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यूनाइटेड नेशन में चुनाव चल रहे, पता है कैसे चुने जाते हैं UN के महासचिव?

यूएन के महासचिव को दुनिया का चीफ डिप्लोमेट कहा जाता है लेकिन इस डिप्लोमेट को चुनने की प्रक्रिया क्या होती है?

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3 मई 2026 (पब्लिश्ड: 03:39 PM IST)
UN Election
यूएन महासचिव के चुनाव चल रहे हैं. (फोटो- UN)
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दुनिया की सबसे बड़ी अंततराष्ट्रीय संस्था यूनाइटेड नेशन (United Nations- UN) में चुनाव चल रहा है. संस्था अपने प्रमुख यानी महासचिव को चुनने की प्रक्रिया में लगी है. दुनिया भर में शांति और सुरक्षा के अभियानों का नेतृत्व करने वाले इस संस्था का प्रमुख बनने के लिए 4 लोगों ने दावेदारी की है. 21-22 अप्रैल को चारों उम्मीदवारों ने यूएन जनरल असेंबली के सामने भाषण भी दिया. ये एक जरूरी स्पीच होती है, जिसे ‘informal, interactive dialogues’ कहा जाता है. इसमें सभी उम्मीदवारों ने अपने अनुभव, सोच और यूएन में आगे के काम को लेकर विस्तार से बातें कीं.

यूएन के महासचिव का पद इंपॉर्टेंट क्यों है?

यूएन के महासचिव को दुनिया का चीफ डिप्लोमेट कहा जाता है लेकिन इस डिप्लोमेट को चुनने की प्रक्रिया क्या होती है? आपके मन में भी ये सवाल कभी न कभी तो आया होगा. आज हम इसी बारे में जानेंगे, लेकिन इससे पहले ये जान लें कि महासचिव करते क्या हैं? यूएन में ये पद कितना महत्व का है? 

यूएन चार्टर के मुताबिक, जनरल सेक्रेटरी संगठन का Chief Administrative Officer होता है. यानी यूएन के रोजमर्रा के कामकाज से लेकर बड़े फैसलों तक, हर जगह उसकी भूमिका होती है. वो यूएन सेक्रेटेरिएट की अगुवाई करता है और जनरल असेंबली, सिक्योरिटी काउंसिल और इकोनॉमिक और सोशल काउंसिल जैसे प्रमुख हिस्सों के कामों को आगे बढ़ाने में मदद करता है.

महासचिव का अधिकार

महासचिव के पास एक अहम अधिकार ये भी होता है कि अगर उसे लगे कि दुनिया में कहीं शांति और सुरक्षा को खतरा है, तो वो उस मुद्दे को सीधे सिक्योरिटी काउंसिल के सामने रख सकता है. इसके अलावा जरूरत पड़ने पर वह अपने विशेष दूत भी नियुक्त कर सकता है. मौजूदा महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वेस्ट एशिया के मौजूदा संकट में ऐसा किया भी है. अक्सर महासचिव को दुनिया का चीफ डिप्लोमैट कहा जाता है, क्योंकि वो कई बार देशों के बीच बातचीत करवाने और तनाव कम करने की कोशिश करता है. साथ ही, क्लाइमेट चेंज, असमानता, जंग और विकास जैसे मुद्दों पर वो यूएन की ओर से दुनिया के सामने अपनी बात रखता है.

अब बात करते हैं कि महासचिव का चुनाव कैसे होता है. यूएन चार्टर के मुताबिक, महासचिव की नियुक्ति जनरल असेंबली करती है, लेकिन इसके लिए सिक्योरिटी काउंसिल की सिफारिश जरूरी होती है. यहीं पर पांच स्थायी सदस्य चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका बहुत अहम हो जाते हैं. इनके पास विटो पावर होती है. इसका मतलब ये है कि अगर इन पांच में से कोई एक देश भी किसी उम्मीदवार के खिलाफ है, तो वो उम्मीदवार आगे नहीं बढ़ सकता.

चुनाव की परंपराएं

कुछ परंपराएं भी इस चुनाव में देखी जाती हैं. तकनीकी तौर से महासचिव के कार्यकाल की कोई तय सीमा नहीं है, लेकिन 1981 के बाद से सभी महासचिवों ने खुद को दो कार्यकाल तक ही सीमित रखा है. इसके अलावा ये भी माना जाता है कि ये पद दुनिया के अलग-अलग इलाकों में बारी-बारी से जाता है. जैसे अफ्रीका, एशिया, पूर्वी यूरोप, पश्चिमी यूरोप और लैटिन अमेरिका- कैरेबियन. इस बार लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र की बारी मानी जा रही है. हालांकि इस क्षेत्र के अंदर भी अलग-अलग देशों के बीच समर्थन को लेकर मतभेद हैं.

कौन-कौन हैं उम्मीदवार?

अब उन चार उम्मीदवारों के बारे में जान लेते हैं, जो इस समय दौड़ में हैं. पहला नाम है वेरोनिका मिशेल बाचेलेत जेरिया का. वो चिली की पूर्व राष्ट्रपति रह चुकी हैं और यूएन में मानवाधिकार मामलों की प्रमुख भी रही हैं. दूसरा नाम है मैकी सैल, जो सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति हैं. तीसरे उम्मीदवार हैं राफेल मारियानो ग्रॉसी, जो International Atomic Energy Agency के हेड हैं. चौथी उम्मीदवार हैं रेबेका ग्रिनस्पैन, जो यूएन Conference on Trade and Development की प्रमुख हैं.

नए महासचिव की चुनौती

‘द हिंदू’ की रपट के मुताबिक, ये चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब यूएन कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है. सबसे बड़ी समस्या आर्थिक है. यूएन का काम सदस्य देशों से मिलने वाले Mandatory Contribution पर चलता है. लेकिन कई देश समय पर पैसा नहीं दे रहे हैं. कुछ देश पूरा पैसा नहीं दे रहे हैं और कुछ मामलों में भुगतान में काफी देरी हो रही है. इससे यूएन की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ा है.

दूसरी बड़ी चुनौती Security काउंसिल के कामकाज से जुड़ी है. स्थायी सदस्य देशों के बीच मतभेद इतने बढ़ गए हैं कि कई बार अहम मुद्दों पर फैसले नहीं हो पाते. विटो पावर का इस्तेमाल बार-बार होने से परिषद में मुश्किल हालात बन जाते है.

तीसरी चुनौती यूएन के शांति मिशनों से जुड़ी है. हैती जैसे देशों में मिशन के लिए फंड और सैनिक जुटाना मुश्किल हो रहा है. माली में यूएन मिशन को वापस लेना पड़ा, क्योंकि वहां हालात और मेजबान देश के साथ संबंध चुनौतीपूर्ण हो गए थे.

इसके अलावा हाल के सालों में कई बड़े संघर्ष सामने आए हैं. Gaza, Lebanon, Sudan, Ukraine और ईरान जैसे इलाकों में तनाव और जंग के हालात ने ये सवाल खड़ा किया है कि क्या यूएन अपनी मूल जिम्मेदारी, यानी जंग को रोकने और शांति बनाए रखने में सफल हो पा रहा है.

कुछ मीडिया रपट के मुताबिक, विकास से जुड़े टारगेट के हालात भी चिंताजनक है. यूएन ने 2030 तक Sustainable Development Goals (SDGs) हासिल करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन फिलहाल केवल 18% टारगेट ही सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. वहीं मानवीय सहायता से जुड़ा सिस्टम भी दबाव में है. लगातार बढ़ते संघर्ष, प्राकृतिक आपदाएं और अंतरराष्ट्रीय कानून पर बढ़ते दबाव ने इस व्यवस्था को कमजोर किया है.

ऐसे में अगले महासचिव के सामने सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं होगी, बल्कि उसे इस पूरी संस्था को नई दिशा देने की चुनौती भी होगी.

उम्मीदवारों का नजरिया

महासचिव पद के चारों उम्मीदवारों ने बीते दिनों जनरल असेंबली के साथ बातचीत में अपने-अपने विचार रखे. चारों उम्मीदवारों ने preventive diplomacy पर जोर दिया. इसका मतलब है कि संघर्ष होने से पहले ही बातचीत और कूटनीति के जरिए उसे रोकने की कोशिश करना. हालांकि उनके तरीके अलग-अलग हैं. मिशेल बाचेलेत ने कहा कि यूएन को जमीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ानी चाहिए और क्लाइमेट चेंज को प्राथमिकता देनी चाहिए. 

रेबेका ग्रिनस्पैन ने यूएन में सुधार की जरूरत पर सबसे ज्यादा जोर दिया और कहा कि अगर वह चुनी जाती हैं तो पहले 100 दिनों में ही संगठन के ढांचे में बदलाव की शुरुआत करेंगी. उन्होंने ये भी कहा कि मानवाधिकार और संघर्ष रोकने के कोशिशों को एक साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने कम विकसित देशों को फंड में कटौती से बचाने की बात कही.

मैकी सैल ने माइग्रेशन को एक अहम मुद्दा बताया और कहा कि इस पर वैश्विक स्तर पर बेहतर सहयोग की जरूरत है. 

रफायल ग्रॉसी ने यूएन और वल्ड बैंक के बीच सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया.

चारों उम्मीदवारों ने gender equality यानी लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की बात कही.

चुनाव की प्रक्रिया

अब आगे चुनाव की प्रक्रिया क्या होगी? चुनाव के अगले चरण में सिक्योरिटी काउंसिल बंद कमरे में बैठकर चर्चा करेगा और straw polls यानी अनौपचारिक वोटिंग के जरिए ये तय करेगा कि किस उम्मीदवार को आगे बढ़ाया जाए. इसके बाद परिषद एक नाम जनल असेंबली को भेजेगी. फिर जनरल असेंबली बहुमत से उस नाम को मंजूरी देगी. पूरी प्रक्रिया अक्टूबर तक पूरी होने की उम्मीद है. नया महासचिव 1 जनवरी 2027 से अपना कार्यकाल शुरू करेगा.

ये चुनाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आने वाले सालों में यूएन को कई मोर्चों पर काम करना होगा. जैसे शांति और सुरक्षा बनाए रखना, विकास के टारगेट्स को आगे बढ़ाना, क्लाइमेट चेंज  से निपटना और वैश्विक सहयोग को मजबूत करना. ऐसे में ये देखना अहम होगा कि अगला महासचिव इन चुनौतियों का सामना कैसे करता है और यूएन को किस दिशा में लेकर जाता है.

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