चीन के हेनान प्रांत का अनयांग शहर. 10 जनवरी को यहां ओमिक्रॉन कोरोना वेरिएंट केदो केस सामने आए. अगले दिन पूरे शहर में लॉकडाउन लगा दिया गया. अनयांग, चीन कातीसरा शहर है, जिसमें इस समय कोविड लॉकडाउन लगा हुआ है. शियान तीन हफ़्ते से, जबकियुझू शहर पिछले आठ दिनों से लॉकडाउन में सांस ले रहे हैं. जैसा कि आपको पता है,कोविड का पहला केस चीन के वुहान में सामने आया था. वहीं से कोरोना महामारी पूरीदुनिया में फैली. कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर तमाम किस्म की थ्योरीज़ चलतींहै. मसलन, क्या ये वायरस चीन की लैब में बनाया गया? क्या ये चीन का जैविक हथियारहै? क्या इसे जान-बूझकर फैलाया गया? आदि इत्यादि. इन कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ पर आज तकविराम नहीं लगा है. और, ना ही इस सवाल पर कि कोरोना वायरस आख़िर आया कहां से? भलेही सवाल ना थमे हों, लेकिन चीन ने थाम लिया था. अपने यहां कोरोना का संक्रमण. अगरआप आंकड़े उठाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि चीन में कोरोना का जो कहर हुआ, वो शुरुआतीमहीनों तक ही सीमित रहा. साल 2020 के मार्च-अप्रैल महीने में जब पूरी दुनिया मेंअस्पताल और क़ब्रिस्तान भरते जा रहे थे, उस समय चीन संक्रमण को नियंत्रण में लाचुका था. ट्रेस, टेस्ट एंड लॉकडाउन की उसकी पॉलिसी काम कर रही थी. जल्दी ही चीनसावर्जनिक जगहों को खोलने की तैयारी में जुटा था. इस कथित सफ़लता को लेकर भीअलग-अलग दावे किए जाते हैं. जैसे कि चीन ने मौत के आंकड़े छिपाए. सच सामने लानेवाले को टॉर्चर किया. लॉकडाउन में लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया गया. अगर कुछ समयके लिए इन आरोपों को किनारे रख दिया जाए तो चीन का कोविड कंट्रोल मॉडल एक बेजोड़उदाहरण की तरह दिखता है. लेकिन क्या ये ऐसा है? क्या दुनिया को चीन का उदाहरण फ़ॉलोकरना चाहिए? हालिया खुलासे के बाद तो इसका एक ही जवाब होगा. कतई नहीं. ये खुलासक्या है? चीन की ज़ीरो कोविड पॉलिसी क्या है? कोरोना का एक केस निकल आने पर पूरेशहर को ताला क्यों लगा दिया जाता है? और, ऐसा करके चीन क्या साबित करना चाहता है?20वीं सदी में जर्मनी में एक दार्शनिक हुईं. हना आरेन्ट. वो होलोकॉस्ट सर्वाइवर भीथीं. आरेन्ट का एक कॉन्सेप्ट खासा मशहूर हुआ. The Banality of Evil. हिंदी में मतलबहोगा, बुराई की साधारणता. आरेन्ट ने कहा था कि बुरे से बुरा अपराध उस समय तुच्छ होजाता है, जब वो कल्पनातीत और क्रमिक चरित्र धारण कर लेता है. मतलब ये कि जब आम लोगकिसी बड़े अपराध में हिस्सा लेते हैं या उसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं या फिरउसे सही ठहराते हैं, तब बड़े से बड़ा अपराध तुच्छ हो जाता है. उसकी तासीर ठंडी पड़जाती है. अरेन्ट ने ये थ्योरी यहूदी नरसंहार के मास्टरमाइंड एडोल्फ़ आइख़मैन केसंदर्भ में दी थी. उनका मानना था कि सबसे बुरे अपराधी साइकोपैथ या सैडिस्ट नहींहोते. वे हमारी और आपकी तरह के सामान्य लोग होते हैं. उन्हें ये गुमान होता है किवे जो कर रहे हैं, वो बिलकुल सही है. जर्मन तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर ने लोगों की सोचको उसी दिशा में मोड़ा. वो कामयाब रहा. लाखों जर्मन नागरिकों ने हिटलर के कुकृत्यमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. जो सीधे तौर पर शामिल नहीं हुए, वे मौन समर्थन देतेरहे. जो ये दोनों काम नहीं कर रहे थे, वे हिटलर पर लग रहे आरोपों को झूठा मानतेरहे. इसी के दम पर हिटलर क़यामत की हद तक आगे बढ़ता गया. बीसवीं सदी में जर्मनी मेंजो हुआ, वो आज के दौर में चीन में हो रहा है. न्यू यॉर्क टाइम्स ने 12 जनवरी 2022को एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट पब्लिश की. रिपोर्ट का टाइटल है, The Army ofMillions Who enforce China’s Zero-Covid policy, at all costs यानी, चीन कीज़ीरो-कोविड पॉलिसी का हर क़ीमत पर पालन कराने वाली लाखों की सेना की कहानी इसरिपोर्ट में है कि किस तरह से चीनी अधिकारी और आम नागरिक निजी फायदे के लिए सरकारकी निरंकुश नीतियों को बढ़ावा दे रहे हैं. इनमें से कई लोग ऐसे भी हैं, जो इसेकर्तव्य की तरह ले रहे हैं. एक उदाहरण शियान का है. यहां अब तक कोरोना से तीन लोगोंकी मौत हुई है. शियान में कोरोना से पिछली मौत मार्च 2020 में हुई थी. जुलाई 2021तक 95 प्रतिशत से अधिक व्यस्क आबादी को कोरोना वैक्सीन के दोनों टीके लगाए जा चुकेथे. हालिया लहर में शियान में लगभग दो हज़ार केस आए हैं. इस लहर में किसी भी कोरोनासंक्रमित व्यक्ति की जान नहीं गई है. इसके बावजूद शियान पिछले तीन हफ़्तों से सख़्तलॉकडाउन में है. लोगों से घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं दी गई. कुछ ही दिनोंमें लोगों के खाने का स्टॉक खत्म हो गया. वे भूख से मरने की कगार पर पहुंच गए थे.तब कुछ ने हिम्मत कर इंटरनेट का सहारा लिया. तब सरकारी अधिकारियों की नींद खुली.हालांकि, चीन में लॉकडाउन का दायरा फ़ूड डेलिवरी तक ही सीमित नहीं रहा है. शियानमें एक आदमी को दिल का दौरा पड़ा. उसे अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल ने उसे एडमिटकरने से मना कर दिया. अंत में उस व्यक्ति की मौत हो गई. आठ महीने की एक गर्भवतीमहिला का इलाज इसलिए नहीं किया गया क्योंकि उसके पास कोविड टेस्ट का रिजल्ट नहींथा. उस महिला ने अपना बच्चा खो दिया. एक नौजवान खाना निकले बाहर निकला था. उसे लोकलकम्युनिटी के वॉलंटियर्स ने पकड़ लिया. नौजवान से ज़बरदस्ती माफ़ी मंगवाई गई. उसकावीडियो बनाकर चाइनीज़ सोशल मीडिया पर डाला गया. हालांकि, बाद में वॉलंटियर्स नेइसके लिए माफ़ी मांग ली. कुछ लोगों के लिए शहर में रहने का खर्च ज़्यादा पड़ रहाथा. उनमें से तीन चुपके से गांव के लिए निकल गए. उन्हें वापस पकड़कर लाया गया. दोलोगों को पुलिस हिरासत में रखा गया है. इसके अलावा, जो कोई भी सरकार की आलोचना करताहै, उसके ऊपर ट्रोल आर्मी लद जाती है. एक धड़ा ऐसा है जो बुराई सुनने के लिए तैयारनहीं है. आईना दिखाने वाले लोगों को चाइनीज़ सोशल मीडिया पर झूठा साबित करने कीकोशिश की जाती है. ये कुछ उदाहरण भर हैं. ये कुछ कहानियां हैं, जो सोशल मीडिया केज़रिए बाहरी दुनिया तक पहुंच पाईं है. चीन सरकार के कुकर्म यहीं तक नहीं रुके हैं.चीन ने अप्रैल 2020 से ही अपने यहां भारी संख्या में क़्वारंटीन सेंटर्स बनाने शुरूकर दिए थे. इन सेंटर्स में टीन के कमरे बने हैं. दरबों के जैसे. वहां बुनियादीसुविधाएं तक नहीं हैं. अगर किसी इमारत में एक भी कोरोना का केस आ जाए तो वहां रहरहे सभी लोगों को इन क़्वारंटीन सेंटर्स में भर दिया जाता है. शियान के कई इलाकोंमें ऐसा हुआ. एक जनवरी की रात जब लोग सोए थे, तभी उन्हें जगाकर घर से निकलने के लिएकह दिया गया. फिर उन्हें बसों में बिठाकर क़्वारंटीन सेंटर्स में भर दिया गया.इनमें बच्चे, बूढ़े, बीमार और गर्भवती महिलाएं भी थीं. मीडिया रिपोर्ट्स केमुताबिक, चीन ने लगभग 45 हज़ार लोगों को इन दरबों में बंद करके रखा है. चीन ऐसा करक्यों रख रहा है? दरअसल, चीन सरकार ज़ीरो-कोविड पॉलिसी पर अड़ी हुई है. चीन काप्लान है कि स्थानीय संक्रमण का एक भी केस ना आए. इसके लिए चीन दो तरीका अपनाता है,सख़्त लॉकडाउन और मास टेस्टिंग. अगर किसी जगह पर कोरोना का केस आता है तो पूरे शहरको ताला लगा दिया जाता है. इसके बाद हर नागरिक की टेस्टिंग की जाती है. ये प्रोसेसतब तक जारी रहता है, जब तक कि केस आने बंद ना हो जाएं. वैज्ञानिकों का कहना है किये तरीका कुछ समय तक राहत दे सकता है. लेकिन ये स्थायी समाधान नहीं है.ऑस्ट्रेलिया, न्यू ज़ीलैंड और सिंगापुर भी एक समय ज़ीरो कोविड पॉलिसी की बात कर रहेथे. लेकिन जब डेल्टा वेरिएंट आया, तब इन देशों ने नए सिरे से अपनी नीति बदली.उन्होंने वैक्सीनेशन पर ज़ोर दिया. ओमिक्रॉन वेरिएंट के चलते ऑस्ट्रेलिया मेंरेकॉर्ड संख्या में केस आ रहे हैं. लेकिन वे सख़्त नियम से बच रहे हैं. यूरोप औरअमेरिका में भी ऐसा ही है. लोगों ने कोरोना वायरस के साथ जीना सीखना शुरू कर दियाहै. लेकिन चीन अभी भी इसके लिए तैयार नहीं है. 04 फ़रवरी से बीजिंग में विंटरओलंपिक्स का आयोजन होना है. ये वो समय होगा, जब पूरी दुनिया की नज़र चीन पर होगी.चीन इसमें पूरी तरह पाक-साफ़ दिखना चाहता है. उसे कोरोना को लेकर अपनी छवि चमकानेका मौका मिलेगा. इसलिए, बीजिंग के आस-पास के इलाकों में कोविड का एक भी केस आने परभयानक सख़्ती बरती जाती है. ऊपर से अगर दो नियम लगाने को कहा जाता है तो नीचे केअधिकारी आठ कर देते हैं. बाकी का काम वफ़ादारों की सेना कर देती है. इसका पूरा भारआम लोगों को झेलना पड़ रहा है. ये कब खत्म होगा, इसका जवाब आना बाकी है.