विविध भारती की शुरुआत तीन अक्टूबर 1957 को हुई थी.लेट एटीज़ या अर्ली नाइंटीज़ के दौर की कोई एक रात. रात के दस बज रहे हैं. पूरापरिवार डिनर से फ़ारिग होकर सोने की तैयारी में है. दिनभर के तमाम कामों के शोर सेनिजात मिल गई है. कमरे में शाम से ही चल रहे रेडियो पर ध्यान देने की मोहलत मयस्सरहो पाई है. ऐसे फुरसती लम्हे में एक आवाज़ गूंजती है. “ये है विविध भारती. अब आपसुनिए ‘छायागीत’. एक छोटा सा म्यूजिक पीस और उसके फ़ौरन बाद एक रौबदार आवाज़.“छायागीत के सभी सुनने वालों को कमल शर्मा का नमस्कार. बर्फीले पहाड़ों पर जब चांदकी सुराही से झरता है नूर, तो लगता है, जैसे बर्फ के गोलों पर फैला दी हो किसी नेरंगीन मीठी चाशनी. और कभी लगता है जैसे चांदनी पहाड़ियों पर लगा रही हो रोशनी काउबटन. किसी नटखट बच्चे की तरह हवा उड़ाती रहती है हिमकणों के फुग्गे. बर्फ की रज़ाईमें दुबक जाता है पूरा गांव. नींद से जागता है तभी जब धूप खींच लेती है गिलाफ़.”अहा! फिर शुरू होता है गाना, ‘ठंडी हवा ये चांदनी सुहानी, ऐ मेरे दिल सुना कोईकहानी’. भारतवर्ष में ऐसा शख्स ढूंढ पाना बहुत मुश्किल है जो एटीज़ या उससे पहलेपैदा हुआ हो और ऊपर लिखे सीन से अंजान हो. गाना/प्रोग्राम में चेंज हो सकता हैलेकिन विविध भारती से उसका रिश्ता न रहा हो ये नहीं हो सकता. आह विविध भारती!बरसों-बरस किताबों के बाद मनोरंजन का एकमात्र साधन! इकलौता ऐसा साधन जिस तक ख़ासो-आमहर एक की पहुंच थी. इस पीस को लिखने वाले की ज़िंदगी के न जाने कितने ही लम्हे विविधभारती और उस पर आने वाले ढेरों प्रोग्राम्स ने गुलज़ार कर रखे हैं. याद करने बैठूंतो कितना कुछ याद आ जाता है! इतना कुछ कि महज़ उनके बारे में सोचना भर पूरे वजूद कोसनसनाहट से भर देता है. विविध भारती को याद करना बचपन के अनगिनत लम्हों को फिर सेजी लेने जैसा है. मुझे साफ़ दिख रहा है वो स्टैंड जिस पर रेडियो रखा रहता था. वोरेडियो जिसका घर में आगमन वाला दिन किसी त्योहार से कम नहीं था. अमीन सायानी, यूनुसखान, ममता सिंह, कमल शर्मा, रेणु बंसल, राजेंद्र त्रिपाठी, शहनाज़ अख्तरी, अमरकांतदुबे, निम्मी मिश्रा. ये सब महज़ नाम नहीं बल्कि हमारे बचपन को गुलज़ार करने वालेफ़रिश्ते हैं. इंटरनेट और फेसबुक के आगमन के बाद हम इनकी शक्लों से परिचित हो गए हैंलेकिन एक वो दौर भी था जब हमने इनको बिना देखे इनसे इश्क किया है. इनसे, इनकी आवाज़से, इनके अंदाज़ेबयां से!विविध भारती की सिग्नेचर टोन सुनिएविविध भारतीविविध भारती उस दौर में ज़िंदगी का अभिन्न अंग हुआ करता था. ज़माना आज जितना एडवांस्डनहीं था. वांछित फ्रीक्वेंसी को रेडियो सही से पकड़ ही लेगा इसकी कोई गारंटी नहींहुआ करती थी. चर्र चर्र की आवाज़ निकालते रेडियो सेट को आड़ा-टेढ़ा करते हुए साफ़ आवाज़सुनने की कोशिश करते रहने का अपना ही मज़ा था. उस ख़ास घड़ी का फ्रस्ट्रेशन तो यादकरने पर अब भी महसूस होता है, जब आप शिद्दत से कुछ पसंदीदा सुनने की कोशिश में लगेहों और सिग्नल साथ ना दे रहा हो. कई बार तो रेडियो अजीब सी पोजीशन पर मुड़ा होता थाजब वो ठीक सिग्नल पकड़ता था. ऐसे में उसी पोजीशन में उसे संभाले-संभाले पूरा गानासुन लिया जाता. कितने ही प्रोग्राम ऐसे हैं जो उस वक़्त रूटीन में सुन लिए गए लेकिनआज बहुत याद आते हैं. एक नज़र कुछ चुनिंदा प्रोग्राम्स पर #बिनाका गीतमाला: अब तोटीवी-रेडियो पर अनगिनत काउंटडाउन शोज आते हैं. उस वक़्त ये इकलौता था जिसमें टॉप परकौन सा गीत रहेगा इसकी उत्सुकता लगी रहती थी. पहले ये रेडियो सिलोन पर आया करता थाजो श्रीलंका से प्रसारित होता था. 1989 के बाद से ये विविध भारती पर आने लगा. अमीनसायानी के अंदाज़ेबयां का कायल पूरा हिन्दुस्तान तब भी था, आज भी है. उन्हें भुलानानामुमकिन है. कौन सा गाना कितने ‘पायदान’ की छलांग लगाकर कहां से कहां पहुंचा ये वोबड़ा ही लुत्फ़ लेकर बताया करते थे. उस लम्हे का तो ख़ास तौर से इंतजार रहता था जबआख़िर में वो फुल ड्रामेटिक टोन में कहते थे, “बहनों-भाइयों, ये रहा संगीत सीढ़ी कीचोटी का गीत.” इस ‘चोटी’ पर चढ़े बैठे गीत के लिए हम भाई-बहन अंदाज़ें लगाया करते थे.हर बुधवार रात 8 से 9 रेडियो से चिपके रहना तय था. बिनाका गीतमाला बाद में बदलकरसिबाका गीतमाला हो गया था. बिनाका गीतमाला की पूरी कहानी अमीन सायानी की ज़बानी:#जयमाला: भारतीय रेडियो के इतिहास में शायद इकलौता कार्यक्रम जो फौजी भाइयों के लिएसमर्पित था. जहां गीतमाला हफ्ते में एक बार आती थी वहीं जयमाला रोज़ आता था. शाम सातबजे शार्प. फ़ौज के सैनिकों की रैंक्स के बारे में जितना जयमाला सुनकर सीखा उतनाकहीं और से शायद ही इतनी सहजता से हो पाता उस उम्र में. सूबेदार, लांसनायक, सिपाही,हवलदार! अच्छी तरह याद है मुझे कि जयमाला में फौजी भाइयों के नाम सुनते वक़्त आंखोंके सामने एक नज़ारा हमेशा तैरा करता था. फ़ौज की वर्दी में कोई आदमी बॉर्डर एरिया कीकिसी बैरक में बैठा ख़त लिख रहा है. जयमाला आज भी आता है. सुनते कितने लोग हैं नहींपता. अब तो सैनिकों के पास भी फेसबुक है. मशहूर अदाकार 'प्राण' को जयमाला पेश करतेहुए सुनिए #छायागीत: अक्सर रेडियो प्रोग्राम्स में श्रोताओं की पसंद के या पॉपुलर सॉंग्स बजाएजाते थे. ये इकलौता प्रोग्राम था जिसमें अनाउंसर अपनी पसंद के गीत सुनाया करते. औरउन गीतों से ज़्यादा दिलकश हुआ करती थी वो काव्यात्मक बातें जो पता नहीं कौन लिखताथा! ऐसी मखमली शब्दावली में अनमोल अल्फ़ाज़ पेश किए जाते कि दिल झूम के रह जाता. एकटुकड़ा आप इस लेख के शुरुआत में ही पढ़ चुके हैं. कमल शर्मा और ममता सिंह मेरेफेवरेट थे. आज ममता सिंह फेसबुक पर लिस्ट में जुड़ी हैं. सोशल मीडिया ने करीब होनेका मौक़ा दिया. लेकिन मेरी याद में ममता जी रेडियो-सखी के रूप में ही सुरक्षितरहेंगी. ममता सिंह की मखमली आवाज़ में छायागीत #हवा-महल: 'हवा-महल' कहानियों को नाट्य रूप में पेश किया करता था. अक्सर विनोदी हुआकरती थी ये प्रस्तुति. धमाल हुआ करता था ये प्रोग्राम. अमरीश पुरी, ओम पुरी, असरानीजैसे बड़े कलाकारों ने हवा-महल में काम किया है. बचपन में बहुत क्रेज़ हुआ करता थाहवा-महल का. हवामहल का कदरन नया एपिसोड #संगीत-सरिता: ये सुबह साढ़े-सात बजे आया करता था. इस प्रोग्राम का सबसे बड़ा एहसानये है भारतीय संगीतप्रेमियों पर कि इसने संगीत के ढेर सारे पहलुओं से जनता को वाकिफ़कराने का काम कराया. एक बेसिक समझ को विकसित किया. इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों कोआमंत्रित कर के उनसे संगीत की बारीकियों पर चर्चा की जाती थी. किसी शास्त्रीय रागपर आधारित गानों को सुनाया जाता और उसी बहाने उस राग से श्रोताओं को पूरी तरहपरिचित कराया जाता. #हेल्लो फरमाइश: फोन का चलन भारत में बढ़ने के बाद इस प्रोग्रामका क्रेज़ देखने लायक था. लोग घंटों एंगेज लाइन से जूझा करते थे कि किसी तरह उनकाफोन इस प्रोग्राम में लग जाए और पूरा देश उनकी आवाज़ सुने. देशभर के लोगों कीफरमाइशें पूरा करता ये प्रोग्राम मेरे पसंदीदा प्रोग्राम्स में से है. न जाने कितनीबार कोशिशें की लेकिन कभी उस जीवटता को अपने अंदर पैदा न कर सका जिससे अनगिनतरेडियो के मतवालों के जोशोखरोश से पार पा सकूं. इन शॉर्ट, कभी न लगा अपना फोन.#पिटारा: पिटारा मस्ती, एंटरटेनमेंट और जानकारी का पूरा पैकेज था. ‘हेल्लो फरमाइश’पिटारा का ही हिस्सा था. इसमें रोज़ अलग-अलग प्रोग्राम पेश किए जाते. फ़िल्मी सितारोंसे मुलाक़ात ‘सेल्युलाइड के सितारे’, संगीत की दुनिया से दिग्गजों से मुलाक़ात ‘सरगमके सितारे’, सेहत से जुड़ा प्रोग्राम ‘सेहतनामा’, ‘यूथ एक्सप्रेस’ और 'हेल्लोफरमाइश'. क्या क्या याद करें! मुझे तो पत्रावली भी बेहद पसंद था जिसमें हफ्तेभर केअपने कार्यक्रमों की प्रतिक्रया में आए दर्शकों के पत्रों को पढ़ के सुनाया जाता.ऐसे ही एक और पसंदीदा प्रोग्राम था 'आज के फ़नकार'. किसी एक मशहूर गायक, गीतकार,संगीतकार को केंद्र में रखकर उसकी रचनाएं, उसकी बातें पेश की जाती. कितने हीउद्घोषक ऐसे हैं जिनके नाम पर तब गौर नहीं किया, गौर किया हो तो अब याद नहीं लेकिनजिन्होंने हमारे बचपन को यादगार बनाने में कोई कसर न छोड़ी. 'आज के फ़नकार' में साहिरलुधियानवी के बारे में दिलचस्प बातें बताती निम्मी मिश्राझुमरीतलैयाक्या सुनहरा दौर था वो जब झुमरीतलैया से आई गाने की फरमाइश के बिना विविध भारती काकोई प्रोग्राम मुमकिन ही नही था. लगता था जैसे वहां के लोगों का मेन काम फरमाइशकरना ही है. बाकी नौकरी-वौकरी, कामकाज तो खाली वक्त में करते होंगे. ऐसा कोईफरमाइशी प्रोग्राम मुश्किल ही होता था जिसमें झुमरीतलैया से किसी की फरमाइश शामिल नहुई हो. उस वक़्त बहुत से लोगों को लगता था कि ये कोई फिक्शनल जगह है. वो तो बादमें, बहुत बाद में, पता चला कि ये झारखंड में कोई कस्बा है.बदलाव की सुनामी के साक्षी हैं हमहम उस दौर में बड़े हुए हैं जब बदलाव की रफ़्तार मानव इतिहास में शायद सबसे ज़्यादाथी. हमारे सामने ही लैंडलाइन फ़ोन फले-फूले और एकदम से मोबाइल के हल्ले में लगभगअप्रासंगिक भी हो गए. तार-सेवा जैसी बेहद पुरानी सूचना-व्यवस्था देखते ही देखतेख़त्म हो गई. टेप-रिकॉर्डर से सीडी प्लेयर तक और वहां से होती हुई मेमोरी कार्ड्स औरमोबाइल में घुसने तक संगीत की यात्रा धुंआधार स्पीड से हुई. पेजर जैसी क्रांति तोइतनी अल्पजीवी थी कि पेजर को छू कर देख चुके हम जैसे लोग तक आज शक करते हैं कि कभीकोई ऐसी भी प्रणाली थी. ख़त लिखना चलन से बाहर हो गया. अब लेटर्स सिर्फ ऑफिशियल होतेहैं. इन्टरनेट के आगमन के बाद दुनिया काबू में आ गई. संगीत की पूरी दुनिया खुल गईसबके लिए. अब जो चाहे इन्टरनेट पर सुन लो. ना सिग्नल का पचड़ा और ना ही पसंदीदा गानेके इंतजार में नापसंदीदा गीतों को सुनने का टॉर्चर. इस दौर के बाशिंदों को उस लगन,उस अटैचमेंट, उस लगाव की कल्पना करना मुश्किल होगा जो हमारी पीढ़ी ने जिया है.यादों का अनमोल गलियारालिखने को तो इस पर एक पूरी किताब लिखी जा सकती है. तमाम नास्टैल्जिया पर ये रेडियोवाला नास्टैल्जिया भारी पड़ेगा. कितना कुछ ऐसा है जिसका ज़िक्र छूट गया है. सबकोसमेटना मुमकिन भी नहीं. विविध-भारती को ज़िंदगी से निकाल दिया जाए तो बहुतों कीज़िंदगी के कैनवास का रंग फीका लगने लगेगा. ऐंवे ही नहीं जब तनु वेड्स मनु फ़िल्म कीशुरुआत में रेडियो पर अनाउंसर गीत की फरमाइश करने वालों के नाम लेता है तो आपकातुरंत उस फ़िल्म से कनेक्शन जुड़ जाता है. शुक्रिया विविध भारती का और उसके ढेर सारेन्यूज़ रीडर्स, अनाउंसर्स का. एफएम चैनलों के खून पीने वाले आरजे लोगों को सुनता हूंतो ऐसा लगता है रेडियो के अंदर चिल्लाहट मचाने वाला कोई आला फिट कर दिया गया हो. वोठहराव, वो शाइस्तगी, वो मिठास अब कहां! हवा हो गया सब! विविध भारती आज भी आता है.लेकिन अब वो तमाम एफएम चैनलों के हल्ले में नज़रअंदाज़ हो जाता है. कुछ ही लोग हैं जोख़ास तौर से विविध भारती को सुनते हैं. कसरत से सुनना उनके लिए भी पॉसिबल नहीं जबएंटरटेनमेंट के और भी ज़रिये मौजूद हो. दिल्ली में 100.10 पर आता है विविध भारती.सुनिएगा कभी. बाकी अपने-अपने शहर में खोज लो.--------------------------------------------------------------------------------नास्टैल्जिया कम पड़ रहा हो तो यहां से बढ़ाइए वो महान डायरेक्टर जिसकी फिल्में जानवर को भी इंसान बना देयेसुदास के 18 गाने: आखिरी वाला कभी नहीं सुना होगा, दिन भर रीप्ले न करें तो कहें!वीडियो देखें: