मुसलमान, संविधान और इनटॉलरेंस पर इस सेना के अफसर की बात जरूर सुननी चाहिए
वो कौनसी किताब है जो सच में पवित्र है?

कैप्टन रघु रमन 11 सालों तक भारतीय सेना में रहे. इसके बाद 11 साल तक कॉरपोरेट सेक्टर में काम किया. वो पब्लिक स्पीकर भी हैं. टेड एक्स के साथ कई सारे टॉक शो कर चुके हैं. ऐसे ही एक टॉक शो में उन्होंने जो कहा, हम आपके सामने रख रहे हैं.
22 जुलाई, 2011 को ऑस्लो में प्रधानमंत्री कार्यालय के पास एक कार बम धमाका हुआ. 8 लोग मारे गए. सैंकड़ों घायल हो गए. हमलावरों के बारे में कयास लगाया जाने लगा. पहले सबको लगा यह इस्लामिक जेहादियों का काम है. क्योंकि नॉर्वे ने नाटो सेना में अपने सैनिक भेजे हैं. मुस्लिम नॉर्वे में अभी मुख्यधारा में नहीं हैं इसलिए उन्होंने ही ऐसा किया होगा. अभी लोग ऐसा सोच ही रहे थे तब तक एक स्कूल के समर कैंप में दूसरा बम धमाका हुआ. 69 लोग मारे गए. इसमें कुछ लोग वहां के शाही परिवार से भी जुड़े थे. लोग अब मुस्लिमों पर और भी शक करने लगे. लोग आतंकी संगठनों अल कायदा, आईएस का नाम लेने लगे. तभी पता चला कि यह सब एक ही आदमी का किया धरा था. इसका नाम था एंडस बर्विस जो नॉर्वे का ही रहने वाला था.वो मुस्लिमों से बहुत नफरत करता था और नॉर्वे सरकार की मल्टीकल्चरल पॉलिसी का विरोध कर रहा था.

नॉर्वे में हुए बम धमाके की एक तस्वीर (फोटो-यूट्यूब)
दूसरी कहानी सलीम दुर्रानी की है. सलीम दुर्रानी ऊर्फ अबु इंजमाम 10 सालों तक घाटी में सक्रिय रहा. सरहद पार करके आना-जाना उसके लिए बड़ी बात नहीं थी. उसके सिर पर इनाम भी रखा हुआ था. उसे कम से कम तीन-चार दर्जन युवकों की मौत का जिम्मेदार भी माना जाता है. वो एक सच्चा मुस्लिम था. जो पांच बार की नमाज भी अदा करता था. अपने साथ एक योद्धा की तरह एके-47 भी रखा करता था. एक जगह पर दो बार नहीं सोता था. सलीम दुर्रानी मेरे साथ आर्मी में था. वो मेजर था जब कश्मीर में पोस्टेड था. उनकी तीन पीढ़ी में आठ फौजी अफसर निकल चुके हैं. 6 को वीरता पदक और दो को कमेंडेशन लेटर मिल चुके हैं. अब उनका बेटा भी सेना में जाने की तैयारी कर रहा है.

सलीम दुर्रानी.(फोटो-यूट्यूब)
अब इन दोनों स्टोरीज में हमारा दिमाग पहले ही एक नतीजे पर पहुंच चुका था. जब बोला गया कि सलीम दुर्रानी, एके 47, कश्मीर आपका दिमाग एक नतीजे पर पहुंच चुका था. जो गलत साबित हुआ. इसका एक कारण है. हम यह बहुत बार करते हैं. हमारा दिमाग बहुत सारी जानकारियों को एक साथ फिल्टर करता है. और उसके हिसाब से नतीजा निकालता है. जैसे जब मैंने बोला नहीं था तब तक आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं उससे आपके कोहनी और जांघो के छूने को, कमरे में एसी के तापमान को महसूस नहीं कर रहे थे. लेकिन जैसे ही मैंने बोला आप यह सब महसूस करने लगे. ये सब जानकारी आपके दिमाग में पहले से थी लेकिन जैसे ही बोला गया आप इसे फील करने लगे.
एक कारण यह है कि हम हमेशा सबसे बुरी परिस्थिति की ही कल्पना करते हैं. ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि हमारा इवॉल्यूशन ही ऐसे हुआ है. एक उदाहरण से समझिए-
मानव सभ्यता के विकास में दो ट्राइब्स हैं. एक ट्राइब के लोग बहुत वीर और ताकतवर हैं. उनमें से एक आदमी के सामने एक विशालकाय हाथी (मैमथ) आता है. वो सोचता है मैं अकेला ही इसको हरा दूंगा. फिर एक नदी की घाटी को पार करने की बात आती है तो वह सोचता है, मैं लंबी छलांग लगाकर इस घाटी को पार कर लूंगा. एक लाल रंग का फल दिखता है वो उसे बिना इसका रिजल्ट सोचे खा लेता है. जबकि दूसरी ट्राइब वाला हाथी को देखकर सोचता है कि मैं अपने साथियों को बुलाता हूं. घाटी को पार करने के लिए एक पुल बनाने के बारे में सोचते हैं. उस लाल फल को देखकर सोचते हैं पता नहीं यह क्या है इसलिए हम अपने पास रखे केलों को ही खाएंगे. अब आप बताइए कि हम किसके वंशज हैं? दूसरे ट्राइब के क्योंकि पहले वाले लोग मर चुके हैं क्योंकि उन्होंने बिना रिजल्ट सोचे सब किया.

मानव विकास चक्र.
हम परिस्थितियों के साथ मानसिक तौर पर भी बहुत बदल जाते हैं. ऐसे ही जब हम कोई इमोशनल फिल्म देखते हैं तो उसके साथ भावुक हो जाते हैं. जैसे फिल्म- ब्लैक. हमको पता है कि अमिताभ बच्चन खूब पैसा कमा रहे हैं, रानी मुखर्जी अंधी नहीं है. सबकुछ एक काल्पनिक कहानी है. लेकिन फिर भी हम उसके साथ मेंटली अटैच हो जाते हैं. क्योंकि हमारा दिमाग फैक्ट और फिक्शन में अंतर नहीं कर पाता है. और हम उसके साथ इमोशनल होते जाते हैं.
आप जो कल्पना करते हैं जैसे काम करते हैं उसी तरह आपका दिमाग काम करने लग जाता है. इसलिए हम गलत जानकारी पर भी डिसीजन ले लेते हैं. यहां तक तो यह ठीक है लेकिन असल जिंदगी में ऐसे स्टीरियोटाइप बहुत खतरनाक होते हैं. इनकी वजह से लोगों को मार दिया जाता है क्योंकि उन्होंने दूसरे टाइप का मांस खा लिया था. फेक मेसेज पर भरोसा करके दंगे हो जाते हैं. दो देशों में युद्ध हो जाते हैं क्योंकि एक देश को लगता है कि दूसरे के पास उससे ताकतवर हथियार हैं. दो देशों की दशकों पुरानी दोस्ती खत्म हो जाती है कि उनको लगता है कि दूसरे देश के अप्रवासी उस देश की नौकरी खा जाते हैं. हम हर अजनबी को शक की निगाह से देखते हैं क्योंकि हम मान लेते हैं जो हमारे साथ नहीं हैं वो जरूर ही हमारे खिलाफ हैं.

भारत का संविधान.
हमारे देश के कुछ मुख्य सिद्दांतो में से एक सहिष्णुता या टॉलरेंस है. इस सिद्दांत की वजह से ही एक-दूसरे के विपरीत दो विचारों को एक साथ लाया जाता है. और दोनों में से अच्छे को मेरिट के आधार पर चुना जाता है. और नतीजा निकाला जाता है. इस स्पीच से पहले मैंने संकीर्णता और बांटने वाली मानसिकता को रोकने के लिए बहुत सारी किताबें पढ़ीं. लेकिन किसी भी किताब में इसका जवाब नहीं मिला. आखिर में मुझे एक किताब मिली जिसमें इसका जवाब था. इसमें लिखा था-
एक भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्य आर्टिकल 51 ए. हर भारतीय नागरिक की यह जिम्मेदारी है कि वो सभी लोगों के बीच सद्भाव और भाईचारे को बढ़ाए. चाहे वो धर्म,जाति, भाषा, और क्षेत्र के आधार पर कितने भी अलग क्यों न हों.
यह किताब कोई और नहीं भारत का संविधान है. जिसकी भारत के सब नेता, अफसर, फौज, पुलिस शपथ लेते हैं. हमको सिखाया जाता है कि राष्ट्रगान बजने पर सीधे खड़े हो जाओ. सावधान रहो. हम अपने बच्चों को भी यह सिखाते हैं. लेकिन मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हमको बैठ जाना चाहिए और अपने मूल कर्तव्यों को पढ़ना चाहिए. इन्हें अपना लेना चाहिए तब ही कुछ अच्छा होगा.
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