The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • What is Gelatin, an explosive which resulted in Karnataka's Shivamogga Blast?

जिलेटिन क्या है, जिसके धमाके से कर्नाटक के शिमोगा जिले की धरती हिल गई?

जिस ट्रक में जोरदार धमाका हुआ, उसमें जिलेटिन भरा था

Advertisement
pic
22 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 22 जनवरी 2021, 01:00 PM IST)
Img The Lallantop
जिलेटिन की छड़ियां होतीं हैं, इन्हें खदानों में विस्फोट के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
Quick AI Highlights
Click here to view more
कर्नाटक में शिमोगा नाम का एक जिला है. 21 जनवरी की रात यहां एक बड़ा धमाका हुआ. इस धमाके से आठ लोगों की मौत हो गई. ये घटना एक बोल्डर क्रशिंग साइट के पास हुई. यहां बड़ी-बड़ी चट्टानों के टुकड़े किए जाते हैं. बोल्डर क्रशिंग साइट पर एक ट्रक खड़ा हुआ था. इस में ट्रक विस्फोटक सामग्री भरी हुई थी. खबरों के मुताबिक, यहीं एक बहुत बड़ा विस्फोट हुआ. छह लोगों की मौत मौके पर ही हो गई.
पुलिस ने बताया कि ये ट्रक जिलेटिन से भरा हुआ था. जिलेटिन के कई दूसरे मतलब भी होते हैं. भोजन के एक तत्व को भी जिलेटिन कहते हैं. लेकिन यहां जिस जिलेटिन की बात हो रही है, वो एक विस्फोटक है. इसका असली नाम है जेलिग्नाइट. इसे ब्लास्टिंग जिलेटिन भी कहा जाता है. जेलिग्नाइट यानी ब्लास्टिंग जिलेटिन का आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल ने किया था. इन्हीं के नाम से हर साल नोबेल पुरस्कार बांटे जाते हैं. अल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट का आविष्कार भी किया था. जिलेग्नाइट और डायनामाइट, इन दोनों का इस्तेमाल माइनिंग में ही किया जाता है. कई बार ये बड़ी इमारतों को गिराने के काम भी आते हैं
आपने फिल्मों में देखा होगा. जब भी माइनिंग वाली जगहों का सीन आता है, एक आदमी अपने हाथ से एक पंप जैसी चीज (ब्लास्टिंग स्विच) दबाता है. इसके बाद खदान में जोर का धमाका होता है. इसी धमाके के लिए जिलेटिन और डायनामाइट जैसे विस्फोटक काम आते हैं.
इस पंप को डेटोनेटर कहते हैं. ये विस्फोटकों को सक्रिय कर देता है.
इस पंप को डेटोनेटर कहते हैं. ये विस्फोटकों को सक्रिय कर देता है.

आविष्कार कैसे हुआ?
जिलेग्नाइट के आविष्कार से जुड़ा एक किस्सा सुनाया जाता है. हुआ ये कि एक बार अल्फ्रेड नोबेल की उंगली में चोट लग गई. और वो उंगली दुखे जा रही थी. तो दर्द से छुटकारा पाने के लिए नोबेल ने कोलोडियन लगाया. कोलोडियन जो है, ईथर और एल्कोहॉल में नाइट्रोसेल्युलोस मिलाने से बनता है. इस कोलोडियन को नोबेल ने अपने घाव पर लगाया. लेकिन कुछ खास आराम नहीं मिला.
दर्द के सारे अल्फ्रेड नोबेल को नींद नहीं आ रही थी. आम आदमी को नींद नहीं आती तो अपने बगीचे या बालकनी में जाता है. अल्फ्रेड नोबेल साइंटिस्ट आदमी थे. ये पहुंच गए अपनी लैब में. लैब में जाकर ये एक्सपेरिमेंट करने लग गए. नोबेल को सूझा कि जो कोलोडियन उन्होंने अपनी उंगली में लगाया है, इसका नाइट्रोग्लिसरिन पर क्या असर होगा.
अल्फ्रेड नोबेल और नोबेल प्राइज़ में दिया जाने वाला सिक्का.
अल्फ्रेड नोबेल और नोबेल प्राइज़ में दिया जाने वाला सिक्का.

नोबेल ने कोलोडियन और नाइट्रोग्लिसरीन को मिलाया. इसका नतीजा देखकर उन्हें बड़ा संतोष हुआ. नोबेल को मालूम हुआ कि सॉल्वेंट्स का वाष्पीकरण होने के बाद एक ठोस प्लास्टिक टाइप का मटेरियल बच जाता है. उन्होंने अलग-अलग चीजों की मात्रा बदलकर और प्रयोग किए. यहां से ब्लास्टिंग जिलेटिन अस्तित्व में आया.
डायनामाइट के इस नए भाई को नाम मिला जिलेग्नाइट. अल्फ्रेड नोबेल ने 1875 में जिलेग्नाइट का पेटेंट करा लिया. यानी उन्होंने ये दर्ज करा लिया कि जिलेग्नाइट का आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल ने किया है. बाद में इसे ब्लास्टिंग जिलेटिन भी कहा जाने लगा. ब्लास्टिंग जिलेटिन ठोस होने के साथ प्लास्टिक भी था. यानी इसका आकार बदला जा सकता था. इसलिए इसकी मोटी-मोटी छड़ी बनाई जाने लगीं. जिलेग्नाइट की इन छड़ियों को जिलेटिन स्टिक्स कहा जाता है.
नोबेल को अपने एक्सपेरिमेंट्स से पता चला कि नाइट्रोसेल्युलोस और नाइट्रोग्लिसरीन को मिलाने से एक ठोस, प्लास्टिक मटेरियल बनता है. ये मटेरियल साधारण डायनामाइट से ज्यादा ऊर्जा के साथ ब्लास्ट होता है. इसकी एक विशेषता यह भी है कि ये मटेरियल वॉटर रेजिस्टेंट है. यानी ये पानी से खुद को बचा लेता है.
नाइट्रोसेल्युलोस और नाइट्रोग्लिसरिन.
नाइट्रोसेल्युलोस और नाइट्रोग्लिसरीन.

कितना सेफ है?
शुरुआत में ब्लास्टिंग जिलेटिन बनाने के लिए मुख्यत: नाइट्रोसेल्युलोस और नाइट्रोग्लिसरीन का इस्तेमाल किया जाता था. आगे चलकर लोगों ने नाइट्रोग्लिसरीन की जगह अमोनियम नाइट्रेट मिलाना शुरू कर दिया. इससे इसे बनाने में कम लागत आती है. और ये सस्ता मिलता है. ये वाला मिक्सचर ज्यादा सेफ भी है.
जिलेटिन को डायनामाइट से ज्यादा स्टेबल माना जाता है. स्टेबल होने का मतलब है कि ये ब्लास्ट होने के लिए कम तत्पर रहता है. इसे संभालने में डायनामाइट से कम रिस्क है. अगर ये कहीं ले जाते हुए गिर जाए, तो कुछ नहीं होगा. कोई इसे ठोकने-पीटने लगे, तो भी कुछ नहीं होगा. इसे एक जगह से दूसरी जगहा फेंका भी जा सकता है. और इसके छोटे-छोटे टुकड़ों को जलाया भी जा सकता है.
लेकिन ये ध्यान रखने वाली बात है कि जिलेटिन सिर्फ तब तक सेफ है, जब तक आसपास इसे ऐक्टिवेट करने के लिए कुछ न हो. अगर कहीं बहुत ज्यादा मात्रा में जिलेटिन रखा है और उसमें आग लग जाए, तो इसमें धमाका होना तय है. जिलेटिन से होने वाला धमाका कितना घातक हो सकता है, इसका अंदाजा कर्नाटक की घटना से लग जाता है. अभी तक आई रिपोर्टों में बताया गया है कि ये धमाका इतना बड़ा था कि आसपास लोगों को भूकंप जैसा महसूस हुआ. कुछ घरों की खिड़कियां टूट गईं. कहीं-कहीं तो सड़कों में दरार तक आ गई. ये अभी तक साफ नहीं हुआ है कि जिलेटिन से भरे ट्रक में धमाका कैसे हुआ. फिलहाल इसकी जांच की जा रही है.

Advertisement

Advertisement

()