तू फतवा फतवा करती है, फतवे से क्यों डरती है. गाने की लाइन क्यों जोड़ दी, ये सोचकेभावनाएं आहत न करना. ये महज़ तुकबंदी है. मीडिया से सवाल है. सवाल इसलिए है कि इधरमौलवी ने कुछ कहा, उधर फतवा बदनाम हो गया. हद ये हो गई है कि मौलवी साहब ने जंभाईलेना चाही. मीडिया ने समझा फतवा आ गया. और इस चक्कर में फ़ोकट में मौलवी साहब बदनामीतो छोड़िए मशहूर हो गए और दुकान चल पड़ी. फतवे को लेकर इतना शोर मचा दिया जाता है.जैसे वो फतवा नहीं बल्कि कोई तुगलकी फरमान आ गया है. अब वो सारे अधिकार छीन लेगा.वो सांस नहीं लेने देगा. वो सिर कलम कर देगा. ये शोर मचाने का नतीजा है. ये नासमझीका नतीजा है. इस हल्ले गुल्ले में फतवे का मतलब गायब हो जाता है. जिस तरह से असम कीसिंगर नाहिद आफरीन के साथ हुआ. मतलब मौलवी लोगों ने लेटर में लिखकर भेजा कुछ औरहल्ला मच गया कि फतवा जारी कर दिया गया. पहले ये जान लेना ज़रूरी है ये फतवा क्याहै? फतवा अरबी का लफ्ज़ है. जिसका मतलब होता है मुस्लिम लॉ के मुताबिक किसी निर्णयपर नोटिफिकेशन जारी करना. ओह थोड़ा मुश्किल हो गया. इसको ऐसे समझिए फतवा यानी राय,जो किसी को तब दी जाती है जब कोई अपना निजी मसला लेकर मुफ़्ती साहब के पास पहुंचे.और कहे मुफ़्ती साहब मेरे साथ ऐसा ऐसा है. इस सिचुएशन में बताइए इस्लाम के मुताबिकमुझे क्या करना चाहिए. अब मुफ़्ती साहब या तो इस्लामिक इतिहास खंगालेंगे कि अगर ऐसीसिचुएशन मोहम्मद साहब या किसी खलीफा, या इमाम या फिर आलिमे दीन के सामने आई तोउन्होंने क्या प्रावधान दिया. क्या सुझाव दिया. अगर कोई उदाहरण मिल जाता है तो वोबता देंगे. या फिर कुरान में कुछ ऐसा है तो वो बता दिया जाएगा. और अगर ऐसी सिचुएशनकहीं नहीं मिली तो फिर शरिया क़ानून को पढ़कर समझकर मुफ़्ती साहब अपनी राय दे देंगे.और ये ही जो अपनी तरफ से राय कायम करने वाला पॉइंट है ये ही थोड़ा गड़बड़ा जाता है.जिसकी वजह से कुछ ज्यादा हो हल्ला मच जाता है. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि येमैंने राय दे दी है और अब इसको माना ही जाएगा. ये महज़ राय है. जिसको मानना या नमानना उसके हाथ में है जो फतवे के लिए मौलवी साहब के पास गया था. पैगंबर मुहम्मदसाहब ने अपनी राय दीं, लेकिन कहीं ऐसा नहीं मिलता कि उन्होंने अपनी राय को मानने केलिए किसी पर दबाव डाला हो. ज़ोर ज़बरदस्ती दिखाई हो. बल्कि इन मुफ़्ती साहब की किताबोंमें ही ये मिलता है कि मुहम्मद साहब इस्लाम की पैरोकारी करते गए. और लोग उनकीशख्सियत से प्रभावित होकर मुसलमान बनते गए. फतवा, कोई कानून नहीं है. जिससे डरनाचाहिए. फतवा एक राय है उसको वैसे ही देखना चाहिए. और कोई भी फतवा नहीं दे सकता. जबतक उसे इस्लाम की पूरी जानकारी नहीं है. फतवा देने के लिए एक अथॉरिटी होती है जोपूरी तरह सोच विचार करती है. ज्यादातर फतवों में परिस्थिति और संदर्भ ही जुड़ा होताहै. ऐसे में ये फतवे सब पर लागू नहीं हो सकते. फतवा किसी सवाल का जवाब होता है. औरजब सवाल ही न हो तो फतवा कहां से आएगा. और अगर कोई अपनी राय ज़ाहिर कर रहा है तोइसका मतलब ये नहीं है कि वैसा करना अब अनिवार्य है. राय है. उस राय को कोई दूसरामौलवी अपने फतवे में इस्लामिक तर्क से नकार सकता है. हां जो शरिया कानून में उसेफॉलो करना होता है. लेकिन ये भी समाज विशेष की परिस्थितियों पर निर्भर करता है किकिस तरह उसका पालन करना है. हां अगर फतवा या राय को ज़बरदस्ती लागू कराया जाता है.वो गलत है. क्योंकि इस्लाम जोर ज़बरदस्ती की इजाज़त खुद ही नहीं देता. ये फतवे कासमर्थन करने वालों को भी समझ लेना चाहिए. जो ये समझ बैठते हैं कि मौलवी साहब ने कहाहै तो मानना ही पड़ेगा. और हम उसे मनवाकर रहेंगे. मीडिया को भी ये ऐसे ही समझनाचाहिए जैसे पैनल डिस्कशन में बैठे नेताओं की राय अलग-अलग होती है. मानना या न माननाएंकर के विवेक की बात है. मेरी भी अपनी राय है मेरे तर्कों के हिसाब से. आपकी भीहोगी. न आप मुझपर थोप सकते हैं और न ही मैं आप पर. सिर्फ राय है जो दी जा सकती है.मानना न मानना एक दूसरे के हाथ में. और अगर मनवाने की जोर जबरी होती है तो वोअधिकारों का उल्लंघन है.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़िए :इस लड़की के गाने पर 46 मौलानाओं को ऐतराज़ क्यों?मुसलमान लड़की ने हिंदू भजन गाया, लोगों को मिर्ची लग गई ‘मुस्लिम बहुल’ देवबंद मेंभाजपा की जीत का सच! “इन्हीं आंखों से जहन्नुम देखा है, खुदा वो वक़्त फिर कभी नदिखाएं” अपने फेवरेट गानों को स्टूडियो में रिकॉर्ड होते देखो, बमबम हो जाओगे NUछात्र की मौत पर विरोध लाज़मी है, लेकिन तथ्यों पर तो हो! श्रेया घोषाल के जन्मदिनपर सुनिए नशा भर देने वाले गाने