अंकित त्रिपाठीलल्लनटॉप को एक और फायरब्रांड लौंडा मिला है. बकैती के तीर्थस्थल कानपुर से. कहिताहै कि RSS के स्कूल से पढ़ा है, जिसके हिसाब से उम्र 24 है, लेकिन असल में 25 है.IIT से बीटेक किया है. मार्क्स धर्म को अफीम कह गए थे, अंकितवा गांजा कहता है. जबमूड भन्नाता है तो वेबसाइटों के पेज पर जाकर कमेंट दाग देता है.रेज्यूम जीवन में सिर्फ एक बार बनाया, क्योंकि ये बनावटी काम लगता है. वनलाइनर ऐसेमारता है कि बड़के मठाधीश भी जल-भुन जाएं. आपके लिए बड़ी मोहब्बत से कैंपस किस्सालिखकर लाया है. बांचिए. इससे आपको भी वो किस्से याद आएंगे, जब आप घरवालों को गोलीदिया करते थे.--------------------------------------------------------------------------------बात उन दिनों की है, जब हम भी स्कूल जाया करते थे. ग्यारहवीं में थे. कोचिंग जातेथे दीनदयाल विद्यालय. एक दिन दीनदयाल विद्यालय, एक दिन शिक्षा निकेतन. उस दिनदीनदयाल का नंबर था. दसवीं तक स्कूल पैदल ही जाया करते थे, पर कोचिंग दूर थी तोसाइकिल से जाने की इजाजत मिल चुकी थी. कुल मिलाकर नई-नई रंगबाजी सीखे थे हम. साइकिलसे स्किड मारने से लेकर अगला ब्रेक मारके पिछला टायर उचका लेने तक सारे पैंतरे सीखलिए थे.स्किड तो ऐसी गजब की मारते थे कि सड़क पर टायर की ग्रे कलर की घिसन छूट जाती थी,जिसे देखकर लोग बोलते थे, 'बेटा, त्रिपाठी ने मारी है'. वो बात अलग है कि दो-चारबार घुटने पर पैंट भी फट गई. अब कोई पेट से थोड़े न स्किड मारना सीखकर आता है, फट गईपैंट यार. हां तो अब दीनदयाल के सीन पर वापस आ जाते हैं. उस दिन कोचिंग के बाददीनदयाल के साइकिल स्टैंड के पास दोस्तों के साथ बकर चल रही थी.तभी एक चिरांद ने लफ्फाजी में कहा, 'गुरू, वहां से कोई कुदा पाएगा साइकल? 10 रुपएमेरी तरफ से'. दरअसल साइकल स्टैंड के एक ओर ग्राउंड था खेलने के लिए और साइकलस्टैंड और ग्राउंड की जमीनों के बीच एक डेढ़ फुट का अंतर था. साइकल स्टैंड उच्चे परथा और ग्राउंड निच्चे पर. दूर से साइकल भगाकर लानी थी और उसी उच्चे से निच्चे मेंकुदानी थी. वैसे तो तब हमाये लिए 10 रुपए बड़ी चीज हुआ करती थी, लेकिन तब बात 10रुपए से आगे बढ़ चुकी थी. अरे शान-वान भी कउनो चीज होती है कि नहीं.कसम से ऐसा जोश भर गया कि फड़क-फड़ककर मन कहने लगा कि भाई, कुदा दे साइकल और दिखा देलौंडों को कि यहां के तो बादशाह हमइ हैं. फिर क्या था. जवान खून भला रुक सकता थाक्या? पीछे से हवाओं ने फड़फड़ाकर माहौल बना दिया बिल्कुल साउथ की किसी पेलम पिच्चरकी तरह. पैडल पर धरी लात और जय बजरंग बली बोलकर दौड़ा दी साइकल डेढ़ फुट गहरे गड्ढेकी ओर. धुक-धुक तो बहुत हो रही थी, लेकिन शायद अपनी स्टंटबाजी से कुछ ज्यादैइम्प्रेस्ड थे. आव देखा न ताव, दम बांधकर कुदा दी साइकल गड्ढे में और अगले ही पलमेरी साइकल उस पार हो गई.इतिहास रचा जा चुका था. जो कोई नहीं कर सका था, वो त्रिपाठी ने चुटकी में कर डालाथा. अब मैं सातवें आसमान पर चढ़ चुका था. इतना कि एक और लड़के को हौसला देने औरकुदाने की ट्रिक बताने के लिए एक और बार साइकल कुदाकर दिखाने की हामी भर दी. इस बारफट नहीं रही थी, बल्कि गुंडई मुस्कान थी चेहरे पर. गए शेर की तरह दहाड़ते हुए, लेकिनअगले ही पल ग्राउंड पर कुत्ता की नामा मिमिया रहे थे. इस बार वो नहीं हुआ, जो पिछलीबार हुआ था.कुछ ज्यादा ही तगड़ी चीज़ हो गई थी. अलगै लेवल की. साइकल जैसे ही नीचे ग्राउंड कीजमीन से टकराई, साइकल की कइंची टूट गई और पिछला टायर दो-तीन फुट हवा में उछल गया.हम भी उछलकर गिरे जाकर, घसिलते हुए, दो-तीन मीटर दूर तक. भयंकर मुंह छिल गया था. येतो कहो चश्मा उछलकर कहीं और गिरा गया था, नहीं तो साला कांच-वांच भी घुस सकता थाआंख में. अंधिया ही जाते हम तो. लेकिन बहुत बचे यार. ये देखकर दोस्तों की वैसे हीसिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी थी. फिर हमी उठे, पैंट झाड़ी और कहा, 'चलो बे कुछ नहींहुआ'.जल्दी-जल्दी मुंह धोकर बाहर भागे, लेकिन बाहर जाकर पता चला कि चोट गुरू गहरी लगीथी. एक छोटी सी डिस्पेंसरी में जाकर मरहम-पट्टी कराई और घरवालों को बताने के लिए एकमस्त कहानी बना ली कि ऑटोवाले ने पीछे से पेल दिया, आगे सड़क खुदी पड़ी थी, उलर केगिरे जाकर, सब मौरंग-गिट्टी मुंह छेल डालिस. जिसने भी ये कहानी सुनी, ऑटो वालों कोगरियाया और हमें 4-5 दिन कोचिंग जाने से आराम मिल गया.पांच दिन खातिरदारी हुई जमकर. दिनभर टीवी देखने को मिली वो अलग. चलो कुछ तो फायदाहुआ चोट लगने का. कहानी तो सुन ली यार तुमने, लेकिन एक बिनती है. ये कहानी हमाये घरमें बता न देना, कुछ भी हो जाए चाहे. काहे से अइसा है न कि उनकी नज़र में कातिल आजभी ऑटो वालै है.--------------------------------------------------------------------------------ये वाले कैंपस किस्से भी पढ़ लो:हगते वक्त मेरी मुहब्बत मुझे कल्लाने लगती थीसोनिया गांधी को गरिया पुलिस के डंडे खाने वाले क्रांतिकारी, बाबू बैनर्जीस्टीफेंस कॉलेज में पढ़ने वाली एक बनारसी लड़की की डायरीमां कहती थी बड़ी होकर घास काटोगी, और वो सच हो गया‘माड़साब्ब, लड़की से मिलने नहीं, ऊंटनी खोजने गए थे’