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आसमान में रंग बिरंगे बादल आखिर होते क्या हैं?

ऑरोरा. यानी रंग बिरंगे बादल. सिर्फ़ वॉलपेपर में दिखते हैं. लेकिन असलियत में भी होते हैं. पर ये बनते कैसे हैं? हम बतायेंगे.

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केतन बुकरैत
9 मार्च 2016 (अपडेटेड: 9 मार्च 2016, 07:11 PM IST)
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इंडिया में तो खैर ये सब होता नहीं है. बस खाली वॉलपेपर में देखने को मिल जाता है. क्या? अबे वही कि रात का टाइम है और ऊपर आसमान में बादल हैं और साथे में कुछ लाल-नीली-हरी लाइटें जल रही हैं. ऐसे लगता है कि जैसे बादल में किसी ने रंग घोल दिया हो. पहली बार हम देखे थे तो लगा था कि कौनो पिकासा पे फोटू एडिट कर दिया होगा. लेकिन एक दिन साइंस वाला चैनल देख रहे थे तो उसमें लौंडे ने बताया कि ऐसा सही में होता है. और इसको कहते हैं ऑरोरा (Aurora)
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AURORA

हम अभी अखबार में देखे कि NASA के साइंटिस्ट्स ऑरोरा के ऊपर फिर से कुछ नयी रिसर्च करना शुरू कर दिए हैं. तो हमने सोचा कि लाओ तुम लोगों को भी इससे मुलाक़ात करवा दें. अगर मालूम है तो टेंसन न लो, बैठे रहो. जो हम न बताएं तुम बता देना.


 
सबसे पहले, गैलीलियो ने इस घटना के बारे में बताया था और उन्होंने इसको नाम दिया ऑरोरा बोरियालिस (Aurora Borealis). लैटिन में ऑरोरा बोरियालिस का मतलब होता है - 'Dawn of the North' यानी उत्तर दिशा की भोर.
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Galileo

तो कुल मिला के ऑरोरा में होता ये है कि पृथ्वी के आस पास दो जगहों पर ऐसे कुछ कार्यक्रम हो रहे होते हैं जिससे ये ऑरोरा बनते है. ये दो जगहें एक दूसरे के उलट हैं - ज़मीन के किलोमीटरों अन्दर पृथ्वी का कोर और पृथ्वी के किलोमीटरों ऊपर चमकता हुआ सूरज.
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Molten iron in Earth's core.

पृथ्वी के कोर में गरम गरम लोहा पिघल रहा होता है. ये पिघलता लोहा भयंकर ग्रेविटी के फ़ोर्स के प्रेशर में घूम रहा होता है. अब इससे होता ये है कि पिघले लोहे के ग्रेविटी के प्रेशर में घूमने से एक बहुत बड़ी सी मैग्नेटिक फ़ील्ड (Magnetic Field) बन जाती है. ये मैग्नेटिक फ़ील्ड इतनी भौकाली होती हैं कि पृथ्वी के कोर से चालू होती हैं और पृथ्वी के आस पास के स्पेस में फैल जाती हैं. इस प्रोसेस में मैग्नेटिक फ़ील्ड की वजह से जो माहौल बनता है उसे मैगनेटोस्फेयर (Magnetosphere) कहते हैं.
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Magnetosphere

ये मैगनेटोस्फेयर बहुत काम की चीज होती है. पूछो कैसे. अरे पूछो! इस मैगनेटोस्फेयर का फ़ायदा ये होता है कि सूरज से लगातार आने वाले ऐसे पार्टिकल जो अपने अन्दर झोला भर चार्ज समेटे रहते हैं, वो पृथ्वी के माहौल (वायुमंडल) में नहीं घुस पाते. चार्ज समेटे पार्टिकल्स मैग्नेटिक फ़ील्ड से टकरा कार वापस लौट जाते हैं.
अब आते हैं सूरज की ओर से समपन्न होने वाले कार्यक्रम पे. सूरज मैटर की चौथी स्टेट में रहता है. यानी प्लाज़्मा. अब होता ये है कि प्लाज़्मा के आयन्स (Ions) और इलेक्ट्रॉन्स(electrons) एक दूसरे के चारों ओर फ्री होके नाच रहे होते हैं. इन पार्टिकल्स की सबसे ख़ास बात ये होती है कि ये सूरज जैसी ऑब्जेक्ट की भयानक ग्रेविटेशनल फ़ील्ड से भी अलग हो जाते हैं. सूरज से अलग होने के बाद ये सीधे पृथ्वी की ओर कूच करते हैं. मिलियन किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से. पार्टिकल्स के सूरज से पृथ्वी की और हो रहे इस मूवमेंट को कहते हैं सोलर विंड (Solar Wind).
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Solar wind

जैसे कि पहले बताया, ज़्यादातर पार्टिकल्स मैग्नेटिक फ़ील्ड से बाउन्स होकर वापस हो जाते हैं. एकदम वैसे ही जैसे एंडी रॉडिक की फनफनाती सर्विस के जवाब में रॉजर फेडरर के रैकेट पे टेनिस बाल पड़ते ही बाउंस होके लौट जाती है.
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लेकिन कभी कभी फेडरर के किले में भी सेंध लग जाती है. फेडरर के बैकहैंड में हल्का सा झोल है. वैसे ही पृथ्वी के आस पास बनी मैग्नेटिक फील्ड कहीं न कहीं कमज़ोर हो जाती है और वहां से चार्ज समेटे हुए पार्टिकल्स पृथ्वी के माहौल में घुस जाते हैं. पृथ्वी के मैग्नेटिक फ़ील्ड में ये सबसे कमज़ोर पॉइंट नॉर्थ और साउथ पोल पे होते हैं.
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Week magnetic fields at North n South poles

अब आते हैं पृथ्वी के माहौल में. माहौल यानी पृथ्वी का वायुमंडल. वायुमंडल में क्या सबसे ज़्यादा होता है? हवा. गैस. गैस में सबसे ज़्यादा क्या होता है? नाइट्रोजन और ऑक्सीजन. ये चार्ज हुए पार्टिकल्स जब पृथ्वी के माहौल में घुसते हैं तो ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के कांटैक्ट में आते हैं. इलेक्ट्रॉन्स इन गैसों को एनर्जी ट्रांसफर कर देते हैं. ऐसे में ये पार्टिकल्स खुद तो रिलैक्स हो जाते हैं लेकिन अब ऑक्सीजन और नाइट्रोजन एक्साईट हो चुके हैं.
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Release of energy in the form of Photons

जब कोई एक्साईट होता है तो उसमें भी भरपूर एनर्जी आ जाती है. ऐसा ही होता है ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के साथ. इस केस में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन एनर्जी शूट करते हैं. इस शूट की गयी एनर्जी को ऑक्सीजन पैकेट्स के फॉर्म में छोड़ा जाता है. इन पैकेट्स को फ़ोटॉन (Photons) कहते हैं. यही फ़ोटॉन हमें ऑरोरा के रूप में दिखाई देते हैं.
अब आते हैं कि ये रंग-रौनक कैसे आती है? तो होता ये है कि सब कुछ डिपेंड करता है कि चार्ज लेकर चल रहे पार्टिकल्स किस जगह पर ऑक्सीजन और नाइट्रोजन से कॉन्टैक्ट में आते हैं. जगह के हिसाब से रंग बदलता है.
जैसे अगर ऑक्सीजन 150 मील तक है तो एक नीला शेड लिया हुआ हरा रंग आसमान में मिलेगा. उसके ऊपर लाल रंग मिलता है. 60 मील तक नाइट्रोजन से जब चार्ज किये हुए पार्टिकल्स मिलते हैं तो नीला रंग मिलता है.
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किसी ने हमसे पूछा कि ये ऑरोरा रात ही में क्यूं बनते हैं. तो हमने बताया कि ऑरोरा बनते तो दिन में भी हैं पर सूरज इतना तेज़ चमक रहा होता है कि दिखाई नहीं पड़ता.
समझे कि नहीं? कोई दिक्कत हो तो कमेन्ट में पूछो. हम बतलायेंगे!

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