अंकित त्रिपाठीअंकितवा लल्लनटॉप का फायरब्रांड लौंडा है. बकैती के तीर्थस्थल कानपुर से आता है.कहिता है कि RSS के स्कूल से पढ़ा है, जिसके हिसाब से उम्र 24 है, लेकिन असल में 25है. IIT से बीटेक किया है. मार्क्स धर्म को अफीम कह गए थे, अंकितवा गांजा कहता है.जब मूड भन्नाता है तो वेबसाइटों के पेज पर जाकर कमेंट दाग देता है.रेज्यूम जीवन में सिर्फ एक बार बनाया, क्योंकि ये बनावटी काम लगता है. वनलाइनर ऐसेमारता है कि बड़के मठाधीश भी जल-भुन जाएं. इस बार किस्सा है कानपुर के टैम्पो का.-------------------------------------------------------------------------------- आज ही सुबह दिल्ली से ‘आज तक साहित्य’ अटेंड करके कानपुर लौटे. वही अपनी श्रमशक्तिसे. ऑटो और रिक्शे वालों को हाथ से ही मना करते हुए घंटाघर चौराहे तक आये. स्मॉगकाफी हो गया है यार कानपुर में भी. कोई सर्दी नहीं फिर भी धुंध छायी हुयी थी. सफ़ेदवाली नहीं काली वाली. सब्जी-पूड़ी, छोला-चावल और जूस वगैरह वाले सभी ठेले बोहनी केइंतज़ार में दुकान सजा रहे थे. हम चुपचाप सड़क पार करके मंजुश्री टॉकीज के सामने वालीरोड पे आ गये जहां टैम्पो वाले हाथों से इशारे करते हुए चिल्ला रहे थे- जरीबचौकी,विजयनगर, फज़लगंज.टैम्पो वाले यहां पर घसीट के आपको पीछे की ओर खड़ी अपनी कम भरी टैम्पो में घुसेड़नेकी कोशिश करते हैं. लेकिन हम भी एक्सपीरियंस्ड हैं गुरु, उन सबको इग्नोर करते हुएआगे वाली भरी टैम्पो में बैठ गये. टैम्पो में पांच-छः लोग पहले से ही बैठे थे.हमारी वाली सीट पे हमें मिलाकर तीन लोग बैठे थे और सामने वाली पे भी तीन ही थे. फरकइतना था केवल कि हमारी वाली सीट पे थोड़े दुबले-पतले और नार्मल साइज़ के आदमी थे औरसामने वाली पे थोड़े खाते पीते घरों के लोग थे. एक जरूर थोड़ा सा मीडियम साइज़ का थालेकिन दो तो कतई छइले हुए थे. एकदम मुस्टंडे. कौन ज्यादा फूला हुआ था, ये फैसलाकरने में जोर आ सकता था. जगह की तंगी के चलते उनकी जांघ से जांघ सटी हुयीं थीं औरउनकी पैंटों में इतना ज्यादा तनाव था कि छू भर लेते तो शायद चिर जातीं.जल्द ही एक आदमी और आया और उसने सामने वाली सीट का वीभत्स नज़ारा देखकर हमारी वालीसीट पे ही बैठना मुनासिब समझा. हमारी वाली सीट पर चार आदमियों का कोटा पूरा हो गया.आगे ड्राइवर के बगल में दो-तीन पहले ही चढ़ चुके थे. केवल एक व्यक्ति ही बचा थाटैम्पो फुल होने में लेकिन शायद ड्राइवर ने सुबह का वक़्त देखते हुए टैम्पो बढ़ा दी.सुबह का वक़्त था नहीं तो आगे बढ़ाने के लिए लकड़ी के मोटे-मोटे डंडे भी मारे जाते हैंटैम्पो के पीछे.दो दिन में कानपुर बिलकुल भी नहीं बदला था. वही आबो-हवा, वही हिचकोले भरती हरी-हरीटैम्पुयें. टैम्पो में गाना भी बज रहा था- ‘मुबारक हो तुमको ये शादी तुम्हारी’. अगलबगल और सामने बैठे लोगों में एक दो को छोड़कर सभी गुटका चबा रहे थे. कहने का मतलब हैकि बिलकुल कनपुरिया फीलिंग आ रही थी. चन्द्रिका देवी चौराहे के थोड़ा पहले ही एकआदमी खड़ा था टैम्पो के इंतज़ार में. ड्राइवर ने उसको देख के गाड़ी रोकी. पहले तो उसआदमी ने बैठना चाहा लेकिन एक तरफ चार और दूसरी तरफ तीन ठसे हुए लोगों को देखकर उसनेअपना इरादा बदल दिया. टैम्पो का हत्था छोड़ दिया. ड्राइवर बोला, ‘जल्दी बइठो यार.’आदमी - ‘नहीं बइठेंगे.’ ड्राइवर - ‘क्या हो गया?’ आदमी - ‘अरे नहीं बइठेंगे. बस’ड्राइवर - ‘बताओगे? हुआ क्या?’ आदमी - ‘जगह कहां है?’ ड्राइवर - ‘पीछे वाली सीट पेतीन ही लोग तो हैं.’ आदमी - ‘रहिन दो.’ ड्राइवर सवारी छोड़ना नहीं चाहता था. उसकीनज़र में टैम्पो में एक आदमी की जगह और थी. इसलिए वो गाड़ी से उतर आया और तीनों सेसरकने का इशारा किया और आदमी से फिर से कहा, ‘चलो अब बइठो, करा दी जगह.’आदमी ने झांककर देखा तो जरा सा तिकोना स्पेस क्रिएट हुआ था. मुश्किल से चार-पांचइंच की जगह. वो भी केवल आगे की ओर. दरअसल आगे से पैर थोड़े और सटा लिए गये थे लेकिनपीछे कमर कहां ले जाते? आदमी हालांकि दुबला था लेकिन था तो भरा-पूरा आदमी ही.चार-पांच इंच में कैसे फिट हो जाता? बोला, ‘रहिन दो.’ ड्राइवर - ‘अमा बइठो यार, अभीजरीबचौकी पे खाली हो जाएगी.’ आदमी - ‘कहि रहे हैं न, रहिन दो.’ ड्राइवर और आदमीदोनों गुटका भरे थे मुँह में. कोई बाहरी होता तो उसे समझ में न आता कि दोनोंक्या-क्या कह रहे हैं. लेकिन कनपुरिया होने के नाते ऐसी भाषा समझने में हमारीएक्सपर्टी है. उन दो मुस्टंडों को छोड़कर बाकी सबको मजा आ रहा था. अगल-बगल एक दूसरेको देखकर मुस्की भी ढील रहे थे. इसी बीच ड्राइवर ने आदमी का हाथ पकड़ लिया और घसीटतेहुए कहा, ‘अरे घुसो, आ जाओगे.’हमने लगा कि कहीं ये आदमी ड्राइवर पर गुटके के पीक से प्रहार कर न दे लेकिन ऐसानहीं हुआ. आदमी शरीर में ड्राइवर के लेवल से थोड़ा डाउन था, इसलिए उसने सिर्फ हाथझटककर ही गुस्सा दिखाया और कहा, ‘जबरजस्ती है क्या? जब कहि रहे हैं रहिन दो तो काहेहाथ पकड़ रहे हो?’ ड्राइवर - ‘चार आते हैं एक सीट पे.’ आदमी - ‘तो हम का करें बे?’ड्राइवर - ‘तुम करो कुछ न, बस घुस जाओ अन्दर.’ आदमी - ‘तुम अगर पूरी कमर पीछे धरकेबइठ के दिखा दो तो बइठ जायेंगे हम.’ ड्राइवर - ‘अबे हम तगड़े हैं न, लेकिन तुम फिटहो जाओगे.’ आदमी - ‘हम खुदी तगड़े हैं.’ ड्राइवर और आदमी की ये मूंहाचाही देखकर आसपास थोड़ी भीढ़ भी जमा हो गयी. मामले को बढ़ता देखकर सामने दो मोटे लोगों में से एक नेड्राइवर से कहा, ‘टैम्पो बढ़ाओ यार, हम डबल किराया दे देंगे.’ये सुनकर ड्राइवर ने झगड़ा छोड़के चुपचाप टैम्पो बढ़ा दी. अभी तक जिसका मजाक उड़ रहाथा, उस मोटे व्यक्ति के प्रति लोगों के मन में थोड़ी सांत्वना की भावना भर आयी. पूरेवाकये को देखकर यही दिमाग में आया.“देस मेरा रंगरेज ये बाबू, घाट-घाट यहाँ घटता जादू.”वैसे अगर ऊपर वाली इक्वेशन में ‘देस’ की जगह ‘कानपुर’ भी कर दो, तो भी बात एक्कैहै.