The Lallantop
Advertisement

क्या है ये 'प्राइड' जिसके लिए दिल्ली सड़कों पर उतरने वाली है?

ये किसी के लिए महज एक शब्द है तो किसी के लिए पूरी जिंदगी.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
प्रतीक्षा पीपी
24 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 24 नवंबर 2016, 12:18 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
आने वाले संडे को दिल्ली के सैकड़ों लोग सड़कों पर एक बार फिर उतरने वाले हैं. वजह है 'प्राइड परेड'. यानी समलैंगिकों, ट्रांसजेंडर, हिजड़े, क्रॉस-ड्रेस और हर वो इंसान जो खुद को स्त्री या पुरुष होने तक सीमित नहीं रखना चाहता, उनका मिलन, उनका उत्सव. उसको सपोर्ट करने वालों का उत्सव.
Image embed

प्राइड क्या है, प्राइड क्यों है?

'प्राइड' अंग्रेजी का शब्द है. जिसका मतलब है गर्व.
हम कोई अच्छा काम करते हैं, तो हमसे प्रेम करने वालों को हम पर गर्व होता है. जीवन में सफल होते हैं, तो खुद पर गर्व करते हैं. कितनी सकारत्मक फीलिंग होती है न, 'गर्व' की.
मुझे याद है बचपन में जो बच्चे पढ़ने में कमजोर होते थे, या होमवर्क नहीं करते थे, उनकी एक अलग सीट बना दी जाती थी. उन्हें बाकी बच्चे खुद से कम समझते. कभी-कभी मजाक भी उड़ाते. कोई इस बात का खयाल नहीं करता कि उनकी ऐसी हालत क्यों है? कि क्या उनके परिवार के हालात ठीक हैं. क्या उनके माता-पिता को कभी पढ़ने का मौका नहीं मिला जो वो अपने बच्चे को पढ़ाई वाला बैकग्राउंड नहीं दे पाए. क्या उनके पास दूसरे बच्चों की तरह महंगे ट्यूटर लगवाने के पैसे हैं या नहीं. और सब कुछ छोड़ भी दें, तो क्या किसी एवरेज बच्चे का एवरेज होना ऐसा गुनाह था कि उन्हें दूसरे बच्चों से अलग बैठाया जाए?
Image embed

A participant attends the fourth Delhi Queer Pride parade, an event promoting gay, lesbian, bisexual and transgender rights in New Delhi November 27, 2011.  REUTERS/Adnan Abidi 

हो सकता है आप उन एवरेज बच्चों में से एक हों. हो सकता है आपको आत्मविश्वास के टूटने के मायने मालूम हों. हो सकता है आपको 50 बच्चों की क्लास में अकेलापन महसूस करने के मायने मालूम हों.
कभी ऐसा हुआ है, कि किसी मॉल में, मेले में, पार्टी में, या रेस्टोरेंट में आप अकेले हुए हों? कभी रेलवे स्टेशन पर उतरें और अचानक आपका साथी खो जाए? जरूर हुआ होगा. और ऐसा होने पर आपने महसूस किया होगा एक अजीब सा डर. इस बात का डर नहीं कि कोई आपको पीट देगा. या कोई मार डालेगा. बस अकेला होने का डर. किसी भी साथी के न होने का डर. फिर जब आपका साथी आपको मिल जाता है, कैसी राहत की सांस भरते हैं आप.
अब एक मिनट के लिए सोचिए उनके बारे में, जो समझदारी की उम्र से बुढ़ापे तक खुद को अकेले पाते आए हैं. जिनसे कोई बात नहीं करता, जिनका मजाक उड़ता हो. जिनको सभी लोग उस तरह देखते हों जैसे क्लास के कमजोर बच्चों को देखा जाता था. सिर्फ इसलिए, कि वो दूसरों से नहीं थे. और इसलिए उन पर किसी को कभी-कभी गर्व नहीं हुआ. उन्होंने कभी महसूस नहीं किया कि 'प्राइड' क्या है.
हमारे बीच ऐसे ही कुछ समुदाय हैं, जिन्होंने कभी महसूस नहीं किया कि 'प्राइड' क्या है. उन्हें 'मेहतर', 'भंगी', 'चमार' बोलकर टॉयलेट साफ़ करने के लिए एक फुट दूर से पैसे पकड़ाए गए, उनके गिलास और कप अलग कर दिए गए. या फिर उन 'लड़कों' को जिनकी चाल को 'जनाना' बताकर उन पर हंसा गया. उन लड़कों को जिनको लंबे बाल नहीं रखने दिए गए. उन लड़कियों को जिनकी आवाज़ भारी या चाल तेज होने की वजह से 'मर्दाना' कहा गया. उन लोगों को जिनके मुसलमान होने पर उनको किराए पे घर नहीं मिले. उन लड़कियों को जिनका लड़की होने की वजह से रेप कर दिया गया या उन हिजड़ों को जिन्हें इंसान न समझकर नंगा कर पीटा गया. उन लोगों को जिन्हें सिर्फ इसलिए पेशाब पिलाया गया, जिनका मुंह काला किया गया, सिर्फ इसलिए कि वो चुन सके कि वो किस कौम, जाति या किस लिंग के साथ पैदा हों.
अगर आप उन लोगों में से एक हैं, तो आप शायद समझ सकते हैं कि हमें क्यों जरूरत है 'प्राइड' की. क्यों होना चाहिए ऐसे लोगों के जीवन में 'गर्व'. क्योंकि गर्व हर तरह की शर्म, डर, अकेलेपन का विलोम है.
इसी प्राइड के उत्सव को मनाने के लिए लोग एक बार फिर दिल्ली की सड़कों पर उतरने वाले हैं. चीखने वाले हैं, चिलाने वाले हैं, नाचने-गाने वाले, एक-दूसरे के गलों में हाथ डालकर, बांहों में बांहें डालकर चलने वाले हैं. एक दूसरे को चूमने वाले हैं. और अगर आप इसे प्यार की बेजा नुमाइश कहते हैं तो नुमाइश ही सही, मगर करने वाले हैं.

कैसे शुरू हुई प्राइड परेड?

आज से तकरीबन 60 साल पहले, अमेरिका में समलैंगिकों ने सरकार के नियमों का विरोध करना चालू कर दिया था तो समलैंगिकता को गुनाह मानते थे. समलैंगिकता तो तबसे थी, जबसे दुनिया है. लेकिन इसको 'नॉर्मल' की मान्यता मिलने की लड़ाई 1950 के दशक में शुरू हुई. 1960 का दशक आते-आते एक्टिविस्ट लोग सड़कों पर उतर चुके थे. और पिकेटिंग के जरिए सरकार तक समलैंगिकों के लिए सामान अधिकार की मांग कर रहे थे. अमेरिका में कुछ गे बार और गे बसेरे भी चल रहे थे.
1969 में एक ऐसे ही 'इन' जिसमें गे, लेस्बियन और ट्रांसजेंडर भारी मात्रा में जाते थे, पर पुलिस ने छापा मारा. लोगों को गिरफ्तार किया. और देखते ही देखते मुद्दा इतना बड़ा हो गया कि एक सुबह सैकड़ों समलैंगिक और ट्रांसजेंडर सड़कों पर उतर आए. दुनिया के इतिहास में इसी के साथ दर्ज हुई पहली प्राइड परेड.
Image embed


Gay rights activists listen to a speaker during "Queer Pride March" in New Delhi June 29, 2008. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA)
आज लगभग दुनिया भर के 40 देशों में प्राइड परेड होती है. और हर देश के तमाम शहरों में भी. दिल्ली में ये परेड 2007 में शुरू हुई. और हर साल नवंबर में इसका आयोजन किया जाता है. दिल्ली के अलावा इसे सबसे पहले बंगलुरु, कोलकाता और पुदुचेरी में आयोजित किया गया. और उसके बाद मुंबई, गुवाहाटी, चेन्नई, गुरुग्राम और ढेर सारे शहरों में.

दिल्ली में कब और कहां आना होगा?

बाराखंबा रोड, कनॉट प्लेस. तारीख 24 नवंबर यानी संडे.


ये भी पढ़ें:

इन हिंदी तस्वीरों से समझ लो 'गे' और 'लेस्बियन' कौन होते हैं

'तुम हिजड़े हो क्या जो लिपस्टिक लगाकर नाचोगे?'

इंडिया के हिजड़ों का ये वीडियो सुपरहिट हो रहा है, आपने देखा क्या

'मैं एक भारतीय गे मुसलमान हूं, यही मेरी पहचान है'

'मैं हर जनम में हिजड़ा होना चाहती हूं'

जरूरी तो नहीं कि हर इंसान खुद को 'औरत' या 'मर्द' कहलाना चाहे

Advertisement

Advertisement

()