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बच्चियों को सिर्फ़ बुरी मंशा से छूने के बारे में बताना ही काफी नहीं

बड़े बदलाव के लिए ये तरीके जरुरी हैं.

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16 जून 2018 (अपडेटेड: 16 जून 2018, 11:33 AM IST)
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सभी चित्र सांकेतिक है.
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यह लेख डेली ओ से लिया गया है जिसे नमिता भंडारे ने लिखा है.   दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


आज हमारे आसपास न जाने कितनी औरतें, छोटी बच्चियां, बलात्कार और यौन हिंसा का शिकार हो रही हैं. इतनी डरावनी स्थितियों के बीच भी हम में से कई कह पड़ते हैं कि 'हम इसमें क्या कर सकते हैं?' इससे शर्मनाक और कोई बात नहीं हो सकती. जो भी करना हो, करना हमें ही होगा. सिर्फ बातों से कोई बदलाव नहीं आता. बदलाव के लिए प्रयास करने पड़ते हैं. दुनिया बदलने के लिए हमेशा बड़ी क्रांतियों या विचारों की जरूरत नहीं होती. अक्सर छोटी-छोटी बातें ही दुनिया बदल देने का ज़ज्बा रखती हैं. हर इंसान अगर अपने स्तर पर कोशिश करे तो चीजों का बदलना इतना भी मुश्किल नहीं. और नामुमकिन तो बिलकुल नहीं. पढ़िए ये नौ तरीके और अपनी तरफ से इनमें कुछ और भी जोड़िए-

#बच्चियों को 'ना' कहना सिखाएं-

हम अपनी बच्चियों को बैड टच (बुरा स्पर्श) के बारे में बताते रहते हैं. लेकिन उन्हें सिर्फ इतना बताना ही काफी नहीं है. हमें उन्हें 'न' कहना या किसी भी वैसी चीज के लिए मना करना सिखाना होगा, जो उन्हें पसंद नहीं. अब भी कई माएं अपनी बेटियों को अच्छी लड़की बनने की सीख देती रहती हैं. अच्छी लड़की मतलब, ऐसी लड़की जो किसी चीज के लिए मना न करे, चुपचाप हर बात मानती जाए. किसी भी हाल में खुश रह कर पूरी ज़िंदगी समझौते करती रहे. उसे ये सब बताते हुए हम ये नहीं समझ पाते हम ये नहीं समझ पाते बच्चियों को ना कहना सिखाना भी उन्हें आने वाली ज़िंदगी के लिए तैयार करना ही है. जिस दिन वे किसी गलत चीज के लिए मना करना सीख जाएंगी उनका शोषण होना बंद हो जाएगा, वो गलत रिश्तों में रहने से इंकार कर पाएंगी. अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा पाएंगी. बेटियों को आत्मसम्मान से जीने के लिए उन्हें ना कहना सिखाइए. साथ ही अपने बेटों को 'हां' का इंतज़ार करना भी सिखाइए.

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  #सबसे पहले अपनी भाषा पर ध्यान दें-

अपनी खुद की भाषा भी बदलें. अपने बेटों से या अपने घर में किसी भी लड़के से 'लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो?' या 'मर्द बनो.' जैसी भाषा का इस्तेमाल करने से बचें. किसी मर्द को अपमानित करने के लिए 'चूड़ियां पहन लो' कहने का आखिर क्या मतलब है. और क्यों ऐसी भाषा में हमें बात नहीं करनी चाहिए, ये भी उन्हें बताइए. शारीरिक शोषण, बलात्कार और छेड़छाड़ के फर्क के बारे में भी बताएं। उन्हें बताएं की 'ऑनर किलिंग' एक अपराध है और उस का इज़्ज़त के साथ कोई लेना देना नहीं है. शब्द बनी बनाई धारणाओं को और अधिक मजबूत करते हैं. औरतें कोमल, दयालू और त्याग की मूर्ती होती हैं. मर्द महत्वाकांक्षी और बहादुर होता है. जब औरत-मर्द को इन सीमाओं में बाँध दिया जाता है, तब इन मानदंडों या सीमाओं को तोड़ने वाले हमारी नजर में अपराधी हो जाते हैं जैसे. महत्वाकांक्षी औरत और दयालू मर्द की हम कल्पना भी नहीं कर पाते. हमें छोटे छोटे शब्दों के प्रयोग और उनके छिपे मकसद को भी समझाना होगा. हाल ही में मेरे 55वें जन्मदिन के मौके पर मेरे दोस्त ने तारीफ़ करने के अंदाज़ में मुझसे कहा कि मैं 45 साल से ज्यादा की नहीं दिखती. मुझे समझ नहीं आता कि ये तारीफ़ कैसे है. या लोग इसे तारीफ़ क्यों समझते हैं.

#बेटों को घरेलू काम सिखाएं-

अपने बेटों को किचन से जुड़े सारे काम सिखाएं। झाड़ू-पोंछे जैसे दूसरे घरेलू काम करने की भी आदत डालें. उन्हें उनके खुद के और पेरेंट्स के बिस्तर बनाना सिखाएं। इससे आपके बेटे आत्मनिर्भर बनेंगे. इसके अलावा बेटों को उन घरेलू कार्यों की इज़्ज़त करना सिखाएं जो उनकी माएं किया करती हैं. जिस दिन मर्द यानी पति या बेटे घर के कामों में अपनी पत्नी या मां का हाथ बंटाने लगेंगे उसी दिन से घर के काम के बोझ की वजह से किसी औरत को नौकरी नहीं छोड़नी पड़ेगी.

#बेटियों को खेलना सिखाएं-

बेटियों को सार्वजनिक जगहों जैसे पार्क या खेल के मैदान में खेलने भेजें. अपनी बेटी को क्रिकेट बैट या फुटबॉल खेलने वाले जूते गिफ्ट कीजिए. उसे बताइए कि वह किसी मायने में, कहीं से भी कमजोर नहीं है. स्पोर्ट्स से उसमें आत्मविश्वास गहरा होगा. उसे पता चलेगा कि उसमें और लड़कों में कोई अंतर नहीं है. लड़कियों को स्पोर्ट्स से दूर रखना उन्हें पब्लिक स्पेस से दूर रखना है. पहले हम उसे खेल के मैदान से दूर रखते हैं फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से. ऐसा लगता है जैसे इन सार्वजनिक चीजों या जगहों पर सिर्फ मर्दों का ही अधिकार हो. इसलिए उन्हें खेलने दें.

playing girls   #किसी महिला की गाइड या मार्गदर्शक बनें-

अगर आप ऐसी स्थिति में हैं आप किसी की मदद कर सकें तो अपने पूरे करियर में कम से कम एक महिला का मार्ग दर्शन जरूर करें। उसे आवाज उठाना सिखाएं और ये भी ध्यान रखें कि उसे उसके काम के लिए जाना जाए. उसे पहचान मिले. उसे बताएं कि वो कहां गलत है और कहां सही. घरेलू समस्याओं को सुलझाने में भी उसकी मदद करें. अपने ऑफिस या कार्यस्थल पर लैंगिक-समानता स्थापित करने का प्रयास करें. साथ ही एक समान सैलरी के लिए भी आवाज़ उठाएं.

#अपने भीतर छुपे स्त्रीविरोधी रवैये पर भी नजर रखें-

कहीं आप भी उन्हीं लोगों में से तो नहीं जो लड़कियों से उनके करियर या लक्ष्यों के बारे में बात न कर के सिर्फ शादी और प्यार-मोहब्बत की बातें किया करती है? आपकी सहेली का बेटा जब नर्सिंग की पढ़ाई करना चाहता है तो कहीं आप उसके पीठ पीछे उसका मजाक तो नहीं उड़ातीं? कहीं आपको ये तो नहीं लगता कि आप नौकरी के लायक नहीं और इसलिए आप ऑफिस में अपनी सैलरी बढ़ाने या अपनी पदोन्नति के बारे में कोई बात ही नहीं करतीं. अगर ऐसा है तो सबसे पहले आपको खुद को सुधारना होगा. अपने पूर्वाग्रहों से निकलना होगा.

#औरतों के समूह के साथ जुड़ें-

फेमिनिस्ट अर्थशास्त्री ऋतु दीवान कहती है- 'उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ के कई गांवों ने नए तरीके की कार्य-संस्कृति विकसित की है जिसे वे 'अल्टा-पल्टा' कहती हैं. इसमें औरतें, समूह में सारे कार्य करती हैं. ये समूह उन्हें सशक्त तो बनाते ही हैं, वे बाज़ार के शोषण से भी दूर रहती हैं.' जैसे अगर एक औरत दूसरी औरत के लिए लकड़ियां तोड़ लाती है तो उसके बदले अगली बार दूसरी औरत उसके लिए कोई और काम कर देती है. इस तरह औरतें एक दूसरे का काम आसान करती है. ऐसी ही पहल शहरों में भी होनी चाहिए.

women   #अपनी संस्कृति को करीब से जानें-

इस साल आपने स्त्री लेखकों की कितनी किताबें पढ़ीं? नहीं पढ़ीं, तो उन्हें पढ़िए. सोशल मीडिया पर आप किन लोगों को फॉलो करते हैं इसका भी ध्यान रखिए. अगर आपको 'डोर' या 'तुम्हारी सुलु' जैसी फ़िल्में पसंद हैं तो उनके बारे में लिखें. दूसरों को भी इन फिल्मों के बारे में बताएं. औरतों से जुड़ी हर अच्छी जानकारी और उन्हें प्रोत्साहित करने वाली बात का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें.

#हंसना सीखें-

मेरी सबसे अच्छी सहेली ने हाल ही में एक दिन मुझे आंटी कह कर पुकारा. इस चुटकुले में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसपर नाराज़ हुआ जाए. हम खूब हंसे। देर तक हंसते रहे. खुल कर हंसना सीखें. हर मर्द दुश्मन नहीं होता. ना ही हर मर्द औरतों पर अत्याचार करता है. सच तो ये है कि हम सिर्फ गुस्से और नाराजगी के बल पर पितृसत्ता से नहीं लड़ सकते. ये एक लम्बी लड़ाई है और कई बार छोटे-छोटे रास्ते और हल्के-फुल्के तरीकों से भी बड़ी लड़ाई जीती जा सकती है. ये हम पर निर्भर करता है कि हम किस रास्ते से जीत हासिल करते हैं.


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