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वाबी-साबी: जापान की पूरी फिलॉसफी समझने का रास्ता

चाय शौकीन भी इधर गौर फरमाएं. क्योंकि...

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5 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 5 जुलाई 2016, 01:42 PM IST)
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जापान के वाबी-साबी का नाम सुना है आपने? नहीं, नहीं, ये दो जुड़वा बच्चों के नाम नहीं हैं. ये तो एक कमाल का कांसेप्ट है. जिससे जापान की पूरी संस्कृति, कला और सब कुछ समझा जा सकता है.
वाबी का मतलब होता है जीने या चीज़ों को देखने का तरीका, एक दिशा या फिलॉसफी. और साबी का मतलब होता है चीज़ों को टाइम और स्पेस के संबंध में देखना. उनके नेचुरल स्टेट को समझना. इसी लाइन में आगे बढ़ते हुए, वाबी-साबी को दुनियादारी से दूर, एक शांत संन्यासी की तरह समझ सकते हैं. जो जीवन के अधूरेपन, खालीपन और इम्परफेक्शन को स्वीकार कर चुका है. और इस अधूरेपन को पहचानने से आने वाली शांत समझ उनके अंदर आ चुकी है.
हर चीज़ फलती-फूलती है. फिर उसके बाद उसके दिन ढल जाते हैं. बढ़ने और ख़तम हो जाने की इस नेचुरल साइकिल को वाबी-साबी स्वीकार करता है. और उसे खूबसूरत मानता है. अगर थोड़ा हिस्ट्री पढ़ोगे तो पता चलेगा कि बहुत पहले जापान के कल्चर पर चाइना के कल्चर का काफी असर था. चाइना के ही 'ताओइस्म' और 'जेन बुद्धिज़्म' जब जापान आए, तो वाबी-साबी निकल कर आया. ये जेन बुद्धिज़्म और ताओइस्म है क्या? ताओइस्म एक फिलॉसफी है. जिसमें पूरे ब्रह्मांड से लेकर आम इंसानों की जिंदगी, सब कुछ की बात है. नेचर की साइकिल और चीज़ों के आपसी बैलेंस से सब कुछ जोड़ा जाता है. ये फिलॉसफी मानती है कि जिंदगी कुदरत के नेचुरल फ्लो के हिसाब से चलनी चाहिए.
ताओइस्म का काफी असर पड़ा जेन बुद्धिज़्म के ऊपर. बुद्धिज़्म तो आप जानते ही होंगे. भारत से बुद्धिज़्म जब चीन, जापान, नेपाल जैसे देशों में पहुंचा तो इसमें काफी बदलाव आते गए. जेन बुद्धिज़्म की शुरुआत भी चाइना में हुई थी. जेन बुद्धिज़्म वैसे तो महायान बुद्धिज़्म का एक हिस्सा. लेकिन महायान के मूर्ति पूजा से अलग, ये ध्यान यानी मैडिटेशन पर जोर देता है. माना जाता है कि सूत्रों के बारे में जानने से ज्यादा ज़रूरी है शांत रहना और ध्यान लगाना.
वाबी-साबी एक बड़ा लंबा-चौड़ा कांसेप्ट है. इसे समझ कर आप जापान की पूरी संस्कृति, वहां का आर्ट और आध्यात्मिक ट्रेडिशन, सब कुछ समझ सकते हैं.
जापान की हर परंपरा में वाबी-साबी का कांसेप्ट शरीर में आत्मा की तरह रहता है. रिलिजन, आर्ट, जापानी कविताएं और जापानी टी सेरेमनी, सब को वाबी-साबी से समझा जा सकता है. चलिए देखते हैं कैसे. 1) आर्ट वेस्टर्न दुनिया में कायदे से पूरा किए गए काम को खूबसूरत आर्ट की केटेगरी में रखा जाता था. सिमेट्री, मैथमेटिकल तरीके से बैलेंस्ड चीज़ों को परफेक्ट आर्ट माना जाता था. आमतौर पर हम सब के दिमाग में भी 'खूबसूरत' की एक ख़ास परिभाषा तय रहती है. लेकिन वाबी-साबी के कांसेप्ट से 'खूबसूरत' की पूरी समझ ही उलट-पलट दी जाती है.
चीज़ों की वो खूबसूरती जो समय और बढ़ती उम्र के खुरदरे निशान में उभर कर आती है, उसे एकनॉलेज किया जाता है. इसे देखने का सबसे आसन तरीका है जापान के पॉटरी आर्ट को देखना. आपको भी कहीं दिख ही गया होगा. परफेक्ट शेप में बने 'खूबसूरत' बर्तनों के टूट जाने के बाद उन्हें रिपेयर कर दिया जाता है. और इसी से उसकी 'खूबसूरती' बढ़ जाती है. ऐसे ही आपको जापानी टी सेरेमनी के बर्तन भी दिख जाएंगे. ये वाबी-साबी के हिसाब से टेढ़े-मेढ़े भी हो सकते हैं. 2) जेन बुद्धिज़्म जेन बुद्धिज़्म में खुद को समझने के लिए नेचर के उबड़-खाबड़ पैटर्न को समझना होता है. जीवन-मौत, आने-जाने के नेचुरल नियम को स्वीकारना होता है. वाबी-साबी इस कांसेप्ट से ही निकल कर आता है. जो नेचर के साथ-साथ इंसानी जिंदगी और इंसान की बनाई हुई चीज़ों को भी ऐसे ही देखता है. जेन बुद्धिज़्म में लंबे समय तक ध्यान लगाना होता है. 3) लिटरेचर में वाबी-साबी एक बात अक्सर की जाती है कविताओं के बारे में. शेक्सपियर ने भी की है. किसी की याद में सोने-चांदी जड़कर भी इमारतें बनवा लो. या उसके नाम के पत्थर गड़वा लो. ये सब एक दिन ख़तम हो जाना है. लेकिन अगर किसी की याद में एक कविता लिख दो, तो वो अमर हो जाएगी.
हर बड़े कवि या कलाकार की एक तमन्ना ज़रूर होती है कि उसकी कविता या कला आने वाले वक्त में बनी रहे. वक्त की चोट से बचकर फलती-फूलती रहे. ये एक अजीब डर है चीज़ों के ख़तम हो जाने का. अजीब चाहत है पर्मानेंस की.
वाबी-साबी इस डर और चाहत से आज़ादी दिलाता है. वाबी-साबी आर्ट से लेकर आर्किटेक्चर और लिटरेचर में एक नई सोच ले कर आता है. ये हमें चीज़ों के अधूरेपन, उनके ख़तम हो जाने और वक़्त के साथ उनके 'ख़राब' होते जाने को सेलिब्रेट करने देता है. इसे हम कविताओं के जापानी फॉर्म 'हाइकू' में भी देख सकते हैं. हाइकू 3-4 लाइन की छोटी कविता होती है. इसमें अक्सर दो बातों या चित्रों को कंट्रास्ट में रखा जाता है. मत्सुयो बाशो को हाइकू का पिता माना जाता है. ये एक बार अकेले निकल पड़े.
काफी दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे. इसी दौरान उन्हें वाबी-साबी का असली मतलब समझ आया. अकेलेपन में उन्हें जैसे एक आज़ादी मिल गई. वो कुछ सुनसान रास्तों पर भिखारी बन कर घूमते रहे. खूबसूरत जगहों से गुज़रते हुए वो छोटी-छोटी कविताएं लिखते रहे. और हर पल गुज़रते समय में अपनी देखी-सुनी चीज़ों को समेटने की कोशिश में उन्हें वाबी-साबी दिखाई दिया. 4) जापानी टी सेरेमनी ये चाय पीने का एक तरीका है, जिसे जापानी में चा-नो-यू कहते हैं. जानते हैं इसकी शुरुआत क्यों हुई? क्योंकि जेन बुद्धिस्ट साधुओं को लंबे समय तक ध्यान लगाना होता था. अब इस बीच उन्हें नींद आ सकती थी. जिससे बचने के लिए वो चाय पीया करते थे.
ऐसे ही एक साधू थे मुराटा शुको. इन्होनें वाबी-साबी के कांसेप्ट के हिसाब से जापानी टी सेरेमनी को नया शेप दिया. इन्होंने अपने शिष्यों को एक चिट्ठी लिखी. जिसे अब 'लेटर ऑफ़ द हार्ट' कहा जाता है. इस चिट्ठी में शुको ने टी सेरेमनी में चाय पीने के तरीके के बारे में बताया. वो तो ये चाहते थे कि चाय पीने में सादे बर्तनों का इस्तेमाल हो. और धीरे-धीरे चाय पीते हुए दिमाग दुनियादारी से आज़ाद हो जाए. लेकिन कई बार ये टी सेरेमनी राजाओं और अमीर लोगों के दिखावे का जरिया बन जाता था. इससे वो अपने कीमती कप-प्लेट को जैसे डिस्प्ले में लगा देते थे.
शुको के बाद सेन नु रिकियु नाम के बुद्धिस्ट साधु ने टी सेरेमनी को वाबी-साबी के सच्चे फॉर्म में वापस लाने की कोशिश की. उन्होंने बड़े-बड़े योद्धाओं और रईसों के बीच सादगी भरे टी सेरेमनी को जिंदा करने की कोशिश की. इसे सिम्बोलाइज़ करने के लिए उनके पास एक कमाल का आइडिया था. उन्होंने एक ऐसा टी हाउस बनवाया, जिसके दरवाज़े की चौखट बहुत नीची थी. अब यहां घुसने के लिए राजाओं तक को झुकना पड़ता था. रिकियु ने एक और काम किया. उन्होंने जापानी टी सेरेमनी में चाय बनाने के लिए ख़ास तरीके बताए. ऐसे हाथ के मूवमेंट्स से चाय बनाना जो सरल हों. जिन्हें करने में कोई ताम-झाम न हो.
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टोक्यो में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ पीएम मोदी, चाय पीते हुए. टी सेरेमनी हुई थी बाकायदा.

जापानी टी सेरेमनी बड़ी अनोखी परंपरा है. पहले तो हमें समझ में ही नहीं आता था कि आखिर चाय पीने को इतना ख़ास बनाने की क्या ज़रूरत है? भारत में हम लोग तो हर घर, ऑफिस, चौराहे पर दिन भर चाय पीते रहते हैं. हमने तो कभी इसे 'सेरेमनी' नहीं बनाया.
फिर हमने रविन्द्र केलेकर का एक आर्टिकल पढ़ा जापानी टी सेरेमनी के बारे में. उसमें उन्होंने बड़े मजेदार तरीके से 4 घूंट चाय को बीसों मिनट में पीने के बारे में बताया है. पहले तो उनका भी सिर चकरा गया कि ऐसे चाय पीने का क्या फायदा?
फिर धीरे-धीरे उन्हें तन्मयता से चाय पीने के फायदे दिखे. उन्हें लगा कि पूरा दिमाग दिन भर की हलचल, भागदौड़ से आज़ाद हो गया है. वर्तमान में इतना धीरे हो चुका है कि भूत और भविष्य से बहुत दूर आ चुका है. उन्हें जो महसूस हुआ, उसे वाबी-साबी का ही एक असर कह सकते हैं.
आज के वक्त में वाबी-साबी वेस्टर्न कल्चर और उसके बाजारवाद से काफी प्रभावित हो चुका है.
एक तरफ वाबी-साबी के जानकारों को ये उम्मीद है कि आज की मटेरियलिस्ट जिंदगी में वाबी-साबी एक राहत की सांस बन कर आ सकती है. बाजारवाद और उससे आने वाली खालीपन या असंतोष की फीलिंग को वाबी-साबी से संभाला जा सकता है. लेकिन एक और बात निकल आती है. कि मार्केट तो कुछ भी बेच सकता है. अब मार्केट वाबी-साबी के कांसेप्ट, उस पर आधारित आर्ट को ही बेचने लगा है.
टूटी-फूटी इमारतें, रिपेयर किए गए पॉटरी, ये सब कुछ बेचे जा रहे हैं. अब मार्केट ही इन चीज़ों के अधूरेपन और उनके कमज़ोर होने में खूबसूरती दिखाता है.


(ये स्टोरी पारुल ने लिखी है.)

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