आने वाले संडे को दिल्ली के सैकड़ों लोग सड़कों पर एक बार फिर उतरने वाले हैं. वजह है'प्राइड परेड'. यानी समलैंगिकों, ट्रांसजेंडर, हिजड़े, क्रॉस-ड्रेस और हर वो इंसानजो खुद को स्त्री या पुरुष होने तक सीमित नहीं रखना चाहता, उनका मिलन, उनका उत्सव.उसको सपोर्ट करने वालों का उत्सव.प्राइड क्या है, प्राइड क्यों है?'प्राइड' अंग्रेजी का शब्द है. जिसका मतलब है गर्व.हम कोई अच्छा काम करते हैं, तो हमसे प्रेम करने वालों को हम पर गर्व होता है. जीवनमें सफल होते हैं, तो खुद पर गर्व करते हैं. कितनी सकारत्मक फीलिंग होती है न,'गर्व' की.मुझे याद है बचपन में जो बच्चे पढ़ने में कमजोर होते थे, या होमवर्क नहीं करते थे,उनकी एक अलग सीट बना दी जाती थी. उन्हें बाकी बच्चे खुद से कम समझते. कभी-कभी मजाकभी उड़ाते. कोई इस बात का खयाल नहीं करता कि उनकी ऐसी हालत क्यों है? कि क्या उनकेपरिवार के हालात ठीक हैं. क्या उनके माता-पिता को कभी पढ़ने का मौका नहीं मिला जो वोअपने बच्चे को पढ़ाई वाला बैकग्राउंड नहीं दे पाए. क्या उनके पास दूसरे बच्चों कीतरह महंगे ट्यूटर लगवाने के पैसे हैं या नहीं. और सब कुछ छोड़ भी दें, तो क्या किसीएवरेज बच्चे का एवरेज होना ऐसा गुनाह था कि उन्हें दूसरे बच्चों से अलग बैठाया जाए?A participant attends the fourth Delhi Queer Pride parade, an event promotinggay, lesbian, bisexual and transgender rights in New Delhi November 27, 2011. REUTERS/Adnan Abidi हो सकता है आप उन एवरेज बच्चों में से एक हों. हो सकता है आपको आत्मविश्वास केटूटने के मायने मालूम हों. हो सकता है आपको 50 बच्चों की क्लास में अकेलापन महसूसकरने के मायने मालूम हों.कभी ऐसा हुआ है, कि किसी मॉल में, मेले में, पार्टी में, या रेस्टोरेंट में आपअकेले हुए हों? कभी रेलवे स्टेशन पर उतरें और अचानक आपका साथी खो जाए? जरूर हुआहोगा. और ऐसा होने पर आपने महसूस किया होगा एक अजीब सा डर. इस बात का डर नहीं किकोई आपको पीट देगा. या कोई मार डालेगा. बस अकेला होने का डर. किसी भी साथी के नहोने का डर. फिर जब आपका साथी आपको मिल जाता है, कैसी राहत की सांस भरते हैं आप.अब एक मिनट के लिए सोचिए उनके बारे में, जो समझदारी की उम्र से बुढ़ापे तक खुद कोअकेले पाते आए हैं. जिनसे कोई बात नहीं करता, जिनका मजाक उड़ता हो. जिनको सभी लोग उसतरह देखते हों जैसे क्लास के कमजोर बच्चों को देखा जाता था. सिर्फ इसलिए, कि वोदूसरों से नहीं थे. और इसलिए उन पर किसी को कभी-कभी गर्व नहीं हुआ. उन्होंने कभीमहसूस नहीं किया कि 'प्राइड' क्या है.हमारे बीच ऐसे ही कुछ समुदाय हैं, जिन्होंने कभी महसूस नहीं किया कि 'प्राइड' क्याहै. उन्हें 'मेहतर', 'भंगी', 'चमार' बोलकर टॉयलेट साफ़ करने के लिए एक फुट दूर सेपैसे पकड़ाए गए, उनके गिलास और कप अलग कर दिए गए. या फिर उन 'लड़कों' को जिनकी चाल को'जनाना' बताकर उन पर हंसा गया. उन लड़कों को जिनको लंबे बाल नहीं रखने दिए गए. उनलड़कियों को जिनकी आवाज़ भारी या चाल तेज होने की वजह से 'मर्दाना' कहा गया. उन लोगोंको जिनके मुसलमान होने पर उनको किराए पे घर नहीं मिले. उन लड़कियों को जिनका लड़कीहोने की वजह से रेप कर दिया गया या उन हिजड़ों को जिन्हें इंसान न समझकर नंगा करपीटा गया. उन लोगों को जिन्हें सिर्फ इसलिए पेशाब पिलाया गया, जिनका मुंह काला कियागया, सिर्फ इसलिए कि वो चुन सके कि वो किस कौम, जाति या किस लिंग के साथ पैदा हों.अगर आप उन लोगों में से एक हैं, तो आप शायद समझ सकते हैं कि हमें क्यों जरूरत है'प्राइड' की. क्यों होना चाहिए ऐसे लोगों के जीवन में 'गर्व'. क्योंकि गर्व हर तरहकी शर्म, डर, अकेलेपन का विलोम है.इसी प्राइड के उत्सव को मनाने के लिए लोग एक बार फिर दिल्ली की सड़कों पर उतरने वालेहैं. चीखने वाले हैं, चिलाने वाले हैं, नाचने-गाने वाले, एक-दूसरे के गलों में हाथडालकर, बांहों में बांहें डालकर चलने वाले हैं. एक दूसरे को चूमने वाले हैं. और अगरआप इसे प्यार की बेजा नुमाइश कहते हैं तो नुमाइश ही सही, मगर करने वाले हैं.कैसे शुरू हुई प्राइड परेड?आज से तकरीबन 60 साल पहले, अमेरिका में समलैंगिकों ने सरकार के नियमों का विरोधकरना चालू कर दिया था तो समलैंगिकता को गुनाह मानते थे. समलैंगिकता तो तबसे थी,जबसे दुनिया है. लेकिन इसको 'नॉर्मल' की मान्यता मिलने की लड़ाई 1950 के दशक मेंशुरू हुई. 1960 का दशक आते-आते एक्टिविस्ट लोग सड़कों पर उतर चुके थे. और पिकेटिंगके जरिए सरकार तक समलैंगिकों के लिए सामान अधिकार की मांग कर रहे थे. अमेरिका मेंकुछ गे बार और गे बसेरे भी चल रहे थे.1969 में एक ऐसे ही 'इन' जिसमें गे, लेस्बियन और ट्रांसजेंडर भारी मात्रा में जातेथे, पर पुलिस ने छापा मारा. लोगों को गिरफ्तार किया. और देखते ही देखते मुद्दा इतनाबड़ा हो गया कि एक सुबह सैकड़ों समलैंगिक और ट्रांसजेंडर सड़कों पर उतर आए. दुनिया केइतिहास में इसी के साथ दर्ज हुई पहली प्राइड परेड.Gay rights activists listen to a speaker during "Queer Pride March" in New DelhiJune 29, 2008. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA)आज लगभग दुनिया भर के 40 देशों में प्राइड परेड होती है. और हर देश के तमाम शहरोंमें भी. दिल्ली में ये परेड 2007 में शुरू हुई. और हर साल नवंबर में इसका आयोजनकिया जाता है. दिल्ली के अलावा इसे सबसे पहले बंगलुरु, कोलकाता और पुदुचेरी मेंआयोजित किया गया. और उसके बाद मुंबई, गुवाहाटी, चेन्नई, गुरुग्राम और ढेर सारेशहरों में.दिल्ली में कब और कहां आना होगा?बाराखंबा रोड, कनॉट प्लेस. तारीख 24 नवंबर यानी संडे.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:इन हिंदी तस्वीरों से समझ लो 'गे' और 'लेस्बियन' कौन होते हैं'तुम हिजड़े हो क्या जो लिपस्टिक लगाकर नाचोगे?'इंडिया के हिजड़ों का ये वीडियो सुपरहिट हो रहा है, आपने देखा क्या'मैं एक भारतीय गे मुसलमान हूं, यही मेरी पहचान है''मैं हर जनम में हिजड़ा होना चाहती हूं'जरूरी तो नहीं कि हर इंसान खुद को 'औरत' या 'मर्द' कहलाना चाहे