1905 के आस-पास का दौर था. उस वक्त राजा-महराजा हुआ करते थे. अखाड़े होते थे. दंडपेलते एक से एक हैवी पहलवान होते थे. कुश्ती के मुकाबले हुआ करते थे. जब 7 फीट काकोई पहलवान अपने शरीर पर तेल मल कर अखाड़े में उतरता था. अपनी लंगोट चढ़ाता था. झुककरमट्टी उठा कर हाथ झाड़ता था. और हाथ से अपनी जांघ को ठोककर ताव देता था. अखाड़े केबाहर बैठे लोगों के शरीर में करंट दौड़ जाता था.रुस्तम-ए-हिन्द रहीम बक्श, दतिया के गुलाम मोहिउद्दीन, भोपाल के प्रताब सिंह, इंदौरके अली बाबासेन, मुल्तान के हसन बक्श. ये सब उस दौर के सबसे मशहूर और ताकतवर पहलवानथे. ऊंचे-लम्बे, तगड़े पहलवान. फिर एक और पहलवान आया. अपवाद जैसा. मध्य प्रदेश केदतिया डिस्ट्रिक्ट से. छोटी हाइट का. बस 5 फुट 7 इंच. पहलवानों के खानदान का छुटका सा बच्चा. लेकिनलप्पुझन्ना टाइप का नहीं था वो. बॉडी गठी हुई. बाजुओं में ऐसी ताकतकि एक-एक करके इन सारे खतरनाक पहलवानों को उसने सही में धूल चटा दी. खलबली मचगई. अपने जैसा वो एक ही पीस था. जो अपने से डेढ़ फुट ऊंचे पहलवान को भी उठा के पटकदे तो सही में हड्डी पसली और दांत अट्ठन्नी-चवन्नी की तरह बिखर जाते थे. गामा पहलवान Credit: facebookवो पंजाब का लड़का था. मध्य प्रदेश के दतिया डिस्ट्रिक्ट के पहलवानों के घराने का.दुलार में घर और गांव वाले 'गामा' बुलाते थे. बाहर का नाम था, गुलाम मोहम्मद बक्श.भाई था इमाम बक्श. पापा मोहम्मद अजीज बक्श भी पहलवान थे. चाचा-मामा-ताऊ सब वर्जिशकिया करते थे. पहलवानी खून और परवरिश दोनों में आ गई. पापा ने बचपन से दंड-बैठककरना सिखाया. छुटपन में ही दोनों भाई पंजाब के फेमस पहलवान माधोसिंह के साथ कुश्तीलड़ते थे. खेल के दांव-पेंच सीखते थे.जब गामा 5 साल का हुआ. उसके पापा की मौत हो गयी. उस समय दतिया के राजाथे भवानीसिंह. वो गामा के पापा को बहुत अच्छे से जानते थे. उन्होंने गामा और उसकेभाई की आगे की ट्रेनिंग की ज़िम्मेदारी उठा ली. उस दौर में राजाओं के दरबारों मेंकुश्तियां हुआ करती थीं. कुश्ती लोगों के एंटरटेनमेंट का एक जरिया थी. साथ ही मेंलोगों को वर्जिश, योग वगैरह के फायदे भी समझ आते थे. राजाओं के अपने पहलवान होतेथे. जिनके खाने, रहने और ट्रेनिंग का खर्चा राजा लोग उठाया करते थे. दतिया के राजागामा को अपने दरबार का पहलवान बनाना चाहते थे. गामा पहलवान ने दतिया में अपनीट्रेनिंग पर खूब ध्यान लगाया. एक दिन में 5000 दंड और 3000 पुश-अप्स करता था. अबइतनी कसरत के बाद तो हम पूरा आदमी खा जाएं. गामा भी एक साथ छः देशी चिकन खाता था.उसके साथ 10 लीटर दूध और आधा किलो घी पीता था. ऊपर से बादाम का टॉनिक, चुस्ती औरदिमागी ताकत के लिए.Credit: facebookगामा ने कुल 50 साल प्रोफेशनल कुश्ती लड़ी. लेकिन उसका रिकॉर्ड है कि वो एक बार भीनहीं हारा. दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई. दुनिया भर के पहलवानों को हराया. एक बारनहीं. कई-कई बार. लेकिन वो खुद मरते समय तक अनडिफीटेड रहा.पहली कुश्ती में 400 से ज्यादा पहलवानों को हरायाकसरत और कुश्ती खून में थी ही. कुल जमा 10 साल की उम्र रही होगी. जोधपुर के राजा एककम्पटीशन करवा रहे थे. 'सबसे ताकतवर आदमी'. इसी तरह का कुछ. जैसे आजकल मिस्टरइंडिया या मैन-हंट जैसे कम्पटीशन होते हैं. इसमें हर किसी को अपनी ताकत दिखानी थी.हर मैच के बाद जो हार जाता वो बाहर हो जाता. पूरे देश से 400 से ज्यादा पहलवान आएथे. सब उम्र, हाइट और एक्सपीरियंस में गामा से बहुत बड़े थे. एक से एक मुश्किल कसरतकरनी थी. नॉक-आउट राउंड थे. जो पहलवान वो कसरत या आसन ना कर पाता, बाहर हो जाता.आखिर में बचे टॉप 15. उन टॉप 15 में गामा भी था. जोधपुर के राजा गामा से बहुतइम्प्रेस हुए. 10 साल का बच्चा. इतने बड़े-बड़े पहलवानों के बीच आता है. और पूरेकम्पटीशन में छा जाता है. राजा ने गामा को विनर घोषित कर दिया. इस कम्पटीशन के बाददेशभर के लोग गामा के बारे में जानने लगे.--------------------------------------------------------------------------------तीन मुकाबले और रुस्तम-ए-हिन्द जोधपुर में अपनी ताकत दिखाने वाले कम्पटीशन के बाद गामा काफी समय तक अपनी ट्रेनिंगपर ध्यान देता रहा. जब वो 19 साल का था, उस वक़्त पहलवानी का 'रुस्तम-ए-हिन्द' था,पहलवान रहीमबख़्श सुल्तानीवाला. पंजाब के गुजरांवाला में रहने वाला कश्मीरी 'बट'.गामा से 2 फीट ज्यादा उसकी हाइट थी.बार-बार हाइट का ज़िक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कुश्ती या इस तरह के खेलों मेंहाइट ज्यादा होना फायदेमंद हो जाता है. खिलाड़ी को अपने विरोधी के ऊपर एक प्लस पॉइंटमिल जाता है.हां तो गामा की ट्रेनिंग दतिया में चल रही थी. उसने 'रुस्तम-ए-हिन्द' को चुनौती देडाली. रुस्तम-ए-हिन्द रहीम बक्श अब अपने करियर के एकदम आखिरी दौर में था. गामा उससेज्यादा जवान और चुस्त था. लेकिन रहीम के पास हाइट ज्यादा होने का एडवांटेज था. गामाऔर रहीम बक्श के बीच कुल 3 बार कुश्ती के मुकाबले हुए.Credit Facebookपहला मुकाबला: ऐतिहसिक मैचजब 19 साल की उम्र में गामा ने रहीम बक्श को चैलेंज किया था. लोगों को लगा था, गामापगला गया है. रहीम बक्श बहुत आसानी से गामा को हरा देगा. कुछ लोग कह रहे थे कि रहीमबक्श अब बूढ़ा हो चुका है. ये नया लड़का उसको आराम से हरा देगा. मुकाबला शुरू हुआ. एकके बाद एक दांव खेले जाने लगे. इधर पकड़, उधर पटक. कई घंटों तक मुकाबला चला. ना कोईजीत रहा था, ना कोई हार रहा था. कई घंटों बाद जब दोनों पहलवान लड़ते लड़ते चूर हो गए.इस मुकाबले को ड्रा करार दे दिया गया.गामा जीत तो नहीं पाया लेकिन रुस्तम-ए-हिन्द के साथ मुकाबला ड्रा करवाना भी कोईछोटी बात नहीं थी. रातों-रात वो स्टार बन गया. ये मुकाबला कुश्ती के इतिहास के कुछऐतिहासिक मुकाबलों में से एक था.दूसरा मुकाबलादूसरी बार गामा बहुत तैयारी के साथ आया था. अखाड़े में उतरते ही उसने एग्रेसिव दांवखेलने शुरू कर दिए. कुश्ती के दौरान गामा की नाक से खून बहने लगा. उसका एक कान भीकट गया. लेकिन इस बार वो सिर्फ जीतने आया था. और जीता भी. रुस्तम-ए-हिन्द रहीम गामासे हार गया.Credit: facebookआखिरी मुकाबला: रुस्तम-ए-हिन्दये मुकाबला था रुस्तम-ए-हिन्द के टाइटल का. साल था 1911. इलाहाबाद में घंटों तक चलाये मुकाबला. रहीम को अपना रुस्तम-ए-हिन्द का टाइटल बचाए रखना था. गामा को वो टाइटलजीतना था. उस वक़्त तक गामा पूरी दुनिया में एक बहुत बड़ा नाम बन चुका था. ऐसा पहलवानजो एक भी मुकाबला नहीं हारा था. मुकाबला शुरू हुआ. पिछली बार की तरह इस बार भी गामाबहुत एग्रेसिव था. जब उसने एक दांव चलते हुए रहीम को मिट्टी में पटक दिया. रहीम जोरजोर से चिल्लाने लगा. आयोजक अखाड़े में पहुंच गए. रहीम चिल्लाए जा रहा था कि उसकीपसली टूट गई है. वो हिल भी नहीं पा रहा था. डॉक्टर्स भी वहां मौजूद थे. उन्होंनेजांच की. पसली की कोई हड्डी नहीं टूटी थी. लेकिन रहीम से दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहाथा. इस वजह से अब उसके लिए लड़ पाना नामुमकिन था. ऐसे में गामा पहलवान को विनर मानलिया गया और उसको रुस्तम-ए-हिन्द का टाइटल मिल गया. इस मुकाबले में भी गामा ने अपना'कभी ना हारने का' रिकॉर्ड टूटने नहीं दिया.एक इंटरव्यू में गामा से पूछा गया था कि उसके लिए सबसे तगड़ा प्रतिद्वंदी कौन रहाथा. गामा ने रहीम बक्श का ज़िक्र किया. कहा, "हमारे खेल में अपने से बड़े और ज़्यादाक़ाबिल खिलाड़ी को गुरु माना जाता है. मैंने उन्हें दो बार हराया ज़रूर, पर दोनोंमुकाबलों के बाद उनके पैरों की धूल अपने माथे से लगाना नहीं भूला."--------------------------------------------------------------------------------वेस्टर्न रेसलिंग और 'जॉन बुल बेल्ट': जब गामा के डर से वर्ल्ड चैंपियन पहलवान कीफूंक सरक गई थी1898 से 1907 तक गामा पहलवान ने इंडिया के सारे पहलवानों को कम से कम एक बार तो हराही दिया था. अब वो लंदन जा कर वहां के पहलवानों को चैलेंज करना चाहता था. वेस्ट केपहलवानों से लड़ना चाहता था. इसलिए 1910 में अपने भाई के साथ गामा लंदन पहुंच गया.हैवी वेट चैंपियनशिप थी. लेकिन वहां जा कर एक मैटर फंस गया. कुश्ती में हिस्सा लेनेके कुछ नियम थे. जिनके हिसाब से गामा के हाइट और वेट हिस्सा लेने के लिए ज़रूरी हाइटऔर वेट से कम थे. गामा का इस बात पर दिमाग खराब हो गया. इतनी दूर वो इसलिए तो नहींआया था कि उसको कुश्ती लड़ने का मौका ही ना मिले.Credit: facebookउसने वेस्टर्न रेसलिंग के सभी पहलवानों को खुला चैलेंज दिया. कहा कि वो तीनपहलवानों से एक साथ कुश्ती लड़ेगा. और सिर्फ 30 मिनट में तीनों पहलवानों को रिंग सेबाहर फेंक देगा. चाहे वो पहलवान कित्ता भी भारी हो. वो तीनों को एक साथ हरा देगा.लंदन के पहलवानों ने गामा के चैलेंज को कोई भाव नहीं दिया. उसकी बात को सीरियसलीलिया ही नहीं. कोई गामा से कुश्ती का मुकाबला करने नहीं आया. फिर गामा ने उनपहलवानों को ललचाने की कोशिश की. कहा कि अगर लंदन का कोई भी पहलवान उसको हरा देगातो वो उस पहलवान को ईनाम वाले 5 पाउंड खुद अपनी जेब से देगा. और चुपचाप इंडिया वापसचला जाएगा. अभी भी कोई उससे कुश्ती करने के लिए तैयार नहीं हुआ.तब गामा ने सोचा ऐसे हवा में बोल देने से कुछ नहीं होगा. उसने उस वक़्त के सबसे बड़ेपहलवानों स्टेनिस्लास जबिस्को और फ्रेंक गॉच का नाम लेकर उनको चैलेंज किया. लेकिनसबसे पहले उसके चैलेंज को एक्सेप्ट किया अमेरिका के बेंजामिन रोलर ने. मुकाबला शुरूहुआ. अभी सिर्फ 1 मिनट 40 सेकंड हुए थे. रोलर चारों खाने चित्त पड़ा था. करीब 9 मिनटऔर 10 सेकंड ये मुकाबला चला. आखिर में गामा ने रोलर को दे पटका. और मुकाबला जीतलिया. फिर अगले दिन गामा ने कुल 12 पहलवानों को हरा दिया. अब तो वेस्टर्न रेसलरटूर्नामेंट के लोग हाथ जोड़ कर उसको अपने टूर्नामेंट में बुला रहे थे. उस 'अपवाद सेपहलवान' ने दो दिनों में 15 पहलवानों को हरा कर टूर्नामेंट में अपनी जगह बना ली थी.Credit: youtubeफिर स्टेनिस्लास जबिस्को ने गामा का चैलेंज एक्सेप्ट कर लिया. ये बहुत बड़ा मुकाबलाहोने वाला था. ना तो लंदन के लोगों ने, ना ही वहां के पहलवानों ने ऐसा ढीठ इंडियनपहलवान पहले कभी देखा था. मुकाबले की तारीख निकली 10 सितंबर 1910. इस मुकाबले केवज़न को देखते हुए इनाम भी बढ़ा दिया गया. अब जीतने वाले को 250 पाउंड्स के साथ 'जॉनबुल बेल्ट' भी मिलने वाली थी. ये बेल्ट मिलने का मतलब था वर्ल्ड चैंपियन बन जाना.मैच शुरू हुआ. जबिस्को का वज़न बहुत ज्यादा था. लेकिन सिर्फ एक मिनट में गामा नेजबिस्को को उठा कर ऐसे नीचे पटक दिया कि वो बहुत देर तक उठ ही नहीं पाया. बहुत देरतक जब वो नहीं उठा, मैच को ड्रा मान लिया गया.Facebook मुकाबले से पहले गामा पहलवान और जबिस्कोलेकिन बेल्ट किसी को तो मिलनी ही थी. इसलिए मुकाबला फिर से होना था. अगला मैच ठीकएक हफ्ते बाद होना था. 17 सितम्बर 1910 को गामा जब अखाड़े में मैच के लिए पहुंचा तोदेखा जबिस्को आया ही नहीं. गामा से हारने की सोच कर ही उसको बेईज्ज़ती लग रही होगी.और पिछले मुकाबले के बेहोश होकर वो ये तो समझ गया होगा कि जीतना इम्पॉसिबल है. बहुतदेर तक जब जबिस्को नहीं आया. गामा को विनर मान लिया गया. उसको 'जॉन बुल बेल्ट' मिलगई. अब गामा 'रुस्तम-ए-जमाना' बन गया था. मतलब वर्ल्ड चैंपियन.--------------------------------------------------------------------------------गामा पहलवान और मैथिलीशरण गुप्त की तिजोरीमैथिलीशरण गुप्त की ससुराल दतिया में थी. और गामा दतिया में रहता था. 1901-02 मेंभयंकर प्लेग फ़ैल गया था. उस वक़्त तक मैथिलीशरण गुप्त अपने परिवार के साथ झांसी केपास चिरगांव में रहते थे. जब प्लेग उनके आस पास के इलाकों में फैलने लगा. पूरागुप्त परिवार सारा सामान बैलगाड़ी में लादकर दतिया चला आया. उनके साथ लोहे की एकतिजोरी थी. बहुत भारी. 8 लोगों ने मिलकर वो तिजोरी बैलगाड़ी पर लदवाई थी. किसी तरहवो लोग दतिया पहुंचे. मैथिलीशरण गुप्त की ससुराल में गामा पहलवान का आना जाना था.जिस वक़्त बैलगाड़ियां पहुंचीं, गामा वहीँ था. तिजोरी उतारने के लिए कई लोग आगे आए.लेकिन उस भारी तिजोरी को गामा ने अकेले ही उठाकर जगह पर रख दिया. जैसे वो कोईकार्डबोर्ड का डब्बा हो. जो आदमी 300 किलो के पहलवानों को उठा कर पटक देता हो, उसकेलिए तिजोरी उठाना कौन बड़ी बात रही होगी.--------------------------------------------------------------------------------पूरे पचास साल तक कुश्ती लड़ने के बाद 1952 में गामा पहलवान उर्फ़ गुलाम मोहम्मद नेइस खेल से संन्यास ले लिया. इसके बाद उसने किसी को चैलेंज नहीं किया. 1947 मेंइंडिया-पाकिस्तान बंटवारे के वक़्त गामा पहलवान पाकिस्तान चला गया.लेकिन आखिरी के दिन बहुत मुश्किल में बिताए. रावी नदी के किनारे एक झोपड़ी बना कररहना पड़ा. एक के बाद एक बीमारियां होने लगीं. इलाज के लिए अपने सोने और चांदी कीट्रॉफियां बेचनी पड़ीं.Credit: Facebookऐसा कहा जाता है कि जब भारत सरकार को ये बात पता चली थी. सरकार गामा के इलाज औररहने के लिए पैसे भेजने के लिए तैयार थी. पटियाला के राजा और बिड़ला ग्रुप ने भीगामा की मदद करने के लिए पैसे भेजने की बात कही थी. लेकिन तब तक गामा की हालत बहुतबिगड़ गई थी.22 मई 1960 को गरीबी और बीमारी से जूझते गामा पहलवान उर्फ़ गुलाम मोहम्मद वल्दमोहम्मद अजीज बक्श की लाहौर में मौत हो गयी.https://www.youtube.com/watch?v=9UX1Z13_c8Aछोटी-छोटी मगर मोटी बातेंगामा पहलवान का ट्रेनिंग रूटीन अपने आप में एक रीसर्च का टॉपिक है. ब्रूस ली गामाका बहुत बड़ा फैन था. उसने गामा के ट्रेनिंग रूटीन के हिसाब से अपना खुद का रूटीनबनाया था. गामा ने ब्रूस ली को दंड बैठक और योग के कुछ आसन सिखाए थे. जिनको ब्रूसली ने ज़िन्दगी भर फॉलो किया.यहां हमने एक हफ्ते जिम में 8-8 किलो वज़न उठा लिए और हमारी पीठ अकड़ गई. गामा पहलवानजब दंड लगाया करता था, अपने गले में एक वेट डिस्क डाल कर करता था. उस वेट डिस्क कावज़न 95 किलो है. और ये डिस्क पहन कर वो 5000 दंड बैठक करता था.1902 में गामा पहलवान किसी कुश्ती के लिए वड़ोदरा गया था. वहां उसने एक पत्थर उठायाऔर लोग शॉक रह गये. क्यों? क्योंकि उस पत्थर का वज़न 1200 किलो से भी ज्यादा था.किसी मशीन ने नहीं, बल्कि एक हाड़-मांस के आदमी ने उसको उठा लिया था. अब वो पत्थरवड़ोदरा के म्यूजियम में रखा हुआ है. उस पत्थर पर खुदा है, 'ये पत्थर 23 दिसम्बर1902 के दिन गुलाम मोहम्मद ने उठाया था.'गामा की परपोती हैं कुलसुम शरीफ. जो पाकिस्तान के बारहवें प्रधानमंत्री नवाज शरीफकी पत्नी हैं. गामा पहलवान के कैरेक्टर पर एक वीडिओ गेम कैरेक्टर बना है. दारुन मिस्टर.जो Street Fighter EX वीडिओ गेम की सीरीज में आता है. वो भी गामा की तरह बहुत हीताकतवर है. दारुन मिस्टरपरमीत सेठी जॉन अब्राहम को ले कर गामा पहलवान पर एक बायोपिक बना रहे थे. लेकिनफिलहाल इस फिल्म का काम रुका पड़ा है.