मुसलमानों की आर्थिक बदहाली पर चर्चा के लिए एक सभा बुलाइए. तालीम की कमी से जूझतेमुसलमान बच्चों के भविष्य पर बात करने के लिए किसी सेमीनार का आयोजन कीजिये.वैचारिक और सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने की खातिर मुसलमानों में जनजागरण हो इसकेलिए कोई रैली का प्रस्ताव रखिये. देखिये कितने लोग आते हैं..!! कोई नहीं आएगा.कहीं किसी फिल्म में मजहब का मजाक उड़ता है, कहीं कुरआन के पन्ने फटे पाए जाते हैं,कहीं कोई सिरफिरा आदमी हुजूर की शान में कुछ कह देता और अचानक से मुस्लिम समाज कीधार्मिक चेतना जाग जाती है. सड़कों पर एक हजूम उमड़ आता है. मालदा में जो हुआ उसकीजितनी मजम्मत की जाए कम है. ऐसी मूर्खता का कोई जवाब भी नहीं सूझता. गुस्से सेज्यादा तरस आता है अब. मैं मुसलमान हूं और मुझे बहुत दुख होता है जब मुस्लिम समाजजाहिलियत के नित नए कीर्तिमान स्थापित करता है. मजहब को चारदीवारी में रख कर जियोभाइयो. मेरे भारत का सामाजिक तानाबाना बड़ा नाजुक है. उसे बचाए रखने की जिम्मेदारीसिर्फ बहुसंख्यक समाज की नहीं है. सबकी है. जितनी जल्दी ये सबक हम सीख जाएं वोअच्छा.जब पैरिस में शार्ली अब्दो पर हमला हुआ था तब एक पोस्ट लिखी थी कुफ्रिया शायरी पर.सिर्फ ये बताने के लिए कि किसी ज़माने में शायर लोग इतने हौसलामंद भी हुआ करते थे.आज अगर होते तो खौफ के जेरेसाया ही रहते या दरबदर हो जाते..ग्रीस में एक गांव इडोमेनी के पास ग्रीस व मेसोडोनिया की सीमा के रेल ट्रकों परबैठा एक ईरानी शरणार्थी जिसने अपने होठ सी लिए हैं================================================= एक शायर थे अब्दुल हमीद अदम.उन्होंने लिखा कि, "दिल खुश हुआ है मस्जिद-ए-वीरां को देख कर, मेरी तरह खुदा का भीखाना खराब है...!!" सोचता हूं कि अगर वो आज ये शेर लिखते तो उन्हें सर में गोलीरिसीव करने में कितने दिन लगते ? शुक्र है कि उन्हें गुजरे 33 साल हो गए वरना मजहबके रखवाले उनका वाकई खाना खराब करने पर तुल जाते. जब मुगलिया सल्तनत थी तब एकमुस्लिम हुकूमत के जेरेसाया रहते ग़ालिब लिखने की हिम्मत कर पायें कि, "ईमां मुझेरोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र, काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे.." आज होतेग़ालिब तो शांतिदूतों ने उनकी मानसिक शांति में पलीता लगा देना था.. मीर से लेकरअल्लामा इकबाल तक, हफीज जलंधरी से लेकर फैज़ अहमद फैज़ तक कई शायरों ने अपने अपनेनजरिये से ईश्वर को परिभाषित करने की, उससे संवाद साधने की, उससे सवाल करने कीकोशिशें की है. बिना किसी डर के. मीर कहा करते थे, 'अब तो चलते हैं बुतकदे से ऐ'मीर', फिर मिलेंगे गर खुदा लाया...!!" अल्लामा इकबाल का ये ऐलानिया ऐतराफ किसीआईएसआईएस के सूरमा की भावनाएं भड़काने के लिए काफी से ज्यादा था कि, "मस्जिद तो बनाली पल भर में, ईमां की हरारत वालों ने, दिल अपना पुराना पापी था, बरसों में नमाज़ीबन ना सका.." इसी तरह और भी कुछ शेर हैं जिन पर कुफ्रिया शायरी का लेबल लगा हुआ है.ऐसी शायरी जिससे अल्लाह पता नहीं खफा होगा या नहीं लेकिन उसके नेक बन्दों कीभावनाएं तवे पर उछलते पॉपकॉर्न की तरह फड़कती है. चंद एक नमूनें अर्ज़ है......."होता इन्हें यकीन गर जन्नत में हूरों का, ये वाइज़-ओ-शेख कब के मर चुके होते..!" (नामालूम )"बंदा परवर मैं वो बंदा हूं के बहर-ए-ज़िन्दगी, जिसके आगे सर झुका दूंगा खुदा होजाएगा..!" ( आज़ाद अंसारी )"बेखुदी में हम तो तेरा दर समझ कर झुक आयें, अब खुदा मालूम वो काबा था के बुतखानाथा..!" ( तालिब बागपती )"जुबान-ए-होश से ये कुफ्र सरज़द हो नहीं सकता, मैं कैसे बिन पिये ले लूं खुदा का नामऐ साकी..!" ( अब्दुल हमीद अदम )"महशर में इक सवाल किया था करीम ने, मुझसे वहां भी आपकी तारीफ़ हो गई..!" ( अब्दुलहमीद अदम )"हुआ है चार सजदों पे ये दावा जाहिदों तुम को, खुदा ने क्या तुम्हारे हाथ ये जन्नतबेच डाली है..!" ( नामालूम )"जिसने इस दौर के इंसान किये हैं पैदा, वही मेरा भी खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं..!" (हफीज जलंधरी )"बन्दे ना होंगे जितने खुदा है खुदाई में, किस किस खुदा के सामने सजदा करे कोई..!"( यास यगाना चंगेजी )"मिट जायेगी मखलूक तो इन्साफ करोगे, मुंसिफ हो तो अब हश्र उठा क्यूं नहीं देते ?" (फैज़ अहमद फैज़ )"अल्लाह जिसको मार दे, हो जाए वो हराम, बन्दे के हाथ जो मरे, हो जाए वो हलाल ?" (गिरगिट अहमदाबादवी )"ये जनाब शेख का फलसफा है अजीब तरह का फलसफा, जो वहां पियो तो हलाल है, जो यहांपियो तो हराम है..!" ( खादिम अरशद )"शबाब आया, किसी बुत पर फ़िदा होने का वक्त आया, मेरी दुनिया में बन्दे के खुदा होनेका वक्त आया..!" ( पंडित हरी चंद अख्तर )"लज्जते गुनाह की खातिर जिसने हार दी थी जन्नत, मेरी रगों में भी उसी आदम का खूनहै..!" ( नामालूम )ये तमाम शायर अलग अलग कालखंड में अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी को जी सकें क्यूं कि तबतक मजहबों के ठेकेदारों का ये बदसूरत चेहरा नमूदार नहीं हुआ था. आज जब निदा फाजलीने शेर पढ़ा कि,"उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए, दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!"तो कट्टरपंथी उनके पीछे पड़ गए. जिस महफ़िल में उन्होंने ये शेर पढ़ा वहां से उन्हेंबीच में ही उठ जाना पड़ा. और भी सौ तरह की सफाइयां देनी पड़ी. ये तो अच्छा हुआ कि ऊपरके शेर कहने वाले ज्यादातर शायर दुनिया के तख्ते पर से कूच फरमा चुके हैं वरना धर्मके ठेकेदार उन्हें दौड़ा दौड़ा कर मारते. शार्ली अब्दो की घटना की निंदा करते हुए औरउसे अंजाम देने वाले या उस हरकत के पीछे पल रही जहरीली मानसिकता को किसी भी तरह कासमर्थन करने वाले तमाम कट्टरपंथी भेडियों पर लानत भेजते हुए मैं 'फिराक गोरखपुरी'साहब का ये शेर एक बार फिर पूरे होशोहवास में दोहराता हूं..."मजहब कोई लौटा ले, और उसकी जगह दे दे, तहजीब करीने की, इंसान सलीके के...!"==============================================जब तक मजहब निजी चीज नहीं हो जाता तब तक ये जीने के लिए जरुरी मुद्दों पर हावी होतारहेगा. अपनी आस्था बरकरार रखो, जरुर रखो लेकिन उसको जानलेवा हथियार ना बनाओ. मजहबके नाम पर बही लहू की एक बूंद भी इंसानियत के दामन पर एक भद्दे दाग की शक्ल में जड़ीजाती है. खुदा/ईश्वर/गॉड भी इसे किसी हाल में ठीक नहीं मानने वाला. जब फ्रस्ट्रेशनका लेवल हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो मेरा दिल करता है कि मैं तमाम मजहबीकट्टरपंथियों का गिरेबान पकड़ कर उनको यास यगाना चंगेज़ी साहब का ये शेर सुनाऊं...."सब तेरे सिवा काफिर, आखिर इसका मतलब क्या ! सर फिरा दे इंसा का, ऐसा ख़ब्त-ए-मजहबक्या !!!