'रांझण दे यार बुलेया सुन ले पुकार बुलेया तू ही तो यार बुलेया मुर्शिद मेरा...मुर्शिद मेरा...तेरा मुकाम कमले सरहद के पार बुलेया परवरदिगार बुलेया हाफिज तेरा... मुर्शिदमेरा...'--------------------------------------------------------------------------------रणबीर कपूर इन दिनों ये बोल गुनगुना रहे हैं 'ऐ दिल है मुश्किल' में. किसी बुलेयासे बात कर रहे हैं. उसे अपना यार बताकर उससे कुछ अरज कर रहे हैं. पर ये बुलेया हैकौन? ये कौन है जो अक्सर गाने के बोलों में हमारा यार बन जाता है. आखिर कौन है येजिससे हर कोई हमनवां होना चाहता है. कोई उसका कलाम पढ़ता है तो कोई उससे उसकी पहचानपूछता है. कोई उसके बहाने सूफी हो जाना चाहता है.और इतने सारे सवालों के बीच बुलेया कहता है, 'बुल्ला की जाणां मैं कौन...'.--------------------------------------------------------------------------------जिस बुलेया से आप वाबस्ता होना चाहते हैं, वो कहता है, मैं खुद नहीं जानता कौन हूं.उसे नहीं पता कि 'होना' क्या होता है. जब हम बुलेया को ढूंढने निकलते हैं तो वोहमें मुर्शिद खोजने की राह में खड़ा मिलता है. हजरत मोहम्मद का वो वशंज ख़ुदा कोपाने निकला था. इस सफर में एक दौर वो भी आया जब बुल्ला खुद अपने मुर्शिद के रंग मेंरंग गया और कहने लगा, 'रांझा रांझा करदी नी मैं आपे रांझा होई...'.--------------------------------------------------------------------------------बुलेया पहले अब्दुल्ला शाह था. 1680 में पैदा हुआ. तब भारत और पाकिस्तान नहीं थे.बहावलपुर था (अब पाकिस्तान में). वहीं पैदा हुआ था. फिर अपने पिता के साथ मलकावल(मुल्तान) चला गया. बाद में प्यार से नाम मिला बुल्ले शाह. इस्लामी और सूफी किताबोंसे कई मुलाकातों के बाद बुलेया को रब पाने की चाहत हुई. इसके लिए एक मुर्शिद कीजरूरत थी. मुर्शिद यानी जो उसका रहबर हो, गुरू हो, सांई हो. जब बुलेया बाग में आमगिराने की कलाकारी दिखा रहा था, तब शाह इनायत पास में खड़े थे. दोष देने लगे तोबुलेया बोला, 'मैंने तो कुछ किया ही नहीं.' दोनों पहचान गए एक-दूसरे को. बुल्लाइनायत के कदमों में लोट गया और बोला, 'ख़ुदा से मिला दो.'इनायत बोले, 'बुलेया, रब दा की पौणा, एधरों पुटणा ते ओधर लाउणा' यानी बुल्ले, रब कोपाना मतलब एक पौधे को यहां से उखाड़कर वहां लगा देना है. बस. बुल्ला अपने सफर परनिकल गया और इतनी दूर चला गया, जहां उसकी कोई जात, कोई पहचान नहीं रह गई. 'टोटलसियाप्पा' में अली जफर बुलेया से गुजारिश करते हैं, 'चल बुल्लेया चल ओथे चलिए,जित्थे सारे एन्ने, ना कोई साड्डी जात पछाने'. बेशक, बुलेया की कोई जात नहीं है,लेकिन न जाने कितने चेहरे बुलेया में अपनी पहचान ढूंढ लेते हैं.https://www.youtube.com/watch?v=lTQCH4Eh4Bcलेकिन बुलेया का ये सफर इतना आसान नहीं था. इनायत शाह जाति से अराइन थे. सैय्यदजाति के बुल्ले शाह से छोटी जाति के. ये दिल्लगी देखकर हर कोई बिफर पड़ा. बुलेया कीभाभी आईं और कहने लगीं:बुल्ले नूं समझावन आंइयां पैणां ते परजाइयां 'मन्न ले बुल्लेया साड्डा केहणा, छड्डदे पल्ला राइयां आल नबी, औलाद अली, नूं तू क्यूं लीकां लाइयां?मतलब: बुल्ले की बहनें और भाभियां समझाने आईं, 'बुल्ले हमारा कहना मान ले और अराइनको छोड़ दे. नबी के परिवार और अली के वशंजों पर कलंक मत लगा.'लेकिन पता है उस बेख़ौफ, बेक़ैद बुलेया ने क्या जवाब दिया:'जेहड़ा सानू सैय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सजाइयां जो कोई सान्नूं राईं आक्खे,बहिश्तें पींगां पाइयां राईं-सांई सभनीं थाईं रब दियां बे-परवाइयां सोहनियां परेहटाइयां ते कूझियां ले गल्ल लाइयां जे तू लोड़ें बाग-बहारां चाकर हो जा राइयांबुल्ले शाह दी जात की पुछणी? शुकर हो रजाइयांमतलब: मुझे सैय्यद बुलाने वाला नरक जाएगा और अराइन कहने वाले को स्वर्ग में झूलेमिलेंगे. अराइन और सैय्यद पैदा होते रहते हैं, रब को जाति की परवाह नहीं है. वोखूबसूरतों को दूर हटाकर बदसूरतों को गले लगाता है. अगर तुझे स्वर्ग चाहिए तोअराइनों का नौकर बन जा. बुल्ले की जाति क्या पूछता है, इस दुनिया के लिए रब काशुक्र मना.इसी बेख़ौफ और बेक़ैद बुलेया से जब इरशाद कामिल मुलाकात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसेबुलेया बगल में बैठा अपना यार है. 'अ वेडनेसडे' के लिए लिखा गया था ये गाना जिसेतोशी ने गाया था. 'ओ बुल्ले शाह ओ यार मेरे...'https://www.youtube.com/watch?v=a4BuOutBkA4ख़ुदा से इश्क के पंथ सूफी को, सूफी बनाने में ढेर सारे लोगों ने कांधा लगाया, लेकिनबुलेया ने दिल लगाया. यही कारण है कि आज बुलेया का सहारा लेकर सूफी हो जाना बड़ाआसान है. बुलेया ने अपने मुर्शिद को अपना महबूब बना लिया और लिख दिया, 'मेरा पियाघर आया ओ लाल नी...'. 1993 में वाशिंगटन के मीनी हॉल में बैठे नुसरत फतेह अली ख़ानसाहब जब बुलेया का ये कलाम गा रहे थे तो हर कोई अपने पिया को अपने दिल में महसूसकरने लगा.https://www.youtube.com/watch?v=2jNy1aI-ugMवैसे बुलेया और उनके मुर्शिद शाह इनायत की कहानी भी बड़ी हसीन है. इश्क का सफर था.यकीनन मुश्किल रहा. एक बार बुलेया ने ख्वाहिश जताई कि वो हजरत रसूल का दीदार करनेहज जाना चाहता है. इनायत अली ने उसे उसके सपने में ही रसूल से मिला दिया. ख्वाब मेंबुल्ला पहचान ही नहीं पाया कि दोनों में से हजरत कौन था और मुर्शिद कौन. लेकिन एकदिन कहानी पलट गई.बुलेया के अंदर अभी तक बुलेया बाकी था और प्रेम की राह में ये सबसे बड़ा रोड़ा था.मुर्शिद खफा हो गए इस बात से. उन्होंने बुल्ले को ठुकरा दिया. ये इम्तिहान थाबुल्ले का. मुर्शिद से दूर बुलेया तड़पती हीर सा हो गया. घुंघरु बांध लिए. नाचनासीख लिया. गाना सीख लिया. ऐसी काफियां लिखने लगा जो सीधे ख़ुदा तक पहुंचाती हैं.गाता रहा. तब तक गाता रहा, जब तक मुर्शिद पिघल नहीं गए. आखिरकार मुर्शिद लौटे औरबुल्ले से पूछा, 'तू बुल्ला है?' बुल्ला बोला, 'नहीं मुरशद, मैं भुल्ला (भूला)हूं.' मुर्शिद रो पड़े और बुल्ले को रब मिल गए. वो गाने लगा, 'आवो नी सइयों रल देवोनी वधाई, मैं वर पाया रांझा माही'.बुलेया का महबूब सिर्फ रब नहीं, राम भी है. वो तो बस नजर का फर्क है. ये फर्क हमने1995 में खत्म होते देखा, जब 'याराना' में बेसबब हुस्न वाली माधुरी नाचते हुए गातीहैं, 'मेरा पिया घर आया ओ राम जी... मेरा पिया घर आया'. माया गोविंद ने लिखा था येगाना जो बुल्ले के कलाम पर ही था.https://www.youtube.com/watch?v=xVViRaALOLMपाकिस्तान से शुरू हुआ बुल्ले शाह का सफर पंजाब और वहां से अमेरिका तक पहुंचा.गुलजार बताते हैं कि सूफियों का कलाम गाते-गाते आबिदा परवीन खुद सूफी हो गई हैं.उनकी आवाज अब इबादत की आवाज लगती है. वही आबिदा जब बुल्ले शाह को गाती हैं तो सारेहिसाब आंखें मूंदकर बैठ जाते हैं. 'जे रब मिलदा नहातेयां धोतेयां...'https://www.youtube.com/watch?v=zdq2ZGri5Aoवैसे गुलजार का जिक्र हो और महफिल गुलाबी न हो, ऐसा मुमकिन नहीं. कबीर को हमसेमिलाने वाले गुलजार ने बुल्ले शाह को भी हमसे मिलाया. मणिरत्नम की फिल्म 'रावण' मेंगुलजार ने लिखा था, 'रांझा रांझा करदी नी मैं आपै रांझा होई.' ये बुल्ले शाह का हीकलाम था.https://www.youtube.com/watch?v=d_-CFHIbS-Qजब बुल्ले शाह के लिए उनका मुर्शिद उनका साजन, यार, सांई, आरिफ, रांझा, महबूब, शौह,हादी, आरियां... सब हो गया था, तब बुल्ले शाह ने ये लिखा था:'रांझा रांझा' करदी हुण मैं आपे रांझा होई सद्दो मैनूं धीरो रांझा हीर न आक्खो कोई.रांझा मैं विच, मैं रांझे विच गौर खिआल न कोई मैं नाही ओह आप है अपणी आप करेदिलजोई.जो कुझ साडे अन्दर वस्से जात असाडी सोई जिसदे नाल मैं न्योंह लगाया ओही जैसी होई.चिट्टी चादर लाह सुट कुड़िए, पहन फकीरां दी लोई चिट्टी चादर दाग लगेसी, लोई दाग नकोई.मतलब: रांझा रांझा करते-करते मैं खुद ही रांझा हो गई हूं. अब मुझे हीर नहीं, रांझाही कहो. अब रांझा मुझमें है और मैं रांझे में हूं, अब मैं कुछ भी नहीं हूं और सबरांझा ही है. जो हमारे अंदर है वही हमारी जाति है. मैंने जिससे प्रेम किया, उसकेजैसा ही हो गई. सफेद चादर छोड़कर फकीरों की लोई पहन लो, क्योंकि सफेद चादर में दागलग जाएगा, लेकिन लोई में कोई दाग नहीं लगेगा.वजूद के जादूगर बुल्ले शाह दूसरों को भी जादूगरी दिखाने का मौका देते हैं. गुलजारने ये मौका नहीं छोड़ा. 'जब तक है जान' में जब वो 'हीर हीर न आक्खो ड़ियो' लिख रहेथे तो उनकी हीर रांझा नहीं, बल्कि साहिबां हो गई. वो रांझा नहीं, साहिबां कहलानाचाहती है.https://www.youtube.com/watch?v=aNcxgxHcGYgकई बार तो बुल्ले शाह के लिखे काफियों की भी जरूरत नहीं पड़ती. बस उनका नाम भर जोड़देने से माहौल सूफियाना हो जाता है. यही हुआ 'इनकार' के गाने 'मौला तू मालिक है'में. स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा ने इसकी शुरुआत बुल्ले शाह के चंद लफ्जोंसे की, 'अब हम गुम हुए गुम हुए...'https://www.youtube.com/watch?v=D7fYtad92y0कोक स्टूडियो के गाने 'मदारी' में भी ऐसा ही था. विशाल ददलानी के साथ सोनू कक्कड़गाती हैं, 'हाजी लोक मक्के नूं जांदे, ते असां दे जाणां तख्त हजारे. आन फकीर ले खाखा जावें, राजी होवो बुल्ला.' सब बुल्ले दी मर्जी है.https://www.youtube.com/watch?v=jE_MLCBFKmg1757 से 1759 के बीच न जाने किस दिन बुल्ले शाह चले गए. प्रेम करना सिखाकर. वो नजाने कितनों को सूफी बना गए. पर हमारी पहुंच से इतनी दूर होने के बावजूद उनसे मिलनेमें हमें कभी ज़हमत नहीं हुई. अभी कुछ दिनों पहले ही 'सुल्तान' में इरशाद कामिल नेउन्हें न्यौता दिया था. पेपॉन गा रहे थे, 'मैं भी नाचूं मनाऊं सोहणे यार को, चलूंमैं तेरी राह बुलेया. मैं भी नाचूं रिझाऊं यार को, करूं न परवाह बुलेया.'और अब सबसे खास चीज. बुलेया हमेशा कहता है कि उसकी कोई पहचान नहीं है पर इस सवाल परवो एक संजीदा जवाब भी देता है. बुल्ला बताता है न उसका कोई नाम है, न कोई देश है. नकोई मजहब, न कोई जाति. कोई किताब, कोई भाषा उसकी पहचान नहीं है. बुल्ले शाह का येकाफिया रब्बी शेरगिल ने गाने की तर्ज पर गाया है. पांच साल के स्ट्रगल के बाद बनपाया ये गाना हर उस शख्स के लिए तोहफा है जो बुल्ले शाह के रंग में रंगना चाहता है.https://www.youtube.com/watch?v=_51KXfwcPMs--------------------------------------------------------------------------------https://www.youtube.com/watch?v=pTxZy32Fv_0आज बुल्ले शाह फैशन बन चुके हैं. उनका नाम, उनके कलाम, उनकी काफियां छू भर लेने सेलोगों को सूफी होने का गुमान हो जाता है. आज बुल्ले शाह हमें खुश्क नाज़नीन चेहरोंऔर गिटारों के बीच भी मिल जाते हैं. शॉर्टकट से हो गए हैं वो. कभी अकेले में बैठकरबुल्ले शाह को गुनगुनाएंगे तो महसूस होगा जैसे दिल में कुछ जुड़ा सा जा रहा है.बुल्ले शाह ने पाकिस्तान के कसूर में आखिरी सांस ली थी. वहां आज भी हर साल लोग जमाहोते हैं. दिनभर सूफी गाते हैं. झूमते हैं. दीवाने हो जाते हैं. बुल्ले के रंग मेंडूब जाते हैं.https://www.youtube.com/watch?v=8JU3-wyAh_E