विवेक कुमारयूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटेंतो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर दूररहा. लेकिन ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरेयूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक कुमार. जर्मनीमें रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत औरसमाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको.वादे के मुताबिक वो लाए हैं 'डाक यूरोप' की छठी किस्त. बता रहे हैं कि भारत औरयूरोप में इतना अंतर क्यों है. तो पढ़िए और खो जाइए.--------------------------------------------------------------------------------मैं यूरोप में रहता भारतीय हूं तो क्या मुझे यहां की हर बात पर भारत से तुलना करनीचाहिए? यूरोप में रहने वाले थर्ड वर्ल्ड के लोग अक्सर यही करते हैं. जब दो-तीनभारतीय दो-तीन बियर लगाकर बैठ जाते हैं तो लड़कियों तक पहुंचने से पहले इस तरह कीबातें होती हैं.-------------------------------------------------------------------------------- यहां सड़कें कितनी अच्छी हैं, हमारे यहां तो हर बारिश में टूट जाती हैं. यहांक्लर्क कितने कर्मठ हैं, हमारे यहां तो बस मट्ठ हैं. यहां कपड़ों की क्वॉलिटी कितनीअच्छी है, जबकि सारी मैन्युफैक्चरिंग हमारे यहां होती है. टॉप क्वॉलिटी की चीजेंएक्सपोर्ट कर देते हैं और थर्ड क्लास भारत में बेचते हैं. फिर बात पहनने के सलीकेपर होने लगती है और वहां से होते हुए पहनने वालों या वालियों पर पहुंच जाती है.-------------------------------------------------------------------------------- ये चर्चा करने वाले गलत नहीं हैं, क्योंकि जब फर्क इतना ज्यादा हो कि जमीन-आसमानवाला पुराना सा मुहावरा तक इस्तेमाल करना पड़ जाए तो चाहे न चाहे तुलना हो ही जातीहै. अब जैसे कि नीदरलैंड्स में एक सड़क बनी है जिसे सोलर रोड कहते हैं. 70 मीटर कीयह साइकल लेन बिजली बनाती है. अभी बहुत कारगर नहीं है, फिर भी सालभर में तीन घरोंलायक बिजली बना रही है.सोलर रोडया नॉर्वे में एक सड़क बन रही है, समुद्र के अंदर. सच में. तैरती हुई एक सुरंगबनेगी. और उस सुरंग के भीतर सड़क होगी. या फिर जर्मनी में इस बात पर जमकर काम होरहा है कि घरों को ऐसा कैसे बनाया जाए कि उसमें ऊर्जा का इस्तेमाल कम से कम हो.मसलन, एक ऐसा घर बना लिया है जिसे गर्म रखने के लिए कम से कम बिजली की जरूरतपड़ेगी.बाहर से ऐसा दिखेगी टनलअंदर से कुछ ऐसी दिखेगी टनलऐसे ही, ऐम्स्टर्डम में एक गांव बन रहा है, जो पूरी तरह आत्मनिर्भर होगा. इस गांवमें हर घर शीशे का होगा. उसके अंदर ही जरूरत लायक बिजली बनेगी, खाना पैदा होगा औरवेस्ट मैनेजमेंट होगा. यानी, लगातार कुछ न कुछ बन रहा है. कुछ न कुछ ऐसा बन रहा हैजो जीवन को, दुनिया को और जाति के रूप में इंसान को आगे बढ़ा रहा है. अपने आस-पासइस तरह कुछ न कुछ बनता देखकर तुलना करने का मन तो होता ही है ना.ऐम्स्टर्डम के गांव की तस्वीरजाहिर है कि हमारे हालात एकदम अलग हैं. आज अगर भारत ऐसा है तो उसके ऐतिहासिक,भौगोलिक और सांस्कृतिक कारण हैं. आप कह सकते हैं कि अभी जुमा-जुमा 70 साल तो हुएहैं देश बने, तब भी हमने तो कितनी तरक्की कर ली है. लेकिन, दिक्कत ये है कि हम सोचभी नहीं रहे हैं. कुछ बनाने के बारे में, खुद को आगे बढ़ाने के बारे में और गलतियोंके सबक को सिरे चढ़ाने के बारे में कोई बात नहीं हो रही है.यहां पश्चिम में लोग सोच रहे हैं. हर सम्मेलन में बात होती है कि 25 साल बाद हमेंकिस चीज की जरूरत होगी. मेट्रो की छोटी सी मिसाल है, जिससे मेरा रोज सामना होता है.यूरोप में मेट्रो चले दशकों हो चुके हैं. आज भी इन्फ्रास्ट्रक्चर इतना बड़ा है किकम नहीं पड़ता है. रोज सुबह मेट्रो में चढ़ता हूं तो दिल्ली के मेट्रो की असहनीयभीड़ को याद करता हूं. तब सोचता हूं कि हम क्यों नहीं 25 साल बाद की बात सोच पाए.क्यों हमारा आज का बनाया इन्फ्रास्ट्रक्चर भी कम पड़ जाता है! कहीं ऐसा तो नहीं किहमारा सिर इतिहास की कढ़ाही में इस कदर डूबा हुआ है कि हमें वर्तमान और भविष्यदिखता ही नहीं?-------------------------------------------------------------------------------- डाक यूरोप की पिछली किस्तें:भला खंभा भी कोई साफ करता है!एक हज़ार साल पुरानी यंग 'स्लेव' लड़की से मुलाक़ातभाई बर्तन उठाकर अपनी रसोई अलग कर ले तो ऐसा लगता हैवो मर गया, जिसके शब्द मानवता का सर झुका देते थेविदेशियों से रिश्ते बनाने में आगे हैं महिलाएं