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कौन कितना कलाबाज: अमरीकी चुनावी सर्कस की अटकलें

अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव से विश्वास और अविश्वास की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है.

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लल्लनटॉप
7 नवंबर 2016 (Updated: 7 नवंबर 2016, 07:09 AM IST)
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भूमिका जोशी
भूमिका जोशी

भूमिका जोशी. लखनऊ की रहने वाली हैं. इस लड़की का एंथ्रोप्लाजी में दिमाग लगता है और हिंदी साहित्य में दिल. न्यू हेवन में रहती है. येल में पीएचडी कर रही है और बिला नागा हर हफ्ते आपको अमेरिका का हाल सुनाती है. वहां की चुनावी हलचल. लोकल गपशप. लोग. जिंदगी. कभी सर्द तो कभी नर्म और गर्म भी.

दी लल्लनटॉप में हम इसी किस्म की पत्रकारिता करने का ख्वाब देखते हैं. आंखों देखी. भारी शब्दों से मुक्त. बेहद अपनी. कच्ची पक्की जैसी भी हो, पर नितांत सच्ची. जिसमें किस्से बयां हों. और उनके दरमियान जिंदगी के सबक या कि सच भी. भू
मिरिका
की नई किस्त में वो हाल सुना रही हैं ट्रंप और हिलेरी के बीच हो रही लड़ाई का, जो अब विश्वास और अविश्वास की लड़ाई की शक्ल ले चुकी है. बांचिए.




जितनी बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बारे में लिखने के लिए कलम उठाती हूं, उतनी बार एक नई समस्या मेरे सामने होती है. फिलहाल मैं मेक्सिको एयरपोर्ट पर अमेरिकी एयरलाइन्स की घटिया व्यवस्था के चंगुल में फंसी हूं. पिछले कुछ दिनों में कुछ ऐसे हादसे भी घटे हैं, जिनकी वजह से इस चुनाव पर टिप्पणी करने में नई समस्या उत्पन्न हो रही है. ऐसा क्या कहूं इस चुनाव के बारे में, जो पहले किसी ने कभी कहा नहीं.
हिलेरी की जीत तय करते-करते भी राजनीतिक विशेषज्ञ इसकी दिलासा नहीं दिला पा रहे हैं. पिछले एक लेख में मैंने बहुत समय लगाकर ये कहने की कोशिश की थी कि चुनाव शायद इस बात पर तय होगा कि वोट करने वाले के लिए कौन कम भयंकर है. ट्रंप समर्थक हिलेरी के साथ-साथ बिल क्लिंटन की भयंकरता बांच रहे हैं. वो भयंकरता, जो राजनीतिक वर्चस्व और अधिकार की भयंकरता है. भले हिलेरी लिबरल अमेरिकियों के लिए एक चुनाव हों, लेकिन उनसे हिलेरी की वो छवि भी छिपी नहीं है, जिसे ट्रंप ने चुन-चुनकर हवा दी है. लेक्चर देने के लिए निजी कंपनियों से अपने कैंपेन के लिए पैसे लेना हो या क्लिंटन फाउंडेशन के खातों में घपलेबाजी का संदेह होना.
भले ट्रंप और हिलेरी की लड़ाई के बीच कई लोग हिलेरी की इस शख्सियत को नकार दें, पर ये उतना ही वाजिब है, जितना ट्रंप के प्रति इसी लिबरल गुट की घृणा. हिलेरी समर्थकों और हिलेरी ने खुद भले ही ट्रंप समर्थकों को 'बुरे' और 'विदेशियों से नफरत करने वालों' की उपाधि दे दी हो, पर यही अमेरिकी जनता है, जो हिलेरी की बेइमानी की भनक भर को हवा देने से नहीं चूकेगी. राजनीतिक जीवन में और खासकर चुनावी दिनों में ये लगभग स्वाभाविक है, तो फिर इसमें टिप्पणी करने लायक क्या बात है?
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विश्वभर में दक्षिणपंथी राजनीति के उठान में एक बात सामान्य है और वो है अविश्वास. इस बात का अविश्वास कि पूरे देश की जनता किसी भी अति दक्षिणपंथी (और उस हिसाब से वामपंथी) गुट को चुन सकती है. हाल फिलहाल में भले ही तुर्की में अर्डोगन (तुर्की के राष्ट्रपति) का चुनाव हो, ब्रिटेन में टोरी पार्टी का या भारत में बीजेपी का. शुरुआत अविश्वास से ही होती है कि ऐसी राजनीतिक पॉसिबिलिटी है ही नहीं कि इस तरह की राजनीति पूरे देश में हो सके. अमेरिका में दक्षिणपंथी विचारधारा की नुमाइंदगी करती रही रिपब्लिकन पार्टी ने खुद ट्रंप की अति दक्षिणपंथी राजनीति से स्वयं को दूर कर लिया है, पर व्यंग्य और कटाक्ष का बकरा होते हुए भी ट्रंप ने विश्वास-अविश्वास की राजनीति का वो लट्टू घुमाया है कि वो जीते या न जीते, लेकिन ऐसी राजनीति ने एक नई जगह पा ली है.
ये सिर्फ फैक्ट चेक वाला विश्वास-अविश्वास नहीं है जो हर प्रेसिडेंशियल डिबेट के बाद ट्रंप और हिलेरी के कथनों की सत्यता की जांच करें. ये उस प्रकार का राजनीतिक विश्वास है, जो स्वयं को सिद्ध करने से भारी होता है. मसलन हिलेरी कहती रह जाएं कि उनके पास न केवल अमेरिका के भविष्य के लिए पुख्ता कार्यक्रम और पॉलिसी डिजाइन है या फिर ये कि उनके पास सरकार में कार्यरत होने का तजुर्बा है. ट्रंप का इतना ही कहना है कि राजनीतिक वर्चस्व के इतने सालों में सरकार से इतने करीब रहते हुए भला हिलेरी ये सब क्यों नहीं कर पाईं. ये न केवल लिबरल राजनीति के दोगलेपन को दर्शाता है, बल्कि ट्रंप समर्थकों में हिलेरी समर्थकों से ज्यादा विश्वास पैदा करता है.
ये विश्वास कि उनका प्रतिनिधि राजनीतिक दंगल से उतना ही दूर है, जितना हिलेरी उससे जुडी हुई हैं. भले ट्रंप ने कई साल के टैक्स रिटर्न सार्वजनिक नहीं किए या फिर उनके ऊपर दर्जनभर महिलाओं ने सेक्शुअल हरैसमेंट का आरोप लगाया हो. ट्रंप समर्थकों के लिए ये ट्रंप के गैर राजनीतिक जीवन का हिस्सा है, जो कई लोगों के लिए ट्रंप को मानवीय बताता है. दूसरी ओर फर्स्ट लेडी, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट और सीनेटर रह चुकीं हिलेरी क्लिंटन इसी जनता के लिए उस थकी हुई राजनीति का अभिन्न अंग हैं, जिससे वो स्वयं को हारा हुआ मानते हैं. ट्रंप के टूटे-फूटे बयानों में उतना ही राजनीतिक साजिश का अविश्वास है.
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चुनाव से 11 दिन पहले FBI के डायरेक्टर जेम्स कॉमी ने हिलेरी के प्रति जो जांच दोबारा स्थापित कर दी है, उसने इस विश्वास-अविश्वास की राजनीति को और भी कठोर कर दिया है. खुद ही सोच लीजिए. एक तरफ हैं ट्रंप पर लगाए गए सेक्शुअल हरैसमेंट के आरोप और दूसरी तरफ हिलेरी पर देश की सुरक्षा के प्रति केयरलेस होने का आरोप. सामान्य राजनीतिक जीवन में किसका पलड़ा भारी प्रतीत होगा?
ट्रंप पहले से ही इस बात को तूल दे रहे थे कि हिलेरी विश्वास का पात्र नहीं हो सकतीं और भले FBI डायरेक्टर ने किसी भी वजह से ये जांच पुनः स्थापित की हो, हिलेरी के प्रति अविश्वास तो गहराता हुआ दिख रहा है. भले ये प्रतीत हो रहा है कि FBI के डायरेक्टर और यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट के बीच मतभेद में हिलेरी फंस गई हैं, पर ये भी आश्चर्य की बात है कि इसी FBI जांच द्वारा अमेरिकी चुनाव में रूस के तथाकथित प्रभाव की पुष्टि ने वो तूल नहीं पकड़ा, जो हिलेरी के ई-मेल प्रकरण कांड ने पकड़ लिया है.
अमेरिकी चुनाव की इस विश्वास-अविश्वास की लड़ाई में न केवल गुट आधारित कटुता और अविश्वसनीयता भारी पड़ती दिख रही है, बल्कि अमेरिका के सबसे विश्वसनीय अंगों और आधारों: FBI, डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस और नेशनल सिक्यॉरिटी की भी मानहानि होती दिख रही है. जैसा कि मैंने पिछले लेख में
लिखा था, इस चुनाव की तुलना कई मायने में निक्सन और रीगन के बीच 1970 के चुनाव से की जा सकती है. ट्रंप ने स्वयं निक्सन और रीगन के बीच 1970 के राजनीतिक एजेंडे से बहुत से तरीके अपनाए हैं, पर FBI जांच के पुनः शुरू होने की खबर से ट्रंप समर्थकों ने खुद हिलेरी को ही निक्सननुमा घोषित कर दिया है.
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वजह ये है कि राष्ट्रपति चुने जाने के डेढ़ साल में ही निक्सन को वाटरगेट कांड में दोषी घोषित करके महाभियोग लगा दिया गया था. ट्रंप समर्थकों और चुने हुए विशेषज्ञों का का कहना है कि अगर हिलेरी राष्ट्रपति चुनी गईं, तो ये शर्मनाक होगा कि एक अमेरिकी राष्ट्रपति FBI जांच का पात्र होगा और अगर उन पर लगे आरोप सिद्ध हो गए, तो निक्सन की तरह वो भी महाभियोग का पात्र बन सकती हैं. ये वाकई शर्मनाक होगा कि अमेरिकी जनता एक ऐसी राष्ट्रपति चुने, जो शायद चुने जाने के बाद जल्द ही 'क्रिमिनल' घोषित हो जाए.
ध्यान रखिए कि इस प्रस्ताव में बहुत सारे 'शायद' और 'अगर' हैं. 'अगर' इस FBI जांच में हिलेरी के प्रति कुछ मिलेगा या नहीं, 'अगर' हिलेरी राष्ट्रपति घोषित होंगी नहीं, 'अगर' राष्ट्रपति बनने के बाद FBI जांच उन्हें दोषी करार देगी या नहीं? पर चुनावी राजनीति में अविश्वास पैदा करने के लिए ये 'अगर' ही काफी है.
भले ही कई लोग 'अगर ट्रंप बन आए' के प्रस्ताव से भयभीत हैं, लेकिन कई और लोगों ने 'अगर हिलेरी राष्ट्रपति' बन जाएं' को शर्म और अविश्वास की राजनीति से ऐसे जोड़ दिया है कि अमेरिकी चुनावी राजनीति के अजब-गजब मूल्यों को अनदेखा कर पाना बहुत ही मुश्किल होता जा रहा है. कुछ दिनों पहले ही ट्रंप हर रैली में चुनावों के तय होने का आरोप उछाल रहे थे और शिकायत कर रहे थे कि हिलेरी सरकारी तंत्र-मंत्र से इतनी घुली-मिली हुई हैं कि जिस FBI जांच ने उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया था, वो भी अविश्वास है. इसलिए अगर चुनावों के नतीजों ने उन्हें नहीं जिताया, तो वो उन नतीजों को चुनौती देंगे, पर FBI जांच के पुनः खुल जाने के क्षण भर में ही ट्रंप ने उसी FBI के प्रति अपना आभार प्रकट करते हुए कह डाला कि 'शायद अब अमेरिकी जनता इन्साफ की अपेक्षा कर सकती है'. अब हिलेरी समर्थकों की बारी है कि वो तय करें कि वो कौन सा रुख लेंगे.
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कई लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया है कि FBI डायरेक्टर का फैसला गलत है. नियमानुसार FBI चुनाव के साठ दिन पहले तक ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती है. जिन हिलेरी समर्थकों ने अभी तक FBI की विश्वसनीयता के आधार पर हिलेरी का निर्दोष होना निर्धारित कर लिया था, वो भी अब इस दुनिया में हैं कि आखिरकार इन नए खुलासों से क्या साबित होगा? क्या ये खुलासा चुनाव के नतीजों पर असर डालेगा? ये संभव है कि जो ट्रंप समर्थक अब तक FBI और जुड़े हुए सरकारी तंत्र को ही चुनौती दे रहे थे, वो अब उसके आभारी हैं और जो हिलेरी समर्थक अपनी जीत को इस व्यवस्था की विश्वसनीयता से जोड़े हुए थे, अब वही अपना संदेह प्रकट करने लगे हैं. अमेरिकी चुनावी राजनीति की ये कलाबाजियां सारी संभावनाओं और असंभावनाओं को सिर पर खड़ा करने में खूब सफल रहीं हैं. शांति हेतु ये कहने का लालच हो रहा है कि हफ्ते भर में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, पर शायद नहीं.


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