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किसानों का कर्ज़ माफ़ करके सरकार कोई एहसान नहीं कर रही है

कर्ज तो किसानों का हम पर है और माफी भी हमें मांगनी है!

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26 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 26 दिसंबर 2018, 08:48 AM IST)
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श्रीश पाठक

श्रीश पाठक. ये उन सज्जन का नाम है, जिनकी तस्वीर आप बाईं तरफ देख रहे हैं. असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. गलगोटिया यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में पढ़ाते हैं. श्रीश ने लल्लनटॉप के रीडर्स के लिए किसानों की कर्जमाफ़ी पर कुछ लिख भेजा है. इस मुद्दे पर वो पूरी तरह किसानों के पाले में खड़े हैं. विस्तार से बता रहे हैं अपना नज़रिया. बांचिए.




भारत दुनिया के मोहल्ले का सातवां बड़ा और छठा धनी मकान
हाथ नचाकर भारत के वित्त मंत्री जेटली जी ने हाल ही में कहा कि भारत अगले साल पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा और अगले ही कुछ वर्षों में तीसरे स्थान की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के आसार हैं. फिलहाल भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसमें कोई संशय नहीं है. आइए इसे जमीन पर समझते हैं. इसका मतलब यह है कि दुनिया के मोहल्ले में एक मकान (भारत) है जो आकार में सातवां सबसे बड़ा मकान है और जिस मकान में इतने ज्यादा लोग रहते हैं कि इससे अधिक एक बस उसी मकान में लोग हैं, जो मोहल्ले में आकार के हिसाब से चौथा बड़ा मकान (चीन) है.
यदि मोहल्ले में कुल 100 लोग रहते हैं तो चीन में 20 लोग रहते हैं और भारत के मकान में 18 लोग रहते हैं. इस मकान की जो कुल माली हालत है वह इसे मोहल्ले का छठा सबसे धनी मकान बनाता है. इस मकान में तकरीबन 11 (61. 5 प्रतिशत) ऐसे लोग रहते हैं जो कृषि पर निर्भर है. इस मकान ने सन 1950 में अपने पूर्वजों की देखरेख में लोकतंत्र अपनाया था. सन 1950 में संविधान निर्माताओं ने तय किया था कि गल्ला सबका है और चाभी इसकी, उसके पास होगी जिसे मकान का हर सदस्य चाहेगा और इस चाभी तक पहुंच सबकी होगी.
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हरा मकान या बदरंग
आप सोच रहे होंगे यह मकान हरा होगा, कृषि का काम सबसे शानदार होगा, लोग किसानों को बहुत इज्जत देते होंगे. कम से कम इस मकान में किसान खुशहाल होगा और निर्णायक होगा. अब चूंकि 18 में से 11 लोग खेतों में काम करते हैं तो इस मकान की जो बुनियादी पहचान होगी वह कृषि पर आधारित होगी. इस मकान के एक अति सम्मानित बुजुर्ग महात्मा गांधी भी चेता गए थे कि यह मकान किसानों का है और इसकी आत्मा किसानों में बसती है. उन्होने यह भी कहा था कि इस मकान की अर्थव्यवस्था किसानों पर आधारित होगी, एक-एक किसान समृद्ध होगा तो मकान आप ही संवर जाएगा. कोई बाहरी जब कागज पर यह जानेगा कि इस मकान में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र सांस लेता है तो वह इस मकान की जो तस्वीर खींचेगा उसमें किसान के चेहरे खिले होंगे. किसान के हाथ में मकान के कागज होंगे. चुनावों में किसान के मुद्दे प्रमुख होंगे. सेना, पुलिस, कचहरी, बैंक, अस्पताल, विद्यालय आदि सब किसानों को वरीयता देते होंगे.
कोई राजनीतिक दल जब अपना घोषणापत्र बनाता होगा तो कम से कम उसका 60% हिस्सा किसानों को समर्पित होगा. अर्थशास्त्री जब आर्थिक नीतियां गढ़ता होगा तो प्राथमिक क्षेत्र कृषि उसकी सर्वोच्च वरीयता में होगा. साहित्य हरा होगा, लेखकों की स्याही हरी होगी, अखबार हरे मुद्दों से भरे होंगे, शिक्षा के पाठयक्रमों में हरे विषय अधिक होंगे, भौतिकी यों पढ़ाई जाती होगी, जिससे कृषि कार्य सुगम हो, रसायन भी कृषि पर प्रयोग करते होंगे, प्रबंधन कृषि कार्यों पर प्रोजेक्ट बनाता होगा. कुल मिलाकर चूंकि लोकतंत्र है तो कम से कम इस मकान में वे 11 ही सारे 18 के भाग्यविधाता होंगे.
लेकिन हे विडंबना के विट्ठल! हे हिप्पोक्रेसी के हायकू! हे दोहरेपन के बौनों! ऐसा कुछ भी नहीं है इस मकान में.
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अजीब है यह मकान. बेतरतीब ढंग से रंग भरे हैं इस मकान के चित्र में. जितना हरा होना था उतना ही लाल है ये. इस मकान की पहचान उन 7 में से कुछ लोगों से है जो इन 11 लोगों से कृषि उत्पाद लेकर बाजार में भांति-भांति तरह से बेचते हैं. पहचान उन लोगों से भी है जो बेचे जाने में कहीं बीच में मदद कर रहे हैं, माध्यम बना रहे, या बन रहे. आश्चर्य यह है कि इस मकान में मोहल्ले का छठा सबसे बड़ा गल्ला रखा है लेकिन इस गल्ले की चाभी 11 लोगों के पास नहीं है, बल्कि इसकी चाभी बाकी 7 में से कुछ के पास है.
भाग्यविधाता की थाली सूनी
इस मकान के 11 लोग मकान के समूचे 18 लोगों की सुबह-शाम की थाली में अन्न लगाते हैं पर इनकी अपनी थाली सुबह-शाम नहीं लग पाती. ये ग्यारह खेतों में भूखे कई बार कुकड़ते हैं. 1950 से बहुत पानी बह गया है. रट्टू तोते बोलते हैं कि केवल किसानी से इस मकान का गल्ला मोहल्ले का छठा बड़ा गल्ला थोड़ी बना है! किसानी से इस गल्ले में केवल 15 रुपया माल आता है. 31 रुपया कारखाने से और 54 रुपया हवा-हवाई वाले सेवा से आता है. उन तोतों को एक बुनियादी बात नहीं समझ आती है कि कृषि उत्पाद शून्य कर दें और समस्त कृषि उत्पाद यदि बाहर से मंगाना पड़ जाए तो कारखाना बैठ जाएगा और हवाहवाई सेवा की हवा निकल जाएगी.
बड़ी चालाकी से धीरे-धीरे खेत की माटी में काम करने वाले को खेत में ही छोड़ दिया गया, अनाज उठाने वाला मंडी में ही बस गया और हिसाब लगाने वाला कमरों में ही रह गया. कमरे वाले सारा घी पिए जा रहे, मंडी वाले बोली लगा रहे और खेत वाले खलिहान में आत्महत्या कर रहे. इस मकान की हालत अजीब है. कुछ नंगे हैं, कुछ भीख मांग रहे, कुछ जमीन पर सोते हैं, कुछ बिना कंबल के सोते हैं, कुछ छत पर सोते हैं, कुछ कभी सो ही नहीं पाते, वे छत से कूद जान दे देते हैं.
वह एक आदमी
18 लोगों के इस गल्ले में जो यदि कुल 18 रुपया ही है तो ऑक्सफ़ैम की रिपोर्ट कहती है कि 13 रुपया 1 आदमी के पास है और बाकी 5 रुपये में 17 लोग काम चला रहे. ऐसा नहीं है कि इन 17 लोगों के पास इस 5 रुपये का बराबर 17वां हिस्सा यानी 0. 85 रुपया है, इतना भी हो जाय तो दुनिया का सबसे खुश किसान इस मकान का होगा. सरकारी आंकड़ा कहता है कि इस 17 में से 4 लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं यानी इन्हें इंसानों की जिंदगी ही मयस्सर नहीं है. अगर यह स्थिति है तो आप समझ गए होंगे भारत की आर्थिक नीतियां कितनी शानदार हैं, अर्थशास्त्री कहां सर खपा रहे हैं और सरकारें कितनी बढ़िया काम कर रही हैं. आप संजोग से अर्थशास्त्र के विद्यार्थी हैं और इस व्याख्या तक स्वयं नहीं पहुंच पाए हैं तो समझ लीजिए कि कौन पढ़ा रहा है, सिलेबस कौन बना रहा है और किस मकसद को पूरा करने के लिए आर्थिक शिक्षा दी जा रही!
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आइए किसान कर्ज माफी ज़रा समझें
इस देश में जबकि अभी बैंकों की शाखाएं सारे गांवों में पहुंची नहीं है, सभी किसानों के पास जनधन के बाद भी चलता हुआ बैंक खाता नहीं है, सभी प्रांतों में भूमि सुधार की हालत खस्ता है, और जिस देश में तकरीबन 18 में से 13 के पास वित्तीय साक्षरता नहीं है वहां कितने किसानों को ऋण मिल पाया होगा. बैंकों के कुल (non performing asset) ऋण का तकरीबन 8 प्रतिशत ही कृषि सैक्टर में है. यानी 92 प्रतिशत ऋण का मतलब किसानों से नहीं है. अब जरा ध्यान से सोचें कि एक तो सारे किसानों को ऋण नहीं मिलता. जिन्हें मिला है उनका कुल ऋण बैंकों के कुल बैड लोन का लगभग 8 प्रतिशत ही है. फिर कर्ज माफी राज्य सरकारें कर रहीं यानी सारे प्रांत सरकार ऐसे फैसले कर नहीं रहे और जो कर भी दें तो भी 92 प्रतिशत बैड लोन दूसरे सैक्टर के हैं.
जरा सोचें कि जो पहले से ही बैड लोन की गणना में है, यानी उसके बिना भी भारत के वित्त मंत्री यानी वकील साहब यह स्वप्न तो देख ही रहे न कि भारत के पास दुनिया का पांचवें नंबर का माल होगा. तो जरा दिमाग लगाइए किस एक आदमी के लिए वो यह सपना देख रहे, उसी के लिए न जिस एक आदमी के पास भारत के कुल 18 रुपए में से 13 रुपया है!
उलझाव का अर्थशास्त्र
कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि समझ न आए, बस उसे जानबूझकर उलझाया जाता है. कुछ इसी उलझाव का पैसा ले रहे और उन्हें देश का बड़ा अर्थशास्त्री भी कहते हैं. यकीनन किसानों का ऋण माफ करने से भारतीय अर्थव्यवस्था ढहने नहीं जा रही और जो ढहने जा रही तो वह पहले ही ढह चुकी है और जो वह ढह चुकी है तो जेटली जी किस आत्मविश्वास से बोल रहे और मोदी जी ने फिर पांच साल विकास मकान का किया या उसी एक इंसान का किया? मोदी जी ही क्यों जरा ध्यान से सोचिए कि पिछली सभी सरकारों ने आखिर क्या किया, कैसे किया कि 18 में से उस एक आदमी के पास मकान का 13 रुपए जमा हो गया?
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मजबूरी का उदारीकरण
भारत ने मजबूरी में उदारीकरण अवश्य अपनाया था पर आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था बाजार आधारित नहीं है. यह एक मिश्रित अर्थव्यवस्था के सिद्धांत पर कार्यरत है. ध्यान से सोचेंगे तो समझ आएगा उस एक आदमी के इशारे पर सरकारें चल रहीं, उस एक आदमी के इशारे पर मध्य वर्ग नौकरी कर रहा और टुच्चा इंक्रीमेंट पाकर खुश है. वैश्वीकरण की रोटी वह एक आदमी खा रहा, दुनिया घूम रहा और भट्टी में बाकी झोंके जा रहे. किसान कर्ज माफी पर रोने वाले रट्टू तोते आंख मूंदकर सच देख रहे.
एक पहलू यह है कि कुछ लोग कहते हैं कि यह सही नहीं किसी अर्थव्यवस्था के लिए कि ऋण माफ किया जाय. बड़ा भोलेपन वाला तर्क है यह. यह तर्क उस देश की अर्थव्यवस्था के लिए सही है जहां कृषि पर इतने लोग आधारित नहीं होते, जहां की सरकार ने घोषित तौर पर पूंजीवादी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था को अपना लिया है और हर चीज मुनाफे और कॉम्पीटीशन के पूंजीवादी चश्मे से देखी जाती हो. जनाब भारत के संविधान की प्रस्तावना अभी भी समाजवादी लक्ष्यों को समर्पित है जो समाज के आखिरी व्यक्ति की चिंता करता है.
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सरकारें बस सत्तालोलुप
'जय जवान' के रिटायर जवान जंतर-मंतर पर पारदर्शी पेंशन के लिए अनशन पर बैठे रहे. सरकार दर सरकार और 'जय किसान' का किसान नंगा हो अनशन कर रहा वहीं. कुछ नई चुनी सरकारें छटाक भर कर्ज माफ करके कॉलर उचका रहीं और कुछ दल ऐसा करने की अगले चुनाव में घोषणा कर रहे, जानते हैं क्यूं? क्यूंकि इसी 11 में से सबसे ज्यादा लोग चुनाव में वोट देने घर से निकलते हैं!
जरा सोचिए किसका कर्जा किस पर है? क्या कारखाना हमें गेंहूं दे सकता है, कपास दे सकता है? हवा-हवाई सेवा क्षेत्र हमें चावल दे सकता है, छौंकने का तेल दे सकता है? क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जब अपने किसानों का कर्जा माफ करेगा तो एहसान करेगा किसानों पर? जरा सोचिए!
(सभी तस्वीरें प्रतीकात्मक.)

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