भूमिका जोशीभूमिका जोशी. लखनऊ की रहने वाली हैं. इस लड़की का एंथ्रोप्लाजी में दिमाग लगता हैऔर हिंदी साहित्य में दिल. न्यू हेवन में रहती है. येल में पीएचडी कर रही है औरबिला नागा हर हफ्ते आपको अमेरिका का हाल सुनाती है. वहां की चुनावी हलचल. लोकलगपशप. लोग. जिंदगी. कभी सर्द तो कभी नर्म और गर्म भी.दी लल्लनटॉप में हम इसी किस्म की पत्रकारिता करने का ख्वाब देखते हैं. आंखों देखी.भारी शब्दों से मुक्त. बेहद अपनी. कच्ची पक्की जैसी भी हो, पर नितांत सच्ची. जिसमेंकिस्से बयां हों. और उनके दरमियान जिंदगी के सबक या कि सच भी. भूमिरिकाकी नई किस्त में वो हाल सुना रही हैं ट्रंप और हिलेरी के बीच हो रही लड़ाई का, जोअब विश्वास और अविश्वास की लड़ाई की शक्ल ले चुकी है. बांचिए.--------------------------------------------------------------------------------जितनी बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बारे में लिखने के लिए कलम उठाती हूं, उतनीबार एक नई समस्या मेरे सामने होती है. फिलहाल मैं मेक्सिको एयरपोर्ट पर अमेरिकीएयरलाइन्स की घटिया व्यवस्था के चंगुल में फंसी हूं. पिछले कुछ दिनों में कुछ ऐसेहादसे भी घटे हैं, जिनकी वजह से इस चुनाव पर टिप्पणी करने में नई समस्या उत्पन्न होरही है. ऐसा क्या कहूं इस चुनाव के बारे में, जो पहले किसी ने कभी कहा नहीं.हिलेरी की जीत तय करते-करते भी राजनीतिक विशेषज्ञ इसकी दिलासा नहीं दिला पा रहेहैं. पिछले एक लेख में मैंने बहुत समय लगाकर ये कहने की कोशिश की थी कि चुनाव शायदइस बात पर तय होगा कि वोट करने वाले के लिए कौन कम भयंकर है. ट्रंप समर्थक हिलेरीके साथ-साथ बिल क्लिंटन की भयंकरता बांच रहे हैं. वो भयंकरता, जो राजनीतिक वर्चस्वऔर अधिकार की भयंकरता है. भले हिलेरी लिबरल अमेरिकियों के लिए एक चुनाव हों, लेकिनउनसे हिलेरी की वो छवि भी छिपी नहीं है, जिसे ट्रंप ने चुन-चुनकर हवा दी है. लेक्चरदेने के लिए निजी कंपनियों से अपने कैंपेन के लिए पैसे लेना हो या क्लिंटन फाउंडेशनके खातों में घपलेबाजी का संदेह होना.भले ट्रंप और हिलेरी की लड़ाई के बीच कई लोग हिलेरी की इस शख्सियत को नकार दें, परये उतना ही वाजिब है, जितना ट्रंप के प्रति इसी लिबरल गुट की घृणा. हिलेरी समर्थकोंऔर हिलेरी ने खुद भले ही ट्रंप समर्थकों को 'बुरे' और 'विदेशियों से नफरत करनेवालों' की उपाधि दे दी हो, पर यही अमेरिकी जनता है, जो हिलेरी की बेइमानी की भनक भरको हवा देने से नहीं चूकेगी. राजनीतिक जीवन में और खासकर चुनावी दिनों में ये लगभगस्वाभाविक है, तो फिर इसमें टिप्पणी करने लायक क्या बात है?विश्वभर में दक्षिणपंथी राजनीति के उठान में एक बात सामान्य है और वो है अविश्वास.इस बात का अविश्वास कि पूरे देश की जनता किसी भी अति दक्षिणपंथी (और उस हिसाब सेवामपंथी) गुट को चुन सकती है. हाल फिलहाल में भले ही तुर्की में अर्डोगन (तुर्की केराष्ट्रपति) का चुनाव हो, ब्रिटेन में टोरी पार्टी का या भारत में बीजेपी का.शुरुआत अविश्वास से ही होती है कि ऐसी राजनीतिक पॉसिबिलिटी है ही नहीं कि इस तरह कीराजनीति पूरे देश में हो सके. अमेरिका में दक्षिणपंथी विचारधारा की नुमाइंदगी करतीरही रिपब्लिकन पार्टी ने खुद ट्रंप की अति दक्षिणपंथी राजनीति से स्वयं को दूर करलिया है, पर व्यंग्य और कटाक्ष का बकरा होते हुए भी ट्रंप ने विश्वास-अविश्वास कीराजनीति का वो लट्टू घुमाया है कि वो जीते या न जीते, लेकिन ऐसी राजनीति ने एक नईजगह पा ली है. ये सिर्फ फैक्ट चेक वाला विश्वास-अविश्वास नहीं है जो हरप्रेसिडेंशियल डिबेट के बाद ट्रंप और हिलेरी के कथनों की सत्यता की जांच करें. येउस प्रकार का राजनीतिक विश्वास है, जो स्वयं को सिद्ध करने से भारी होता है. मसलनहिलेरी कहती रह जाएं कि उनके पास न केवल अमेरिका के भविष्य के लिए पुख्ता कार्यक्रमऔर पॉलिसी डिजाइन है या फिर ये कि उनके पास सरकार में कार्यरत होने का तजुर्बा है.ट्रंप का इतना ही कहना है कि राजनीतिक वर्चस्व के इतने सालों में सरकार से इतनेकरीब रहते हुए भला हिलेरी ये सब क्यों नहीं कर पाईं. ये न केवल लिबरल राजनीति केदोगलेपन को दर्शाता है, बल्कि ट्रंप समर्थकों में हिलेरी समर्थकों से ज्यादाविश्वास पैदा करता है. ये विश्वास कि उनका प्रतिनिधि राजनीतिक दंगल से उतना ही दूरहै, जितना हिलेरी उससे जुडी हुई हैं. भले ट्रंप ने कई साल के टैक्स रिटर्नसार्वजनिक नहीं किए या फिर उनके ऊपर दर्जनभर महिलाओं ने सेक्शुअल हरैसमेंट का आरोपलगाया हो. ट्रंप समर्थकों के लिए ये ट्रंप के गैर राजनीतिक जीवन का हिस्सा है, जोकई लोगों के लिए ट्रंप को मानवीय बताता है. दूसरी ओर फर्स्ट लेडी, सेक्रेटरी ऑफस्टेट और सीनेटर रह चुकीं हिलेरी क्लिंटन इसी जनता के लिए उस थकी हुई राजनीति काअभिन्न अंग हैं, जिससे वो स्वयं को हारा हुआ मानते हैं. ट्रंप के टूटे-फूटे बयानोंमें उतना ही राजनीतिक साजिश का अविश्वास है.चुनाव से 11 दिन पहले FBI के डायरेक्टर जेम्स कॉमी ने हिलेरी के प्रति जो जांचदोबारा स्थापित कर दी है, उसने इस विश्वास-अविश्वास की राजनीति को और भी कठोर करदिया है. खुद ही सोच लीजिए. एक तरफ हैं ट्रंप पर लगाए गए सेक्शुअल हरैसमेंट के आरोपऔर दूसरी तरफ हिलेरी पर देश की सुरक्षा के प्रति केयरलेस होने का आरोप. सामान्यराजनीतिक जीवन में किसका पलड़ा भारी प्रतीत होगा? ट्रंप पहले से ही इस बात को तूल देरहे थे कि हिलेरी विश्वास का पात्र नहीं हो सकतीं और भले FBI डायरेक्टर ने किसी भीवजह से ये जांच पुनः स्थापित की हो, हिलेरी के प्रति अविश्वास तो गहराता हुआ दिखरहा है. भले ये प्रतीत हो रहा है कि FBI के डायरेक्टर और यूएस जस्टिस डिपार्टमेंटके बीच मतभेद में हिलेरी फंस गई हैं, पर ये भी आश्चर्य की बात है कि इसी FBI जांचद्वारा अमेरिकी चुनाव में रूस के तथाकथित प्रभाव की पुष्टि ने वो तूल नहीं पकड़ा, जोहिलेरी के ई-मेल प्रकरण कांड ने पकड़ लिया है. अमेरिकी चुनाव की इस विश्वास-अविश्वासकी लड़ाई में न केवल गुट आधारित कटुता और अविश्वसनीयता भारी पड़ती दिख रही है, बल्किअमेरिका के सबसे विश्वसनीय अंगों और आधारों: FBI, डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस और नेशनलसिक्यॉरिटी की भी मानहानि होती दिख रही है. जैसा कि मैंने पिछले लेख मेंलिखा था, इस चुनाव की तुलना कई मायने में निक्सन और रीगन के बीच 1970 के चुनाव सेकी जा सकती है. ट्रंप ने स्वयं निक्सन और रीगन के बीच 1970 के राजनीतिक एजेंडे सेबहुत से तरीके अपनाए हैं, पर FBI जांच के पुनः शुरू होने की खबर से ट्रंप समर्थकोंने खुद हिलेरी को ही निक्सननुमा घोषित कर दिया है.वजह ये है कि राष्ट्रपति चुने जाने के डेढ़ साल में ही निक्सन को वाटरगेट कांड मेंदोषी घोषित करके महाभियोग लगा दिया गया था. ट्रंप समर्थकों और चुने हुए विशेषज्ञोंका का कहना है कि अगर हिलेरी राष्ट्रपति चुनी गईं, तो ये शर्मनाक होगा कि एकअमेरिकी राष्ट्रपति FBI जांच का पात्र होगा और अगर उन पर लगे आरोप सिद्ध हो गए, तोनिक्सन की तरह वो भी महाभियोग का पात्र बन सकती हैं. ये वाकई शर्मनाक होगा किअमेरिकी जनता एक ऐसी राष्ट्रपति चुने, जो शायद चुने जाने के बाद जल्द ही 'क्रिमिनल'घोषित हो जाए.ध्यान रखिए कि इस प्रस्ताव में बहुत सारे 'शायद' और 'अगर' हैं. 'अगर' इस FBI जांचमें हिलेरी के प्रति कुछ मिलेगा या नहीं, 'अगर' हिलेरी राष्ट्रपति घोषित होंगीनहीं, 'अगर' राष्ट्रपति बनने के बाद FBI जांच उन्हें दोषी करार देगी या नहीं? परचुनावी राजनीति में अविश्वास पैदा करने के लिए ये 'अगर' ही काफी है. भले ही कई लोग'अगर ट्रंप बन आए' के प्रस्ताव से भयभीत हैं, लेकिन कई और लोगों ने 'अगर हिलेरीराष्ट्रपति' बन जाएं' को शर्म और अविश्वास की राजनीति से ऐसे जोड़ दिया है किअमेरिकी चुनावी राजनीति के अजब-गजब मूल्यों को अनदेखा कर पाना बहुत ही मुश्किल होताजा रहा है. कुछ दिनों पहले ही ट्रंप हर रैली में चुनावों के तय होने का आरोप उछालरहे थे और शिकायत कर रहे थे कि हिलेरी सरकारी तंत्र-मंत्र से इतनी घुली-मिली हुईहैं कि जिस FBI जांच ने उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया था, वो भी अविश्वास है. इसलिएअगर चुनावों के नतीजों ने उन्हें नहीं जिताया, तो वो उन नतीजों को चुनौती देंगे, परFBI जांच के पुनः खुल जाने के क्षण भर में ही ट्रंप ने उसी FBI के प्रति अपना आभारप्रकट करते हुए कह डाला कि 'शायद अब अमेरिकी जनता इन्साफ की अपेक्षा कर सकती है'.अब हिलेरी समर्थकों की बारी है कि वो तय करें कि वो कौन सा रुख लेंगे.कई लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया है कि FBI डायरेक्टर का फैसला गलत है. नियमानुसारFBI चुनाव के साठ दिन पहले तक ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती है. जिन हिलेरी समर्थकोंने अभी तक FBI की विश्वसनीयता के आधार पर हिलेरी का निर्दोष होना निर्धारित कर लियाथा, वो भी अब इस दुनिया में हैं कि आखिरकार इन नए खुलासों से क्या साबित होगा? क्याये खुलासा चुनाव के नतीजों पर असर डालेगा? ये संभव है कि जो ट्रंप समर्थक अब तक FBIऔर जुड़े हुए सरकारी तंत्र को ही चुनौती दे रहे थे, वो अब उसके आभारी हैं और जोहिलेरी समर्थक अपनी जीत को इस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जोड़े हुए थे, अब वही अपनासंदेह प्रकट करने लगे हैं. अमेरिकी चुनावी राजनीति की ये कलाबाजियां सारी संभावनाओंऔर असंभावनाओं को सिर पर खड़ा करने में खूब सफल रहीं हैं. शांति हेतु ये कहने कालालच हो रहा है कि हफ्ते भर में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, पर शायदनहीं.--------------------------------------------------------------------------------पढ़िए भूमिका की पिछली किश्तें:स्पेशल रिपोर्ट, सीधे फ्रॉम अमेरिका, एक सांस में खींच जाओभूमिरिका: औरत की तबीयत पर ऐसा ध्यान, देश की तबीयत नासाज़ हैभूमिरिका: डाडा और उसकी मम्मा से अमरीका में मुलाकातआज आप मिलेंगे अमेरिका के केजरीवाल से. लाइव. सिर्फ लल्लनटॉप पर.भूमिरीका 3: येल यूनिवर्सिटी में उस दिन हिंदी कूल हो चली थी