15 अगस्त 1947 को देश ने आज़ादी हासिल की. इस साल 70वां स्वतंत्रता दिवस मनाया जारहा है. हम आपको सुना रहे हैं, आजादी के सात पड़ावों के बारे में. 9 अगस्त से 15अगस्त तक. रोज एक किस्सा. आज जानिए विभाजन के गुनहगारों के बारे में.भारत का विभाजन एक ऐसी घटना थी, जिसके बारे में किसी ने सोचा नहीं था. जिन्ना सहितकुछ नेता कई सालों से ये मांग कर रहे थे, पर ऐसा लगता था कि ये थोड़े बहके लोग हैं.पर विभाजन के वक़्त जो हत्याएं और बलात्कार हुए, इसके बारे में विभाजन की मांग करनेवालों ने भी नहीं सोचा था. सबको लगा था कि धर्म के नाम पर आराम से बंटवारा होजायेगा. पर हुआ नहीं. आइये पढ़ते हैं कि विभाजन के कौन-कौन गुनहगार थे:1. भारत के बड़बोले नेता, जिनका जनता पर पॉजिटिव प्रभाव ख़त्म हो चुका था. पर आग मेंघी जरूर डालते थे.नेताओं ने 3 जून के विभाजन प्लान को ऐसे लिया मानो गृह-युद्ध होने वाला हो. सारेनेता अपने भाषणों में भूकंप, ज्वालामुखी, खून और आग जैसे शब्दों का इस्तेमाल करतेथे. बड़े नेताओं का प्रभाव ख़त्म हो चुका था. उपन्यास 'तमस' में लिखा है: जब दंगाशुरू होगा तो तुम मेरी जान बचाने आओगे? गांधीजी बचाने आयेंगे? RSS के नेता गोलवलकरने लिखा था: नस्ल की शुद्धता बचाने के लिए जर्मनी ने यहूदियों का सफाया कर दुनियाको चौंका दिया था. जाति गौरव. हिंदुस्तान के लोगों को इससे सीखना चाहिए. 3 मार्च1947 को लाहौर में मास्टर तारा सिंह ने तलवार चमकाते हुए कहा: हम टुकड़े-टुकड़े होजायेंगे, लेकिन पाकिस्तान को हरगिज़ स्वीकार नहीं करेंगे. जिन मुसलमानों ने मुस्लिमलीग को हराने की कोशिश की, उनको विश्वासघाती या कांग्रेस का पिछलग्गू कहा जाता था.कहा गया, 'जो लीग से नहीं जुड़ा है, वो काफिर है.' भारत के नेता बिल्कुल ही कमांड खोचुके थे. छुटभैये नेता हर जगह आग लगाते रहते थे. किसी भी बड़े नेता को ये अंदाज़ानहीं था कि इतना खून-खराबा होगा. जब होने लगा तो सबको लगा कि अब बंटवारा ही एकमात्ररास्ता है. नेहरू ने 1960 में कहा था: ये सच है कि हम थके हुए लोग थे. वर्षों सेउलझे थे. विभाजन ने हमें इससे उबरने का रास्ता दिखाया. हमने इसे अपना लिया. 1946में महात्मा गांधी ने कहा था: भारतीय रेलों में यात्रा कर रहा कोई बाहरी व्यक्तिअपने जीवन में पहली बार स्टेशनों पर हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए पानी और चाय केअलग-अलग बंदोबस्त की बेतुकी बातें सुनकर चकित रह जायेगा. (स्टेशनों पर 'हिन्दूपानी' और 'मुस्लिम पानी' लिखा रहता था.) नेता हर जगह जाते भी नहीं थे. वहींअहमदाबाद में दंगे रोकने की कोशिश में दो गांधीवादी कार्यकर्ताओं वसंत राव और राजाबाली को छुरा मार दिया गया.2. देश छोड़कर जाते अंग्रेज, जिनको सब पता था कि क्या होने वाला है1946 में वायसराय लॉर्ड वावेल ने अपनी डायरी में लिखा था: अगर यह साल बिना दिक्कतके बीत जाए, तो अपने आप में ख़ुशी की बात होगी. उसी साल से अंग्रेजों ने धीरे-धीरेभारत छोड़ना शुरू कर दिया था. 1946 से शुरू हुए दंगों में किसी भी अंग्रेज के साथकोई बदतमीजी भी नहीं हुई थी. वावेल की डायरी में लिखा है: हर छोटी बात में दंगे भड़कउठते थे. देश बांटने आये रेडक्लिफ को इंडिया के बारे में कुछ पता नहीं था. एक हीगांव आधा हिंदुस्तान, आधा पाकिस्तान बन गया. कहीं-कहीं एक ही घर आधा-आधाहिंदुस्तान-पाकिस्तान में तब्दील हो गया. अंत में अंग्रेजों ने भारत को एकदम ही छोड़दिया था. भारत सरकार तो बन गयी थी. पर उसके पास सेना और पुलिस को कायदे से इस्तेमालकरने की ताकत नहीं थी. अंग्रेजों ने उस वक़्त बिल्कुल ही छोड़ दिया कि तुम्हारे लोग,तुम जानो. कर लो बंटवारा. हम जा रहे हैं.3. 'नौजवान लड़के' जिनके पास कोई काम नहीं था, पर भटकाव जरूर था1946 में जब अंग्रेजी हुकूमत लड़खड़ा रही थी, उत्तर भारत में तरह-तरह के लड़ाकू,कट्टरपंथी हथियारबंद समूह पैदा हो गए. ये लोग लाठी लेकर जीप में घूमते रहते. हिन्दूमहासभा के एक ग्रुप राम सेना में शामिल होने के लिए संकल्प लेना पड़ता: ''अपनेकर्तव्य पालन के दौरान किसी भी नुकसान या खतरे के बदले किसी मुआवजे की उम्मीद नहींहै. कुर्बानी के लिए तैयार हैं.'' ये सब कुछ 'सुरक्षा' के नाम पर हो रहा था.सुरक्षा की तैयारी बड़ी आसानी से हमलों में बदल जाती थी. जुगलचंद्र घोष कलकत्ता मेंअखाड़ा चलाते थे. दंगों में उनके लड़के शामिल थे. घोष ने कहा था: एक जगह चार ट्रक खड़ेथे. सभी में तीन फीट तक लाशें भरी हुयी थीं. खून टपक रहा था. इस सीन ने मेरे ऊपरबड़ा बुरा असर डाला था. प्रेसीडेंसी कॉलेज के एक छात्र निजामुद्दीन हुसैन ने कहा था:लोग इस कदर उन्मत थे, जैसे शराब पी रखी हो या बेहद जोश में हों. 25 लाख भारतीयसैनिकों ने द्वितीय विश्व-युद्ध में हिस्सा लिया था. 24 हज़ार मारे गए थे. 64 हज़ारघायल हुए थे. लड़ाई ख़त्म होने के बाद बहुत सारे सैनिक बेकार भी हो गए थे. ब्रिटिशराज को भी इनसे कोई मतलब नहीं था. नौजवानों की संख्या बहुत ज्यादा थी. ये लोग किसीकी बात भी नहीं सुनते थे. सबने अपने-अपने मन से देशभक्ति और धर्मभक्ति बना ली थी.मार-काट इनका मुख्य उद्देश्य रह गया था. अपने जीवन की हर समस्या का समाधान इनकोभारत के बंटवारे में नज़र आता था.4. 'खबरों' और 'अफवाहों' में कोई अंतर नहीं था: दोनों आग लगाती थींइतिहासकार के. एम. पन्निकर ने लिखा है: हिंदुस्तान हाथी है, पाकिस्तान कान. हाथीकान के बगैर भी जिन्दा रह सकता है. खबरें: हर मुसलमान को पाकिस्तानी का दर्जा देदिया गया. मुसलमान पुलिस वालों को पाकिस्तान जाने के लिए कहा जा रहा था. 15अक्टूबर 1946 को नोआखाली से तार निकला: घर जला दिए गए हैं. सैकड़ों लोगों को जिन्दाजला दिया गया है. हिन्दू लड़कियों से जबरदस्ती निकाह किया जा रहा है. गोमांस खिलायाजा रहा है. मूर्तियाँ तोड़ दी गयी हैं. कराची में एक दिन ऊपरी बरामदे से किसी बच्चेके हाथ से प्याज गिर गया. और दंगा भड़क गया. लोग-बाग इतने भड़के हुए थे कि किसी बातकी पड़ताल नहीं करते थे. कहीं से एक औरत के बलात्कार की खबर आती. तो लोग नए तरीके सेज्यादा दरिंदगी करते. कहीं पर कोई नहीं सोचता कि हम खुद क्या कर रहे हैं.मंदिर-मस्जिद का मुद्दा तो सांस लेने-छोड़ने पर भड़क जाता था. हर जगह यही अफवाह उड़तीकि बस बंटवारा हो जाये, फिर सब कुछ ठीक हो जायेगा.5. 'स्थितियां' जिनको ब्रिटिश राज ने पैदा किया था, पर वश किसी का नहीं था1943 में बंगाल में अकाल पड़ा था. 30 लाख लोग मरे थे. पर अकाल ख़त्म नहीं हुआ. 1946तक सूखा पड़ता रहा. लड़ाई के दौरान कलकत्ता में 'ब्रिटानिया' कंपनी की होर्डिंग लगीथी. सैनिकों वाली. इसमें लिखा था: अपनी जरूरतें पहले पूरी करो. ये एक ऐसा पाठ था,जिसे जनता ने बड़ी मुश्किल से सीखा था. अनाज देखते ही हर जगह लोग दौड़ पड़ते. होली परदंगे होते थे. मस्जिदों के सामने नमाज के वक़्त लाउडस्पीकर बजाने पर भी दंगे होतेथे. गाय का कटना तो था ही काफी. 1947 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसररहे मुजीब लिखते हैं: मैं भी उस वक़्त ये सोचने लगा था कि मुझे मुस्लिमों की दुकानोंसे ही खरीदारी करनी चाहिए. उस वक़्त के राष्ट्रवादियों में भी हिन्दू-मुसलमान के अलगहोने का भाव पैदा हो गया था. पर जब मुजीब ने अपने घर की औरतों पर 'मुस्लिम दुकानोंसे खरीदारी' करने दबाव बनाया, तो औरतों ने दो टूक जवाब दे दिया: खरीदारी तो वहीं सेकरेंगे, जहां सामान अच्छा हो और दुकानदार ढंग से बात करे. भुखमरी, बेगारी औरमार-पिटाई से जूझती जनता एकदम पागल हो उठी थी विभाजन के नए फरमान से. सबको ये लगताकि झीन लो, मार दो, काट दो. अगर उस समय की सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्टडी की जाए, तोपता चल जाएगा कि लोग तरह-तरह के मानसिक विकारों से ग्रस्त थे. स्थितियां इस कदर हाथसे निकल चुकी थीं कि लोग त्रस्त होकर अलग-अलग देश की मांग करने लगे थे. भारत काविभाजन अपने-आप में ऐसी घटना थी, जिसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती. जिसस्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई का आधार अहिंसा थी, वो संग्राम ख़त्म हुआ अपने लोगों केसाथ हिंसा पर. अनगिनत हत्याएं हुईं. इतने अपराध हुए कि पीढ़ियां जल रही हैं अभी तक.ये भारत के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी थी. साभार: यास्मीन खान की किताब The GreatPartition से-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़िए:एक तरफ बूढ़े शेर देश में घूम रहे थे, दूसरी तरफ बिस्मिल जैसे लड़कों ने बंदूक उठा लीथीदिल्ली में 22 हज़ार मुसलमानों को एक ही दिन फांसी पर लटका दिया गया!कांग्रेस बनाकर अंग्रेजों ने अपना काम लगा लियाखुदीराम बोस नाम है हमारा, बता दीजियेगा सबको.गांधी इंडिया के जेम्स बॉन्ड थे या अंग्रेजों के एजेंट ?जब नेताजी बोस के जीतने पर गांधी बोले- ये मेरी हार है