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हिंदुओं के ऋषि, मुस्लिमों के पीर, आतंकियों ने मजार में आग लगा दी, जल गया कश्मीर

मजार आतंकियों ने उड़ाई थी क्योंकि हिंदू-मुसलमानों की साझा आस्था से वो डर गए थे.

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19 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 19 जुलाई 2016, 10:02 AM IST)
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कश्मीर में पिछले एक दशक से अशांति का माहौल है. मोदी सरकार के आने बाद यह अश्न्ति कम होने की बबजाए बढ़ी ही है.
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रात के 2.30 बजे थे. चंद घंटों बाद कश्मीर घाटी में पौ फटने वाली थी. चरार-ए- शरीफ दरगाह में 75 आतंकी थे. ये आतंकी हरकत-उल-अंसार और हिजबुल मुजाहिदीन के थे. आर्मी ने दरगाह को घेरना शुरू किया. गोलीबारी होने लगी. 27 आतंकी मारे गए और हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकी मस्त गुल अपने साथी हरकत-उल-अंसार के आतंकियों को छोड़कर भाग खड़ा हुआ. जब ये आतंकी कश्मीरियत के लिए लड़ रहा था तो फिर भागा क्यों ? क्या इसे शहादत के बाद 72 हूरें नहीं चाहिए थीं ? जो आतंकी भागे उन्होंने अफवाह फैला दी कि दरगाह में आग आर्मी ने लगाई है. इस अफवाह से कश्मीर हिंसा की आग में जलने लगा. हम आपको बताते हैं क्या हुआ था 10 मई 1995 की रात ?


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आतंकियों ने चरार-ए-शरीफ दरगाह में आग लगाई. दरगाह पूरी तरह खत्म हो गई, जिसे बाद में फिर से बनवाया गया.

मिडिल कश्मीर के बड़गाम जिले में कटोरे जैसी दिखने वाली घाटी में चरार-ए-शरीफ है, जो श्रीनगर से 45 किलोमीटर दूर है. यहां सूफी संत नुरुद्दीन नूरानी की दरगाह है.  मुस्लिमों के लिए नुरुद्दीन अलमदार-ए-कश्मीर थे और हिंदू उन्हें नंद ऋषि कहते थे. माना जाता है कि उन्होंने ही ऋषि की परंपरा शुरू की.
1953 में शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त होने के बाद सियासी प्रतिद्वंद्वी बख्शी गुलाम मुहम्मद ने जनता से मेलजोल के लिए चरार-ए-शरीफ को अपना ठिया बना लिया. मार्च 1990 में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) ने 'चलो चरार' का ऐलान किया. वहां तीन लाख लोग जुटे. जेकेएलएफ ने 'आजादी' पाने तक जेहाद की कसम खाई. जल्द ही ये इलाका घुसपैठियों का ठिकाना बन गया. कट्टरपंथी मुस्लिमों का दबदबा बढ़ा. उन्हें ये बर्दाश्त नहीं हुआ कि लोग दरगाह पर हाजिरी दें, क्योंकि कट्टरपंथी इस्लाम मजारों को नहीं मानता. आतंकी चरार-ए-शरीफ में रहते रहे. आतंकी साजिशें रचते रहे. जब आर्मी का शिकंजा कसने लगा, तो उन्होंने वहां के बाशिंदों को भरोसा दिलाया कि ईद-उल-जुहा के दिन वो उस इलाके को खाली कर देंगे और जंगल में चले जाएंगे, लेकिन ईद के दिन ही चरार-ए-शरीफ को जला दिया गया.

आतंकी गुट हरकत-उल-अंसार हथियार डाल देना चाहता था

दिसंबर में ठंड से बचने के लिए आतंकी चरार-ए-शरीफ को ठिकाना बनाने लगे. जब तक आर्मी ने दरगाह को घेरना शुरू किया, तब तक 75 आतंकी पहुंच चुके थे. आतंकियों ने दरगाह के चारों तरफ बारूदी सुरंगें बना दीं. गैस सिलेंडर बिछा दिए. सरकार को डर था कि आतंकी कभी भी दरगाह में आग लगा सकते हैं, इसलिए कोई एक्शन नहीं लिया. 14 मार्च को आतंकियों को मैसेज भेजा कि उन्हें पाकिस्तान भेजा जा सकता है अगर वो कोई आतंक न मचाएं तो. आतंकियों ने इस ऑफर पर यकीन नहीं किया.
ब्रिगेडियर मोहिंदर सिंह के मुताबिक हमने आतंकियों पर हमले करके उनमें निराशा बढ़ाई. हरकत-उल-अंसार सरकार के ऑफर को मानने के लिए तैयार था. वो हथियार डाल देना चाहता था, लेकिन हिजबुल मुजाहिदीन का लीडर मस्त गुल पाकिस्तान से मिल रहे ऑर्डर को फॉलो कर रहा था. पाकिस्तान उसे सरेंडर नहीं करने दे रहा था. आर्मी को मस्त गुल का एक मैसेज भी सुनने को मिला. जिसमें वो अपने आकाओं को बोल रहा था, 'इंशाल्लाह हम वही करेंगे जो मरकज कहेगा.'
आर्मी ने कस्बे को खाली कराना शुरू किया. 20 हजार की आबादी थी. अप्रैल के अंत तक कस्बे में सिर्फ एक हजार ही बचे थे. मई के पहले हफ्ते में आर्मी और आतंकियों के बीच छिटपुट गोलीबारी होने लगी.

खानकाह मस्जिद में धमाका हुआ और दरगाह जल गई

8 मई को आतंकियों ने दरगाह से दो सौ मीटर दूर रिहायशी इलाके बाबा मोहल्ला में आग लगा दी. आतंकियों ने सोचा कि इस भगदड़ में बचकर निकल भागेंगे. तेज हवा चल रही थी. आधे से ज्यादा कस्बा जल गया. फायर ब्रिगेड ने जब तक आग पर काबू पाया दो-तिहाई कस्बा जल चुका था. 10 मई 1995 को दरगाह के पास में खानकाह मस्जिद के पिछवाड़े धमाका हुआ. मस्जिद में आग लगा दी गई. इसी दौरान कुछ आतंकवादी शहर में घुस गए. 11 मई की रात करीब दो बजे आग दरगाह तक पहुंच गई. दरगाह जल गई.

भाग गया आतंकी मस्त गुल

जगह-जगह बारूद बिछा था. आर्मी का आतंकियों तक पहुंच पाना मुश्किल हो गया. गोलीबारी होती रही. 20 आतंकी मारे गए. 2 जवान शहीद हो गए. 7 जख्मी हो गए और कस्बे के 4 लोग भी जख्मी हो गए. दिनभर गोलियां बरसती रहीं. आखिर में पाकिस्तान के फैसलाबाद का रहने वाला और हरकत-उल-अंसार का आतंकी अबु जिंदाल गिरफ्तार कर लिया गया. सेना ने उसके जरिए जहां-जहां बारूद बिछा था, उस जगह का पता किया और आतंकियों को तलाश किया.
इंडिया टुडे मैगजीन ने पकड़े गए आतंकी अबु जिंदाल से बात की. उसने कहा, '10-11 मई की रात को मैंने अपने गिरोह के साथ फरार होने कोशिश की, लेकिन 7-8 लोग मारे गए और कुछ भाग निकले. मैं दरगाह की ओर लौटा तो मस्त गुल का गिरोह जा चुका था और दरगाह जल रही थी. जाहिर है ये काम मस्त गुल का था. दरगाह के तबाह होने से एक हफ्ते पहले सेना से संपर्क साधा, लेकिन मस्त गुल ने विफल कर दिया.'
मस्त गुल (हरे कपड़ों में) पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के मंच पर.
मस्त गुल (हरे कपड़ों में) पाकिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के मंच पर.

सेना ने तलाशी के दौरान 23 परिष्कृत विस्फोटक डिवाइस ( improvised explosive device, IED) हटाए और दो छोटे कारखानों का पता लगाया., जहां आतंकी IED बनाते थे. 14 मई तक 27 आतंकी ढेर हो गए और चार जवान भी शहीद हो गए. तब तक पूरा कस्बा दरगाह समेत ऐसा लग रहा था, जैसे बमबारी से शहर को तबाह किया गया हो. मस्त गुल अपने साथियों के साथ फरार हो चुका था. बाद में ये पाकिस्तान में आतंकी वारदात में शामिल रहा. साल 2014 में उसने तहरीक-ए-तालिबान के साथ प्रेस कांफ्रेंस की और पेशावर में शियों पर हुए हमलों की जिम्मेदारी भी ली.

और फिर हवाई जहाज में पत्रकारों को भरकर ले जाया गया

पूरी घाटी में ये बात फैला दी गई कि आर्मी ने हेलिकॉप्टर से बारूद छिड़का और मोर्टार से उसे उड़ा दिया. ये कहानी बेतुकी है. गलती ये हुई केंद्र ने अनुभवों से सबक नहीं लिया और वहां पत्रकारों को नहीं घुसने दिया. काफी लोगों ने इस कहानी पर यकीन कर लिया. हिंसा भड़क गई. गोलीबारी जारी थी. देश-विदेश के पत्रकारों को हवाई जहाज में भरकर वहां ले जाया गया. तब तक इतना नुकसान हो गया था कि इसकी भरपाई करना मुश्किल था. ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस के मीरवायज उमर फारूक ने कहा, ' हमारे राजनीतिक संघर्ष को कुचलने के लिए भारत सरकार हमारे धार्मिक स्थलों को बर्बाद कर रही है.'
कश्मीर में हिंसा प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की सरकार को गहरा झटका था. इस बात का इकरार उन्होंने जर्नलिस्ट शेखर गुप्ता से बातचीत के दौरान किया था, जो उस वक्त इंडिया टुडे में छपी थी. उन्होंने कहा था, 'निश्चय ही यह झटका है. खासकर इसलिए कि ये ऐसे समय में लगा है जब हमें लगने लगा था कि हालात बदल रहे हैं. लोग आतंकवाद से ऊब गए थे. झटका कितना गहरा है ये कह पाना अभी मुश्किल है.'
19 मार्च को धारा 144 लगा दी गई. लोगों और पत्रकारों को शहर में आने से रोक दिया गया, ताकि मस्त गुल को शोहरत न मिले. कश्मीर हिंसा में जल चुका था. बदहाली थी. लोग सरकार और आर्मी के खिलाफ हो गए थे.
चरार-ए-शरीफ में आगजनी के बाद हिंसा भड़क गई. लोगों ने आर्मी के खिलाफ प्रोटेस्ट किया.
चरार-ए-शरीफ में आगजनी के बाद हिंसा भड़क गई. लोगों ने आर्मी के खिलाफ प्रोटेस्ट किया.

मर्द, औरतें और बच्चों की भीड़ कस्बे की तरफ बढ़ रही थी. पुलिस को उस भीड़ को रोकने में मुश्किल हो रही थी. 400 लोगों की भीड़ ने जब पत्रकारों को देखा तो एक महिला ने चीखकर कहा, 'अगर वे (आर्मी) आतंकियों से लड़ना चाहते थे तो हमारे घर और दरगाह को क्यों जला दिए.' लोगों को शिकायत थी कि पानी और बिजली बंद कर दी गई है. उन्हें वहां से चले जाने को मजबूर किया जा रहा है.
कश्मीरी ये मान बैठे थे कि चरार-ए-शरीफ दरगाह में इंडियन आर्मी ने आग लगाई है और इसी शक में घाटी हिंसा की आग में जलती रही. कट्टरपंथ मुस्लिम ने दरगाह को फूंकने से पहले जरा भी खौफ नहीं आया. हिंदुओं और मुस्लिमों की आस्था को बारूद से जला डाला. कश्मीरियों का यकीन आज भी वैसे ही डांवाडोल है जो हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है. तब भी हिजबुल मुजाहिदीन की लगाई आग थी और अब भी उसी की है.

पहले भी जली थी दरगाह

सूफी संत नुरुद्दीन नूरानी की दरगाह तकरीबन 600 साल पुरानी है. ये मजार कश्मीरियत की नींव है. सूफीवाद, सेक्युलरिज्म का सिंबल है. 1995 से पहले दरगाह में दो बार आग लग चुकी है. 1808 में अफगान गवर्नर अता मुहम्मद खान ने दोबारा इसको बनवाया.
लोग मन्नत के धागे बांधने आते हैं. मन्नत पूरी होती है धागे खोल दिए जाते हैं. यहां रिलीजियस म्यूजियम भी है, उसमें एक अरबी लिबास है, जो पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा का समझा जाता है.
चरार-ए-शरीफ.
चरार-ए-शरीफ.

1995 की तरह आज फिर कश्मीर के लोग आर्मी के खिलाफ

आतंकी हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी को इंडियन आर्मी ने मार डाला. वानी की मौत के बाद हालात 1995 वाले आज फिर बन गए. कुछ कश्मीरी वानी को शहीद बता रहे हैं. आर्मी पर उन्हें यकीन नहीं है. इस वजह से आर्मी और लोगों के बीच टकराव हो रहा है. इस हिंसा में 30 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और तीन हजार से अधिक जख्मी हो चुके हैं. जख्मियों में 16 सौ से अधिक सुरक्षाबल शामिल हैं.
जैसे बुरहान वानी की मौत के बाद पाकिस्तान को मिर्ची लगी, वैसे ही चरार-ए-शरीफ में आतंकियों को मार गिराने पर पाकिस्तान को मिर्ची लगी थी. तब भी पाकिस्तान ने इस मसले को लेकर आसमान सर पर उठा लिया था. इस्लामी मंचों पर ये मुद्दा उठाने की धमकी दी थी.


 

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