वामन भोंसले, वो एडिटर जिसने अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना की क्लासिक फिल्मों पर कैंची चलाई
दिग्गज डायरेक्टर्स इन्हें अपना गुरु मानते थे.
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89 साल की उम्र में वामन भोसले का निधन हो गया. बतौर एडिटर, चार दशकों तक वे फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा रहे. फोटो - ट्विटर
26 अप्रैल, 2021. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से एक बुरी खबर आई. वामन भोंसले नहीं रहे. सुभाष घई उन्हें याद करते हुए लिखते हैं,
लिरिसिस्ट और राइटर वरुण ग्रोवर ने वामन भोंसले का एक पुराना इंटरव्यू शेयर किया. साथ में लिखा,
89 साल की उम्र में वामन भोंसले का निधन हो गया. वो लंबे समय से बीमार चल रहे थे. वामन के भतीजे ने इंडियन एक्स्प्रेस को बताया, वामन भोंसले के बारे में बात करने से पहले एक फिल्म की बात की जानी जरूरी है. फिल्म थी 1998 में आई ‘ग़ुलाम’. इसका एक सीन याद कीजिए. बड़ा फेमस था. जिसमें आमिर खान का किरदार सामने आती हुई ट्रेन की ओर भाग रहा होता है. ट्रेन और आमिर के बीच कुछ कदमों का ही फासला रहता है कि वो ट्रैक से कूद जाता है. टक्कर होने ही वाली थी बस. उस समय जिसने भी देखा अचंभित हो गया. आमिर की बहादुरी की तारीफ़ें करने लगा. कि यार क्या स्टंट किया है. लेकिन ये आमिर का कमाल नहीं था. कमाल था फिल्म के एडिटर यानी वामन भोंसले का. आज भी फिल्म एडिटिंग के इच्छुक उस सीन को देखकर एडिटिंग की बारीकियां सीखने की कोशिश करते हैं. आप इस सीन को नीचे देख सकते हैं. उन्हीं वामन भोंसले की लाइफ के बारे में जानेंगे. चार दशक के कैनवास में फैले उनके करियर के बारे में जानेंगे.
#10 किलोमीटर पैदल स्कूल जाना पड़ता था
तारीख 19 फ़रवरी, 1932. गोवा के एक छोटे से गांव पोमबुरपा में वामन भोंसले का जन्म हुआ. गांव छोटा इसलिए क्यूंकि बेसिक जनसुविधाओं की तंगी थी. छोटी-से-छोटी जरूरत के लिए भी कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता था. स्कूली शिक्षा के लिए भी वामन को करीब 10 किलोमीटर चलना पड़ता था. जंगल-जंगल होते हुए. किसी तरह शिक्षा पूरी हुई. मेट्रिक पास कर ली. गांव के आसपास रोज़गार के ज़्यादा ऑप्शन थे नहीं. इसलिए फैसला लिया बॉम्बे आने का. उनके बड़े भाई डाई मेकर थे. भाई का काम सीखना चाहा. लेकिन जी नहीं लगा. समझ आ गया कि ये काम अपने मतलब का नहीं.
उनके पिता के एक दोस्त थे. जो बंबई में काम करते थे. नाम था डी एन पाई. आगे जाकर इन्हीं डी एन पाई ने मनोज कुमार की ‘गुमनाम’ और ‘वो कौन थी’ जैसी फिल्में एडिट की थी. खैर, काम की तलाश में वामन पहुंच गए डी एन पाई के पास.
# बॉम्बे टॉकीज़ से फिलमिस्तान का सफर
उन दिनों डी एन पाई बॉम्बे टॉकीज़ में काम करते थे. बतौर चीफ एडिटर. बॉम्बे टॉकीज़ किसी जमाने का नामी फिल्म स्टूडियो था. जिसने हिंदी सिनेमा को ‘अछूत कन्या’, ‘किस्मत’ और ‘जीवन नैया’ जैसी फिल्में दी थीं. लेकिन उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ का तारा बुलंद नहीं था. आए दिन खबरें आती थी कि स्टूडियो पर कभी भी ताला लग सकता है. इसी माहौल के बीच वामन भी पाई के पास पहुंचे. काम मांगा. फिल्म या फिल्म इंडस्ट्री से वामन का कोई ताल्लुकात नहीं था. इसलिए पाई ने उन्होंने एक अप्रेंटिस के तौर पर रख लिया. काम सिर्फ इतना था कि जो भी पाई कर रहे हैं, वामन को बस वो देखना है. देखकर सीखना है. उन्हें इस दौरान कभी रील पर कैंची या अधेसिव लगाने का मौका नहीं मिला.
बंबई के शुरुआती दिनों में वामन की तस्वीर. फोटो - यूट्यूब
पांच-छह महीने बीत गए. बॉम्बे टॉकीज़ के बंद होने की खबरें अब तूल पकड़ने लगी थीं. दूसरी ओर पाई को फिलमिस्तान से ऑफर आ गया. कि हमारी फिल्मों पर बतौर एडिटर काम कीजिए. उन्होंने फिलमिस्तान जॉइन कर लिया. साथ में अपने अप्रेंटिस को भी ले लिया. लेकिन अब वामन सिर्फ उनके अप्रेंटिस नहीं थे. बल्कि, असिस्टेंट बन गए थे. वामन ने अपने गुरु पाई को ‘पड़ोसन’ और ‘नीलकमल’ जैसी फिल्मों पर असिस्ट किया.
# ‘ये रेशमी ज़ुल्फ़ें’ वाली फिल्म ने स्थापित किया
अब तक वामन को जितनी भी फिल्में एडिट करने का मौका मिला, वो सब डी एन पाई के अंतर्गत मिला. कहें तो उन्होंने अकेले किसी फिल्म पर काम नहीं किया था. ये मौका भी आया. और ये मौका दिया राज खोसला ने. जो ‘सोलवा साल’ और ‘वो कौन थी’ जैसी फिल्में डायरेक्ट कर चुके थे. राज उन दिनों राजेश खन्ना और मुमताज़ स्टारर ‘दो रास्ते’ बना रहे थे. उसी दौरान उन्होंने वामन का ‘पड़ोसन’ और ‘नीलकमल’ पर किया काम भी देखा. इम्प्रेस हुए. और ‘दो रास्ते’ ऑफर कर डाली. कि पूरी तरह फिल्म को तुम ही एडिट करो. वामन मान गए. 05 दिसम्बर, 1969 को फिल्म रिलीज़ हुई. बॉक्स ऑफिस पर लोगों का हुजूम टूट पड़ा. ब्लॉकबस्टर साबित हुई. इस फिल्म की मेहरबानी ऐसी हुई कि वामन को इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा. न ही जरूरत पड़ी किसी डायरेक्टर या प्रड्यूसर के ऑफिस फोन कर काम मांगने की. सब खुद-ब-खुद अप्रोच करने लगे.
राज खोसला, जिन्होंने वामन को 'दो रास्ते' ऑफर की. आगे जाकर दोनों ने 'मेरा गांव मेरा देश' में फिर साथ काम किया.
आगे जाकर वामन ने गुलज़ार, सुभाष घई, सुनील दत्त, शेखर कपूर और रवि टंडन जैसे फिल्ममेकर्स के साथ काम किया. और भारतीय सिनेमा को ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘इंतकाम’, ‘मौसम’, ‘आंधी’, ‘दोस्ताना’, ‘कर्ज़’, ‘हीरो’, ‘सौदागर’, ‘ग़ुलाम’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्में दी. इतने बड़े नामों में एक फिल्म छूट गई. जो वामन भोंसले के करियर का नगीना साबित हुई. फिल्म थी 1977 में आई ‘इनकार’. फिल्म को नैशनल अवॉर्ड मिला था. आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है, अनगिनत फिल्मों ने नैशनल अवॉर्ड जीते हैं. जवाब है कि ये हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म थी जिसके लिए किसी टेक्निशियन को नैशनल अवॉर्ड मिला हो. फिल्म को अपनी एडिटिंग के लिए नैशनल अवॉर्ड फॉर बेस्ट एडिटिंग का अवॉर्ड मिला था.
'इनकार' से पहले कभी किसी हिंदी फिल्म के टेक्निशियन को नैशनल अवॉर्ड से सम्मानित नहीं किया गया था. फोटो - इनकार से एक स्टिल
बतौर एडिटर, 1999 में आई ‘सिर्फ तुम’ वामन की आखिरी फिल्म थी. नहीं, नहीं एडिटिंग से लगाव खत्म नहीं हुआ था. वजह थी कि फैमिली वाले टोकने लगे थे. दरअसल, एडिटिंग में कई घंटे निकल जाते. 12-15 घंटे की शिफ्ट लगानी पड़ती. दिन में काम पूरा नहीं होता तो रात को जागकर पूरा करना पड़ता. ताकि प्रड्यूसर का नुकसान ना हो. ऐसी 24x7 वाली दिनचर्या से उनकी सेहत पर असर पड़ने लगा. परिवार वाले भी आपत्ति जताने लगे. तो सारी बातें आंककर उन्होंने फिल्में एडिट करना बंद कर दी.
दिलबर दिलबर गाने वाली 'सिर्फ तुम' के बाद उन्होंने फिल्में एडिट करना बंद कर दिया. फोटो - यूट्यूब
वामन भोंसले ने करीब 230 फिल्मों पर काम किया. उनमें से बहुत सारे नाम छूटे भी हैं. लेकिन गारंटी है कि अगली बार आप 70 या 80 के दशक की कोई भी कमाल की फिल्म उठा लीजिएगा, उसमें एडिटर के टाइटल प्लेट के नीचे ‘वामन भोंसले’ का नाम नज़र आएगा. इतनी सारी बेहतरीन फिल्में देने के लिए उनका शुक्रिया. इतनी सारी यादें देने के लिए शुक्रिया.
मधुर भंडारकर ने लिखा,RIP 🙏🏽WAMAN BHONSLE SIR
A GENUIS film editor in my first film KALICHARAN remained my editor teacher in all my films till khalnayak n inspired me to edit my film like TAAL n so on A Great teacher🙏🏽
We @MuktaArtsLtd
@Whistling_Woods
Remain grateful for good 🙏🏽 pic.twitter.com/5Ad9ivDtLw
— Subhash Ghai (@SubhashGhai1) April 26, 2021
लिरिसिस्ट और राइटर वरुण ग्रोवर ने वामन भोंसले का एक पुराना इंटरव्यू शेयर किया. साथ में लिखा,
Legendary Hindi film editor and National Award Winner Waman Bhonsle saab is no more.
He edited Gulzar's Aandhi and Mausam among many other films.
An interview with him on Guftagoo.https://t.co/XzYDumyUoV
— वरुण 🇮🇳 (@varungrover) April 26, 2021
89 साल की उम्र में वामन भोंसले का निधन हो गया. वो लंबे समय से बीमार चल रहे थे. वामन के भतीजे ने इंडियन एक्स्प्रेस को बताया, वामन भोंसले के बारे में बात करने से पहले एक फिल्म की बात की जानी जरूरी है. फिल्म थी 1998 में आई ‘ग़ुलाम’. इसका एक सीन याद कीजिए. बड़ा फेमस था. जिसमें आमिर खान का किरदार सामने आती हुई ट्रेन की ओर भाग रहा होता है. ट्रेन और आमिर के बीच कुछ कदमों का ही फासला रहता है कि वो ट्रैक से कूद जाता है. टक्कर होने ही वाली थी बस. उस समय जिसने भी देखा अचंभित हो गया. आमिर की बहादुरी की तारीफ़ें करने लगा. कि यार क्या स्टंट किया है. लेकिन ये आमिर का कमाल नहीं था. कमाल था फिल्म के एडिटर यानी वामन भोंसले का. आज भी फिल्म एडिटिंग के इच्छुक उस सीन को देखकर एडिटिंग की बारीकियां सीखने की कोशिश करते हैं. आप इस सीन को नीचे देख सकते हैं. उन्हीं वामन भोंसले की लाइफ के बारे में जानेंगे. चार दशक के कैनवास में फैले उनके करियर के बारे में जानेंगे.
#10 किलोमीटर पैदल स्कूल जाना पड़ता था
तारीख 19 फ़रवरी, 1932. गोवा के एक छोटे से गांव पोमबुरपा में वामन भोंसले का जन्म हुआ. गांव छोटा इसलिए क्यूंकि बेसिक जनसुविधाओं की तंगी थी. छोटी-से-छोटी जरूरत के लिए भी कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता था. स्कूली शिक्षा के लिए भी वामन को करीब 10 किलोमीटर चलना पड़ता था. जंगल-जंगल होते हुए. किसी तरह शिक्षा पूरी हुई. मेट्रिक पास कर ली. गांव के आसपास रोज़गार के ज़्यादा ऑप्शन थे नहीं. इसलिए फैसला लिया बॉम्बे आने का. उनके बड़े भाई डाई मेकर थे. भाई का काम सीखना चाहा. लेकिन जी नहीं लगा. समझ आ गया कि ये काम अपने मतलब का नहीं.
उनके पिता के एक दोस्त थे. जो बंबई में काम करते थे. नाम था डी एन पाई. आगे जाकर इन्हीं डी एन पाई ने मनोज कुमार की ‘गुमनाम’ और ‘वो कौन थी’ जैसी फिल्में एडिट की थी. खैर, काम की तलाश में वामन पहुंच गए डी एन पाई के पास.
# बॉम्बे टॉकीज़ से फिलमिस्तान का सफर
उन दिनों डी एन पाई बॉम्बे टॉकीज़ में काम करते थे. बतौर चीफ एडिटर. बॉम्बे टॉकीज़ किसी जमाने का नामी फिल्म स्टूडियो था. जिसने हिंदी सिनेमा को ‘अछूत कन्या’, ‘किस्मत’ और ‘जीवन नैया’ जैसी फिल्में दी थीं. लेकिन उन दिनों बॉम्बे टॉकीज़ का तारा बुलंद नहीं था. आए दिन खबरें आती थी कि स्टूडियो पर कभी भी ताला लग सकता है. इसी माहौल के बीच वामन भी पाई के पास पहुंचे. काम मांगा. फिल्म या फिल्म इंडस्ट्री से वामन का कोई ताल्लुकात नहीं था. इसलिए पाई ने उन्होंने एक अप्रेंटिस के तौर पर रख लिया. काम सिर्फ इतना था कि जो भी पाई कर रहे हैं, वामन को बस वो देखना है. देखकर सीखना है. उन्हें इस दौरान कभी रील पर कैंची या अधेसिव लगाने का मौका नहीं मिला.
बंबई के शुरुआती दिनों में वामन की तस्वीर. फोटो - यूट्यूब
पांच-छह महीने बीत गए. बॉम्बे टॉकीज़ के बंद होने की खबरें अब तूल पकड़ने लगी थीं. दूसरी ओर पाई को फिलमिस्तान से ऑफर आ गया. कि हमारी फिल्मों पर बतौर एडिटर काम कीजिए. उन्होंने फिलमिस्तान जॉइन कर लिया. साथ में अपने अप्रेंटिस को भी ले लिया. लेकिन अब वामन सिर्फ उनके अप्रेंटिस नहीं थे. बल्कि, असिस्टेंट बन गए थे. वामन ने अपने गुरु पाई को ‘पड़ोसन’ और ‘नीलकमल’ जैसी फिल्मों पर असिस्ट किया.
# ‘ये रेशमी ज़ुल्फ़ें’ वाली फिल्म ने स्थापित किया
अब तक वामन को जितनी भी फिल्में एडिट करने का मौका मिला, वो सब डी एन पाई के अंतर्गत मिला. कहें तो उन्होंने अकेले किसी फिल्म पर काम नहीं किया था. ये मौका भी आया. और ये मौका दिया राज खोसला ने. जो ‘सोलवा साल’ और ‘वो कौन थी’ जैसी फिल्में डायरेक्ट कर चुके थे. राज उन दिनों राजेश खन्ना और मुमताज़ स्टारर ‘दो रास्ते’ बना रहे थे. उसी दौरान उन्होंने वामन का ‘पड़ोसन’ और ‘नीलकमल’ पर किया काम भी देखा. इम्प्रेस हुए. और ‘दो रास्ते’ ऑफर कर डाली. कि पूरी तरह फिल्म को तुम ही एडिट करो. वामन मान गए. 05 दिसम्बर, 1969 को फिल्म रिलीज़ हुई. बॉक्स ऑफिस पर लोगों का हुजूम टूट पड़ा. ब्लॉकबस्टर साबित हुई. इस फिल्म की मेहरबानी ऐसी हुई कि वामन को इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा. न ही जरूरत पड़ी किसी डायरेक्टर या प्रड्यूसर के ऑफिस फोन कर काम मांगने की. सब खुद-ब-खुद अप्रोच करने लगे.
राज खोसला, जिन्होंने वामन को 'दो रास्ते' ऑफर की. आगे जाकर दोनों ने 'मेरा गांव मेरा देश' में फिर साथ काम किया.
आगे जाकर वामन ने गुलज़ार, सुभाष घई, सुनील दत्त, शेखर कपूर और रवि टंडन जैसे फिल्ममेकर्स के साथ काम किया. और भारतीय सिनेमा को ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘इंतकाम’, ‘मौसम’, ‘आंधी’, ‘दोस्ताना’, ‘कर्ज़’, ‘हीरो’, ‘सौदागर’, ‘ग़ुलाम’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्में दी. इतने बड़े नामों में एक फिल्म छूट गई. जो वामन भोंसले के करियर का नगीना साबित हुई. फिल्म थी 1977 में आई ‘इनकार’. फिल्म को नैशनल अवॉर्ड मिला था. आप पूछेंगे कि इसमें खास क्या है, अनगिनत फिल्मों ने नैशनल अवॉर्ड जीते हैं. जवाब है कि ये हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म थी जिसके लिए किसी टेक्निशियन को नैशनल अवॉर्ड मिला हो. फिल्म को अपनी एडिटिंग के लिए नैशनल अवॉर्ड फॉर बेस्ट एडिटिंग का अवॉर्ड मिला था.
'इनकार' से पहले कभी किसी हिंदी फिल्म के टेक्निशियन को नैशनल अवॉर्ड से सम्मानित नहीं किया गया था. फोटो - इनकार से एक स्टिल
बतौर एडिटर, 1999 में आई ‘सिर्फ तुम’ वामन की आखिरी फिल्म थी. नहीं, नहीं एडिटिंग से लगाव खत्म नहीं हुआ था. वजह थी कि फैमिली वाले टोकने लगे थे. दरअसल, एडिटिंग में कई घंटे निकल जाते. 12-15 घंटे की शिफ्ट लगानी पड़ती. दिन में काम पूरा नहीं होता तो रात को जागकर पूरा करना पड़ता. ताकि प्रड्यूसर का नुकसान ना हो. ऐसी 24x7 वाली दिनचर्या से उनकी सेहत पर असर पड़ने लगा. परिवार वाले भी आपत्ति जताने लगे. तो सारी बातें आंककर उन्होंने फिल्में एडिट करना बंद कर दी.
दिलबर दिलबर गाने वाली 'सिर्फ तुम' के बाद उन्होंने फिल्में एडिट करना बंद कर दिया. फोटो - यूट्यूब
वामन भोंसले ने करीब 230 फिल्मों पर काम किया. उनमें से बहुत सारे नाम छूटे भी हैं. लेकिन गारंटी है कि अगली बार आप 70 या 80 के दशक की कोई भी कमाल की फिल्म उठा लीजिएगा, उसमें एडिटर के टाइटल प्लेट के नीचे ‘वामन भोंसले’ का नाम नज़र आएगा. इतनी सारी बेहतरीन फिल्में देने के लिए उनका शुक्रिया. इतनी सारी यादें देने के लिए शुक्रिया.

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