कांवड़ियों को भोंपू बेचने वाले सात बच्चों के पिता परवेज की बात सभी को सुननी चाहिए
दी लल्लनटॉप की कांवड़ यात्रा में सड़क किनारे दुकान लगाए परवेज से बातचीत का हासिल.

हड्डियां और उन पर चिपकी गहरे रंग की खाल. धंसे हुए गाल. बाल एकदम काले, पर दाढ़ी खिचड़ी जैसी. काली पैंट और सफेद चकत्तों वाली काली शर्ट. ये परवेज भाई हैं, जो बागपत के मशहूर पुरा महादेव मंदिर के रास्ते में बैठे है. सड़क किनारे बने झुरमुटों की छांव में उन्होंने अपने धंधे के लिए अच्छी जगह खोज ली है. उनकी देखा-देखी में ढेर सारे कांवड़िए भी वहां छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर बैठ गए हैं.
बात परवेज भाई की, पर उससे पहले आसपास की जगह की.
हरिद्वार से गंगाजल लेकर दी लल्लनटॉप का कारवां बागपत पहुंच चुका है. इस शहर को 'जाट कैपिटल' कहा जाता है. यहां पुरा महादेव नाम का एक बहुत फेमस मंदिर है, जहां हर साल लाखों कांवड़िए शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने आते हैं. इस बार भी बहुत भीड़ है. बागपत शहर की मेन रोड से मंदिर का रास्ता करीब 4 किमी है, जिसे कांवड़िये पैदल तय करते हैं. कई बार वो नंगे पैर होते हैं. धूप में तपती सड़क पर पैर जलने लगते हैं, पर उनके लिए ये किसी साधना जैसा है, जिसे पूरा करना ही है.

कांवड़ियों के बीच दुकान लगाए परवेज
परवेज भी इसी रास्ते पर बैठे हैं. सड़क किनारे पल्ली बिछाए. पल्ली पर ढेर सारे छोटे-छोटे भोंपू रखे हुए हैं. लाल और हरे रंग के. परवेज यही बेचते हैं. इन भोंपुओं को खास ढंग से बजाया जाए, तो इनमें से एक-दो साल के बच्चे के रोने की आवाज निकलती है. कांवड़ियों को ये भोंपू बहुत पसंद आता है. वो इनसे खूब शोर करते हैं. उन्हें ये खूब पसंद होता है कि जहां कुछ लोग बैठे हों, वहां ग्रुप में ये भोंपू बजाते हुए निकला जाए. हमने अपने सामने खूब देखा.
तीन चरसी कावड़ियों संग बैठक के बाद जब हम परवेज के पास पहुंचे, तो लगा जैसे वो तैयार बैठे थे. बात करने के लिए. बात शुरू हुई उनके बिजनेस से. उनके सामने सैकड़ों भोंपू पड़े हुए थे, जिन्हें वो 10 रुपए में पांच बेच रहे थे. दो रुपए का एक. आजकल क्या मिलता है दो रुपए में? टॉफी-च्यूइंगम के अलावा. पर वहां दो रुपए में भोंपू मिल रहा था.

परवेज की दुकान पर रखे भोंपू
परवेज की इस खुली दुकान पर सबसे अच्छी चीज ये लगी कि वहां आकर कोई हुज्जत नहीं कर रहा था. हमारे सामने ही कई ग्राहक आए. उन्होंने पूछा कि भोंपू कितने का मिलेगा. पूछते समय उनके चेहरे पर यही भाव होते थे कि या तो वो पैसों पर हुज्जत करेंगे या बिना खरीदे चले जाएंगे. लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता कि ये सिर्फ दो रुपए का है, लोग पांच खरीद लेते. हालांकि, वो लोग पहले पांचों भोंपू बजाकर चेक करते, फिर ले जाते.
परवेज ने बताया कि लोग मंदिर के जितना पास पहुंचते जाएंगे, वहां बिकने वाली चीजें उतनी ही महंगी होती जाएंगी. उन्होंने बताया कि आगे की दुकानों पर यही भोंपू पांच रुपए का एक मिल रहा है. जब हमने पूछा कि क्या उन्हें ज्यादा पैसे नहीं कमाने, तो वो बोले कि इतने में गुजारा हो जाता है, अच्छा मुनाफा निकल आता है, तो कोई दिक्कत नहीं. घरवाले मिलकर इन्हें तैयार करते हैं और परवेज बेचने के लिए बाजार ले जाते हैं. घर के सारे लोग हाथ बंटाते हैं.

परवेज जब कुछ और खुले, तो उन्होंने दावा किया कि इस भोंपू के कारोबार के अलावा उनका पॉलिश बनाने का भी काम है. वो अपने घरवालों के साथ मिलकर कार की पॉलिश बनाते हैं, जिसे बागपत और मेरठ वगैरह के दुकानदार खरीदते हैं. परवेज बताते हैं कि वो ये काम करीब 13-14 साल से कर रहे हैं, लेकिन उनके पास कभी इतनी पूंजी नहीं रही कि वो इसे संगठित रूप दे सकें. मजबूरन वो सस्ते में पॉलिश बेचने को मजबूर है. उनके जितनी बेहतरीन पॉलिश किसी और के पास नहीं मिलेगी, ऐसा परवेज का दावा है.
हमने पूछा कि क्या कभी उन्होंने बैंक से लोन वगैरह लेने की कोशिश नहीं की, तो वो बोले कि दो हफ्ते पहले उन्होंने एक बैंक में लोन की अर्जी डाली है, लेकिन अभी तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. हमने जानना चाहा कि बैंक के कर्मचारियों का उनके साथ रवैया कैसा था, तो वो बोले कि उन्हें लोन मिलने की उम्मीद है. परवेज ने बताया कि अभी की सरकार की वजह से उन्हें फ्री में LPG कनेक्शन मिल गया है. हालांकि, उन्हें उज्जवला योजना का नाम नहीं पता था.

हम परवेज से बात कर ही रहे थे, तभी वहां एक लड़का आ गया. उसे हमारी बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वो आया और कुछ भोंपू झोले में भरने लगा. हमने परवेज से पूछा, तो पता चला कि वो उनका बेटा था. संतानों के बारे में पूछने पर पता चला कि परवेज सात बच्चों के पिता हैं. छ: बेटियां और एक बेटा. 'ये ज्यादा नहीं हो गया' के सवाल पर परवेज कहते हैं,
'हो तो गया ज्यादा, लेकिन अब क्या कर सकते हैं. तब ध्यान नहीं दिया. बेटे के लालच में रह गए, लेकिन बेटियां होती चली गईं. ये मेरा बेटा बीच का है. मैं चाहता था कि इसके साथ का एक और आ जाए, लेकिन नसीब में लिखा ही नहीं था. दिक्कत तो होती ही है. कुछ बड़ा नहीं कर पाया. इन सबके लिए भी कुछ अच्छा नहीं हो पाया. लेकिन मैं अपनी बेटियों को बहुत प्यार करता हूं. ये जो मेरा बेटा है, इससे ज्यादा मैं बेटियों से प्यार करता हूं.'

ये बताते समय परवेज की आवाज में मजबूरी थी, हताशा थी. इस पर और बात करने का कोई मतलब नहीं था. परवेज पर जितना भार पड़ना था, पड़ चुका. अब तो उनकी ये भार ढोने की बारी है. इसी के साथ बात राजनीति पर आ गई. परवेज को लगता है कि ये सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन वो ये भी कहते हैं कि हर पार्टी में अच्छे-बुरे लोग होते हैं. हालांकि, उन्हें संतोष इस बात का है कि कांवड़ यात्रा के दौरान उनके साथ कभी कुछ बुरा नहीं हुआ.
परवेज राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में भी मेलों में दुकाने लगा चुके हैं. जिंदगी फाका-मस्ती में चल रही है. हम अपनी राह पर बढ़ जाते हैं और परवेज हमसे लौटकर मिलके जाने की बात कहते हैं. हमारे जाते समय उन्होंने हमारे लिए खूब भोंपू बजाया.
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