बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 30 मार्च को पत्रकारों से अपने दिल की बातक्या कह दी पटना से लेकर दिल्ली तक अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया. ढेर सारी अटकलें.कि नीतीश कुमार उपराष्ट्रपति बनाए जा सकते हैं. कि बिहार सीएम की कुर्सी भाजपा केपास जा सकती है. कि जदयू से दो डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं.अटकल या कयास हमेशा अधूरी जानकारी से बनते हैं. लेकिन राजनीति में अधूरी बात से भीपूरा मतलब निकालने की परंपरा है. संकेतों की राजनीति में किसी भी बयान या तस्वीर कोइग्नोर नहीं किया जाता.टीवी की खबरों में आजकल अटकलें बहुत हैं. हर रोज रूस-यूक्रेन युद्ध में जीत-हार केकयास लगाए जाते हैं. पाकिस्तान में इमरान खान कुर्सी बचा पाएंगे या नहीं, ISI काअगला कदम क्या होगा, कुर्सी नहीं बची तो पाकिस्तान का नया प्रधानमंत्री कौन होगा.इसे लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं. मगर हमारा ध्यान अंतर्राष्ट्रीय की जगहराष्ट्रीय विमर्श पर ज्यादा गया. जिसमें कहा जा रहा है कि बिहार में मद्धम आंच परकुछ पक तो जरूर रहा है. बिहार की राजनीति में उथल-पुथल को लेकर चर्चा है,टिप्पणीकार कह रहे हैं कि अगला बड़ा खेला यहीं होने वाला है.मोदी-नीतीश की वायरल फोटोबिहार के सीएम नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. इनकी दो तस्वीरें वायरलहैं. दोनों तस्वीरों में नीतीश कुमार की बॉडी लैंग्वेज का बड़ा फर्क था. 90 डिग्रीके कोण से घुमते हुए शरीर का झुकाव 60 के कोण पर पहुंच गया. लोग कहने लगे. सबवक्त-वक्त की बात है. कभी तन कर मिला जाता था, बराबरी की बात होती थी. अब सत्ता कीताकत ने स्वरूप बदल दिया है. गणित के नियम में भले ही कोण का गिरना झुकाव दर्शाताहो, मगर राजनीति का विज्ञान दूसरा है. कई बार यहां झुकाव में उन्नति का रास्ताखुलता है. वैसे कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कहा कि ये सम्मान की बात है.मान-सम्मान की बात में उलझ कर इतिहास में झांकना खड़े मुर्दे उखाड़ने जैसा होगा.हमको बात वर्तमान की करनी है. वर्तमान ये कि 74 सीटें जीतकर बड़े भाई की भूमिका मेंबीजेपी तो पहले ही आ चुकी थी. अब भाजपा मुकेश सहनी की पार्टी VIP के 3 विधायक आनेके बाद 77 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है. 2015 के बाद का थोड़ा समयछोड़ दें तो बीजेपी करीब 20 सालों से नीतीश कुमार की JDU के साथ बिहार की सत्ता मेंहै. मगर ये इकलौता हिंदी पट्टी का राज्य है, जहां आज तक बीजेपी अपना सीएम नहीं बनापाई है. 43 सीटें जीतने के बावजूद 2020 में भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने.लेकिन यूपी समेत 4 राज्यों में बीजेपी की जीत के बाद सेनारियो बदलने लगा है. इसीबीच कल एक बात जंगल में आग की तरह फैल गई. बताया गया कि नीतीश कुमार ने कुछ वरिष्ठपत्रकारों से विधानसभा के अपने कक्ष में अनौपचारिक बातचीत की. क्या निकला ये वहांसे ? ये कि पत्रकारों ने पूछा कि पिछले दिनों आपने अपने पुराने संसदीय क्षेत्र बाढ़का दौरा किया, पुराने साथियों से मुलाकात. क्या 2024 में लोकसभा लड़ने का मन है ?जवाब आया अरे अब कहां ? किसी ने छेड़ा राजनीति के चारों धाम में एक धाम रह गया है.चारों धाम का मतलब यहां लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद. नीतीश कुमार तीनसदनों के सदस्य रह चुके हैं. 1989 में बाढ़ संसदीय सीट से सांसद बने, कुल 6 बारसांसद रहे. 1995 में नालंदा जिला की हरनौत से विधानसभा पहुंचे. अभी विधान परिषद केसदस्य हैं. तीन हो गए, बचा एक राज्यसभा. सूत्रों ने बताया कि नीतीश कुमार ने हामीभरी कि हां राज्यसभा का मुंह नहीं देखा.बस फिर क्या था, खबर चल पड़ी. अगस्त में उपराष्ट्रपति का चुनाव होना है. बीजेपीनीतिश कुमार को उपराष्ट्रपति बना सकती है. उनको दिल्ली लाकर बिहार में अपनामुख्यमंत्री बना सकती है. इससे उनकी राज्यसभा जाने की ख्वाहिश भी पूरी हो जाएगी. हमयहां डिस्क्लेमर के तौर पर क्लीयर कर देते हैं ये अटकलें हैं. आई रिपीट अटकलें हैं.मगर राजनीति में संभावनाओं से इनकार नहीं कर सकते.तो सारी खबरें यहीं से उठने लगी. संभावनाओं के इस खेल में सवाल कई हैं. आखिर नीतीशकुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी क्यों छोड़ेंगे ? नीतीश कुमार को उपराष्ट्रति बनाने सेबीजेपी को क्या फायदा होगा, जबकि उसके पास खुद बड़ी लीडरशिप है. और लाख टके का सवालये कि नीतीश कुमार अगर दिल्ली आ गए तो बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा ? बारी-बारीसे सारे तर्कों टटोला जाए.1. नीतीश कुमार के दिल्ली आने के पीछे सबसे बड़ा तर्क ये दिया जा रहा है कि अबउनकी ताकत वो नहीं रही, जो पिछले चुनाव तक हुआ करती थी. विधायकों की संख्या भी कमहै और वोट शेयर भी गिर चुका है. विरोधी कहते हैं बीजेपी की कृपा पर मुख्यमंत्रीबने हैं. समर्थक कहते हैं ये तो बीजेपी की मजबूरी है, अगर नीतीश ने फिर से पाला बदललिया तो बांस और बांसूरी दोनों के लाले पड़ जाएंगे. दोनों बातें अपनी जगह सही हैं.रहा सवाल नीतीश क्या दिल्ली आने को राजी हो जाएंगे..तो नीतीश कुमार ने चुनाव के वक्त कहा था कि ये उनका आखिरी चुनाव है. अगर अगला चुनावनहीं लड़ना तो उपराष्ट्रपति पद के जरिए उन्हें सेफ एग्जिट मिल सकता है. कई जानकारपार्टी में टूट का भी खतरा जताते हैं. जैसा बीजेपी ने कई राज्यों में किया भी. ऐसेमें समरता बनी उसके लिए दिल्ली कूच किया जा सकता है. पदक्रम के आधार पर देखेंगे तोउप राष्ट्रपति का पद राष्ट्रपति से नीचे और प्रधानमंत्री से ऊपर होता है. उपराष्ट्रपति विदेश दौरों पर भी जाते हैं ताकि अन्य देशों के साथ कूटनीतिक रिश्तेमज़बूत किए जा सकें.2. दूसरा ये कि नीतीश कुमार को उपराष्ट्रपति बनाने से बीजेपी को क्या फायदा ? फौरीतौर पर पहला फायदा तो यही है कि बीजेपी के लिए अपना मुख्यमंत्री बनाने की राह खुलजाएगी. दूसरा फायदा लांग टर्म है. आम तौर पर बीजेपी को बाकी जगहों पर OBC के बड़ेतबके - कुर्मी और कोइरी मतदाताओं का वोट मिलता है. मगर बिहार में कुर्मी और कोइरीनीतीश कुमार के कोर वोटर माने जाते हैं.8 फीसदी कुर्मी और 6 फीसदी कोइरी. दोनों मिलाकर 14 फीसदी होते हैं जो 13 फीसदी यादववोटों को बैलैंस करते हैं. नीतीश कुमार की सम्मानजनक विदाई से बीजेपी इस जाति केवोटों पकड़ बना सकती है. जात-पात से ऊपर उठने की बातें कितनी भी क्यों ना हो, मगरबिहार की राजनीति की एक-एक ईंटे जाति के मोरंग पर ही टिकी है. नीतीश कुमार नेजातियों को लेकर गजब का प्रयोग किया था. दलितों को दो हिस्सों में बांटा, दलित औरमहादलित.पिछड़ों को दो हिस्सों में बांटा. OBC और MBC यानी पिछड़ा और अति पिछड़ा. जातियोंके इस बाइफ्रिक्शन को हथियार बनाया और खुद को लालू की ताकत के सामने स्थापित करलिया. बीजेपी भी नीतीश कुमार के जरिए वही ताकत हासिल करना चाहती है. क्योंकि ये बातसत्य है कि पिछड़ी जातियों का वोट मिले बगैर बिहार की सत्ता हासिल कर पाना लगभगअसंभव है.MBC जातियां बिहार की आबादी में 21% की भागीदारी रखती है. अगर ये वोट बीजेपी अपनीतरफ ट्रांसफर करा ले गई तो हो सकता है कि आने वाले दिनों वो इतनी बड़ी ताकत बन जाए,जो अपने दम पर सत्ता बना पाए. चूंकि नीतीश कुमार के मुंह से राज्यसभा की बात चली तोबीजेपी की उम्मीदें कुलांचे मारने लगी.बीजेपी नेता कहते हैं कि अगर नीतीश राज्यसभा जाना चाहते हैं तो हम उनकी इच्छा जरूरपूरी करेंगे. इस बयान का मतलब तो हर किसी को समझ आ ही रहा है.राबड़ी देवी ने ज्यादा तूल नहीं दिया तो वाचाल शैली के लिए मशहूर विधायक भाईवीरेंद्र ने नीतीश कुमार को आड़े हाथों ले लिया.आखिरी बात गौर करने लायक है. अगर नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने की बात कही तो दूसराकोई व्यक्ति क्या कह सकता है. और यही सारी बातें खबर को बल दे रही है. एडिशलनलफोर्स के तौर पर कुछ घटना क्रम इसे और आगे बढ़ा रहे हैं. मसलन 28 मार्च को बिहारविधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा का 28 मार्च को दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डाऔर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मिलना. उससे पहले विधानसभा में मुख्यमंत्रीऔर अध्यक्ष के बीच बहस होना.बिहार बीजेपी अध्यक्ष संजय जायसवाल का जीतनराम मांझी से मिलना. उससे पहलेप्रधानमंत्री मोदी का बिहार बीजेपी के सांसदों से मिलना. गिरराज सिंह का जेडीयू परहमलावर होना. मुकेश सहनी को मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता दिखाना. ऐसे कई वाकयेहैं जो इस सुगबुगाट को सुलगाए हुए हैं. चुंकि सारी बातें संभावनाओं के इर्द-गिर्दहो रही हैं. तो संभावनाओं से उपजा बड़ा सवाल ये कि अगर नीतीश कुमार दिल्ली आ गए तोबिहार बीजेपी की तरफ से सीएम कौन होगा.3. सुशील मोदी के साइडलाइन होने के बाद पहला नाम जो सबसे मजबूती और दावे के साथलिया जा रहा है. वो है नित्यानंद राय. फिलहाल नित्यानंद राय मोदी सरकार में अमितशाह के जूनियर हैं. मतलब गृहराज्य मंत्री. नित्यानंद राय के नाम के पीछे तर्क दियाजा रहा है कि वो दिल्ली की पसंद है. दूसरी - फायरब्रांड नेता की छवि है. तीसरी औरसबसे बड़ी ये कि वो यादव जाति से आते हैं. बीजेपी नित्यानंद राय के जरिए यादव वोटोंमें सेंधमारी की कोशिश कर सकती है. जो बिहार में RJD का कोर और बेस वोट बैंक है.अगर बाकी जातियों में प्रतिनिधित्व के साथ यादव जाति को तोड़ लिया गया तो बिहारबीजेपी की ताकत दोगुनी हो सकती है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी को यादव वोट बिलकुल नहींमिलते. रामकृपाल यादव का दो-दो बार मीसा भारती को हरा देना. खुद नित्यानंद राय कादो बार लोकसभा जीतना बताता है कि प्रभाव वाले नेताओं को यादव वोट मिलता रहा है. ऐसेमें बीजेपी ये कोशिश कर सकती है. गाहे-बगाहे नित्यानंद राय का नाम संभावित सीएम केतौर पर लिया जाता रहता है. सगंठन भी उन्हीं के पक्ष में माना जाता है. और बिहार कीराजनीति को करीब से समझने वाले भी नित्यानंद राय के नाम पर ही दांव लगाते हैं.नित्यानंद राय के अलावा कुछ और नेताओं का नाम लिया जाता है. मसलन अगर बीजेपी कोलगता है कि वो यादव वोट नहीं तोड़ पाएंगे तो17 फीसदी दलितों को साधने के लिए दलितनेता जनक राम पर भी दांव लगा सकती है. फिलहाल जनकराम नीतीश सरकार में खनन मंत्रीहैं. विधानपरिषद से आते हैं. गोपालगंज सीट से सांसद भी रह चुके हैं. एक नाम गिरिराजसिंह का भी चलता है. भूमिहार जाति के लोगों की बड़ी तमन्ना है कि कोई भूमिहार नेतामुख्यमंत्री बने. मगर संभावनाएं क्षींण तब होती हैं, जब जाति का नंबर कम नजर आताहै.एक तर्क ये भी दिया जाता है कि नीतीश कुमार और गिरिराज की खास बैठती है, फैसलासर्वसम्मति से होगा तो गिरिराज बाबू का पलड़ा कमजोर हो सकता है. एक अनुमान ये भी हैकि अगर सीएम बीजेपी का हुआ तो दो डिप्टी सीएम जेडीयू से हो सकते हैं. कौन होंगे ?नाम के तौर पर ललन सिंह, विजय चौधरी और श्रवण कुमार. दो भूमिहार, एक कुर्मी. ललनसिंह फिलहाल जेडीयू के अध्यक्ष हैं और बाकी दोनों नेता सरकार में मंत्री. मगर फिरसे साफ कर देता हूं देता ये सबकुछ अटकलें, संभावानों के समंदर में गोता लगाती लहरोंकी तरह.नेताओं को सुन लिया, विद्वानों सुन लिया. अब आखिर में एक बात और. बिहार की राजनीतिबड़ी प्रचलित कहावत है. विरोधी विशेषकर इस्तेमाल करते हैं. क्या है कहावत...कहतेहैं नीतीश कुमार के पेट में दांत है. इसका भावर्थ ये निकाला जाता है कि उनकी कथनीऔर करनी में फर्क है. कुछ तो ये भी कहते हैं पेट वाले दांत का काटा पानी नहींमांगता. कई मौकों पर नीतीश कुमार प्रिडिक्टेबल जरूर हुए हैं, मगर ज्यादातर उनकाराजनीति इतिहास अनप्रिडिक्टेबल रहा है. उनके फैसले अचानक होते हैं. इस बार क्याफैसला लेंगे...राम के मन की राम ही जाने.अब बात करते हैं AFSPA की. पूरा नाम - आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट. जैसा किनाम से ज़ाहिर है, सशस्त्र सेनाओं को विशेष अधिकार देने वाला कानून है. आज केंद्रकी मोदी सरकार ने नागालैंड, असम और मणिपुर के कुछ इलाकों से AFSPA हटाने का फैसलाले लिया. 1 अप्रैल से ये फैसला लागू हो जाएगा. इसके तहत असम के 23 ज़िलों से पूरीतरह और एक ज़िले में आंशिक रूप से आफसपा हटा लिया जाएगा. इसी तरह मणिपुर के छहज़िलों के 15 थाना क्षेत्र और नागालैंड के 7 ज़िलों के 15 थाना क्षेत्रों से आफसपाहटाया गया है.AFSPA की कहानी शुरू होती है आज़ादी से भी पहले. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन कोकुचलने के लिए अंग्रेज़ सरकार एक अध्यादेश लेकर आई. भारत आज़ाद हो गया, लेकिनअंग्रेज़ सरकार के बाकी दमनकारी कानूनों के साथ ही आफसपा भी बना रहा.जब नागा उग्रवाद अपने चरम पर था, तब इस अध्यादेश को कानून बना दिया गया. साल था1958. मकसद था, उग्रवाद कुचलने के लिए फौज को और अधिकार देना. धीर धीरे पूरापूर्वोत्तर इस कानून के दायरे में आ गया. उग्रवाद से ग्रसित पंजाब और कश्मीर में भीइसे लागू किया गया.AFSPA की आलोचना ये है कि ये सेना को अधिकार तो देता है, लेकिन जवाबदेही को लगभगखत्म कर देता है. इसीलिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने लगातार शिकायत की है कि एकलोकतंत्र में AFSPA की जगह नहीं हो सकती. क्योंकि उग्रवाद कुचलने की आड़ में लाखोंबेगुनाहों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ हो रहा है. हत्याओं, अपहरणों और रेप तक केमामले सामने आए हैं.2004 में जीवन रेड्डी कमेटी ने AFSPA को हटाने की सिफारिश की. लेकिन मनमोहन सिंहसरकार ने अपनी ही कमेटी की सिफारिश पर अमल नहीं किया. 2014 में मोदी सरकार आई तोसिफारिश को मानने से साफ इनकार कर दिया गया.ऐसा नहीं है कि आफसपा एक बार लगा तो हटा नहीं. पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर तक मेंक्रमशः इलाके आफसपा से बाहर किए गए हैं. पंजाब में आज कहीं आफसपा लागू नहीं है.2018 में मोदी सरकार ने पूरे मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के एक बड़े हिस्से से आफसपाहटा दिया. कारण - क्योंकि आवश्यकता नहीं रह गई. उग्रवाद खात्मे की ओर है और अबस्थिति स्थानीय प्रशासन के काबू में है.लेकिन जिन इलाकों में अब भी AFSPA लागू है, वहां गाहे ब गाहे ऐसी कोई अप्रिय घटनाहो जाता है, जिसके बाद AFSPA को हटाने की मांग ज़ोर पकड़ लेती है. बीते साल 4दिसंबर को नागालैंड के मोन ज़िले में सेना की 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज़ के ऑपरेशन केदौरान यही हुआ. सेना की टुकड़ी उग्रवादियों के लिए घात लगाए बैठी थी, लेकिन चपेटमें आ गए 6 आम लोग. इसके बाद हिंसा हुई, जिसमें सेना के एक जवान की जान गई. अगलेदिन तक हिंसा ने 7 और लोगों की जान ले ली.जनाक्रोश शांत करने के लिए दिसंबर के आखिरी हफ्ते में सरकार ने नागालैंड से AFSPAहटाने पर विचार करने के लिए एक कमेटी बना दी. लेकिन महज़ तीन दिन बाद सरकार ने सूबेमें AFSPA छह महीने के लिए और बढ़ा दिया.आज सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज़ में कहा है कि सरकार ने मोन कांड के बाद बनी हाईपावर कमेटी की अनुशंसाओं को मान लिया है. और सरकार अब चरणबद्ध तरीके से नागालैंड कोआफसपा से बाहर लाएगी. लेकिन सरकार ने कोई डेडलाइन नहीं दी है. सरकार ने ये ज़रूरकहा है कि 2014 की तुलना में 2021 में उग्रवाद से जुड़ी घटनाओं में तीन चौथाई कीकमी आई है. सुरक्षा बलों की मृत्यु में 60 फीसदी और आम लोगों की मृत्यु में 84फीसदी की कमी आई है. 7 हज़ार उग्रवादियों ने हथियार त्याग दिए हैं.केंद्र के फैसले का पूर्वोत्तर में स्वागत हुआ है. असम के मुख्यमंत्री हिमंताबिस्वा सरमा ने ट्विटर पर फैसले का स्वागत किया और कहा कि अब असम का 60 फीसदी सेज़्यादा इलाका आफसपा से बाहर है. सिर्फ 9 ज़िले और एक सब डिविज़न बाकी है. मणिपुरके मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह और नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने भी केंद्रको धन्यवाद दिया.ये मोदी सरकार के आलोचक भी मानते हैं कि 2014 के बाद से पूर्वोत्तर को मुख्यधारामें लाने के गंभीर प्रयास हुए हैं. बीते आठ सालों में प्रधानमंत्री समेत पूरेकैबिनेट ने लगातार पूर्वोत्तर की यात्राएं की हैं. इस सब के नतीजे में लगातारउग्रवादी संगठनों ने हथियार छोड़े हैं और चुनावी राजनीति का हिस्सा बने हैं.राज्यों के बीच आपसी सीमा विवाद पर भी देर से ही सही, काम शुरू हुआ है. यही मोमेंटमअगर बना रहा, तो पूर्वोत्तर में स्थायी रूप से शांति की स्थापना संभव है.