जब बेंगलुरु में मास-मोलेस्टेशन हुआ, पारुल वहां मौजूद थीं. पारुल उसी भीड़ में थीं,जिसमें लड़कियों को दबोचा, नोचा, छुआ गया. पारुल उन्हीं लड़कियों में से थीं, जिनकानए साल का जश्न उनके जीवन की सबसे बुरी यादों में से एक में बदल गया. पारुल सेBindi Bottoms वेबसाइट से बात की. -------------------------------------------------------------------------------- 'मैं उस पूरी रात अपने दोस्तों के साथ वहां थी. हम उन लड़कियों में से थे, जिन्हेंभीड़ ने दबोचा था. तकलीफ ये थी कि हमारा वहां से बाहर निकल आना हमारे डर का अंत नहींथा. हम अपने साथ वो ट्रॉमा घर लेकर आए थे. मेरी एक सहेली सो नहीं पाई क्योंकि उसेसारी रात लगता रहा कि वो घर पर भी सुरक्षित नहीं है. एक और सहेली नींद मेंचौंक-चौंक कर उठ रही थी ये सोचकर कि उसने ऐसा क्या किया, जो उसके साथ ऐसा हुआ. जबहम अगले दिन मिले, एक सहेली ने अकेले घर जाने से मना कर दिया. हम सभी दोस्त उसे घरतक छोड़ने गए.हमारे साथ 3 लड़के भी थे. लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा. हमें तंग करने वाले बड़ेझुंड में आए थे. हमने पलटकर कोई हरकत नहीं की क्योंकि हम उस परिस्थिति को और खराबकिए बगैर बस बचकर भागना चाहते थे. एक लड़का, जो मेरी सहेली को परेशान कर रहा था,10-11 लड़कों के साथ आया था.सच कहूं, मैंने नहीं पढ़ा कि हमारे नेता क्या कह रहे हैं. क्योंकि मुझे मालूम है किवो क्या कह रहे होंगे. उनसे वही अपेक्षित है कि लड़कियां छोटे कपड़े पहनकर निकलेंगी,पश्चिमी संस्कृति को अपनाएंगी तो ऐसा होगा ही. मैं उनसे वही कहूंगी, जो मुझसे पहलेसे लोग कहते आए हैं. मेरे कपड़ों से फर्क नहीं पड़ना चाहिए. बल्कि कपड़ों से कोई फर्कपड़ता ही नहीं है. मुझे सलवार-कमीज़ में भी मोलेस्ट किया गया है, वो भी तब, जबसलवार-कमीज़ मेरी स्कूल यूनिफॉर्म थी.मैं देख रही हूं कि फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर लोग आ-जा रहे हैं. मैंनेदेखा है कि जो हुआ, लोगों ने उस पर अपना गुस्सा जाहिर किया है. लेकिन मैं बताऊं,उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं समझती हूं कि आपके विचार सच्चे हैं. लेकिन जब तक हमअपने बिस्तरों और कुर्सियों पर बैठकर केवल फेसबुक पोस्ट लिखते रहेंगे, तब तक कुछनहीं होगा.हमें कुछ कदम उठाने की जरूरत है. केवल हमारे मंत्री और प्रशासन को नहीं. अगली बारआपके सामने हो, तो खड़े मत रहिए. कुछ करिए. मेरी एक सहेली ने बताया कि वो अपनी कैबतक सुरक्षित सिर्फ इसलिए पहुंच पाई क्योंकि कुछ लोग उसके साथ थे. शहर में 25 लड़कोंका एक ग्रुप है, जो हर नए साल की पार्टी में बाहर जाते हैं, जश्न मनाने नहीं, सिर्फये देखने कि लड़कियां सेफ हैं या नहीं. ऐसे ही चार लड़के मेरी सहेली के पास आए. और वोसुरक्षित अपनी कैब तक पहुंच सकी. अगली बार इतना करें कि सड़कों पर रात को निकलें.उनकी मदद करें जिन्हें आपकी ज़रूरत है. कुछ भी करें, लेकिन बस चुपचाप खड़े होकर तमाशान देखें.जैसा इस साल हुआ, वैसा मेरे साथ पहले भी हो चुका है. पहले मैं उदास हो जाती थी परअब आदत सी हो गई है. मुझे नहीं पता कि ज्यादा बुरा क्या होता है. ये कि पहली बार इसतरह से हैरेस होकर ट्रॉमा झेलना या फिर इतनी बार झेल लेना कि आदत सी पड़ जाए. अबमुझे डर नहीं लगता. मैं गुस्से से पागल हो जाती हूं जब लड़कों को पकड़ नहीं पातीक्योंकि वो बाइक या कार से छेड़कर निकल जाते हैं.सच कहूं, इतना सब झेलने के बाद जब लगता है कि आगे चलकर क्या बच्चे पैदा करूं, तोडाउट होता है. अगर मेरी बेटी हुई, मैं उसे सिखाऊंगी कि अपनी सेफ्टी का ध्यान कैसेरखते हैं. मैं उसको किसी सेल्फ डिफेन्स या मार्शल आर्ट्स की क्लास में भेजूंगी,ताकि अगर कोई उसे हैरेस करे तो वो उसे वहीं पर जवाब दे सके.--------------------------------------------------------------------------------ये बिंदी बॉटम्स की फेसबुक पोस्ट का हिंदी अनुवाद है. --------------------------------------------------------------------------------https://www.youtube.com/watch?v=vTrYYnxzM-Q-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़िए:बेंगलुरु मास मोलेस्टेशन के बाद नेताओं के बयान से भी घटिया ये काम हुआशर्मनाक: बेंगलुरु में CCTV में कैद सेक्शुअल असॉल्ट की घटना‘शायद तुम्हें याद न हो, मैं वो काली ड्रेस वाली लड़की हूं, जिसे तुमने छेड़ा था’नये साल की पार्टी में डेढ़ हजार पुलिसवालों के सामने खुले में मॉलेस्टेशन