टूटता तारा किसे अच्छा नहीं लगता. दिख जाए तो आस्तिक उसे देखकर कुछ मांगने लगतेहैं. नास्तिक एकटक देखते रहते हैं. लेकिन टूटता तारा दिखता बड़ी मुश्किल से है.कितने लोग आसमान ताकते रात बिता देते हैं. इन लोगों के लिए अच्छी खबर है. 20-22अक्टूबर, 2017 की रात ये सैकड़ों तारे टूटते देख सकते हैं. क्योंकि ये वक्त हैसालाना ओरियनिड मीटियोर शावर का.मीटियोर माने टूटता तारा. शावर माने बारिश. तो मीटियोर शावर तारों की बारिश है. इसदौरान एक घंटे के अंदर 100 तक टूटते तारे दिखाई दे सकते हैं. इस साल के ओरियनिडमीटियोर शावर के दौरान सबसे तगड़ा नज़ारा 21 अक्टूबर को रहने की उम्मीद है.धूमकेतु आगे बढ़ते हुए अपने पीछे मलबा छोड़ते चलते हैं (फोटोःरॉयटर्स)21 अक्टूबर को कहां से आएंगे इतने तारे?आपने हेलीज़ कॉमेट के बारे में सुना होगा. कॉमेट माने धूमकेतू. माने पुच्छल तारा.पुश्तों से इंसान इस धूमकेतू को आसमान में देख रहा था. लेकिन एडमंड हेली ने सबसेपहले बताया कि ये हर 74-79 साल में धरती का चक्कर लगाता है. इसलिए इसे हेली का नामदिया गया.एक इंसान नंगी आंखों से हेलीज़ कॉमेंट को अपनी ज़िंदगी में दो बार ही देख सकता है(वो बाबा रामदेव के योग से 400 साल जी जाए तो बात और है.) लेकिन दूसरे धूमकेतुओं कीतरह ही हेलीज़ कॉमेट भी अंतरिक्ष में बढ़ते हुए ढेर सारा मलबा पीछे छोड़ता रहता है.हेलीज़ के कॉमेट की तरह ही ये मलबा भी वक्त पर चलता है. धरती का गुरुत्व इन्हेंअपनी ओर खींच लेता है. नीचे आते हुए मलबे के ये पत्थर धरती के इर्द-गिर्द हवा मेंघर्षण से जलने लगते हैं. हर साल अक्टूबर-नवंबर के बीच इनकी तादाद इतनी होती है किटूटते तारों की बारिश नज़र आती है, नंगी आंखों से.मीटियोर शावर के दौरान ढेर सारे टूटते तारे आसमान में नज़र आते हैं (फोटोःरॉयटर्स)यहां ये समझा जाए कि धूमकेतु और टूटते तारे में फर्क है. धूमकेतु बर्फ, धूल औरचट्टानों का एक गोला होता है जो अंतरिक्ष में चक्कर लगाता रहता है. ये जब सूरज केपास से गुज़रता है तो इसमें से बर्फ भाप बनकर निकलने लगती है. ऐसे में ढीले होचुके पत्थर और धूल भी निकलते हैं. ये मलबा एक पूंछ की तरह धूमकेतु के पीछे उड़ताहै. पूंछ के लिए शब्द है 'कोमा' (coma). इसी से कॉमेट (comet) शब्द बना है. पूंछहै, तो देसी भाषा में पुच्छल तारा भी कह देते हैं.इसी तरह कई चट्टानें भी अंतरिक्ष में भटकती रहती हैं. ये जब धरती की तरफ आते हैं तोधरती का गुरुत्व उन्हें पास खींच लेता है. धरती पर गिरते हुए इन चट्टानों परवायुमंडल में मौजूद हवा से रगड़ पड़ती है और वो गरम होकर दमकने लगते हैं. यही चमकहमें टूटकर गिरते एक तारे का आभास कराती है.मीटियोर या टूटता तारा. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)लेकिन इस मीटियोर शावर को ओरियनिड नाम क्यों पड़ा?साइंस की किताब याद कीजिए. उसमें एक चैप्टर कॉनस्टेलेशन पर था. माने नक्षत्र. मानेतारों का एक पैटर्न जो आसमान में एक खास जगह नज़र आता है, हर रात. इनमें से एक हैओरियन. ओरियन को अपने यहां मृग कहते हैं. हेलीज़ कॉमेट के चलते होने वाली तारों कीबारिश आसमान में वहीं नज़र आती है, जहां ओरियन नज़र आता है. इसलिए इसे ओरियनिडमीटियोर शावर कहते हैं.2017 में ओरियनिड मीटियोर शावर सबसे बढ़िया 20-22 अक्टूबर के दरमियान दिखाई देगा.मीटियोर शावर देखने के लिए टेलिस्कोप की ज़रूरत नहीं पड़ती, ये नंगी आंखों से नज़रआ जाता है. लेकिन इस साल ये वक्त अमावस्या के वक्त पड़ रहा है, इसलिए तारों कीबारिश देखने में कुछ आसानी होगी.अलग-अलग मीटियोर शावर साल में तय वक्त पर नज़र आते हैंकहां देखें तारों की बारिश को?नासा का कहना है कि ये नज़ारा पूरी धरती पर कहीं से भी देखा जा सकता है. लेकिनबेहतर ये होगा कि किसी ऐसी जगह जाएं जहां लाइट पॉल्यूशन कम हो. ये क्या होता है,जानने के लिए नीचे का लिंक क्लिक करें.आपके बरामदे में जलता बल्ब समंदर के एक कछुए की जान ले सकता हैऐसी किसी जगह जाएं जो किसी बड़े शहर से दूर हो. आस-पास ज़्यादा रोशनी नहीं हो तोबेहतर है. लेकिन एक पेच है. आपने दिवाली में सुप्रीम कोर्ट की समझाइश के बाद भीइतना गदर काट दिया है कि आसमान में धुआं-धुआं बचा है बस. तो आप मन मसोसते रहिए. आपधम-धड़ाम की दिवाली मना चुके. असल दिवाली वहां के लोग देखेंगे, जिनके पास आपसे सेरभर दिमाग ज़्यादा है.ओरियनिड मीटियोर शावर के दौरान टूटता एक तारा (फोटोःरॉयटर्स)और भी कभी दिखता है?हेलीज़ कॉमेट का मलबा धरती पर नवंबर के पहले हफ्ते तक गिरता रहता है. लेकिन ओरियनिडशावर को देखने का सबसे बढ़िया समय अक्टूबर में ही होता है, अमूमन 20-22 तारीख केबीच. लेकिन अगर आप इसे मिस कर जाएं तो आप नवंबर की 18 तारीख को लियोनिड (लियो मानेसिंह) शावर या फिर 14 दिसंबर को जेमिनिड (जेमिनी माने मिथुन) शावर देख सकते हैं. तोकैलेंडर पर तारीख का गोदना बना लीजिए. --------------------------------------------------------------------------------प्रोफेसर यशपालः जो कहते थे कि आईआईटी कोचिंग से बुरा कुछ नहीं हो सकता: