महामहिम: हरियाणा का चौधरी, जिसने राष्ट्रपति चुनाव में गजब का रिकॉर्ड बनाया
हरीराम की जिंदगी में दो का अंक यहीं नहीं रुकता. आप चौधरी हरीराम को गूगल करेंगे तो दो नतीजे भी नहीं आएंगे.
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चौधरी हरीराम
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ये चौधरी हरीराम की कहानी है. नेता थे. कभी नहीं जीते. कोई भी चुनाव. मगर फिर भी उनकी कहानी सुनी जानी चाहिए. क्योंकि दूसरे नंबर पर रहकर भी उन्होंने एक नायाब रेकॉर्ड बनाया. इकलौता ऐसा नेता, जो दो बार राष्ट्रपति पद के चुनाव में रनरअप रहा. दूसरे (1957) और तीसरे (1962) राष्ट्रपति चुनाव के दौरान.
हरीराम की जिंदगी में दो का अंक यहीं नहीं रुकता. उनके दो बड़े भाई विधायक रहे. उनके दो बड़े भाई कत्ल किए गए, और खुद उन्होंने दो बार लोकसभा पहुंचने की कोशिश भी की. इस कोशिश में भी वह दो नंबर पर रह गए, पहले आम चुनाव (1952) में. आप चौधरी हरीराम को गूगल करेंगे तो दो नतीजे भी नहीं आएंगे. मगर इंटरनेट पर इंदराजी से पहले भी दुनिया थी. किरदार थे और उनके किस्से थे. ऐसा ही एक सियासी किस्सा चौधरी हरीराम के परिवार का भी है. महामहिम सीरीज में यूं तो हम राष्ट्रपतियों के किस्से सुना रहे हैं, मगर कई बार अवांतर प्रसंग भी जरूरी होते हैं. इसे यूं ही समझें.
नीली कोठी वाले के सिपहसालार
हरियाणा के किसानों को ब्रिटिश राज में संगठित किया रोहतक की नीली कोठी के रहवासी चौधरी छोटूराम ने. उन्हें रहबर ए आजम (दीनबंधु) का खिताब दिया गया. उन्होंने 1923 में किसानों के लिए जमींदारा (यूनियनिस्ट) पार्टी के गठन में अहम रोल निभाया. इस दौरान रोहतक उनकी राजनीति का केंद्र रहा. आसपास के कई गांवों के बड़ी जोत वाले किसानों का उन्हें समर्थन मिला. ऐसे ही एक किसान थे खेड़वाली गांव के श्रीरामजी लाल.
रामजीलाल का सबसे बड़ा बेटा चौधरी टेकराम दीनबंधु के युवा दस्ते का अहम सदस्य था. चौधरी छोटूराम अंग्रेजों से ज्यादा टकराव मोल नहीं लेते थे. युक्ति से काम चलाते थे. इसलिए उन्हें और उनके समर्थकों को अंग्रेजों की बनाई लेजिस्लेटिव काउंसिल में बराबर प्रतिनिधित्व मिलता था. चौधरी टेकराम भी इसी के चलते लाहौर लेजिस्लेटिव काउंसिल के मेंबर बन गए. आज की भाषा में कहें तो विधायक. उसी दौरान उनके छोटे भाई देवकराम का कत्ल हो गया. गांवदारी की रंजिश में. फिर कुछ बरस के अंतर पर चौधरी टेकराम को भी गोली मार दी गई.
रामजीलाल के अब दो बेटे बचे. रामस्वरूप और हरीराम. रामस्वरूप जमींदारा पार्टी में सक्रिय हो गए और हरीराम पहले स्कूल टीचरी और फिर वकालत में रम गए. रामस्वरूप लाहौर एसेंबली के तीन बार मेंबर रहे. जमींदारा पार्टी से कांग्रेस दल में आ गए. आजाद भारत में भी वह एक बार 1962 में सांपला सीट से जीतकर विधायक बने. एकीकृत पंजाब राज्य में. 1966 में हरियाणा एक नए राज्य के रूप में आया. उसके बाद चौधरी रामस्वरूप की राजनीति खत्म सी हो गई.

चौधरी छोटूराम
उधर चौधरी हरीराम थे, जो बड़े भाई की छाया से निकलना चाहते थे. इसके लिए जरूरी था चुनाव लड़ना और जीतना. 1952 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पहली मर्तबा किस्मत आजमाई. जमींदारा पार्टी से. सर छोटूराम के समय से वह भी इस पार्टी में सक्रिय थे. हालांकि 1945 में सर छोटूराम की मौत के बाद इस पार्टी का रसूख कुछ कम हो गया था. पर वजूद तो था ही. चौधरी हरीराम का चुनावी मुकाबला था संविधान सभा के सदस्य रहे चौधरी रणबीर सिंह से, जो कांग्रेस पार्टी के कैंडिडेट थे. चौधरी रणबीर सिंह डेढ़ लाख से ज्यादा वोट पाकर जीते. चौधरी हरीराम 81 हजार वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे.
राष्ट्रपति की लगन की शुरुआत
लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीनों के बाद देश के पहले राष्ट्रपति के लिए चुनाव हुए. मई 1952 में. कांग्रेस की तरफ से डॉ. राजेंद्र प्रसाद मैदान में थे. हर तरफ चर्चा थी कि राजेंद्र बाबू निर्विरोध चुन लिए जाएंगे. जैसे संविधान सभा के आखिर में उनका राष्ट्रपति के लिए चुनाव हो गया था. लेकिन रोहतक के चौधरी हरीराम को ये बात जमी नहीं. उन्होंने कहा कि अब लोकतंत्र आ गया है. बिना प्रतिस्पर्धा के कोई पद नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने भी पर्चा दाखिल कर दिया. कुछ ही दिनों में वामपंथी दलों की तरफ से भी प्रो. केटी शाह मुकाबले में आ गए. राजेंद्र प्रसाद विनर रहे. प्रो. शाह रनर अप. चौधरी छोटू राम 1,954 मूल्य के वोटों के साथ चौथे नंबर पर रहे.
1957 में वह फिर मैदान में थे. पहले तो लोकसभा चुनाव लड़े और हारे, फिर राष्ट्रपति चुनाव के लिए दावेदारी ठोंक दी. राजेंद्र प्रसाद दोबारा राष्ट्रपति बनना चाहते थे. इस बार विपक्षी दलों ने कोई उम्मीदवार नहीं उताया. ऐसे में मामला इकतरफा ही रहना था. और इस फेर में सारा खेला बस इस बात का था कि राजेंद्र बाबू के बाद दूसरे नंबर पर कौन सा निर्दलीय रहता है. बाजी मारी चौधरी हरीराम ने. वह 2,672 मूल्य के वोट के साथ रनरअप रहे.

चौधरी हरीराम
राष्ट्रपति चुनाव में दूसरे नंबर पर आने के बाद चौधरी हरीराम को लगा कि लोकसभा चुनाव अब उनके कद के हिसाब से कमतर ही होंगे. इसलिए वह इसके बाद सिर्फ राष्ट्रपति का ही चुनाव लड़े. दो बार और. 1962 में कांग्रेस के डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के खिलाफ. इस दार्शनिक अध्यापक का अलग ही सियासी रुतबा था. वह 10 साल से देश के उपराष्ट्रपति और उसी के तहत राज्यसभा के सभापति थे. जब वह मैदान में आए तो विपक्षी दलों ने एक बार फिर वॉक ओवर दे दिया. और एक बार फिर चौधरी हरीराम ने ताल ठोंक दी. इस बार उनके वोट ढाई गुना बढ़े. कुल 6,341 मूल्य के वोटों के साथ वह दूसरे नंबर पर रहे.
मगर दो नंबर पर आने का मौका चौधरी हरीराम को दो ही बार लगा. अपने चौथे प्रयास में 1967 के चुनाव में उन्हें जीरो वोट मिले. इस संकेत को उन्होंने बखूबी समझा और फिर कभी चुनाव नहीं लड़े. उनके नौ बच्चे थे. जिसमें से एक कृष्णमूर्ति हुड्डा राजनीति में आए. भजनलाल के करीबी रहे. एक बार निगम के चेयरमैन बने और एक बार फिर कलोई से विधायक-मंत्री .

भारतटेक कन्या उच्च विद्यालय
चौधरी हरीराम ने सियासत के अलावा क्या किया. वकालत की और एक स्कूल खोला. अपने उस भाई चौधरी देवकराम के नाम पर, जो सियासत में नहीं आया और कत्ल कर दिया गया. भारतटेक गर्ल्स हाई स्कूल 1943 में शुरू हुआ और अब भी चलता है. हम भी चलते हैं. अगले राष्ट्रपति के किस्से आपके लिए लाने.
चलते-चलते-
चौधरी हरीराम को एक बार राष्ट्रपति भवन जाने का मौका मिला. 1962 के चुनाव के बाद उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन को बधाई पत्र लिखा. बदले में महामहिम ने उन्हें मुलाकात का न्योता दे दिया. चौधरी हरीराम अपने पूरे परिवार के साथ गए. मिले, बधाई दी और भवन का जायजा लिया.
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हरीराम की जिंदगी में दो का अंक यहीं नहीं रुकता. उनके दो बड़े भाई विधायक रहे. उनके दो बड़े भाई कत्ल किए गए, और खुद उन्होंने दो बार लोकसभा पहुंचने की कोशिश भी की. इस कोशिश में भी वह दो नंबर पर रह गए, पहले आम चुनाव (1952) में. आप चौधरी हरीराम को गूगल करेंगे तो दो नतीजे भी नहीं आएंगे. मगर इंटरनेट पर इंदराजी से पहले भी दुनिया थी. किरदार थे और उनके किस्से थे. ऐसा ही एक सियासी किस्सा चौधरी हरीराम के परिवार का भी है. महामहिम सीरीज में यूं तो हम राष्ट्रपतियों के किस्से सुना रहे हैं, मगर कई बार अवांतर प्रसंग भी जरूरी होते हैं. इसे यूं ही समझें.
नीली कोठी वाले के सिपहसालार
हरियाणा के किसानों को ब्रिटिश राज में संगठित किया रोहतक की नीली कोठी के रहवासी चौधरी छोटूराम ने. उन्हें रहबर ए आजम (दीनबंधु) का खिताब दिया गया. उन्होंने 1923 में किसानों के लिए जमींदारा (यूनियनिस्ट) पार्टी के गठन में अहम रोल निभाया. इस दौरान रोहतक उनकी राजनीति का केंद्र रहा. आसपास के कई गांवों के बड़ी जोत वाले किसानों का उन्हें समर्थन मिला. ऐसे ही एक किसान थे खेड़वाली गांव के श्रीरामजी लाल.
रामजीलाल का सबसे बड़ा बेटा चौधरी टेकराम दीनबंधु के युवा दस्ते का अहम सदस्य था. चौधरी छोटूराम अंग्रेजों से ज्यादा टकराव मोल नहीं लेते थे. युक्ति से काम चलाते थे. इसलिए उन्हें और उनके समर्थकों को अंग्रेजों की बनाई लेजिस्लेटिव काउंसिल में बराबर प्रतिनिधित्व मिलता था. चौधरी टेकराम भी इसी के चलते लाहौर लेजिस्लेटिव काउंसिल के मेंबर बन गए. आज की भाषा में कहें तो विधायक. उसी दौरान उनके छोटे भाई देवकराम का कत्ल हो गया. गांवदारी की रंजिश में. फिर कुछ बरस के अंतर पर चौधरी टेकराम को भी गोली मार दी गई.
रामजीलाल के अब दो बेटे बचे. रामस्वरूप और हरीराम. रामस्वरूप जमींदारा पार्टी में सक्रिय हो गए और हरीराम पहले स्कूल टीचरी और फिर वकालत में रम गए. रामस्वरूप लाहौर एसेंबली के तीन बार मेंबर रहे. जमींदारा पार्टी से कांग्रेस दल में आ गए. आजाद भारत में भी वह एक बार 1962 में सांपला सीट से जीतकर विधायक बने. एकीकृत पंजाब राज्य में. 1966 में हरियाणा एक नए राज्य के रूप में आया. उसके बाद चौधरी रामस्वरूप की राजनीति खत्म सी हो गई.

चौधरी छोटूराम
उधर चौधरी हरीराम थे, जो बड़े भाई की छाया से निकलना चाहते थे. इसके लिए जरूरी था चुनाव लड़ना और जीतना. 1952 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पहली मर्तबा किस्मत आजमाई. जमींदारा पार्टी से. सर छोटूराम के समय से वह भी इस पार्टी में सक्रिय थे. हालांकि 1945 में सर छोटूराम की मौत के बाद इस पार्टी का रसूख कुछ कम हो गया था. पर वजूद तो था ही. चौधरी हरीराम का चुनावी मुकाबला था संविधान सभा के सदस्य रहे चौधरी रणबीर सिंह से, जो कांग्रेस पार्टी के कैंडिडेट थे. चौधरी रणबीर सिंह डेढ़ लाख से ज्यादा वोट पाकर जीते. चौधरी हरीराम 81 हजार वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे.
राष्ट्रपति की लगन की शुरुआत
लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीनों के बाद देश के पहले राष्ट्रपति के लिए चुनाव हुए. मई 1952 में. कांग्रेस की तरफ से डॉ. राजेंद्र प्रसाद मैदान में थे. हर तरफ चर्चा थी कि राजेंद्र बाबू निर्विरोध चुन लिए जाएंगे. जैसे संविधान सभा के आखिर में उनका राष्ट्रपति के लिए चुनाव हो गया था. लेकिन रोहतक के चौधरी हरीराम को ये बात जमी नहीं. उन्होंने कहा कि अब लोकतंत्र आ गया है. बिना प्रतिस्पर्धा के कोई पद नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने भी पर्चा दाखिल कर दिया. कुछ ही दिनों में वामपंथी दलों की तरफ से भी प्रो. केटी शाह मुकाबले में आ गए. राजेंद्र प्रसाद विनर रहे. प्रो. शाह रनर अप. चौधरी छोटू राम 1,954 मूल्य के वोटों के साथ चौथे नंबर पर रहे.
1957 में वह फिर मैदान में थे. पहले तो लोकसभा चुनाव लड़े और हारे, फिर राष्ट्रपति चुनाव के लिए दावेदारी ठोंक दी. राजेंद्र प्रसाद दोबारा राष्ट्रपति बनना चाहते थे. इस बार विपक्षी दलों ने कोई उम्मीदवार नहीं उताया. ऐसे में मामला इकतरफा ही रहना था. और इस फेर में सारा खेला बस इस बात का था कि राजेंद्र बाबू के बाद दूसरे नंबर पर कौन सा निर्दलीय रहता है. बाजी मारी चौधरी हरीराम ने. वह 2,672 मूल्य के वोट के साथ रनरअप रहे.

चौधरी हरीराम
राष्ट्रपति चुनाव में दूसरे नंबर पर आने के बाद चौधरी हरीराम को लगा कि लोकसभा चुनाव अब उनके कद के हिसाब से कमतर ही होंगे. इसलिए वह इसके बाद सिर्फ राष्ट्रपति का ही चुनाव लड़े. दो बार और. 1962 में कांग्रेस के डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के खिलाफ. इस दार्शनिक अध्यापक का अलग ही सियासी रुतबा था. वह 10 साल से देश के उपराष्ट्रपति और उसी के तहत राज्यसभा के सभापति थे. जब वह मैदान में आए तो विपक्षी दलों ने एक बार फिर वॉक ओवर दे दिया. और एक बार फिर चौधरी हरीराम ने ताल ठोंक दी. इस बार उनके वोट ढाई गुना बढ़े. कुल 6,341 मूल्य के वोटों के साथ वह दूसरे नंबर पर रहे.
मगर दो नंबर पर आने का मौका चौधरी हरीराम को दो ही बार लगा. अपने चौथे प्रयास में 1967 के चुनाव में उन्हें जीरो वोट मिले. इस संकेत को उन्होंने बखूबी समझा और फिर कभी चुनाव नहीं लड़े. उनके नौ बच्चे थे. जिसमें से एक कृष्णमूर्ति हुड्डा राजनीति में आए. भजनलाल के करीबी रहे. एक बार निगम के चेयरमैन बने और एक बार फिर कलोई से विधायक-मंत्री .

भारतटेक कन्या उच्च विद्यालय
चौधरी हरीराम ने सियासत के अलावा क्या किया. वकालत की और एक स्कूल खोला. अपने उस भाई चौधरी देवकराम के नाम पर, जो सियासत में नहीं आया और कत्ल कर दिया गया. भारतटेक गर्ल्स हाई स्कूल 1943 में शुरू हुआ और अब भी चलता है. हम भी चलते हैं. अगले राष्ट्रपति के किस्से आपके लिए लाने.
चलते-चलते-
चौधरी हरीराम को एक बार राष्ट्रपति भवन जाने का मौका मिला. 1962 के चुनाव के बाद उन्होंने राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन को बधाई पत्र लिखा. बदले में महामहिम ने उन्हें मुलाकात का न्योता दे दिया. चौधरी हरीराम अपने पूरे परिवार के साथ गए. मिले, बधाई दी और भवन का जायजा लिया.
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