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कनाडा पहुंचे 376 भारतीय क्यों दो महीनों तक भूखे-प्यासे रहे?

कोमागाटा मारू और सेंट लुइस जहाज़ का कनाडा के नस्लभेदी इतिहास से क्या कनेक्शन है?

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28 जुलाई 2021 (अपडेटेड: 27 जुलाई 2021, 03:50 AM IST)
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4 अप्रैल, 1914 को कोमागाटा मारु ने कनाडा की ओर यात्रा शुरू की (तस्वीर: लाइब्रेरी एंड आर्काइव कनाडा)
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आज है 28 जुलाई और इस तारीख का संबंध है कोमागाटा मारू जहाज की त्रासदी से.
कनाडा, एक निहायत उदारवादी देश. इतना कि अगर गूगल पर कनाडा मीम्स सर्च करेंगे तो पहला ही मीम ये मिलेगा-
‘आप कैसे पहचानोगे कि कोई कैनेडियन है, उससे टकरा जाइए, वो खुद आपसे माफी मांगेगा’.
इतना उदारवादी कि अमेरिका में जिसे ‘लेफ्ट विंग’ कहते हैं, उसको कनाडा वाले कहते हैं ‘सॉरी! टू एक्स्ट्रीम राइट’.
कनाडा के प्रधानमंत्री हैं जस्टिन ट्रूडो. साल 2019 में उनकी एक पुरानी फोटो लीक हो गई थी. फोटो में उन्होंने अपने चेहरे पर भूरे रंग का पेंट लगाया हुआ था. दरअसल वह 2001 में जब एक स्कूल में टीचर थे, तब ‘अरेबियन नाइट्स’ थीम वाली एक पार्टी में शामिल होने गए थे. और एक किरदार के रूप में दिखने के लिए उन्होंने ऐसा किया था.
जब ये फोटो मीडिया के हाथ लगी तो कैनेडियन मीडिया में हंगामा हो गया. हंगामा इसलिए क्योंकि पश्चिम में नस्लभेद का एक दर्द भरा इतिहास है. मजाक के लिए भी ऐसा किया जाना नस्लभेद की कैटेगरी में आता है. कुछ-कुछ ऐसा ही कि जैसे जर्मनी में आप मजाक में भी ‘हाएल हिटलर’ नहीं बोल सकते. इस घटना के बाद ट्रूडो को माफ़ी मांगनी पड़ी थी.
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जस्टिन ट्रूडो (तस्वीर: Getty)

ये तो है आज का कनाडा. जहां पड़ोसी देश अमेरिका में इमीग्रेशन इतना बड़ा मुद्दा है कि 2016 में ट्रम्प ने अपने पूरे चुनावी कैंपेन में इसी को केन्द्रीय मुद्दा बनाए रखा था. वहीं कनाडा की कुल जनसंख्या में 5 में से 1 व्यक्ति इमिग्रेंट है. लेकिन इसी कनाडा का इमीग्रेशन और नस्लभेद को लेकर एक काला इतिहास रहा है. हम आपको इस इतिहास की दो घटनाएं बताने जा रहे हैं, जिससे आपको कनाडा के नस्लभेदी और रंगभेदी इतिहास का पूरा तियां पांचा समझ आ जाएगा. सेंट लुइस जहाज़ और होलोकॉस्ट पहली घटना 5 मई, 1939 की है. जर्मनी में कंसंट्रेशन कैंप से बचने के लिए 907 यहूदी हैम्बर्ग, जर्मनी से एक जहाज पर बैठे. जहाज का नाम था सेंट लुइस. ये लोग अपना घर-परिवार, सामान सब कुछ खो चुके थे. उनके पास सिर्फ़ एक बेशकीमती चीज़ बची थी. वो था क्यूबा में घुसने के लिए एंट्रेंस वीसा. 30 मई को ये जहाज़ हवाना पहुंचा. पर क्यूबा ने इसमें सवार लोगों को शरण देने से इंकार कर दिया. शिप पर मौजूद लोगों ने दूसरे देशों से मदद की गुहार लगाई. लेकिन कोई भी जर्मनी से पंगा लेने को तैयार नहीं था.
अब इसकी तुलना आज के समय से कीजिए. आज दुनिया भर में होलोकॉस्ट को लेकर दुःख मनाया जाता है. याद में शोक सभा आयोजित की जाती है. वो क्या है कि अपने वक्त की पॉपुलर नैतिकता को अपनाना बहुत आसान होता है. आज होलोकॉस्ट को बुरा कहना, यहूदियों के प्रति संवेदना जताना सर्व स्वीकार्य है. इसलिए आसान है. लेकिन तब ऐसा नहीं था. कुछ ही लोग सही को सही कहने और करने की हिम्मत रखते थे. इस मामले में आज भी बहुत कुछ बदला नहीं है. आज भी पॉपुलर कॉज के लिए खड़े होना आसान है. लेकिन चाहे पर्यावरण के नष्ट होने का मामला हो या जानवरों के उत्पीड़न का. हम उतने ही नैतिक हो पाते हैं जितना समाज हमें आसानी से होने देता है.
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हवाना, क्यूबा में सेंट लुइस जहाज़ (तस्वीर: ushmm.org)

इस छोटे से रैंट के लिए माफी मांगते हुए आगे बढ़ते हैं.
लैटिन अमेरिकी देशों से निराश होकर सेंट लुइस ज़हाज कनाडा पहुंचा. कनाडा के प्रधानमंत्री थे, मैकेंजी किंग. उन्होंने जहाज़ पर मौजूद लोगों की लिस्ट देखी और उसे कैंसिल करते हुए कहा ‘ये कनाडा की प्रॉब्लम नहीं है’. पर ये केवल एक लिस्ट तो थी नहीं. जैसा की ‘शिंडलर्स लिस्ट’ फिल्म में ‘आइजक स्टर्न’ कहता है,
‘लिस्ट बहुत अच्छी है. क्योंकि ये लिस्ट नहीं, जिन्दगी है.’
हालांकि शिंडलर की तरह यहां यहूदियों को बचाने के लिए कोई हीरो नहीं था. ‘मर्फी लॉ’ को फॉलो करता हुआ सेंट लुइस जहाज़ वापस यूरोप की ओर लौट गया. ‘मर्फी लॉ’ का मतलब किसी नियम से नहीं है. बस एक कहावत है कि,
‘जो कुछ भी गलत हो सकता है, वो गलत होकर रहेगा’.
यूरोप पहुंचने पर जहाज़ में मौज़ूद कुछ लोगों को ब्रिटेन और फ़्रांस ने अपने यहां शरण दी. लेकिन बहुत से लोग जर्मनी के कंसंट्रेशन कैंप्स में जलकर मर गए.
कहने को तो ये हिटलर वाले जर्मनी की गलती है. लेकिन एथिक्स में एक कॉन्सेप्ट होता है जिसे कहते हैं ‘नेगेटिव रिस्पांसबिलिटी’. यानि आप अगर कुछ नहीं करते और उससे कुछ गलत होता है. तो यह भी आपकी नैतिक जिम्मेदारी है. और जैसा श्री पीटर पार्कर यानि स्पाइडरमैन के अंकलजी बेन पार्कर कह गए हैं,
‘विथ ग्रेट पावर कम्स ग्रेट रिस्पांसबिलिटी’.
यानि महान शक्ति के साथ महान जिम्मेदारी भी आती है.
अब कहने को कनाडा ने कोई जान नहीं ली. लेकिन ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’ की पगडंडी पर चलते हुए, ये घटना कनाडा के माथे पर हमेशा लिए एक कलंक बनकर रह गई. जिसके लिए समय-समय पर कनाडा का हर प्रधानमंत्री माफी मांगता रहता है. अब आप पूछेंगे 1939 में घटी इस घटना का आज से और भारत से क्या लेना-देना. तो लेना देना ये है कि आज ही के दिन यानि 28 जुलाई को ऐसा ही सुलूक भारतीय लोगों के साथ भी हुआ था. कनाडा इन 1900 सन 1900 में, जैसा कि आप जानते ही हैं, भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था. कनाडा भी तब ब्रिटिश साम्राज्य का ही हिस्सा था. इसलिए अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वाले कई भारतीय सैनिक रिटायर होकर अच्छी जिन्दगी की तलाश में कनाडा बसने चले जाते थे. इनमें से अधिकतर लोग सिख थे. 1908 तक आते आते करीब 4000 भारतीय कनाडा में सेटल हो गए थे. भारतीयों की बढ़ती संख्या को देखकर कनाडा ने ब्रिटेन से इसकी चिंता जाहिर की. ब्रिटेन ने भी माना कि कनाडा गोरे लोगों का देश है.
इसी के चलते 1908 में कनाडा ने एक क़ानून पास किया. जिसका नाम था ‘कंटीन्यूअस पैसेज रेगुलेशन’. इस क़ानून के तहत कनाडा में प्रवेश करने वाले प्रवासियों के लिए कुछ शर्तें तय कर दी गई. मसलन, कनाडा आना है तो, आप जिस देश के नागरिक हैं, वहां से आपको एक सीधी यात्रा करके आना होगा. यानि कि कोई व्यक्ति अगर भारत से चाइना जाए और वहां से कनाडा आए तो ये गैर कानूनी होगा. और ऐसे व्यक्ति को कनाडा में प्रवेश की मंजूरी नहीं दी जाएगी.
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कोमागाटा जहाज़ का मुआयना करते कनाडा के इमिग्रेशन अधिकारी (फाइल तस्वीर :कनाडा लाइब्रेरी एंड आर्काइव)

इसके अलावा क़ानून में एक नियम ये भी था कि कनाडा में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति के पास 200 डॉलर होने चाहिए, तभी प्रवेश मिलेगा. ये अजीबोगरीब नियम केवल भारतीयों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे. क्योंकि उस समय लंबी दूरी की यात्रा पानी के जहाज़ से होती थी. और कोई भी जहाज़ भारत से डायरेक्ट कनाडा नहीं जाता था.
उस समय वहां रह रहे भारतीयों ने इस कानून का विरोध किया. कनाडा के कुछ नागरिकों ने भी उनका समर्थन किया. इनमें से एक थे रेवरेंड डॉक्टर विल्की. जो इससे पहले 20 साल भारत में रह चुके थे. उन्होंने प्रशासन से कहा कि भारतीय भी ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक हैं. इसलिए उन्हें भी वहां रहने का पूरा हक़ है. इस बात पर कनाडा की सरकार और लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया. उनके पास तर्क की कोई जगह नहीं थी. इसे ऐसे समझिए कि वैंकूवर में उस समय एक बैले गीत बहुत फ़ेमस हुआ करता था, जिसके लिरिक्स थे, ‘वाइट कनाडा फॉरएवर’. जिससे आप लोगों की मंशा को आसानी से समझ सकते हैं. कोमागाटा मारू  अब कनाडा से सीधे हांग-कांग चलते हैं. उस समय हांग-कांग में एक भारतीय बिजनेसमैन रहा करते थे. नाम था गुरदीत सिंह. वहां वो कुछ भारतीयों से मिले जो कनाडा जाना चाहते थे. ताकि वहां एक बेहतर ज़िंदगी तलाश कर सकें. गुरदीत को लगा कि ये व्यापार का एक अच्छा मौक़ा है. उन्होंने एक जहाज किराए पर लिया. जिसका नाम था कोमागाटा मारू. पहले इसे कोयला ढोने के काम में लाया जाता था. गुरदीत को कनाडा के कानून का पता था. लेकिन वैंकूवर की खालसा दीवान सोसाइटी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि कनाडा पहुंचने पर वो उनकी मदद करेंगे.
इसके बाद 4 अप्रैल, 1914 को कोमागाटा मारु ने कनाडा की तरफ़ यात्रा शुरू कर दी. इस समय जहाज़ में 165 लोग मौजूद थे. जापान से उसमें 114 लोग और सवार हुए. जिनमें अधिकतर आर्मी से रिटायर हुए सिख फ़ौजी थे. इन लोगों को लगा कि उन्होंने अंग्रेजों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी है इसलिए उन्हें कनाडा में उतरने की अनुमति मिल जाएगी.
23 मई को जहाज़ वैंकूवर पहुंचा. लेकिन जहाज़ के पहुंचते ही इमीग्रेशन ऑफिसर्स ने उसे घेरकर किनारे से एक किलोमीटर दूर रोक दिया. उतरने की अनुमति मांगी गई तो नियमों का हवाला देते हुए इनकार कर दिया गया.
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कोमागाटा मारू जहाज़ (तस्वीर: कनाडा लाइब्रेरी एंड आर्काइव)

जैसे-जैसे दिन गुजरते गए जहाज़ पर खाना और पानी ख़त्म होने लगा. गुरदीत ने ब्रिटेन से लेकर भारत तक मदद के लिए टेलीग्राम भेजे. पर वहां से कोई मदद नहीं मिली. कनाडा में रह रहे भारतीयों ने पैसे इकट्ठा कर एक वकील भी नियुक्त किया और कोर्ट में अपील दायर की. पर इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ और 7 जुलाई को उनकी अर्जी ख़ारिज कर दी गई.
बात केवल इतनी ही नहीं थी कि लोगों को कनाडा में प्रवेश नहीं करने दिया. अधिकारियों ने जहाज़ पर खाना और पानी पहुंचाने पर भी रोक लगा दी. दो महीने तक 376 लोगों को बिना खाना और पानी के जहाज़ पर रहना पड़ा. कनाडा के लोगों के लिए ये बस एक सर्कस था. रोज़ भीड़ इकट्ठा होती और वो गाना गाते रहते, ‘वाइट कनाडा फ़ॉरएवर, लोंग लिव द किंग’. रिटर्न टू इंडिया  अंत में 23 जुलाई को कोमागाटा मारू को वापस लौटा दिया गया. बड़ी मुश्किल से केवल 20 लोगों को कनाडा में उतरने की इजाज़त मिली. जहाज़ पर मौजूद लोगों ने सोचा चलो वापस वहीं लौट जाएंगे, जहां से आए थे. लेकिन फिर वही कमबख़्त ‘मर्फ़ी लॉ’. जो सबसे बुरा हो सकता था. वही हुआ.
28 जुलाई 1914 को प्रथम विश्व युद्ध की घोषणा हो गई. जहाज़ अब ना हांग-कांग उतर सकता था और ना ही जापान. ब्रिटिश हुकूमत के आदेश पर जहाज़ को सीधे कलकत्ता (आज का कोलकाता) लाना पड़ा. 27 सितम्बर को जहाज़ भारत पहुंचा. ये देश तो अपना था, पर हुकूमत किसी और की थी. जहाज़ को चारों ओर से घेर लिया गया. पुलिस को ये आदेश था कि गुरदीत सिंह और क़रीब 20 अन्य लोगों को गिरफ़्तार कर लिया जाए. जहाज़ पर मौजूद लोगों ने गिरफ़्तारी का विरोध किया. नतीजतन पुलिस ने उन पर गोलियां चला दी, जिससे 28 लोगों की मृत्यु हो गई.
आज कनाडा की कुल आबादी के 4% लोग भारतीय मूल के हैं. जस्टिन ट्रूडो की कैबिनेट में चार मंत्री भारतीय मूल के हैं. भारतीयों का चुनावी महत्व इतना है कि 2008 में प्रधानमंत्री हार्पर ने कोमागाटा मारू घटना के लिए सरेआम माफ़ी मांगी. लेकिन लोग इससे संतुष्ट नहीं हुए. उनकी मांग थी कि प्रधानमंत्री संसद में माफ़ी मांगे. इसके चलते 2016 में जस्टिन ट्रूडो ने इस घटना के लिए संसद में माफ़ी मांगी.
किंतु माफ़ी मांग लेना आसान है. ये भी सच है कि वर्तमान को इतिहास का पूरा दोष नहीं दिया जा सकता. लेकिन आज की नैतिकता सुलभ है. कल जो कुछ ग़लत हुआ, आज साफ़ दिखता है. लेकिन इतिहास हमें इस बात पर तोलेगा कि क्या हम वो सब देख पाए जो आज़ ग़लत है. वो सब कह पाए जिसे ग़लत कहना आसान नहीं है. हमें जो भी शक्ति और सुविधाएं मिली हैं, उनका उपयोग हम किस चीज़ के लिए करते हैं. मारने के लिए या बचाने के लिए. शक्ति की बात पर ‘शिंडलर्स लिस्ट’ का एक और कथन याद आता है,
‘असली शक्ति तब है जब हमारे पास मार देने के लिए सारे तर्क मौजूद हों. लेकिन फिर भी हम जान बक्श दें’.
ख़ैर इस मुआमले में ज़्यादा लोड मत लीजिए. हमारे एक्सक्यूज के लिए मर्फ़ी लॉ तो है ही.

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