साल 1966. नेहरू के जूतों में पैर डालने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुरशास्त्री का देहांत हो गया था. ये सफेद लिबास और सपाट चेहरों में रातें काली करनेका दौर था. शास्त्री की मौत पर सवाल उठ रहे थे, लेकिन कांग्रेस का सिंडिकेट (दक्षिणभारतीय नेताओं का गुट, जिसकी कांग्रेस पर पकड़ थी) इस भावनात्मक हर्डल से दूर नयाप्रधानमंत्री चुनने में दिमाग खपा रहा था. मोरारजी ने दोबारा अपने मनमानेपन की कीमतचुकाई. लेकिन किसी का नाम फाइनल होता, इससे पहले बंबई कांग्रेस के बॉस सदाशिवकानोजी पाटिल ने सिंडिकेट के मुखिया के. कामराज के कान में एक शिगूफा छोड़ा.उन्होंने कामराज से कहा,'इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का भार और सम्मान आप ही अपने कंधों पर क्यों नहीं लेलेते?'इस पर चेन्नई में पैदा हुए इस किंगमेकर ने सिर्फ पांच शब्दों में कहा,'नो हिंदी, नो इंग्लिश. हाऊ?' (No Hindi, no English. How?)जवाहरलाल नेहरू के साथ के. कामराजकामराज ने हमें बताया कि एक दक्षिण भारतीय का दिल्ली की कुर्सी पर बैठना क्यों लगभगनामुमकिन है. लेकिन एक दक्षिण भारतीय नेता दिल्ली की किस कुर्सी तक पहुंच सकता है,ये हमें बताया वेंकैया नायडू ने. आजादी के दो साल बाद आंध्र प्रदेश में पैदा हुएवेंकैया नायडू. अटल से लेकर मोदी कैबिनेट तक में जगह बनाने वाले वेंकैया नायडू.देश के 13वें उपराष्ट्रपति चुनाव बनने वाले वेंकैया नायडू.वो लड़का भाषण बहुत अच्छा देता थाकामराज ने जिस चीज को समस्या माना था, वेंकैया ने उस पर मेहनत की. वो कुछगिने-चुने दक्षिण भारतीय नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने मेहनत से हिंदी सीखी औरफिर उत्तर भारतीय राज्यों में पार्टी के लिए रैलियां कीं. भाषा ने उन्हेंस्वीकार्यता दिलाई और मंच जीतने का गुर तो उनमें था ही. नेल्लोर में कॉलेज के दिनोंमें वेंकैया RSS से जुड़े और फिर ABVP के सदस्य बन गए. आंध्र यूनिवर्सिटी से जुड़ेअपने कॉलेज में चुनाव जीतकर वो छात्रसंघ अध्यक्ष बने. छात्रों के बीच इस 21-22 सालके लड़के को खूब पसंद किया जाने लगा, जो मंच से किसानों और पिछड़ों की बात करता था.उनकी बोलने की कला कमाल की थी, जो लोगों को पसंद आती थी.1971 में जब जय आंध्र आंदोलन शुरू हुआ, तो नायडू को और धार मिली. काकानी वेंकटरत्नम के नेतृत्व वाले इस आंदोलन में वो एड़ी गड़ा चुके थे. आंध्र स्टेट की मांग केलिए शुरू हुआ ये आंदोलन 1969 के तेलंगाना आंदोलन का सीक्वल था. वेंकट रत्नम इसआंदोलन को विजयवाड़ा ले गए, जहां 23 दिसंबर 1972 को पुलिस फायरिंग में आठ लोग मारेगए. वेंकट इससे इतना हिल गए कि दो दिन बाद ही हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई.आखिरकार पीवी नरसिम्हा राव की कैबिनेट में सीमांध्र से आने वाले नौ मंत्रियों नेइस्तीफा दिया और 10 जनवरी 1973 को खुद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. वेंकैयाइस पूरे दौरान आंदोलन से जुड़े रहे.नरसिम्हा राव और सुब्रमण्यन स्वामीराजनीति को इमरजेंसी का तोहफा हैं वेंकैया21वीं सदी के इन सालों में देश ने जितने दिग्गज नेता देखे हैं, उनमें से अधिकांशइमरजेंसी के संघर्ष से निकले नेता हैं. वेंकैया भी इनमें से एक हैं. 1974 में वोजयप्रकाश नारायण से जुड़े और आंध्र की एंटी-करप्शन छात्र संघर्ष समिति के कन्वीनरबने. जब इंदिरा ने देश में आपातकाल लगाया, तो वेंकैया इसके खिलाफ सड़कों पर उतरे.लोगों को इकट्ठा किया. आपातकाल का जमकर विरोध किया. परिणाम ये हुआ कि वो जेल मेंठूंस दिए गए. आपातकाल हटा, तो 1977 में वो अपनी यूथ विंग के अध्यक्ष बने.फिर शुरू हुई जनता का नेता बनने की कवायदजय आंध्र आंदोलन और आपातकाल के दौरान ही वेंकैया जनसंघ के नेताओं की निगाह में आ गएथे. संघ विचारक केएन गोविंदाचार्य का उन्हें बहुत सहयोग मिला. 1977 में जनता पार्टीबनने के अगले साल 1978 में आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए और वेंकैया को उनकेही जिले नेल्लोर की उदयगिरि सीट से उतारा गया. उन्होंने कांग्रेस के जानकीराम मादलाको नौ हजार से ज्यादा वोटों से हराया. विधायक बने. 1983 में जब फिर चुनाव हुआ, तोउन्होंने कांग्रेस के राजामोहन रेड्डी को 20 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. इनजीतों ने वेंकैया को जनाधार वाला नेता बनाया. लेकिन अभी उनका सियासत की छूत से कोईपाला नहीं पड़ा था.चुनाव से हटे, तब बीजेपी के असली काम आए वेंकैया1985 तक वेंकैया आंध्र के लोकप्रिय नेताओं में शुमार हो चुके थे. 1985 से 1988 तकवो आंध्र में पार्टी के महासचिव रहे. 1988 में जब बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे परदावा जताया, तब वेंकैया को आंध्र प्रदेश में बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया. वो 1988से 1993 तक राज्य अध्यक्ष रहे. 1973 में वेंकैया ने जिन नरसिम्हा राव को सीएम कीकुर्सी छोड़ते देखा था, अब वो पीएम थे. 1996 में कांग्रेस की सरकार तो गिरी, लेकिननई सरकार, बीजेपी की सरकार सिर्फ 13 दिन ही टिक पाई. तब संघ को ये अहसास हुआ किराजनीतिक तौर पर स्थिर विकल्प बनने के लिए एक किरदार बनना होगा. अपनी विचारधारा कोराजनीतिक तौर पर स्थापित करना होगा.1996 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते अटल बिहारीनई सरकार जनता दल की बनी, लेकिन टिकी नहीं. दो साल से कम वक्त में ही बीजेपी दोबारासत्ता में आ गई और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने. इस दौरान वेंकैया नायडूबीजेपी के प्रवक्ता थे. उस समय कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य थे, जहां बीजेपीकहीं नहीं ठहरती थी. इसका फायदा आंध्र के दत्तात्रेय और वेंकैया जैसे नेताओं कोहुआ. अब दिल्ली ही वेंकैया की कर्मभूमि बन चुकी थी. इसमें केएन गोविंदाचार्य का भीयोगदान रहा, क्योंकि उन्हीं ने आंध्र के युवा नेताओं को दिल्ली का रास्ता दिखायाथा. इनमें वेंकैया भी थे. हालांकि, बाद में गोविंदाचार्य ने मोदी सरकार की काफीआलोचना भी की.केएन गोविंदाचार्यक्योंकि बीजेपी की सीढ़ियां चढ़ने के लिए प्रवक्ता बनना पड़ता हैअरुण जेटली, सुषमा स्वराज, प्रकाश जावड़ेकर, रविशंकर प्रसाद, निर्मला सीतारामन...ये नेता बीजेपी की पहचान बने. कोई सरकार में बड़े पद पर रहा, तो कोई पार्टी में.लेकिन इनके बीच एक चीज कॉमन है कि ये सभी बीजेपी में प्रवक्ता रहे. वेंकैया नायडूभी इसी लीग के हैं. वो 1996 से 2000 तक पार्टी के प्रवक्ता रहे हैं. फिर 1998 मेंपार्टी ने उन्हें कर्नाटक से राज्यसभा भेजा और 1999 में जब केंद्र में एनडीए कीसरकार बनी, तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में ग्रामीण विकासमंत्री बनाया. 1999 के चुनाव में बीजेपी ने आंध्र प्रदेश में छ: सीटें हासिल कीथीं.चार बार पहुंचे राज्यसभा, उच्च सदन में बड़े अनुभवीवेंकैया बीजेपी के उन नेताओं में से हैं, जिन्हें संसदीय कार्य का सबसे ज्यादाअनुभव है. 1998 के बाद उन्हें 2004 और 2010 में भी कर्नाटक से राज्यसभा भेजा गया.2016 में उन्हें राजस्थान से राज्यसभा भेजा गया. 2016 में राज्यसभा जाने से पहले2014 से 2016 तक नायडू संसदीय कार्यमंत्री भी रहे. बीजेपी के लिए वेंकैया हमेशा सेट्रबल-शूटर रहे हैं.राज्यसभा में वेंकैयातब अटल के लिए सड़क बनाई, फिर मोदी के लिए किले बनाएप्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना अटल के कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि है. इस योजना केतहत गांव में सड़कें बनवाई गई थीं, लेकिन इसे जमीन पर लाने के पीछे वेंकैया ही थे.ग्रामीण विकास से जुड़े सुधारों को आक्रामक रूप से लागू करने में वेंकैया एक्सपर्टरहे. फिर मोदी कैबिनेट में वो शहरी विकास मंत्री बने. सरकार की स्मार्ट सिटी योजनापर वेंकैया ने खूब काम किया.वेंकैया इकलौते ऐसे नेता हैं, जिनकी सबसे बनती है. वो अटल सरकार में मंत्री थे औरअटल के करीबी भी. जबकि असल में उन्हें आडवाणी खेमे का आदमी माना जाता था. अटलकैबिनेट के जिन नेताओं को मोदी कैबिनेट में जगह मिली, उनका रुतब पहले जितना नहींरहा. लेकिन वेंकैया इस राजनीति से भी पार पा गए. वो मोदी के भी उतने ही करीबी रहे,जितने अटल के थे.