बाबा, मुझे ऑस्कर की जूरी का मेंबर देखना है
ऑस्कर जूरी के मेंबर्स के नाम गुप्त रखे जाते हैं. पर किसी मेंबर को इमैजिन करें तो वह 60 साल से ऊपर का कोई गोरा बूढ़ा पुरुष कलाकार ठहरेगा और शायद उसके घर में भी ऑस्कर की पुरानी ट्रॉफ़ी रखी मिलेगी.
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फोटो - thelallantop
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ऑस्कर का हल्ला है. इसे मिलेगा कि उसे मिलेगा. पर ऑस्कर है क्या चीज? क्या वाकई ये उतनी तोप चीज है, जितना लोग बोलते हैं? मिहिर पंड्या डीयू में पढ़ाते हैं और सिनेमा में एमफिल पीएचडी की है. उन्होंने यह लेख हमें लिख भेजा है. बताया है कि हमारे ऑस्कर प्रेम की वजह क्या है. कायदे का कंटेंट हो तो आप भी lallantopmail@gmail.com पर भेज सकते हैं.
नहीं, ऑस्कर सर्वश्रेष्ठ सिनेमा के लिए दिए जाने वाले पुरस्कार नहीं हैं. कोई भी अच्छा आलोचक विश्व के नक्शे पर फैले बर्लिन, कान, टोरंटो, हॉन्ग कॉन्ग, सनडांस और वेनिस जैसे पुराने और नए प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में सराही गई फिल्मों के रास्ते साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की लिस्ट बनाता है. पिछले साल कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का 'पाम दे ओर' पुरस्कार जीती फ्रेंच फिल्म 'धीपन' ऑस्कर में कहीं दिखाई नहीं देगी. नहीं, ये साल के सबसे लोकप्रिय सिनेमा के चयन का मंच भी नहीं. भारत की तरह ही अमेरिका में भी फ़िल्म की शुद्ध व्यावसायिक लोकप्रियता उसके बॉक्स ऑफ़िस कलेक्शन से ही आंकी जाती है. बॉक्स ऑफ़िस लिस्ट, जो ऑस्कर विजेता लिस्ट से हमेशा से काफ़ी अलग होती रही है. बीते साल बाक्स ऑफिस पर सबसे कमाऊ 'स्टार वार्स: फोर्स अवेकन्स', 'जुरासिक वर्ल्ड' और'अवेंजर्स: एज ऑफ अल्ट्रॉन' जैसी फ़िल्में ऑस्कर के मुख्य पुरस्कारों की सूची से सदा नदारद मिलेंगी. नहीं, यह विश्व के प्रतिनिधि सिनेमा पुरस्कार भी नहीं. ऑस्कर में अमेरिका की धरती पर रिलीज़ हुई फ़िल्में ही कम्पीट करती हैं और दुनिया भर के अंग्रेज़ी से इतर भाषा के सारे सिनेमा को यह पुरस्कार की सिर्फ़ एक “फॉरेन लैंग्वेज” कैटेगरी में समेट देता है. भारतीय एंट्री 'कोर्ट' का मुकाबला इस साल इसी कैटेगरी में 81 और देशों की फ़िल्मों से था. इसके बावजूद, ऑस्कर जैसा कोई नहीं. हर साल दुनिया भर के सिनेप्रेमी और सिने आलोचक इस पुरस्कार चयन के इर्द गिर्द खड़े होते हैं और कभी चाय के प्यालों पर तो कभी बियर की बोतलों पर महीनों तक चलने वाली घंटों लम्बी बहसें किया करते हैं. हम जैसे धरती के दूसरे सिरे पर रहनेवाले हिन्दुस्तानी संडे की उस जगमगाती शाम को लाइव देखने के लिए इधर ‘खूनी मंडे’ को तड़के सवेरे उठ जाते हैं और अपनी पसन्दों के साथ जीते-मरते हैं. मैंने ‘किसे ऑस्कर मिलेगा’ और ‘किसे मिलना चाहिए था’ जैसे सवालों पर सालों पुरानी दोस्तियां तक टूटती देखी हैं. भले कोसें, भले सराहें, यह स्वीकार करना होगा कि विश्व सिनेमा पटल पर नाम हासिल करने के लिए इससे बड़ा और चमकदार मंच और दुनिया में कोई नहीं.
आलोचक कहते हैं कि अमेरिका की दुनिया पर चौधराहट कायम करने में जितना हाथ उनकी सेना का है, उससे कहीं ज़्यादा उनके हॉलीवुड सिनेमा का है. इधर कुछ कहते हैं कि हमारा ऑस्कर प्रेम एकध्रुवीय विश्व में अमेरिका के केंद्र बनने की वजह से उभरा है. कई खुद अमेरिकी सिनेमा और ऑस्कर पुरस्कारों को इस एकध्रुवीय विश्व की स्थापना की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा मानते हैं.
बाबा, मुझे ऑस्कर की जूरी का सदस्य देखना है
तो यह फिर ऑस्कर का हफ्ता है. नॉमिनेशन घोषित हुए महीने से ऊपर हो चुका है और इस अंतिम पड़ाव पर चाहनेवाले अपनी पसन्द के लिए सोशल मीडिया पर मार-काट पर उतर आए हैं. लेकिन ऑस्कर पर बहस दरअसल उसकी जूरी की पसन्द पर बहस है. यह पब्लिक वोटिंग वाले पुरस्कार नहीं हैं, यानी सामान्य दर्शक का इसके चयन में सीधा कोई महत्व नहीं. इससे भी आगे, ऑस्कर की विशाल जूरी (जिसमें पांच हज़ार से ज़्यादा अकादमी सदस्य शामिल हैं) को गुप्त रखा जाता है और उनकी कोई अधिकृत सूची अकादमी प्रकाशित नहीं करती.लेकिन रपटें बताती हैं कि ऑस्कर जूरी के आदर्श प्रतिनिधि सदस्य की कल्पना की जाए तो वह 60 साल से ऊपर का कोई बूढ़ा पुरुष कलाकार ठहरेगा, जिसका रंग गोरा होगा और संभवत: उसके घर की अलमारी में भी एक अदद ऑस्कर की पुरानी ट्रॉफ़ी रखी मिलेगी.लॉस एंजेलिस टाइम्स अपनी 2012 की रिपोर्ट में बता चुका है की ऑस्कर जूरी 94% गोरी चमड़ी वालों और 77% पुरुषों से मिलकर बनती है, जिसमें 86% सदस्यों की उम्र पचास बरस से ज़्यादा है. इनमें कई खुद पुराने ऑस्कर विजेता भी शामिल हैं और अकादमी इन्हें ‘सिनेमा में काम कर रहे सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों की टोली’ कहना पसन्द करती है.
पसंद की राजनीति
लेकिन इस जूरी का चयन पर असर साफ़ दिखता है. इसी साल 14 जनवरी को नॉमिनेशन घोषित होने के फौरन बाद ट्विटर पर हैशटैग OscarsSoWhite ट्रेंड होने लगा. वजह थी लगातार दूसरे साल अभिनय की तमाम कैटेगरी में एक भी अश्वेत अभिनेता का चयन ना होना. इसे ऑस्कर जूरी में सिर्फ़ 2% ब्लैक उपस्थिति से जोड़कर देखने वाले कम न थे. यहां तक कि लोकप्रिय रॉकी सीरीज़ को पुनर्जीवित करनेवाली ‘क्रीड’ जैसी हरदिलअज़ीज़ फ़िल्म के लिए सिल्वेस्टर स्टेलॉन का सहायक अभिनेता की भूमिका में चयन तो हुआ (उन्हें पुरस्कार का भी तगड़ा दावेदार माना जा रहा है), लेकिन नायक माइकल बी जॉर्डन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नॉमिनेशन नहीं मिला. जूरी में महिलाआें के अल्पमत को 'कैरॉल' जैसी फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म की सूची से बाहर रखे जाने से जोड़कर देखा गया. जूरी की पसन्द उनके द्वारा फ़िल्मों के चयन में भी दिखती है.अमेरिकी इतिहास और एतिहासिक चरित्रों से जुड़ी कथाएं ऑस्कर में सबसे ज़्यादा पसन्द की जाती हैं. युद्धकथाएं पसन्द की जाती हैं और जीवन-मृत्यु से जूझते किरदारों की कथाएं भी. घोर राजनीतिक और नितान्त व्यक्तिगत कारणों के चलते जर्मन 'हॉलोकॉस्ट' सदा से ऑस्कर में चयनित फ़िल्मों का केंद्रीय विषय रहा है.ऑस्कर की जूरी की औसत उम्र 62 साल से ज़्यादा है, ऐसे में ’ग्लैडिएटर’, ‘ब्रेवहार्ट’ और ‘टाइटैनिक’ जैसी महाकाव्यात्मक भव्यता लिए कथाएं जहाँ ऑस्कर जूरी में बैठे बुज़ुर्गों की चहेती रही हैं, वहीं नए किस्म की प्रयोगात्मक फ़िल्मों को वहाँ पहचान के लिए भटकना पड़ता है. 'डिस्ट्रिक्ट 9' को अत्यधिक हिंसा का आरोप झेलना पड़ता है तो 'शेम' जैसी फ़िल्म को अनैतिक सेक्सचित्रण का. लेकिन अन्तत: इन फ़िल्मों की ऑस्कर में अस्वीकार्यता की वजह इनकी नवीन प्रयोगशीलता है जो जूरी के तय सांचों में फिट नहीं बैठती. अगर आप उन भारतीय या भारत से जुड़ी फ़िल्मों को भी देखें जिन्होंने ऑस्कर में नाम कमाया है - ‘मदर इंडिया’, ‘गांधी’, ‘लगान’ और ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ जैसी फ़िल्में, तो आप यह महाकाव्यात्मक खूबी हर फ़िल्म में पाएंगे.

