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आज़ादी के बाद लोग वोटर पहले बने और नागरिक बाद में

1951 के चुनाव जब नेहरू दो बैलों की जोड़ी के लिए वोट मांग रहे थे

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भारत में 1952 का आम चुनाव दुनियाभर में लोकतंत्र के इतिहास के लिये मील का पत्थर बना. (तस्वीर: भारत सरकार)
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कमल
25 अक्तूबर 2021 (अपडेटेड: 25 अक्तूबर 2021, 06:26 AM IST)
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भारतीय कौन है? तीन शब्दों के इस सवाल की आंसर कॉपी जांचने लग जाएं तो शायद एक भी नक़ल न पकड़ी जाए. ‘अपना अपना मत है’ वाले तर्क को अवॉइड करते हुए अपन चलेंगे विज्ञान की तरफ़. हालांकि वो दिन गए कि विज्ञान नॉन कोंट्रोवर्शियल हुआ करता था. लेकिन अपनी तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद सही डिसिजन के लिए अपना थर्ड अंपायर तो यही है. और इस थर्ड अंपायर के हिसाब से पहला मनुष्य अफ़्रीका के जंगलों में पेड़ों से नीचे उतरा और सवाना के मैदानों में दौड़ लगाने लगा.
तो अगर भारत के ‘ओरिज़िनल निवासी’ वाला तर्क दिया जाए तो लॉजिक के हिसाब से हम में से कोई भी 'ओरिजिनल भारतीय' नहीं है. बहुत सम्भावना है कि भारत की गलियों में घूमते किसी चुन्नू मुन्नू के पर, पर.. परदादा यूरोप से हों और पर, पर.. परदादी अफ़ग़ानिस्तान से.
ध्यान दें, यहां तर्क ये नहीं दिया जा रहा है कि हर कोई भारतीय है. या हर लोकल ग्लोबल हो चुका है. बात बस इतनी है कि ‘भारतीय कौन’ का जवाब कौन, कहां पैदा हुआ से नहीं मिल सकता. और बेसिक सवाल से शुरू करते हैं  भारत आज़ाद कब हुआ? 15 अगस्त, 1947 को.
भारत गणतंत्र कब बना? 26 जनवरी 1950 को.
दोनों जवाब पर फ़ुल नम्बर. अब अगला सवाल, भारत लोकतंत्र कब बना?
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25 अक्टूबर, 1951 को पहला वोट हिमाचल प्रदेश की चिनी तहसील में पड़ा (सांकेतिक तस्वीर)

अब उत्तर कॉम्प्लिकेटेड है. क्योंकि लोकतंत्र अंग्रेजों से तो मिला नहीं. अंग्रेज लोकतांत्रिक होते तो फिर बात ही क्या थी. इसलिए 15 अगस्त 1947 वाला ऑप्शन तो सीधे कैंसिल हो जाता है. तो फिर ज़रूर 26 जनवरी को बना होगा. दो ही तो दिन हैं जब छुट्टी की गॉरन्टी है. गांधी जयंती भी छुट्टी का दिन है, लेकिन वो कब तक रहेगी. इसकी गॉरन्टी शायद ही कोई दे पाए.
बहरहाल गूग़ल में रिपब्लिक vs डिमॉक्रेसी सर्च करिए तो समझ जाएंगे कि गणतंत्र बनने और लोकतंत्र बनने में क्या अंतर है. 26 जनवरी को घोषणा तो हो गई लेकिन सिर्फ़ थियोरी में. प्रैक्टिकल का इग्ज़ाम अभी बाकी था. इसलिए 1950 वाला ऑप्शन ग़लत नहीं तो कम से कम अधूरा ज़रूर है. लेकिन इस MCQ में चॉइस तो दो ही थी. फिर?
दरअसल ये सवाल अब्जेक्टिव सेक्शन का है ही नहीं. गोला भरने से काम नहीं चलेगा. पूरा पैरा लिखना पड़ेगा. और उस पर भी कितने मार्क्स मिलेंगे, ये कॉपी चेक करने वाले की मर्जी पर निर्भर करता है. अपनी कॉपी चेक करने को पाठक लोग हैं. तो देखिए अपन कितना पेज भर पाते हैं. इस सवाल के उत्तर के लिए 1947 से पहले जाना होगा. क्योंकि आज़ादी का मतलब सिर्फ़ चुनाव में वोट देना नहीं है. ना ही सिर्फ़ नियम-क़ानून. ऐसा होता तो ये सब तो 1947 से पहले भी था. 1947 से पहले 1920 में भारत में पहले चुनाव हुए. गांधी बोले बॉयकाट करना है. नेताओं ने उन्हें ही बॉयकाट कर दिया. बहुत से भारतीय सेंट्रल लेजिस्लेटिव अस्सेंबली का हिस्सा बने. चुनाव तो हुए थे लेकिन आम हिंदुस्तानी के लिए नहीं. सिर्फ़ जागीरदारों, ज़मीन के मालिकों या इनकम टैक्स भरने वालों के लिए. 1937 और 1946 में भी चुनाव करवाए गए. लेकिन थोड़े अंतर के साथ कमोबेश हाल वही रहा. एक चौथाई से भी कम जनता को वोट का अधिकार हुआ करता था.
फिर आई आज़ादी. जिसके आने से भारत के भविष्य का पहला सवाल सॉल्व हो चुका था. और बाकी सॉल्व किए जाने का इंतज़ार कर रहे थे. क्या थे ये सवाल? यही कि सरकार कैसे बनेगी, सत्ता का बंटवारा कैसा होगा, इट्सेटरा इट्सेटरा.
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तब मतपत्र पर नाम और चिन्ह नहीं हुआ करते थे, हर पार्टी के लिए अलग मतपेटी थी, जिन पर चुनाव चिन्ह अंकित कर दिए गए थे (तस्वीर: PTI)

इन सवालों की कुंजी थी संविधान. जो ये तय करता कि हमारा गणतंत्र और हमारा लोकतंत्र कैसा होगा. गणतंत्र की ड्राफ़्टिंग के लिए संविधान सभा तैयार थी. लेकिन भारत को सिर्फ़ गणतंत्र ही नहीं लोकतंत्र भी होना था. और उसके लिए ज़रूरी था जल्द से जल्द चुनाव करवाना. हालांकि सिर्फ़ चुनाव हो जाने से आप लोकतंत्र नहीं हो जाते. लेकिन ये भी सच है कि चुनाव लोकतंत्र की आवश्यक शर्त हैं. यहां एक बात नोट करिए कि लोकतंत्र होने के लिए चुनाव सिर्फ़ आवश्यक शर्त हैं, पर्याप्त नहीं.
वैसे ही जैसे लौटरी जीतने के लिए लौटरी ख़रीदना आवश्यक है लेकिन पर्याप्त नहीं. उसी तरह लोकतंत्र होने के लिए ये भी ज़रूरी हैं कि सभी लोगों के अधिकारों की रक्षा हो. और जानने के इच्छुक हैं तो एक और गूगल कर लिजिए, इलेक्टोरल डिमॉक्रेसी vs कम्प्लीट डिमॉक्रेसी. यूनिवर्सल फ़्रैंचाइज़ चुनाव 1950 में गणतंत्र की स्थापना के बाद होने थे. लेकिन तैयारी पहले से चाहिए थी. और उसके लिए एक सवाल का उत्तर देना ज़रूरी था. वोट देने का अधिकार किसे होगा? संविधान सभा ने इस सवाल का जवाब 15 अगस्त से पहले ही खोज़ लिया था. और वो जवाब था, ‘यूनिवर्सल फ़्रैंचाइज़’.
अब ये क्या होता है.
आपने बर्गर किंग और मैकडॉनल्ड की फ़्रैंचाइज़ का नाम सुना होगा. हिंदी में इस शब्द का मतलब है विशेषाधिकार. यानी चुन्नू ने मैकडॉनल्ड की फ़्रैंचाइज़ ले ली तो अब उसे मैक आलू-टिक्की बेचने का विशेषाधिकार मिल गया है. फ़्रैंचाइज़ के साथ यूनिवर्सल जुड़ गया तो हो गया सार्वभौमिक विशेषाधिकार. यानी जिसकी मर्ज़ी वो मैक आलू-टिक्की बेचे. चुनाव के संदर्भ में यूनिवर्सल फ़्रैंचाइज़ का अर्थ हुआ कि हम सभी को मत यानी वोट देने का विशेषाधिकार मिला हुआ है.
लेकिन अगर सभी को अधिकार मिला हो तो ये विशेषाधिकार कैसे हुआ?
हुआ ऐसे कि पहले तो वोट देने के लिए आपको भारत का नागरिक होना ज़रूरी है. दूसरा अधिकार मिल रहा है तो कोई देने वाला भी होगा. मैकडॉनल्ड के केस में अधिकार कम्पनी का मालिक देता है. और चुनाव के केस में एक देश के तौर पर हम सब मिलकर भारत के नागरिक को ये अधिकार देते हैं. यानी अधिकार जिसे मिला वो ‘मैं' और देने वाले ‘हम’.
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पहले लोकसभा चुनाव में निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक सीटें भी हुआ करती थीं, इसलिए 489 स्थानों के लिए 401 निर्वाचन क्षेत्रों में ही चुनाव हुआ (तस्वीर: भारत सरकार)

नोट: लिटरली कहा जाए तो वोट का अधिकार यूनिवर्सल नहीं है. 18 साल से कम उम्र के लोग वोट नहीं दे सकते. 1947 में ये सीमा 21 वर्ष हुआ करती थी.
संविधान सभा ने अप्रैल 1947 में ‘यूनिवर्सल फ़्रैंचाइज’ को अडाप्ट किया. ख़ास बात नहीं लगती ना !
है!
बहुत ख़ास है. क्योंकि भारत वो पहला देश है जहां आज़ादी मिलते ही सभी लोगों को वोट का अधिकार मिल गया. हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में औरतों को वोट का अधिकार मिला 1956 में. यहां तक कि बहुत से पश्चिमी देशों में भी औरतों को वोट का अधिकार भारत के काफ़ी बाद मिला. वोटर लिस्ट कैसे बनी? यूनिवर्सल फ़्रैंचाइज़ अडाप्ट करने के बाद बारी थी वोटर लिस्ट बनाने की. फिर सवाल खड़ा हुआ कि वोटर लिस्ट में कौन जुड़ेगा, कौन नहीं? वैसे तो जवाब ये था कि जो भारत का नागरिक होगा वो जुड़ेगा. लेकिन याद रखिए कि नागरिक होने का अधिकार हमें संविधान देता है. और उसे बनकर पास होने में अभी 3 साल बाकी थे.
इसलिए वोटर लिस्ट में रजिस्ट्रेशन के लिए क्राइटीरिया सिंपल रखा गया. आप एक ही जगह पर 6 महीने से रह रहे हों तो वोटर लिस्ट में जुड़ सकते हो. रजिस्ट्रेशन कराना और चुनाव की तैयारी का काम इलेक्शन कमीशन का था.पहले तय हुआ कि हर राज्य के लिए अलग इलेक्शन कमीशन होगा. लेकिन जब वोटर लिस्ट बनी. तो एक नई लड़ाई शुरू हो गई. संविधान बना नहीं था और रखवाले पहले से तैयार थे.
क़स्बों गांवों में जाति और धर्म के आधार पर लोगों को वोटर लिस्ट में जुड़ने नहीं दिया गया. तब अम्बेडकर ने सभा के आगे कहा कि ऐसा ना हो इसके लिए एक सेंट्रल इलेक्शन कमीशन होना चाहिए. इसके बाद 1949 में संविधान के ड्राफ़्ट में संसोधन हुआ और एक सेंट्रल इलेक्शन कमीशन की स्थापना हुई.
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वोटिंग लिस्ट वेरोफ़ाई करने के लिए चुनाव अधिकारियों को सुदूर इलाक़ों में घर घर जाना पड़ा (तस्वीर: PTI)

17 करोड़ मतदाताओं को वोटर लिस्ट में जोड़ा गया. ‘इंडिया सर ये चीज़ धुरंधर’ ने एक ग़ज़ब का काम किया. भारत के लोग नागरिक बाद में बने और वोटर पहले बन गए. संविधान पास होने से पहले ही वोटर लिस्ट बनकर तैयार हो चुकी थी. रिफ़्यूजी की समस्या को भी सिम्पल तरीक़े से सुलझाया गया. सबसे एक डेक्लरेशन लिया गया. डेक्लरेशन में निहित था, ‘जहां मेरा रेजिस्ट्रेशन हुआ है, मैं उस स्थान पर स्थायी रूप से निवास करने का इरादा रखता हूं’. इलेक्टोरल डिमॉक्रेसी इतनी कहानी हो गई लेकिन एक सवाल का जवाब तो मिला ही नहीं. भारत लोकतंत्र कब बना?
इससे पहले कि आप हमारे नम्बर काटें, अपना ऑप्शन है A से आज की तारीख़. आज ही के दिन यानी 25 अक्टूबर 1951 को गणतांत्रिक भारत के पहला लोकसभा चुनाव शुरू हुए थे. पहला मत पड़ा और भारत कम से कम इलेक्टोरल डिमॉक्रेसी तो बन ही गया.
आज ये नॉर्मल लगता है. आख़िरकार लगभग हर कुछ महीनों में कोई ना कोई चुनाव देखने की आदत हो गई है. लेकिन तब ये कितना बड़ा टास्क था, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि तब पूरी दुनिया की निगाहें हिंदुस्तान पर थी. सबको शक था कि इतने टुकड़ों से बना देश लोकतंत्र बनने के अति दुष्कर काम को अंजाम दे पाएगा? अंग्रेज भारत के लोकतंत्र को ‘लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की बेहूदा नौटंकी’ करार दे रहे थे.
भारतीय भी पीछे नहीं थे. ‘ऑर्गनाइज़र’ नाम की पत्रिका में एक हेडलाइन छपी,
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नेहरू पछताए या नहीं, ये तो नहीं पता. लेकिन ये काम था बहुत कठिन, ये तय है. आज़ाद भारत के पहले चुनाव उस वक़्त देश में सत्रह करोड़ मतदाता थे जिनमें से साढ़े चौदह करोड़ (लगभग 85%) मतदाता निरक्षर थे. चुनाव की पहली वोटर लिस्ट आई तो उसमें महिलाओं ने अपने नाम कि बजाय लिख रखा था, ‘चुन्नू की मम्मी, ‘मुन्नू की बुआ’. ऐसे 40 लाख लोगों की पहचान दुबारा वेरिफ़ाई कारवाई गई.
चुनाव के लिए 3 लाख कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी गई. 20 लाख स्टील बुलेट प्रूफ़ बैलेट बॉक्स बनवाए गए. इन सबको वोटिंग सेंटर में पहुंचाने का काम भी काफ़ी दूभर था. पहाड़ी इलाक़ों में स्थानीय लोगों को इस काम में लगाया गया, बदले में कम्बल और बंदूक़ के लाइसेन्स दिए गए. 68 फ़ेज़ में पूरा चुनाव हुआ. पूरा करवाने में 6 महीने लगे. लागत आई 60 पैसे प्रति वोट. तुलना के लिए देखें तो 2019 में 72 रुपए प्रति वोट का खर्चा हुआ था.
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हर पार्टी प्रचार के लिए अलग नारा यूज़ कर रही थीं. नेहरू साम्प्रदायिकता पर हमलावर थे तो अंबेडकर नेहरू की नीतियों पर (तस्वीर: PTI)

कुल मिलाकर कहा जाए तो भारत का पहला चुनाव अपेक्षा से अधिक सफल रहा. और ये महान परम्परा आज भी बरकरार है. एंटायर पोलिटिकल साइंस के होनहार छात्र इस पर अपनी राय दे सकते हैं. लेकिन सर्वमान्य तथ्य ये है कि डिमॉक्रेसी को कितना भी गरियाइए, इसका कोई अलटेरनेटिव नहीं है.
अंत में दर्शकों को चुनाव के रिज़ल्ट से मतलब रहता है. तो चलिए वो भी कवर कर लेते हैं.
चुनाव का रिज़ल्ट आया तो कांग्रेस के हिस्से 489 में से 364 सीट आई. इंट्रेस्टिंग बात ये है कि इस चुनाव में कोंग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी थे. तब पंजे का निशान ऑल इंडिया फ़ॉर्वर्ड ब्लॉक को मिला था. जिसका नेतृत्व कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया था. और हारने वालों में सबसे बड़ा नाम थे बाबा साहव भीम राव आंबेडकर. उन्होंने नॉर्थ सेंट्रल बॉम्बे की रिजर्व सीट से चुनाव लड़ा था.

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