकी बात करते हैं. इसके लिए उन्होंने संगठन बना रखे हैं. अलग-अलग समय पर इन देशों के मुखिया या उनके प्रतिनिधि आपस में मिलते हैं. बतियाते हैं. सुझाव देते हैं. भविष्य को लेकर करार करते हैं. ऐसा ही एक संगठन है- शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO).
SCO आठ देशों का संगठन है. अक्टूबर में इसकी 2020 समिट भारत में होनी है. भारत पहली बार इसे होस्ट करेगा. इसमें भारत पाकिस्तान को बुलाएगा. विदेश मंत्रालय का कहना है कि SCO के प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को समिट में हिस्सा लेने के लिए निमंत्रण भेजा जाएगा.
पिछली बार मोदी ने इमरान को खूब सुनाया
अब ये पाकिस्तान पर निर्भर है कि इमरान खान SCO समिट में आते हैं या अपने किसी प्रतिनिधि को भेजते हैं. पुलवामा हमले, जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने के बाद दोनों देश के बीच चीज़ें गंभीर चल रही हैं. इसका असर 2019 के किर्गिस्तान SCO समिट में भी दिखा था. तब पीएम मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर इसे खूब सुनाया था. मोदी ने कहा था कि जो देश आतंकवाद को मदद देते हैं, उसे प्रायोजित करते हैं, उनकी फंडिंग करते हैं, उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए.
अब देखना है कि इस माहौल में इमरान खान आते हैं या नहीं. आखिरी बार नवाज़ शरीफ बतौर प्रधानमंत्री भारत आए थे. 2014 में मोदी के शपथ-ग्रहण में. इसके बाद पाकिस्तान का कोई प्रधानमंत्री भारत नहीं आया है.
2019 में किरगिस्तान की राजधानी बिश्केक में पहली बार इमरान खान और नरेंद्र मोदी एक मंच पर साथ थे. हालांकि मोदी की इमरान खान से अलग से मुलाकात नहीं हुई थी. फोटो: AP
2019 में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में पहली बार इमरान खान और नरेंद्र मोदी एक मंच पर साथ थे. हालांकि मोदी की इमरान खान से अलग से मुलाकात नहीं हुई थी. फोटो: AP

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने बताया, 'भारत इस साल सरकारों के मुखिया की मेजबानी करेगा. SCO की प्रक्रिया के हिसाब से सभी आठ सदस्य देशों, चार ऑब्जर्वर देशों और डायलॉग पार्टनर्स को बुलाया जाएगा.'
क्या है शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन?
चीन का शहर है शंघाई. 15 जून, 2001 को यहां शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) बनाने का ऐलान किया गया. तब इसमें 6 देश थे- किर्गिस्तान, कज़ाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान. 2017 में इसमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हो गए. अब आठ देश इसके स्थायी सदस्य हैं.
कहां-कहां हैं ये देश?
इन देशों की लोकेशन की वजह से इस संगठन को यूरेशियाई देशों का संगठन कहा जाता है. यूरेशिया मतलब यूरोप प्लस एशिया. रूस एशिया और यूरोप दोनों का हिस्सा है. पांच देश किर्गिस्तान, कज़ाकस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान सेंट्रल एशिया में हैं. चीन पूर्वी एशिया में है. भारत और पाकिस्तान, दोनों दक्षिण एशिया में हैं. मध्य एशिया में पांच देश आते हैं- कज़ाकिस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान. (फोटो: गूगल मैप्स)
संगठन का काम क्या है?
SCO का मकसद राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य मामलों में के देश एक-दूसरे की मदद करना है. इन्होंने जो लक्ष्य तय किए हैं, वो ये हैं-
- सदस्य देशों के बीच आपसी भरोसा मजबूत करना - जो सदस्य पड़ोसी हैं, उनके बीच पड़ोसी भावना बढ़ाना - राजनीति, व्यापार, अर्थव्यवस्था, रिसर्च, तकनीक और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में असरदार सहयोग - शिक्षा, ऊर्जा, परिवहन, पर्यटन, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों में भी आपसी सहयोग बढ़ाना - शांति, सुरक्षा और स्थिरता का माहौल बनाए रखने के लिए पारस्परिक हिस्सेदारी - लोकतांत्रिक, निष्पक्ष और तर्कसंगत राजनीतिक और आर्थिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की कोशिश
स्थायी सदस्यों के अलावा SCO के साथ कौन है?
शंघाई सहयोग संगठन के चार ऑर्ब्जवर देश हैं. ये चारों अफगानिस्तान, ईरान, बेलारूस और मंगोलिया हैं. ये देश सदस्य देशों के आसपास हैं और इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और लिंकेज के हिसाब से अहम हैं. इनके अलावा छह डायलॉग पार्टनर भी हैं SCO में- अज़रबैजान, आर्मेनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की और श्रीलंका.
SCO की अहमियत क्या है भारत के लिए?
पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध अच्छे नहीं हैं. सीमा-रेखा और पाकिस्तान से दोस्ती की वजह से चीन के साथ भी तनातनी रहती है. मगर इन दोनों के अलावा SCO के दूसरे सदस्यों के साथ भारत की अच्छी बनती रही है. सबसे ज़्यादा रूस और मध्य एशियाई देशों से.
मध्य एशिया के देशों के लिए भारत की नीति है- कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी. इसके अलावा रूस, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान को मिला दें, तो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस और तेल का भंडार बनता है. तुर्कमेनिस्तान के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा और उज़्बेकिस्तान के पास आठवां सबसे बड़ा गैस भंडार है.
कज़ाकस्तान और उज़्बेकिस्तान के पास यूरेनियम भी है. अगर इनके साथ भारत का करार हो, तो कम लागत में हमें तेल और गैस की सप्लाई मिल सकती है.
मध्य एशिया से हमारे रिश्ते कैसे हैं?
SCO के पांच मध्य एशियाई देश भारत के विस्तृत पड़ोस का हिस्सा हैं. इनके साथ हमारे रिश्ते पुराने हैं. भारत के कुषाण साम्राज्य के राजा कनिष्क को वहां से लोग अपना पूर्वज मानते हैं. कनिष्क का राज भारत के अलावा मध्य एशिया में भी फैला था. इसी मध्य एशिया के सिल्क रूट की राह कई यात्री भारत आए. न केवल व्यापार, बल्कि धर्म और संस्कृति में भी कई कनेक्शन हैं. आज भी हिंदी फिल्में और इनके गाने मध्य एशियाई मुल्कों में खूब पसंद किए जाते हैं.
सोवियत के दौर में इनसे कैसा संबंध था?
कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान. ये सब सोवियत का हिस्सा हुआ करते थे. सोवियत के साथ भारत के संबंध अच्छे थे. जब दुनिया के एक बड़े प्रभावी हिस्से ने सोवियत से दूरी बनाई हुई थी, उस दौर में भी मध्य एशिया के इन पांचों मुल्कों के साथ भारत के अच्छे ताल्लुकात थे. बल्कि 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग में संघर्ष-विराम होने के बाद दोनों देश समझौते के लिए उज़्बेकिस्तान की ही राजधानी ताशकंद में पहुंचे थे. 

भारत बेहद गिने-चुने देशों में था, जिसका ताशकंद में अपना एक दूतावास हुआ करता था. सोवियत खत्म होने के बाद भारत और मध्य एशियाई देशों में थोड़ी दूरी आ गई.लेकिन अब ये देश प्राकृतिक संसाधनों के बल पर मज़बूत हो गए हैं.
ये ताशकंद समझौते के समय की तस्वीर है. लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान, दोनों साथ खड़े हैं. इस तस्वीर के लिए जाने के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री की मौत हो गई. ताशकंद समझौते के समय की तस्वीर. लालबहादुर शास्त्री और अयूब खान, दोनों साथ खड़े हैं. इस तस्वीर के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री की मौत हो गई.
SCO से भारत को और क्या फायदे हैं?
मध्य एशिया से भारत की सीमा नहीं लगती. न ही उन तक पहुंचने के लिए समंदर का सीधा कोई रास्ता है. भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता पाकिस्तान और अफगानिस्तान से होकर जाता है. पाकिस्तान से हमारे रिश्ते ठीक नहीं हैं. दूसरा, अफगानिस्तान बेहद अस्थिर और असुरक्षित समझा जाता है. व्यापार और कारोबार के लिए बस लिंक और नेटवर्क नहीं, सुरक्षा भी चाहिए.
इसी की कमी के कारण TAPI (तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडिया) जैसी अहम गैस पाइपलाइन योजना लटकी हुई है. 1,814 किलोमीटर लंबी ये पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान से शुरू होकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत तक पहुंचेगी. चारों देशों ने 2010 में इसके समझौते पर दस्तखत किए. 2020 में इसके शुरू होने की बात थी, मगर ये कब हो पाएगा पता नहीं. अब SCO में चीन और पाकिस्तान दोनों हैं. ऐसे में अगर सच में बातचीत से राह निकले, तो भारत को बहुत फायदा हो सकता है.


शंघाई सहयोग संगठन: पीएम मोदी ने इमरान खान के सामने ही पाकिस्तान को खरी खोटी सुना दी

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