खंडवा, मध्य प्रदेश. 4 अगस्त 1929. एक छोटे से शहर के छोटे से बाज़ार के बेहद छोटेसे मकान में एक बंगाली परिवार. दो बेटों के बाद तीसरा पैदा हुआ. आभास गांगुली.बंगाली परिवार होने के नाते घरवालों की आवाज़ से ज़्यादा उसके कानों में गानों कीआवाज़ जाया करती थी. खुद की आवाज़ एकदम फटा हुआ बांस. साथ ही एक नम्बर का शैतान बालक.न किसी की सुननी, न समझनी. एक दिन धमाचौकड़ी मचाते हुए घर के अन्दर दौड़ लगा रहा था.मां बैठी हुई तरकारी काट रही थी. आभास के पैर की सबसे छोटी उंगली दरवाज़े के कोनेमें जा भिड़ी. खून बह निकला. पैर सूज गया. मलहम लगा, पट्टी बांधी गयी. आभास का रोनान शांत हुआ. तीन दिनों तक. गला फाड़ के रोता रहा. दर्द गया तो रोना बंद हुआ. अब जबवो बोलता तो उसकी आवाज़ में कुछ बदलाव आ गया था. कुछ क्या, काफी ज़्यादा. सारी खराशआंसुओं की भेंट चढ़ चुकी थी. फटा बांस अब बांसुरी में तब्दील हो गया था. बड़ा भाईसंगीत की तालीम लेता था. घर पे मास्टर जी आते थे. एक कमरे में सितार और बाकी काअल्ला-बल्ला लेकर गुरु और चेला बैठे राग अलापते थे. आभास बाहर से बस झांकता रहताथा. पिता वकील थे. एकदम कड़क. इस दौरान उस कमरे के अन्दर जाने की उन्हें मनाही थी.वो बस बाहर से ही झांक सकते थे.--------------------------------------------------------------------------------अपने ही घर में चोरी छुपे ली गयी संगीत की बस इतनी सी ही शिक्षा के दम पर आभासकुमार गांगुली बदल गया किशोर कुमार में.--------------------------------------------------------------------------------किशोर कुमार तीन भाई थे. सबसे बड़े अशोक कुमार यानी दादा मुनि. मंझले भाई अनूपकुमार. तीसरे खुद किशोर कुमार. किशोर कुमार. जिसने मन के कोरे काग़ज़ पर कितनी ही बारअपना नाम लिख दिया. जिसने न देखा, न सोचा, बस निशाने पर जान रख दी. जो हसीनों कीगली से बस दूर ही से सलाम कर के निकल जाता था. और वो जो धड़कते दिलों के तराने लिएबस चला ही जाता था. गांगुली परिवार का फ़िल्मी कनेक्शन था. तीन भाइयों के अलावा एकबहन भी थी. सती देवी. शादी हुई शशिधर मुखर्जी से. शशिधर मुखर्जी ने बम्बई मेंफ़िल्मिस्तान नाम का स्टूडियो बनाया. सेठ जालान के साथ पार्टनरशिप में. शशिधरमुखर्जी ने अपना करियर बॉम्बे टॉकीज़ से शुरू किया जिसमें एक फिल्म बनी महल. दादामुनि उसमें ऐक्टिंग कर रहे थे. पहली बार. किशोर कुमार अभी बालक ही थे. दोनों के बीचकुछ 18 बरसों का फासला था. किशोर कुमार बॉम्बे टॉकीज़ जाते थे और बस कैंटीन में समयबिताते थे. एक टेबल घेर लेते थे और पूरे वक़्त उसपे तबला बजाते हुए 'बमचिक-बमचिक' सीआवाजें निकालते थे. हर कोई मज़ाक उड़ाता था. दादा मुनि अपनी पहचान बना चुके थे. लोगउन्हें जानते थे. लोगों को ऐसा भी लगता था कि उनका ये छोटा आवारा भाई अपने बड़े भाईके फ़िल्मी करियर को सीढ़ी बनाना चाहता था. किशोर कुमार को फ़ायदा बस इतना मिला किचूंकि वो गा-वा लेते थे, उन्हें फिल्मों के गानों में कोरस में खड़े होने का मौकामिल गया. इन सबके बावजूद वो चांस मारते रहे. उन्हें कैमरे के सामने आने का शौक था.दादा मुनि ने उन्हें किसी के पास भेजा भी. उसने किशोर कुमार को झाड़ दिया. बोले कि'तुम्हारा बड़ा भाई हीरो है तो क्या तुम भी बन जाओगे? तुम उसकी शकल देखो और अपनीदेखो. तुम हीरो नहीं बन सकते.' किशोर कुमार ऐसी बातें सुनते आ रहे थे. इस बारउन्हें चुभ गयी. बहुत नाराज़ हुए. कभी भूल भी नहीं पाए. सालों बाद जब वहीडायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स उनके साथ काम करने आये, किशोर कुमार ने उनके साथ कामकरने से साफ़ इनकार कर दिया. दिल में उन सभी के लिए वो तल्खी लिए घूमते थे. मगर वोखुद घूमते थे प्यार का गीत सुनाते हुए. जिसकी नज़र मंज़िल पर थी. एकदम झुमरू. येअड़ियल स्वभाव उनकी पहचान थी. एकदम साफ़ सोच. अच्छा है तो अच्छा है, बुरा है तो बुरा.उन्हें चिढ़ बहुत जल्दी हो जाती थी. लेकिन थे खूब मज़ाकिया. अपने वार्डन रोड के फ़्लैटके दरवाज़े पर एक बोर्ड लगा दिया - किशोर से सावधान. उनके घर परप्रोड्यूसर-डायरेक्टर एच.एस. रवैल आये. उन्हें कुछ पैसे देने. किशोर कुमार नेउन्हें दरवाज़े पर ही अटेंड किया और पैसे लिए. जब रवैल ने हाथ मिलाने के लिए हाथ आगेबढ़ाया, तो किशोर कुमार ने हाथ पकड़ा और काट खाया. रवैल ने जब पूछा कि वो क्या कर रहेहैं, तो किशोर कुमार ने कहा, "तुमने ये बोर्ड नहीं पढ़ा?" किसी फिल्म डायरेक्टर सेजब किशोर कुमार का अजीब-ओ-गरीब मज़ाक सहा नहीं गया तो वो कोर्ट चला गया. कोर्ट नेऑर्डर दिया कि किशोर कुमार डायरेक्टर के कहे मुताबिक़ ही काम करेंगे. उसके बाद एकगाने की शूटिंग में किशोर कुमार गाड़ी चला रहे थे. शॉट खतम हो गया लेकिन वो गाड़ीचलाते रहे. चलाते-चलाते खंडाला पहुंच गए. इसलिए क्यूंकि डायरेक्टर कट बोलना भूल गयाथा. उन्हें नफरत थी उनसे जो उन्हें पूरा पेमेंट नहीं देते थे. एक वक़्त के बाद वोसिर्फ तभी काम करते थे, जब उनका सेक्रेटरी ये बता देता कि पूरा पेमेंट हो चुका है.एक ऐसे ही मौके पर वो शूटिंग के लिए अपने आधे चेहरे पर मेकअप लगा कर पहुंच गए.डायरेक्टर ने पूछा तो कहा, "आधा पैसा तो आधा मेकअप." बाद में समझ आया कि उन्हेंपूरा पेमेंट चाहिए था जबकि मिला सिर्फ आधा ही था. ज़िद और अक्खड़पन की एक और मिसालउन्होंने तब कायम की जब उन्होंने एक फ़िल्म की शूटिंग करने से ही मना कर दिया.डायरेक्टर ने किशोर कुमार को पांच हज़ार रुपये बकाया रख छोड़े थे. बड़े भाई अशोक कुमारने जब समझाया तो तैयार हुए. कैमरा चालू होते ही चिल्लाये, "पांच हज़ार रुपैय्या!" औरकलाबाजियां करने लगे. किशोर कुमार के.एल. सहगल से बहुत इंस्पायर्ड थे. बचपन से. वोउनकी नक़ल करते थे. उनकी ही स्टाइल में गाने गाते थे. फिल्म जिद्दी. साल 1949. एकनया नया हीरो काम कर रहा था. देवानंद. किशोर कुमार का पहला गाना. "मरने की दुआएंक्यूं मांगूं, जीने की तमन्ना कौन करे." देखा जाए तो 1951 में सही मायनों में किशोर कुमार इंडस्ट्री में आये. बिमल रॉयडायरेक्टर थे. शीला रमानी हिरोइन थीं. किशोर कुमार ने एक दिन डायरेक्टर साहब से कहाकि इस फिल्म का एक गाना उन्हें गाना है. म्यूज़िक डायरेक्टर सलिल चौधरी से जब बात कीतो उन्होंने झिड़क दिया. उन्होंने कहा कि ये कोई ट्रेंड सिंगर तो है नहीं. लेकिनकिशोर कुमार जिद्दी थे. ज़िद पे अड़ गए. अंत में हार कर सलिल चौधरी ने गाना गवाया.गाना ऐसा कि आज भी उसे रेडियो पर सुनने का जी चाहता है. बेजोड़ गाना. बहुत बड़ा हिट."छोटा सा घर होगा, बादलों की छांव में..." यहां से शुरू हुआ किशोर कुमार का सिंगिंगऔर ऐक्टिंग करियर. https://www.youtube.com/watch?v=KRfgKRy-W7E पचास के दशक कीशुरुआत में आया गाना - "ईना मीना डीका..." एक बे सर-पैर के बोल वाला गाना. मजाल हैआज भी बज जाए और आपके चेहरे पर एक मुस्कान न आए. मोहन सहगल की बनाई फिल्म न्यूडेल्ही. फिल्म का गाना नखरेवाली. बेहद पॉपुलर हुआ. और उनकी मुलाक़ात हुई एस.डी.बर्मन से. उन्होंने उनसे कहा, 'माना सहगल साहब एक बेहतरीन सिंगर थे. लेकिन तुम्हेंअपनी आवाज़ को ढूंढना चाहिए.' किशोर कुमार ने अपनी आवाज़ ढूंढी और गाया उस सिंगर केलिए जिसके लिए सबसे पहले गाया था - देवानंद. फिल्म फंटूश. गाना - "देने वाला जब भीदेता ..." https://www.youtube.com/watch?v=NoxSwTPneJY गाना "एक लड़की भीगी भागीसी..." किशोर कुमार का कालजयी गाना. गैराज में खड़ी एक गाड़ी, झमाझम होती बारिश, एकलड़की और किशोर कुमार. अपनी स्टाइल में गाते हुए. फिल्म का नाम 'चलती का नाम गाड़ी'.इस फिल्म की दो ख़ास बातें थी. पहली कि ये किशोर कुमार की प्रोड्यूस की हुई सबसेपहली फिल्म थी. दूसरी कि इस फिल्म में तीनों गांगुली भाइयों ने काम किया था. इसफिल्म के गाने बेहद पॉपुलर हुए. आज भी उतने ही हैं. जब किशोर कुमार पांच रुपइय्याबारा आना मांगते हैं तो फ़ील गुड वाली फीलिंग आती है. और उसका ये गाना जो बताता हैकि चलती को गाड़ी कहते हैं और इशारों का समझा जाना किस कदर ज़रूरी है. "सौ बातों कीइक बात यही है, क्या भला तो क्या बुरा, कामयाबी में ज़िन्दगी है..."https://www.youtube.com/watch?v=xlbAlfzIPo0 किशोर कुमार के साथ ही फिल्मों में आईयोडलिंग. गाने के दौरान किशोर कुमार की निकाली गई अजीब-ओ-गरीब आवाजें. वो आवाजें जोअब से पहले हिंदी गानों में नहीं सुनाई देती थीं. किशोर कुमार को योडलिंग का चस्कालगा था अपने मंझले भाई की वजह से. वो बचपन से उसकी प्रैक्टिस करते हुए आ रहे थे.https://www.youtube.com/watch?v=wtGL3Y9OPAU किशोर कुमार का ये मुस्कुराता हुआ,हमेशा मज़ाक के मूड में रहने वाला चेहरा एक मुखौटा मात्र था. इन सभी के पीछे एक बेहदअकेला किशोर कुमार था. वो किशोर कुमार जो चलती का नाम गाड़ी और बढ़ती का नाम दाढ़ीजैसी फिल्में बना रहा था, वही किशोर कुमार दूर गगन की छांव में, दूर का राही जैसीफिल्में बना रहे थे. इन फिल्मों के गीत भी उन्होंने ही लिखे. "बेक़रार दिल तू गाएजा, खुशियों से भरे वो तराने जिन्हें सुन के दुनिया झूम उठे..." ऐसे गाने सिर्फ वोही लिख सकता था, जो कई सतहों में गम में डूबा हो. उनके सारे मज़ाकों के पीछे एक दर्दसे झुलसता आदमी था. जो शायद दुनिया से कहता था,--------------------------------------------------------------------------------"तूने ओ सनम, ढाए हैं सितम, तो ये तू भूल न जाना, के न तुझपे भी इनायत होगी, आजरुसवा तेरी गलियों में मोहब्बत होगी..."-------------------------------------------------------------------------------- https://www.youtube.com/watch?v=yIzCBU0_LyY किशोर कुमार ने पर्सनल और प्रोफ़ेशनलदोनों ही ज़िंदगियों में पहाड़ों की ऊंचाई और खाइयों की गहराई झेली. जीवन में सैकड़ोंमुहब्बत भरे गाने गाने वाले किशोर कुमार असल ज़िन्दगी में लोगों के साथ के मोहताजरहे. खुद को लोगों से दूर रक्खा या दूर होते ही रहे, ये वो खुद भी नहीं समझ पाए.अपना अंतिम संस्कार खंडवा में करवाने की ख्वाहिश जता गए. कहते थे बम्बई में किसी काअंतिम संस्कार सेलिब्रिटियों का गेट-टुगेदर होता है. उन्हें वैसे नहीं जाना था. वोशांति चाहते थे. मुक्ति. अपने तमाम पचड़ों, मुसीबतों, ग़मों के बाद भी किशोर कुमारहमेशा एक ही सीख देते हुए मालूम पड़ते हैं ---------------------------------------------------------------------------------"यूं ही गाते रहो, मुस्कुराते रहो, नाचो रे सब झूम के गाओ रे, हो गाओ रे.... आओरे...!!!"-------------------------------------------------------------------------------- https://www.youtube.com/watch?v=RIjQjECxDDA--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: बस पांडू हवलदार नहीं थे भगवान दादा: 34 बातें जो आपको ये बता देगी!