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क्या वजह है कि आचार्य बालकृष्ण के एक ट्वीट ने यूपी सरकार को अतिसक्रिय कर दिया है

योगी आदित्यनाथ को खुद फोन करके बाबा रामदेव को मनाने की जरुरत क्यों आन पड़ी.

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6 जून 2018 (अपडेटेड: 6 जून 2018, 04:51 PM IST)
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योगी आदित्यनाथ, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण (बाएं से दाएं): कितनी खींचतान
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2003 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार हुआ करती थी. बाबा रामदेव भी इसी समय धार्मिक चैनल आस्था पर दिखना शुरू हुए. उस समय भगवा कपड़े पहने होने के बावजूद उनका राजनीतिक रुझान उतना भगवा नहीं हुआ करता था, जितना आज है. 2003 के साल में ही वो पहली बार टीवी के परदे पर दिखाई देना शुरू हुए थे. यह बाबा रामदेव के एक धार्मिक गुरु से बिजनेस टायकून बनने की शुरुआत थी.


आस्था चैनल पर बाबा रामदेव
आस्था चैनल पर बाबा रामदेव

एक संन्यासी होने के बावजूद रामदेव अपनी जातीय पहचान को ज़ाहिर करने में हिचकते नहीं हैं. उनकी इसी रणनीति ने उन्हें उत्तर भारत के दो बड़े राज्यों में पांव जमाने में मदद की. संयोग यह था कि इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री भी उन्हीं की बिरादरी से आते थे. मुलायम सिंह यादव 2003 से 2007 के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. उस समय उत्तर प्रदेश सरकार ने 100 नए टाउनशिप बना रही थी. उस समय पतंजलि ट्रस्ट नहीं हुआ करता था. दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट हुआ करता था. मुलायम सिंह यादव ने इन 100 टाउनशिप में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के साथ आयुर्वेदिक क्लिनिक खोलने का करार किया था. यह रामदेव के लिए पहली बड़ी सफलता थी.


बाबा रामदेव और मुलायम सिंह.
बाबा रामदेव और मुलायम सिंह.

2009 में बाबा रामदेव ने अपनी 'भारत स्वाभिमान यात्रा' के बाद नई राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की थी. हालांकि, यह योजना बाद में ठंडे बस्ते में चली गई थी. रामदेव 2014 के चुनाव में पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में खड़े हो गए. इसका उन्हें फायदा भी मिला और 2015 में हरियाण में बनी बीजेपी सरकार ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया. देखने लायक बात यह भी है कि इस दौरान उनके दूसरी राजनीतिक पार्टियों के साथ संबंध भी अच्छे बने रहे.


हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बाबा रामदेव
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के साथ बाबा रामदेव

2016 का साल पतंजलि के लिए बहुत कामयाब साल रहा. इस साल पतंजलि ने बिक्री के रिकॉर्ड तोड़ दिए. इस साल पतंजलि की बिक्री 2000 करोड़ से कूदकर 5000 करोड़ पर पहुंच गई. इसी साल पतंजलि ने अपने सबसे बड़े प्रोजक्ट की शुरुआत करने जा रहा था. 30 नवंबर 2016 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 24, 24A और 22B में फैले 455 एकड़ के मेगा फूड पार्क का शिलान्यास किया था. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दी जा रही यह जमीन यमुना एक्सप्रेस से सटी हुई जमीन थी.


पतंजलि फूड पार्क के शिलान्यास के मौके पर पहुंचे अखिलेश यादव.
पतंजलि फूड पार्क के शिलान्यास के मौके पर पहुंचे अखिलेश यादव.

2017 में अखिलेश यादव सत्ता से बाहर हो गए. उनकी जगह आए योगी आदित्यनाथ. इस साल पतंजलि की सेल उछलकर 10,000 करोड़ तक पहुंच चुकी थी. जिस फूड पार्क का शुरुआती इन्वेस्टमेंट 1600 करोड़ था, वो अब बढ़कर 6000 करोड़ पर पहुंच चुका था. लेकिन इसमें एक पेच था. उत्तर प्रदेश सरकार ने फूड पार्क के पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के साथ MoU साइन किया था, लेकिन फूड पार्क खुलना था पतंजलि फूड्स के वेंचर के तौर पर. पतंजलि मेगा फूड पार्क को मार्च 2018 से चालू होना था, लेकिन यह फिलहाल अप्रूवल का इंतजार कर रहा है. अखिलेश सरकार में शुरू हुआ बीजेपी के राज में अटक गया. वही बीजेपी, जिसकी चुनावी सफलता के लिए बाबा रामदेव ने काफी पसीना और पैसा बहाया था. परेशान होकर पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के एमडी आचार्य बालकृष्ण ने एक ट्वीट किया. इस ट्वीट का मजमून इस तरह था,


''आज ग्रेटर नोएडा में केन्द्रीय सरकार से स्वीकृत मेगा फूड पार्क को निरस्त करने की सूचना मिली. श्रीराम व कृष्ण की पवित्र भूमि के किसानों के जीवन में समृद्धि लाने का संकल्प प्रांतीय सरकार की उदासीनता के चलते अधूरा ही रह गया पतंजलि ने प्रोजेक्ट को अन्यत्र शिफ्ट करने का निर्णय लिया.''

एक और ट्वीट में उन्होंने पतंजलि के प्रस्तावित मेगा फूड पार्क का फोटो शेयर करते हुए लिखा


"''यह था पतंजलि फ़ूडपार्क Noida के प्रस्तावित विशाल संस्थान का स्वरूप, जिससे मिलता हज़ारों लोगों को रोज़गार तथा जिससे प्राप्त होता लाखों किसानों को समृद्धशाली जीवन...''

बाबा रामदेव फिलहाल ताकत के चरम पायदान पर हैं. चंद्रास्वामी को अगर छोड़ दिया जाए, तो किसी भी संन्यासी का अब तक सत्ता प्रतिष्ठानों में इस तरह का प्रभाव देखने को नहीं मिला है. फिलहाल पतंजलि के देशभर में 47,000 रिटेल काउंटर हैं, 3500 डिस्ट्रीब्यूटर हैं और 18 वेयरहाउस हैं. पतंजलि के देशभर में 4 जून 2018 को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह खुद रामदेव से मिलने पहुंचे हुए थे. वो बीजेपी के मिशन 2019 का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.


बाबा रामदेव के साथ अमित शाह की हालिया मुलाकात की तस्वीर
बाबा रामदेव के साथ अमित शाह की हालिया मुलाकात की तस्वीर

लेकिन, बालकृष्ण के ट्वीट ने हड़कंप मचा दिया. तुरंत उत्तर प्रदेश सरकार की सफाई आ गई. फूड प्रोसेसिंग महकमे के सचिव जेपी मीणा ने पत्रकारों को बताया-


"पतंजलि को ज़रूरी शर्तों को पूरा करने के लिए चार महीने का समय दिया गया था. चार या पांच शर्तें ऐसी हैं, जिन्हें पतंजलि को पूरा करना है, जिसमें कुछ शर्तें ज़मीन और बैंक लोन से जुड़ी हुई हैं. कोई भी आदमी जो फूड पार्क के काम को पूरा होते देखना चाहता है, उसे ये शर्तें तो पूरी करनी ही पड़ेंगी. हमने पतंजलि को इन शर्तों को पूरा करने के लिए एक महीने का अतरिक्त समय दिया है. अगर वो इस दौरान ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो हमारे पास प्रोजेक्ट को कैंसिल करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा."

उत्तर प्रदेश ब्यूरोक्रेसी के इस अज्वाब के बाद रामदेव और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच खींचतान और बढ़ने के आसार थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. आखिरकार योगी आदित्यनाथ ने इस मामले को खुद हाथ में लेने के फैसला किया. उन्होंने आगे बढ़कर रामदेव को फोन किया और उन्हें भरोसा दिलाया कि फूड पार्क कैंसिल नहीं होगा और सारे विवाद तेजी से निपटा लिए जाएंगे. मीडिया को इस फोन कॉल के बारे जानकारी दी उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री सतीश महाना ने.


बाबा रामदेव और योगी आदित्यनाथ
बाबा रामदेव और योगी आदित्यनाथ

आप इस घटना को दो तरह से देख सकते हैं. पहला कि उत्तर प्रदेश सरकार सूबे की आर्थिक प्रगति को लेकर बेहद सीरियस है. महज़ एक ट्वीट के बाद खुद योगी आदित्यनाथ मदद के लिए आगे आए. दूसरा, आप इसे रामदेव के राजनीतिक रसूख के तौर पर भी देख सकते हैं. लोकसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय बचा है. बाबा रामदेव न सिर्फ देश के सबसे सफल व्यापारियों में से एक हैं, बल्कि उनके पास अच्छा-ख़ासा जनाधार भी है. बीजेपी किसी भी सूरत में उनके जैसे फायदेमंद साथी को छोड़ना नहीं चाहेगी.  फूड पार्क के मामले में सूबे की सरकार की अतिसक्रियता को इस लिहाज से भी देखा जा सकता है.  बाकी सब आपके चश्मे पर निर्भर करता है.




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