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ये बिलैती कांवड़िये भला क्या समझें हमारे शिव जी को!

कौन है शिव-भरोसे, जानते हो?

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26 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 26 जुलाई 2017, 09:27 PM IST)
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अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता. लोक में खास दिलचस्पी, जो आपको यहां दिखेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे रू-ब-रू होते हैं. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश है इसकी आठवीं किस्त:




रूप, गुन और चाल-चलन देखकर नाम रख देने का आसान सा तरीका है देहात में. ये नाम रखना कभी-कभी किसी विचित्रता को लेकर भी होता है. किसी का अलग नाम है, तो भी चलता ये दूसरा वाला नाम ही है. तद्भव की दुनिया है, तो तद्भव ही चलेगा. हां तो सुनिए, शिव के भरोसे रहने में खुद को निछावर कर देने वाले एक इंसान का नाम लोगों ने धर दिया था, शिवभरोसे. इन्हें जन्म से लेकर मृत्यु तक शिव का ही आसरा था. पैदा हुए तो माई-बप्पा ने शिव की मानता मानी थी. दंपति बिना संतान के था. शिव के भरोसे सन्तान मिली. आगे की ज़िन्दगी उन्हीं के नाम. मृत्यु पर्यन्त. शिवभरोसे.

'पर साल करेंगे कांवड़ व्रत'

शिवभरोसे अपनी शिवभक्ति के लिए पूरे गांव में चर्चित थे. कठिन कांवड़ व्रत रखने वाले. हर साल नियमित रूप से. फिर अचानक उन्होंने अपने कांवड़ व्रत को अनिश्चित समय के लिए टाल सा दिया. कारण पूछने पर शान्त रहते. उदासीन से होकर कहते, करेंगे-करेंगे, पर साल करेंगे. शिव के प्रति उनकी आस्था में कमी तो नहीं आई थी. फिर? मैंने अनुमान लगाया कि कुछ तो उम्र की वजह से और कुछ नए दस्तूर के चलते, शिवभरोसे अब कांवड़िये का काम नहीं करते. कई साल तक उनका ‘पर साल’ नहीं आया. फिर अचानक एक दिन खबर मिली कि शिवभरोसे शिवलोक-वासी हो गए.
शिव भक्ति के क्षेत्र में नए-नए कांवड़ियों के आने से वे असहज थे. इसका पर्याप्त संकेत उन्होंने बातचीत के दौरान दिया था. एक बार बातचीत में मैंने उनसे पूछा था, 'अब तो कांवड़िये बहुत अधिक हो गए हैं, शिव भक्त तो काफी बढ़ रहे हैं?' इसके जवाब में वे थोड़ा गुस्साते हुए बोले थे, 'शिव भक्त? ई ससुरे शिव भक्त हैं? लंपट हैं लंपट. ई सब बिलैती (विलायती) कांवड़िया हैं. ई का जानें, का मतलब है शंकर भगवान का? ई सब रंगरूट हैं.'
आप सोच रहे होंगे कि यह बिलैती यानी विलायती कांवड़िया क्या होता है? लेकिन गांव वाला सहज ही समझ सकेगा. गांव में कोई देसी कुत्ते की जगह दूसरी नस्ल का कुत्ता रखता तो कहा जाता कि फलाने तो बिलायती कुत्ता पाले हैं. यहां तक कि एक इमली-नुमा फल वाला पेड़ भी था जिसे कहा जाता कि बिलैती इमली का पेड़ है. बिलैती का मतलब होता, विदेशी. विलायत का. भारत का, यानी अपने यहां का नहीं. मोटे तौर पर वह जो देसी नहीं है. वह जिसमें स्व-भाव का अभाव है. पर-भाव का प्रभाव है.
इन नए कांवड़ियों, शिव भक्तों के लक्षणों को बताने के लिए इससे बेहतर क्या विशेषण होता! शिवभरोसे के मत से इन नए शिवभक्तों में वह मूलभावना थी ही नहीं जो शिवभक्ति के लिए जरूरी होती है. उनका कहना सही भी था. गांव-जंवार के अधिकांश लंपट नई सदी की शुरुआत में शिवभक्त में ‘कन्वर्ट’ हो गए थे. ये वही थे जो नवरात्रि के पहले सड़कों पर वाहनों को रोककर चंदा वसूलते, पर्ची काटते. रात में दारू पीते. दाहिने हाथ की कलाई में कलावे का मोटा बंधन और उस पर चुल्ला. ये इक्कीसवीं सदी के भक्त थे. राममंदिर-बाबरी मस्जिद ढांचा-ध्वंस वाले समय के भक्तों से भी अलग.

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ये भक्त सियासी खुराक के आदी हैं

ये भक्त चुनावों के समय अपने-अपने देवताओं के लिए सक्रिय हो जाते थे. जी जान लगा देते. सियासी आकाओं को ऐसे भक्तों की जरूरत थी. ऐसे भक्तों की फौज बनती जा रही थी. आज भी सिलसिला जारी है. यह फौज अब कई गुना बढ़ी हुई है. ये ज्यादातर बेरोजगार हैं. काम के अवसरों से वंचित. दिग्भ्रमित. सियासी खुराक के आदी. इस्तेमाल होने के लिए तैयार.
राजनीति और बाजार की जुगलबंदी ने भक्ति का स्वरूप भी बदला है. ये भक्त इस जुगलबंदी की पैदावार हैं. इनके कपड़े देखें. हावभाव देखें. बाजार के चिह्र साफ दिखेंगे. बाजार की जरूरतें दिखेंगी. बाजार के दुष्प्रभाव दिखेंगे. इनके गाने सुनें, देसी और शैव संस्कारों से दूर तक इनका कोई वास्ता नहीं.
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ये गाने फिल्मी गानों की भौड़ी नकल पर बनाए हुए, डीजे पर टिकाए हुए, फ्यूजन-फ्यूजन-कनफ्यूजन! इनकी कानफोड़ू नुमाइशी यात्रा भय पैदा करने वाली. इन गानों की पक्तियों को सोचें और भक्ति की गंभीरता पर भी विचार करें. इन समूहों के लिए भक्ति का क्या मतलब है, सहज ही समझ जाएंगे.
ये कांवड़िये वाकई शिवभक्ति के बिलैती संस्करण हैं. सही कहा था शिवभरोसे ने. शिव के स्वरूप से कहीं भी मेल न खाने वाली यह शिवभक्ति. इन्हें शिव को समझना ही नहीं है. इन्हें शिव को सिर्फ कवच की तरह अपने काम में लाना है. ये शिव के नाम से अपने अ-शिव को छुपाना चाहते हैं. खुद के लिए औचित्य ढूंढते हैं. इनके साथ-साथ सारी अमंगलकारी शक्तियां अपना औचित्य ढूंढती हैं. ये शक्तियां चाहे सियासी हों चाहे बाजार की. लेकिन शिव का चरित्र इसकी खिलाफत करता है. हमें इन कांवड़ियों की व्यर्थता दिखाने के लिए शिव के चरित्र की मौलिकता स्पष्ट करनी चाहिए.
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आज पर दबाव न डालो

शिव को अपने कारनामों में कहीं भी औचित्य ढूंढने की ज़रूरत नहीं रही. वे अपनी सहजता में सटीक और सुचिंतित रहे. क्योंकि कामों में विकार तब आता है जब पहले की या बाद की क्रियाओं का दबाव वर्तमान पर डाला जाता है. खुद के लिए औचित्य, कवच, ढूंढने वालों को इस दिशा में ज़रूर सोचना चाहिए. ‘राम, कृष्ण, शिव’ नाम के एक लंबे आलेख में विचारक और समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने लिखा है,
“जीवन कारण और कार्य की ऐसी लंबी शृंखला है कि देवता और मनुष्य दोनों को अपने कामों का औचित्य दूर तक जा कर ढूंढना होता है. यह एक खतरनाक बात है. अनुचित कामों को ठीक ठहराने के लिए चतुराई से भरे, खीझ पैदा करने वाले तर्क पेश किए जाते हैं. इस तरह झूठ को सच, गुलामी को आजादी और हत्या को जीवन करार दिया जाता है. इस तरह के दुष्टतापूर्ण तर्कों का एकमात्र इलाज है, शिव का विचार. क्योंकि वह तात्कालिकता के सिद्धान्त का प्रतीक है. उनका (यानी शिव का) हर काम स्वयं में तात्कालिक औचित्य से भरा होता है और उसके लिए किसी पहले या बाद के काम को देखने की जरूरत नहीं होती.”
डॉ. लोहिया
डॉ. लोहिया

शिव धूर्त चालों से अलग हैं

जिस वस्तु से शिव का मौलिक विरोध है, बिलैती कांवड़िये उसी शिवत्व पर प्रहार कर रहे हैं. विडंबना यह कि वो शिवभक्त होकर यह करते हैं. शिव राजनीति की धूर्त चालों से अलग हैं. वजह यह नहीं कि वे शक्तिहीन हैं. बल्कि यह कि राजनीति की धूर्तता उनके लिए महत्वहीन है. वे इसकी सीमा जानते हैं. लोकोपकार का प्रश्न होगा तो राजनीतिक चालाकियां काम नहीं आएंगी. ये निस्सार हैं.
समुद्र-मंथन हुआ तब अमृत-पान के वक्त चालाकियां और धूर्तताएं उल्लसित हैं लेकिन विष-पान के समय उनकी सीमा सामने आ जाती है. इस मौके पर शिव को ही आना होता है. दुनिया को बचाने और चलाने में विषपान की बड़ी भूमिका है. विषपान है क्या? त्याग, बलिदान, अपमान सहकर भी साधना में लगे रहना, सबका और जो बुरा करे उसका भी शिव (भला) चाहना, प्रतिक्रिया वादी न होना, सहिष्णु होना आदि. इनका औचित्य स्वतः प्रमाणित है. इनसे पूरी सृष्टि में किसी को कोई समस्या नहीं. इन्हें पहले और बाद के किसी कार्य-कारण से नहीं जुड़ना. बल्कि तात्कालिकता से जुड़ना है. यही शिव-कर्म है. क्या कावड़ियों को है इसकी ज़रा सी भी भनक?
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घनघोर प्राकृतिक देव हैं शिव

शिव के आर्य-अनार्य वाली बहस में फिलहाल नहीं जाना चाहता हूं. लेकिन शिव घनघोर प्राकृतिक देव हैं, यह जरूर कहूंगा. अप्राकृतिकता से दूरी बनाने के लिए ही तो कहीं शिव कैलाश-पति नहीं हुए! मौजूदा दौर में पूंजीवादी विकास ने, बाजार ने, जो सांस्कृतिक चाल पकड़ी है, शिवत्व उसका विरोधी है. वह शिवसाधना सर्वोत्तम है जिसमें बाजारी वस्तु है ही नहीं. शिव-परिवेश मानवेतर जीवों से भरा है. यहां विरोधी जीवों और चीजों का नैसर्गिक सामंजस्य है. यहां प्राकृतिक बहुलता है. नई सांस्कृतिक चाल एकरूपता और वर्चस्व की अंधी दौड़ है. इस दौड़ में राजनीति और बाजार ने, भक्ति और धर्मभावना को अपने हित में साधा है. कांवड़िये जिन्हें सियासत और बाजार से बचना था, वे इनके हाथों बिके से दिखते हैं.
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पहचानो शिवभरोसे को

पिछली कई बार की तरह इस बार भी कांवड़ियों के रेले को देखिएगा. उसमें किसी शिवभरोसे को पहचानने की कोशिश कीजिएगा. पता चलेगा कि आपको पूंजी-भरोसे मिल रहे हैं. बाजार-भरोसे मिल रहे हैं. राजनीति-भरोसे मिल रहे हैं. स्वार्थ-भरोसे मिल रहे हैं. अधर्म-भरोसे मिल रहे हैं. दंगा-भरोसे मिल रहे हैं. बेरोजगारी-भरोसे मिल रहे हैं. लेकिन दूर-दूर तक शिव-भरोसे नहीं दिख रहे हैं. उनकी बिरादरी के कोई दूसरे भी नहीं दिख रहे हैं. शिवभरोसे बीते दिनों के सच हैं. उनके कंठ से बारम्बार सुनाई देने वाली तुलसी की पंक्तियां इन दिनों का सच हैं, काशी को एक बड़े रूपक की तरह रखते हुए :
गौरीनाथ, भोरानाथ, भवत भवानीनाथ विश्वनाथपुर फिरी आनि कलिकाल की!


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