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ऐसे रोचक तरीके से चुना जाता है दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान

अमेरिकी चुनाव बेहद मजेदार है.

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ऋषभ
4 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 3 नवंबर 2016, 05:07 AM IST)
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अमेरिका के प्रेसिडेंट का नाम 7 नवंबर को पता चल जाएगा. हर बार नवंबर में ही होता है चुनाव. पिछले एक साल से हल्ला मचा हुआ है दुनिया में. कभी ट्रंप आगे आ जाते हैं, कभी हिलेरी. पर इनका चुनाव प्रोसेस समझ नहीं आता. अपने यहां तो चुनाव की घोषणा होती है, नेता रथ लेकर निकल जाते हैं. खूब प्रचार होता है. कोड ऑफ कंडक्ट लग जाता है. प्रचार रुक जाता है. चुनाव का दिन तय रहता ही है. चुनाव हो जाता है. जनता वोट दे के किनारे हो जाती है. हमारे यहां पार्लियामेंट्री सिस्टम होता है. अमेरिका में प्रेसिडेंशियल सिस्टम होता है. वहां के सांसद अलग से चुने जाते हैं. उनका प्रेसिडेंट से कोई मतलब नहीं होता. बाद में बिल पास कराने में भेंट होती है. प्रेसिडेंट के पास बहुत पावर होती है. वो अपने अफसर खुद चुनता है. सारे डिसीजन वही लेता है. अगर तानाशाहों को छोड़ दें, तो दुनिया में किसी के पास डिसीजन लेने की इतनी पावर नहीं है.

अमेरिका का प्रेसिडेंट बनने के लिए तीन योग्यताएं चाहिए:

अमेरिका में पैदा हुआ नागरिक कम से कम 35 साल की उम्र अमेरिका में कम से कम 14 साल रहा हो

अमेरिका में प्रेसिडेंट बनने के लिए बहुत लोगों को समझाना पड़ता है. उनसे पहले पार्टी के लोगों को ही समझाना पड़ता है कि भइया, हमीं हैं काबिल. हमको कैंडिडेट घोषित करो. प्रेसिडेंट बन जाएंगे. चार साल के लिए चुने जाते हैं प्रेसिडेंट. अधिकतम दो टर्म रह सकते हैं. अगर दुबारा जीत गए तो. जॉर्ज बुश भी दो टर्म रहे और ओबामा भी. तो नवंबर 2016 से ठीक एक साल पहले नवंबर 2015 में लोगों ने घोषणा कर दी कि वो लोग प्रेसिडेंट के लिए खड़े हो रहे हैं. कई लोग थे. वही लोग ऐलान करते हैं, जो खर्चा उठा सकते हैं. क्योंकि बड़ा महंगा होता है चुनाव. सबके बस की बात नहीं है. साल भर सारा काम छोड़ के प्रचार करना पड़ता है. ज्य़ादातर लोग वैसे ही होते हैं, जो बहुत फेमस होते हैं.

पहले चुने जाते हैं पार्टियों के कैंडिडेट

तो सबसे पहले ऑफिशियल घोषणा होती है कि कौन-कौन खड़ा हो रहा है. पेपर भर दिया जाता है. इलेक्शन कमीशन के पास. इसके बाद कोशिश यही रहती है कि जनता की नजर में ज्यादा से ज्यादा आएं. ताकि माहौल बनाया जा सके. भाषणबाजी होती है. दूसरे देशों के नेताओं से मिलना शुरू होता है. जिससे पता चले कि इनकी विदेश नीति क्या है. कहीं किसी पर हमला करने वाले तो नहीं हैं. इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका के लोग अपने इतने सैनिक भेज चुके हैं कि युद्ध को सपोर्ट नहीं करेंगे. फिर अगर कोई कैंडिडेट रूस से प्रेम बढ़ाता है तो उसके वोट कट जाएंगे. गे-लेस्बियन पर क्या विचार हैं, इससे भी वोट बदलते हैं. तो इरादा यही होता है कि हर मुद्दे पर अपनी राय देकर जनता का विश्वास जीता जाए. क्या बोलें कि लोगों के दिमाग में क्लिक कर जाए.
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अमेरिका में दो बड़ी पार्टियां हैं- रिपब्लिकन और डेमोक्रैट. और भी हैं जैसे ग्रीन पार्टी, पीस पार्टी पर प्रेसिडेंट दो के ही बने हैं आज तक. तो सारी पार्टियों को अपने-अपने कैंडिडेट चुनने होते हैं. दो के ही कैंडिडेट्स पर नजर होती है. क्योंकि बाकी में कोई दम नहीं होता है. अब होता ये है कि इन दोनों बड़ी पार्टियों में कई कैंडिडेट होते हैं. तो पहले चुनाव ये होता है कि इन दोनों पार्टिय़ों का कैंडिडेट कौन होगा. ध्यान रहे कि प्रेसिडेंट के बारे में अभी कोई ऐलान नहीं हुआ है. बस अभी पार्टिय़ों के बारे में बात हो रही है. तो दोनों पार्टियां जनवरी से लेकर जून तक का टाइम लेती हैं अपने कैंडिडेट्स को चुनने में. हर राज्य में दोनों पार्टियों के कई नेता होते हैं जिनको डेलीगेट कहा जाता है. इन डेलीगेटों के वोट से ही तय होता है कि किस राज्य में कौन जीत रहा है. हर राज्य में आबादी के हिसाब से डेलीगेट्स की संख्या तय होती है. कुल संख्या का आधा सपोर्ट लाना पड़ता है. यहां चुनाव रोचक हो जाता है. अगर एक राज्य में आधा सपोर्ट ला दिये तो जीत गए. पर इसके साथ ही अब आपको सारे डेलीगेट्स का सपोर्ट मिल जाएगा. तो जब डेलीगेट्स मिलते हैं तो इसे पार्टी कन्वेंशन कहा जाता है. यहीं पे कैंडिडेट तय हो जाते हैं. यहीं पर प्रेसिंडेंशियल कैंडिडेट को रनिंग मेट मिलता है. वो साथ में चुनाव स्ट्रैटजी तय करता है. जीतने पर वो वाइस प्रेसिडेंट बनता है.
पार्टियों के कैंडिडेट चुनाव के लिए दो तरीके होते हैं- प्राइमरी और काकस. कुछ राज्य प्राइमरी वाला मेथड फॉलो करते हैं. कुछ काकस वाला. प्राइमरी इसमें डेलीगेट्स पहले घोषित कर देते हैं कि वो किस कैंडिडेट का सपोर्ट कर रहे हैं. तो इसके आधार पर जनता डेलीगेट्स को वोट करती है. फरवरी और मार्च में एक सुपर ट्यूजडे होता है. उस दिन ज्यादातर राज्य वोट करते हैं. काकस कुछ राज्य काकस फॉलो करते हैं. इसमें सीधे वोटिंग नहीं होती है. पहले लोग इकट्ठा होते हैं. डेलीगेट्स आते हैं. डिस्कस करते हैं. उसके बाद वोटिंग होती है. जिसको ज्यादातर डेलीगेट्स का सपोर्ट रहता है, वो पार्टी का कैंडिडेट बन जाता है. जून तक ये तय हो जाता है कि कौन किस पार्टी का कैंडिडेट है.

डिस्कशन के बाद चुने जाते हैं प्रेसिडेंट

इसके बाद दोनों पार्टियों के कैंडिडेट आपस में डिस्कशन करते हैं टीवी पर. तीन राउंड का डिस्कशन होता है. इसी में मामला सेट हो जाता है कि जनता किसको वोट देगी. जैसा कि अभी हुआ. पहले ट्रंप ने उल्टा-पुल्टा बोल दिया. लड़कियों के बारे में. उनकी लाइकिंग गिरने लगी जनता में. अगले डिस्कशन में पता चला कि हिलेरी का ई-मेल लीक हो गया था. तो तुरंत जनता में संदेश गया कि ऐसी औरत देश कैसे संभालेगी, जो ई-मेल तक संभाल नहीं पाती है. फिर पता चला कि हिलेरी बीमार भी रहती हैं, तो ट्रंप की लाइकिंग और बढ़ने लगी. अब ये देखिए कि ट्रंप के इतना फालतू बोलने के बाद भी लाइकिंग बढ़ रही है. क्योंकि कई मुद्दे हैं. किस को जनता पसंद कर रही है, अब ये मुद्दों पर निर्भर करता है.
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यहां पर भी वोटिंग अलग है. जनता सीधे प्रेसिडेंट नहीं चुनती. पहले कुछ लोगों को वोट करती है, जिनको इलेक्टर कहा जाता है. ये सारे इलेक्टर मिलकर बनाते हैं इलेक्टोरल कॉलेज. किस प्रेसिडेंट को सपोर्ट कर रहे हैं, ये पहले से बता के रखते हैं. जिस राज्य में जितने लोग, उसी हिसाब से इलेक्टर्स. कैलीफोर्निया के 55 इलेक्टर हैं. सबसे ज्यादा. डेलावेयर छोटा राज्य है. 3 इलेक्टर हैं. कुल मिला के अमेरिका में 538 इलेक्टर हैं. अब अंत में ये पता चलता है कि किस प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट के कितने इलेक्टर जीते हैं. इसी आधार पर तय हो जाता है कि कौन अमेरिकी प्रेसिडेंट बनेगा. 270 चाहिए जीतने के लिए. 8 नवंबर से लेकर 20 जनवरी तक पुराने प्रेसिडेंट पद पर बने रहते हैं. ताकि नए वाले को काम समझा सकें. 20 जनवरी को नया प्रेसिडेंट काम संभाल लेता है. बनते ही ऑटोमैटिक वो अमेरिकी आर्मी का कमांडर-इन-चीफ बन जाता है. अमेरिका की विदेश नीति तय करने लगता है. ये बताता है कि अमेरिका किस चीज में कितना खर्च करेगा. सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी चुनता है. हालांकि इसमें सीनेट का अप्रूवल चाहिए होता है. इसके बाद ये आदमी दुनिया के सबसे ताकतवर देश का सबसे ताकतवर आदमी बन जाता है.
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