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केरल का कम्युनिस्ट नंबर-2, जो कार्यकर्ताओं का कप्तान है

चर्च से भिड़ा, एअरपोर्ट पर गन के साथ पकड़ा गया. सीपीआई को बदलने का उठा चुका है जिम्मा.

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19 मई 2016 (अपडेटेड: 20 मई 2016, 07:32 AM IST)
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ये स्टोरी ‘द लल्लनटॉप’ के साथ इंटर्नशिप कर रहे ऋषभ श्रीवास्तव ने लिखी है.
  एक इंसान जो सत्रह सालों से एक पार्टी का लीडर है. जिसे कार्यकर्ता अपना कप्तान समझते हैं. और उसके इशारे पर कोई भी कैच पकड़ सकते हैं. या किसी भी खेमे में गोल मार सकते हैं. यहां तक कि एक बार अपने ही खेमे में गोल मारने की नौबत आ गयी थी. खैर ये हो जाता है. अतिउत्साहित खिलाड़ी और आंखें तरेरते हाफ बैक और गोली. हां, तो उस इंसान को दो बार मुख्यमंत्री पद से वंचित कर दिया गया. और इस बार भी तैयारी है. पर ये मैच पांच साल में एक बार होता है और इस बार खिलाड़ी भी इसके हैं और फील्ड भी. रेफ़री भी मन से इसी के हैं. बस एक स्टार प्लेयर ने लंगड़ी भिड़ाई है हर बार की तरह. 21 मार्च 1944 को ताड़ी निकालने परिवार में पिन्नाराई विजयन का जन्म हुआ था. गरीबी में गुजरा बचपन. स्कूल के बाद एक साल बुनकर का काम किया, कॉलेज जाने से पहले. उसी दौरान छात्र आंदोलनों में भाग लेते-लेते केरल स्टूडेंट फेडरेशन और केरल सोशलिस्ट यूथ फेडरेशन के सचिव भी बने. 1964 में सीपीआई ज्वाइन किया और पार्टी ऐसा मानती है कि वहां पर विजयन ने पार्टी को नक्सलाइट गतिविधियों के लोगों से बचाया. बाद में चार बार विधान सभा में भी पहुंचे. 1996 में बिजली मंत्री रहे राज्य सरकार में और एक शानदार बिजली प्रशासक के रूप में जाने गए. असली गरदा किया इन्होंने को-ऑपरेटिव क्षेत्र में. पार्टी के तत्कालीन सचिव के निधन के बाद विजयन ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया और पोलित ब्यूरो में शामिल हुए. है ना कमाल! पार्टी का अनुशासन. किसी की इच्छाओं का गला घोंट दो. अनुशासन रहना चाहिए. गाय को दौड़ा दौड़ा के पीटो. दूध दे, न दे कोई बात नहीं, अनुशासन रहना चाहिए. सत्तर के दशक में तत्कालीन सरकार ने इनको बहुत पिटवाया था. अरे! ऐसी बात नहीं है. इनकी सरकार नहीं थी उस वक़्त. कांग्रेस की थी. बाद में इनको बदला लेने का मौका मिला. 2006 में केरल मार्च और 2009 में नव केरल मार्च निकाला कांग्रेस+ की सरकार के खिलाफ. सफल रहे. बहुत लोगों ने भाग लिया इसमें. इनकी पार्टी के लिए जनाधार बनाने में इन आंदोलनों ने दारु का काम किया? नहीं बे, टॉनिक का. 1998 से 2015 तक ये स्टेट सेक्रेटरी रहे हैं पार्टी के. पार्टी में इनका कद तब बढ़ा जब वी एस अच्युतानंदन से आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर में वी एस को पोलित ब्यूरो (सीपीआई की सबसे बड़ी डिसीजन मेकिंग बॉडी, एक जमाने में सेंट्रल सेक्रेटेरिएट कहा जाता इसे) से बाहर कर दिया गया वो भी तब जब वी एस मुख्यमंत्री थे. मामला सीरियस हो गया था. ऐसा भी नहीं है कि इनका दामन सिर्फ खून पसीने से रंगा हुआ है. इस पर छींटे भी पड़े हैं. इन पर आरोप लगा कनाडा की कंपनी एसएनसी लावलीन को फायदा पहुंचाने का जब ये बिजली मंत्री थे 1998 में. हालांकि 2013 में कोर्ट ने इनको बरी कर दिया. इसी तरह एक बार चर्च से इनकी भिड़ंत हो गयी फालतू की बात पर. जैसे हर धार्मिक बातों में होता है. पता ही नहीं चलता कौन क्या हासिल करना चाहता है. कभी एअरपोर्ट पर इनके बैग से गोलियां मिलीं, लाइसेंस था इनके पास. पर भाई, प्लेन में नहीं ले जा सकते चाहे कोई भी हो आप या किसी को भी जानते हो. बड़े बड़े लोगों नम्बूदरीपाद, नयनार और उनके बाद के वी एस और अन्य पुराने स्कूल के लोगों के सामने विजयन काफी नए हैं. कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा को ये कैसे आगे ले जायेंगे ये काफी कौतुहल का विषय है. क्योंकि इनकी सोच आधुनिक है और कैपिटलिज्म से ये डरते नहीं. दक्षिणपंथी और कॉर्पोरेट ऐसा मानते हैं कि विजयन कम्युनिस्ट आदर्शवाद से परे गवर्नेंस की राजनीति करने वाले लोगों में से हैं. हालांकि ये देखने लायक रहेगा कि इनकी पार्टी इनकी नई सोच को कैसे लेती है या फिर ‘अनुशासन’ वाली बात चलायी जायेगी. कम्युनिस्ट पार्टी जो जरा-जरा सी बात पर बुरा मान जाती है, मेरी बातों का नहीं, अपने ही लोगों की बातों का, वो कैसे कान खोलेगी अपने? या जमाने के कोलाहल से बचने के लिए और ज्यादा रुई ठूंस लेगी? जनता की आवाज का क्या? और रुई? और तेज आवाज! आंखें भी तो हैं? बंगाल में देखा नहीं?

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