मध्य प्रदेश सरकार ये एक काम करती तो खाद की किल्लत न झेलनी पड़ती
सहकारी समितियों में लंबी-लंबी लाइन, मार्केट में कालाबाजारी, खाद के लिए मची है मारामारी.
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खेत में खाद डालते किसान की सांकेतिक तस्वीर (फोटो- इंडिया टुडे)
खाद के लिए लगी लंबी-लंबी लाइनें. खाद न मिलने पर कई जगहों पर हंगामा तो कई जगहों पर खाद के लिए आए किसानों पर लाठीचार्ज. कहीं किसान तीन दिन से खाद के लिए लाइन में लगे हैं तो कहीं चार दिन से. पूरे-पूरे दिन लाइन में खड़े रहने के बाद भी खाद नहीं मिल रही है. बीते कुछ दिनों से मध्य प्रदेश से खाद की कमी की खबरें लगातार आ रही हैं. रबी के सीजन की बुवाई का समय हो गया है लेकिन खाद न मिल पाने की वजह से बुवाई नहीं हो पा रही है.
सरकारी गोदामों में खाद ही नहीं
किसानों का कहना है कि सरकारी समितियों और गोदामों में खाद उपलब्ध नहीं है. हर रोज हजारों की संख्या में भीड़ इकट्ठी हो जाती है. सुबह से शाम तक लाइन लगाकर खड़े रहते हैं लेकिन खाद नहीं मिल पाती. बाहर मार्केट में जो प्राइवेट दुकानदार खाद बेच रहे हैं, वो औने-पौने दाम वसूल रहे हैं.
विदिशा जिले के सिरोंज तहसील में सरकारी गोदाम के बाहर खाद के लिए प्रदर्शन कर रहे किसान नेता सुरेंद्र रघुवंशी कहते हैं, सिरोंज तहसील के सरकारी गोदाम पर हजारों लोगों की भीड़ जुटी है. कोई रतजगा कर रहा है तो कोई सुबह उठते ही गोदाम पर पहुंच गया है. भरी दुपहरी में लाइन में लगे-लगे थक गए तो छांव में जाकर बैठ गए और अपनी पासबुक को ही कतार में रख दिया. किसानों का दावा है कि पिछले 15-20 दिनों से खाद की कमी की शिकायत की जा रही है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है. अब जमीन पक चुकी है. अगर दो दिन में बुवाई नहीं हुई तो वो खराब हो जाएगी. किसान खेत में जाकर काम करे या फिर दिन-रात यहां लाइन में लगे.
विदिशा के सिरोंज में खाद के लिए लगी लाइन (फोटो- विवेक ठाकुर/इंडिया टुडे)
ये केवल विदिशा जिले का हाल नहीं है. ग्वालियर, गुना, भिंड, मुरैना, मंडला, जबलपुर, सीहोर, सागर, दामोह, इंदौर, उज्जैन, मंदसौर, नीमच समेत करीब 25 जिलों में खाद की भयानक किल्लत है. फिर चाहे वो केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर का संसदीय क्षेत्र मुरैना हो या फिर मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल का क्षेत्र हरदा. मुरैना में खाद के लिए लाइन में लगे लोगों पर लाठीचार्ज का वीडियो तो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था. खाद की दिक्कत क्यों? अभी रबी की फसलों की बुवाई का सीजन शुरू हो रहा है. रबी की फसलें यानी गेहूं, चना, सरसों, आलू, मटर आदि. रबी की फसलें अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती हैं और फरवरी-मार्च में इनकी कटाई होती है. दूसरा प्रमुख सीजन खरीफ का होता है. जिसमें धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन आदि आते हैं. इनकी बुवाई जून-जुलाई में होती है और अक्टूबर में इनकी कटाई होती है. रबी की फसलों की बुवाई के दौरान नम जमीन की आवश्यकता होती है. अभी हाल ही में हुई बारिश ने किसानों की जमीन तैयार कर दी. ऐसे में किसानों ने फसल बोने की तैयारी शुरू कर दी. अब यहां आवश्यकता पड़ती है खाद की. रबी की फसल जैसे, गेहूं-चना की बुवाई के समय बीज के साथ डीएपी खाद मिलाया जाता है. ये खाद मिलती है सहकारी समितियों में. जब किसान सहकारी समितियों में पहुंचे तो वहां उन्हें पता चला कि खाद है ही नहीं.
किसान स्वराज संगठन के अध्यक्ष भगवान मीणा बताते हैं, तो फिर इस साल क्या दिक्कत आ गई? भगवान मीणा बताते हैं, हरदा जिले के किसान राम इनैया भी कहते हैं कि अगर सरकार ने पहले से तैयारी की होती तो इस तरह की समस्या सामने नहीं आती. राम बताते हैं, कांग्रेस पार्टी के मध्यप्रदेश किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष केदार सिरोही आरोप लगाते हैं कि राज्य सरकार ने जानबूझ कर खाद की समस्या को पैदा किया. वे कहते हैं, बारिश की वजह से जल्दी बढ़ गई डिमांड? खाद की किल्लत की एक वजह बारिश को भी बताया जा रहा है. बीते दिनों हुई बारिश के बाद जमीन तैयार हो गई. किसान बुवाई की तैयारी में लग गए और खाद की डिमांड तेज हो गई. किसान राम इनैया बताते हैं, बारिश होने की वजह से खाद की डिमांड बढ़ी जरूर लेकिन रबी की बुवाई हर साल इसी समय पर होती है. फिर भी सरकार की ओर से इसकी तैयारी नहीं की गई. भगवान मीणा कहते हैं, भ्रष्टाचार और कालाबाजारी सहकारी समितियों में खाद उपलब्ध न होने की वजह से इसकी जमकर कालाबाजारी भी हो रही है. कुछ किसान ये भी आरोप लगाते हैं कि खाद की समस्या जानबूझकर पैदा की गई ताकि कालाबाजारी करने वाले मुनाफा कमा सकें. क्योंकि किसान की मजबूरी है. वो कहीं से भी खाद खरीदेगा ही. भगवान मीणा कहते हैं, किसानों का आरोप है कि खाद की कालाबाजारी में नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत है. बिना इनके संरक्षण के ये संभव नहीं है. राम इनैया कहते हैं, आगे हो सकती है और भी दिक्कत रबी की बुवाई के 15-20 दिन बाद यूरिया की जरूरत पड़ती है. अभी डीएपी की किल्लत है. किसानों को आशंका है कि अभी आगे और किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. भगवान मीणा कहते हैं, सरकार का क्या कहना है? केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर ने डीएपी की कमी की बात जरूर स्वीकार की. लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव बढ़ने को जिम्मेदार बताया. 24 अक्टूबर को भोपाल में उन्होंने कहा कि हम डीएपी बाहर से मंगाते हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव बढ़े हैं. कोशिश की जा रही है कि डीएपी की आपूर्ति ठीक तरीके से हो जाए. हमें दूसरे विकल्पों का भी उपयोग करना चाहिए. हालांकि मध्य प्रदेश सरकार खाद की कमी की शिकायतों को सिरे से नकार चुकी है. 14 अक्टूबर को समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बताया गया कि राज्य में पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध है. कहा गया, राज्य के कृषि मंत्री कमल पटेल ने भी दावा किया कि राज्य में खाद की कोई कमी नहीं है. उन्होंने कांग्रेस पर अशांति फैलाने का आरोप लगाते हुए 12 अक्टूबर को कहा, डिफॉल्टर यानी कि वो किसान जो अपना कर्ज नहीं चुका पाए. ऐसे किसानों को सहकारी समिति से मिलने वाली सुविधाएं बंद हो जाती हैं. जिसके बाद ये सीधे डबल लॉक (सरकारी गोदाम) से खाद खरीदते हैं. भगवान मीणा बताते हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी का कहना है कि किसान, डिफॉल्टर कर्जमाफी की वजह से नहीं बल्कि फसलों का सही दाम न मिलने की वजह से हुए हैं. कर्जमाफी से तो लाखों किसान डिफॉल्टर से रेगुलर हो गए हैं. कांग्रेस के किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष केदार सिरोही कहते हैं, एक तरफ सरकार कह रही है कि खाद की कोई किल्लत नहीं है. पर्याप्त खाद उपलब्ध है. जबकि दूसरी तरफ सहकारी समितियों और सरकारी गोदामों के बाहर किसानों की लाइन अब भी लगी हुई है. मारामारी मची हुई है. किसानों का कहना है कि अब लाइन में लगने का समय नहीं है. ज़मीन तैयार है. अगर देर हुई तो जो पलेवा किया है वो सूख जाएगा. बुवाई पिछड़ जाएगी. पानी, खाद और बीज खेती के लिए बेसिक जरूरतें होती हैं. अगर हम इसी में पिछड़ गए तो फिर क्या बचेगा?
विदिशा जिले के सिरोंज तहसील में सरकारी गोदाम के बाहर खाद के लिए प्रदर्शन कर रहे किसान नेता सुरेंद्र रघुवंशी कहते हैं, सिरोंज तहसील के सरकारी गोदाम पर हजारों लोगों की भीड़ जुटी है. कोई रतजगा कर रहा है तो कोई सुबह उठते ही गोदाम पर पहुंच गया है. भरी दुपहरी में लाइन में लगे-लगे थक गए तो छांव में जाकर बैठ गए और अपनी पासबुक को ही कतार में रख दिया. किसानों का दावा है कि पिछले 15-20 दिनों से खाद की कमी की शिकायत की जा रही है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है. अब जमीन पक चुकी है. अगर दो दिन में बुवाई नहीं हुई तो वो खराब हो जाएगी. किसान खेत में जाकर काम करे या फिर दिन-रात यहां लाइन में लगे.
विदिशा के सिरोंज में खाद के लिए लगी लाइन (फोटो- विवेक ठाकुर/इंडिया टुडे)
ये केवल विदिशा जिले का हाल नहीं है. ग्वालियर, गुना, भिंड, मुरैना, मंडला, जबलपुर, सीहोर, सागर, दामोह, इंदौर, उज्जैन, मंदसौर, नीमच समेत करीब 25 जिलों में खाद की भयानक किल्लत है. फिर चाहे वो केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर का संसदीय क्षेत्र मुरैना हो या फिर मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल का क्षेत्र हरदा. मुरैना में खाद के लिए लाइन में लगे लोगों पर लाठीचार्ज का वीडियो तो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था. खाद की दिक्कत क्यों? अभी रबी की फसलों की बुवाई का सीजन शुरू हो रहा है. रबी की फसलें यानी गेहूं, चना, सरसों, आलू, मटर आदि. रबी की फसलें अक्टूबर-नवंबर में बोई जाती हैं और फरवरी-मार्च में इनकी कटाई होती है. दूसरा प्रमुख सीजन खरीफ का होता है. जिसमें धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन आदि आते हैं. इनकी बुवाई जून-जुलाई में होती है और अक्टूबर में इनकी कटाई होती है. रबी की फसलों की बुवाई के दौरान नम जमीन की आवश्यकता होती है. अभी हाल ही में हुई बारिश ने किसानों की जमीन तैयार कर दी. ऐसे में किसानों ने फसल बोने की तैयारी शुरू कर दी. अब यहां आवश्यकता पड़ती है खाद की. रबी की फसल जैसे, गेहूं-चना की बुवाई के समय बीज के साथ डीएपी खाद मिलाया जाता है. ये खाद मिलती है सहकारी समितियों में. जब किसान सहकारी समितियों में पहुंचे तो वहां उन्हें पता चला कि खाद है ही नहीं.
किसान स्वराज संगठन के अध्यक्ष भगवान मीणा बताते हैं, तो फिर इस साल क्या दिक्कत आ गई? भगवान मीणा बताते हैं, हरदा जिले के किसान राम इनैया भी कहते हैं कि अगर सरकार ने पहले से तैयारी की होती तो इस तरह की समस्या सामने नहीं आती. राम बताते हैं, कांग्रेस पार्टी के मध्यप्रदेश किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष केदार सिरोही आरोप लगाते हैं कि राज्य सरकार ने जानबूझ कर खाद की समस्या को पैदा किया. वे कहते हैं, बारिश की वजह से जल्दी बढ़ गई डिमांड? खाद की किल्लत की एक वजह बारिश को भी बताया जा रहा है. बीते दिनों हुई बारिश के बाद जमीन तैयार हो गई. किसान बुवाई की तैयारी में लग गए और खाद की डिमांड तेज हो गई. किसान राम इनैया बताते हैं, बारिश होने की वजह से खाद की डिमांड बढ़ी जरूर लेकिन रबी की बुवाई हर साल इसी समय पर होती है. फिर भी सरकार की ओर से इसकी तैयारी नहीं की गई. भगवान मीणा कहते हैं, भ्रष्टाचार और कालाबाजारी सहकारी समितियों में खाद उपलब्ध न होने की वजह से इसकी जमकर कालाबाजारी भी हो रही है. कुछ किसान ये भी आरोप लगाते हैं कि खाद की समस्या जानबूझकर पैदा की गई ताकि कालाबाजारी करने वाले मुनाफा कमा सकें. क्योंकि किसान की मजबूरी है. वो कहीं से भी खाद खरीदेगा ही. भगवान मीणा कहते हैं, किसानों का आरोप है कि खाद की कालाबाजारी में नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत है. बिना इनके संरक्षण के ये संभव नहीं है. राम इनैया कहते हैं, आगे हो सकती है और भी दिक्कत रबी की बुवाई के 15-20 दिन बाद यूरिया की जरूरत पड़ती है. अभी डीएपी की किल्लत है. किसानों को आशंका है कि अभी आगे और किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. भगवान मीणा कहते हैं, सरकार का क्या कहना है? केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र तोमर ने डीएपी की कमी की बात जरूर स्वीकार की. लेकिन इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव बढ़ने को जिम्मेदार बताया. 24 अक्टूबर को भोपाल में उन्होंने कहा कि हम डीएपी बाहर से मंगाते हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव बढ़े हैं. कोशिश की जा रही है कि डीएपी की आपूर्ति ठीक तरीके से हो जाए. हमें दूसरे विकल्पों का भी उपयोग करना चाहिए. हालांकि मध्य प्रदेश सरकार खाद की कमी की शिकायतों को सिरे से नकार चुकी है. 14 अक्टूबर को समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बताया गया कि राज्य में पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध है. कहा गया, राज्य के कृषि मंत्री कमल पटेल ने भी दावा किया कि राज्य में खाद की कोई कमी नहीं है. उन्होंने कांग्रेस पर अशांति फैलाने का आरोप लगाते हुए 12 अक्टूबर को कहा, डिफॉल्टर यानी कि वो किसान जो अपना कर्ज नहीं चुका पाए. ऐसे किसानों को सहकारी समिति से मिलने वाली सुविधाएं बंद हो जाती हैं. जिसके बाद ये सीधे डबल लॉक (सरकारी गोदाम) से खाद खरीदते हैं. भगवान मीणा बताते हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी का कहना है कि किसान, डिफॉल्टर कर्जमाफी की वजह से नहीं बल्कि फसलों का सही दाम न मिलने की वजह से हुए हैं. कर्जमाफी से तो लाखों किसान डिफॉल्टर से रेगुलर हो गए हैं. कांग्रेस के किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष केदार सिरोही कहते हैं, एक तरफ सरकार कह रही है कि खाद की कोई किल्लत नहीं है. पर्याप्त खाद उपलब्ध है. जबकि दूसरी तरफ सहकारी समितियों और सरकारी गोदामों के बाहर किसानों की लाइन अब भी लगी हुई है. मारामारी मची हुई है. किसानों का कहना है कि अब लाइन में लगने का समय नहीं है. ज़मीन तैयार है. अगर देर हुई तो जो पलेवा किया है वो सूख जाएगा. बुवाई पिछड़ जाएगी. पानी, खाद और बीज खेती के लिए बेसिक जरूरतें होती हैं. अगर हम इसी में पिछड़ गए तो फिर क्या बचेगा?

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