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भारत से हजारों करोड़ लूटने वाला शातिर चोर!

सुभाष कपूर एक भारतीय आर्ट डीलर था जो अमेरिका में भारत से चुराई गई मूर्तियों से एक अंतरराष्ट्रीय स्मग्लिंग रैकेट चलाया करता था. नवंबर 2022 में सुभाष को मूर्ति चोरी और अवैध निर्यात के लिए दस साल के कारावास की सजा सुनाई गई.

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Subhash Kapoor arrest
सुभाष कपूर को भारतीय मूर्तियों की स्मग्लिंग के केस में 10 साल की सजी सुनाई गई(तस्वीर-wikimediacommons/seithipunal.com)
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कमल
11 नवंबर 2022 (अपडेटेड: 11 नवंबर 2022, 05:09 PM IST)
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11 नवंबर 2009 की एक दोपहर. चेन्नई के कोयंबेलु में बस अड्डे पर एक बस आकर रुकती है. दो लोग बस से उतरते हैं. दोनों के पास सामान के नाम पर सिर्फ एक सिलेंडर था. जिसे लेकर वो कहीं जाने की जल्दी में थे. तभी एक आदमी आकर उनसे कुछ पूछताछ करता है. सादे कपड़ों में ये तमिल नाडु पुलिस का सिपाही था. पुलिस को कहीं से एक बड़ी टिप मिली थी और उसी वास्ते उस रोज़ उन दो लोगों की फील्डिंग लगाई थी. पुलिस ने उनके पास से जो सिलेंडर बरामद किया, वो असल में एक कंटेनर था. उसके ऊपरी हिस्से को मॉडिफाई कर एक बड़ा सा ढक्कन लगा हुआ था. ढक्कन खोला गया. उसमें अखबार की तहें बिछी थी. उसने नीचे पुलिस ने देखा कि पत्थर का एक टुकड़ा हैं.जिस पर काले रंग का पेंट किया हुआ है.

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टुकड़े को नजदीक के एक पेट्रोल पंप तक ले जाया गया.उस पर पेट्रोल डालते ही उसका पेंट उतार गया.अंदर से निकला एक शिवलिंग.और कोई ऐसा वैसा शिवलिंग नहीं.ये शिवलिंग एमर्रल्ड यानी पन्ना रत्न का बना हुआ था.जिसे तमिननाडु के थिरूवनमियूर जिले के मरुनदीस्वरार मंदिर(Marundheeshvarar Temple) से चुराया गया था.और ये सिर्फ अकेला शिवलिंग नहीं था.पिछले सालों में ऐसे पांच शिवलिंग दक्षिण भारत के अलग अलग कोनों से चोरी हुए थे.चोल साम्राज्य के दौर में पन्ना रत्न से बने ऐसे 7 शिवलिंग स्थापित किए गए थे, जिनके बारे में मान्यता है कि एक साथ इनकी पूजा करने से आदमी अमर हो जाता है.बहरहाल इन शिवलिंगों की चोरी अमरता के वरदान के लिए नहीं, रोकड़े के लिए की जा रही थी. इंटरनेशनल मार्केट में एक शिवलिंग की कीमत 53 करोड़ रूपये थी. और पूरा धंधा लगभग 1 हजार करोड़ के आसपास था. जिसका मुख्य खिलाड़ी अमेरिका में बैठकर इस पूरे नेटवर्क को चलाता था.  कौन था ये शख्स, कैसे भारत के मंदिरों से चोरी कर लाखों करोड़ो की मूर्तियां विदेश पहुंचाई गई. और कैसे हुआ इस खेल का पर्दाफाश.?

बंटवारे के बाद मूर्तियों की चोरी

इस कहानी की शुरुआत होती है भारत के बंटवारे से. बंटवारे के वक्त पुरषोत्तम राम कपूर पाकिस्तान से भारत आया. यहां जालंधर में उसे एक मकान अलॉट हुआ. ये मकान पहले किसी मुसलमान का था. पुरषोत्तम कपूर को घर में कुछ पुरानी किताबें मिली, जो घर का पुराना मालिक पाकिस्तान जाते हुए वहीं छोड़ गया था. कुछ सालों तक किताबें ज्यों की त्यों पड़ी रही. फिर एक दिन किसी ने पुरुषोत्तम को बताया कि ये किताबें आम नहीं है. ये इस्लाम धर्म से जुड़ी ऐतिहासिक किताबें थीं. जिनकी क़ीमत हजारों लाखों में थी. पुरुषोत्तम ने इन किताबों को बेचकर खूब मुनाफ़ा कमाया और 1961 में दिल्ली आ गए. साउथ एक्सटेंशन में उन्होंने एक आर्ट गैलरी खोली और अपने दोनों बेटों को भी वहीं लगा दिया.

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नटराज की मूर्ती जिसे सुभाष कपूर ने ऑस्ट्रेलिया की नेशनल गैलरी को $5 मिलियन में बेचा था(तस्वीर-illicitculturalproperty.com)

कपूर परिवार ने इस धंधे से खूब मुनाफा कमाया. देश नया नया आजाद हुआ था.भारत और पाकिस्तान के कोनों-कोनों में ऐसे मंदिर थे जिनमें हजारों साल पुरानी मूर्तियां और कलाकृतियां रखी हुई थी. इन मंदिरों में सुरक्षा नाम मात्र की थी, इसलिए चोरों की पौ बारा हो रखी थी. और स्मगलिंग का पूरा बिजेनस एस्टब्लिश हो रहा था. कपूर परिवार भी इनमें से एक था. ये लोग चोरों से मूर्तियां खरीदते और उन्हें खरीदारों तक पहुंचाते. पुरुषोत्तम के दोनों बेटों, सुभाष और रमेश ने इस धंधे को आगे बढ़ाया और अमेरिका तक पहुंचा दिया.

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साल 1974 में सुभाष कपूर(Subhash Kapoor) ने न्यू यॉर्क में अपनी एक आर्ट गैलेरी खोली. नाम रखा, आर्ट ऑफ़ द पास्ट. उसने भारत से लाई बहुमूल्य कलाकृतियों को अमेरिका में बेचना शुरू किया. उसने चन्द्रकेतुगढ़ की टेरेकोटा कलाकृतियां अमेरिका तक पहुंचा दी. साथ ही राजा दीन दयाल की ली हुई ऐतिहासिक फोटोग्राफ्स बेचने के चलते इंटरनेशनल आर्ट्स मार्केट में उसका बहुत नाम भी हो गया. इस बीच ऐतिहासिक कलाकृतियों पर नजरें रखने वाले कई एक्टिविस्ट के लिए ये एक बड़ा सवाल बना हुआ था कि ये मूर्तियां आ कहां से रही हैं.

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सुभाष कपूर(तस्वीर-Facebook)

फिर साल 2009 में एक घटना हुई.  मुम्बई से एक शिपिंग कंटेनर अमेरिका पहुंचा. इस कंटेनर पर अमेरिकी कस्टम अधिकारियों की नजर लगी थी.उन्हें भारत से जानकारी मिली थी कि कंटेनर को लेकर कुछ शंकाएं हैं. मसलन इस कंटेनर में कहने को फर्नीचर जा रहा था. लेकिन जिस कम्पनी के जरिए फर्नीचर जा रहा था, वो कपड़े एक्सपोर्ट करती थी. वहीं इस कंटेनर का वजन कई टन था, जो सामान्य फर्नीचर के हिसाब से काफी ज्यादा था. कंटेनर की तलाशी ली गई तो उसमें से बहुमूल्य पेंटिंग्स और मूर्तियां निकलीं. जिनकी कुल कीमत कई सौ करोड़ में थी. सामान तो ज़ब्त कर लिया गया. लेकिन सुभाष गिरफ्तारी से बच गया.

द आइडल थीफ

सिंगापोर में रहने वाले विजय कुमार(Vijay Kumar) हेरिटेज एक्टिविस्ट हैं. मूर्ति स्मगलिंग का पूरा नेटवर्क तोड़ने में उनकी अहम भूमिका रही थी. अपनी किताब “द आइडल थीफ”(The Idol Thief) में वो लिखते हैं कि सुभाष की भारत और अमेरिका दोनों जगह अधिकारियों से सांठगांठ थी. और इसके बिना इतने साल तक समग्लिंग का ये धंधा चल नहीं सकता था. सुभाष अपनी किताब में वो तरीका भी बताते हैं जिससे सुभाष भारत से मूर्तियां हासिल करता था. भारत में सुभाष का एक एजेंट था, संजीवी असोकन. असोकन ने पूरे दक्षिण भारत में चोरों का एक नेटवर्क बना रखा था. सुभाष को जब भी किसी मूर्ति की जरुरत पड़ती वो असोकन तक इसकी खबर पहुंचाता. असोकन चोरों के नेटवर्क को ये काम सौंपता और कुछ ही दिनों में मूर्तियां गायब कर दी जातीं. कई बार तो मूर्तियां गायब कर नकली मूर्तियां रख दी जाती, जिससे कई महीनों तक लोगों को चोरी की खबर ही नहीं लगती. चोरी के लिए कपूर को मामूली रकम देनी पड़ती.उदाहरण के लिए नटराज की एक चार फुट की मूर्ति के लिए चोरों को तीन लाख रूपये दिए गए. जबकि इसे ऑस्ट्रेलिया की नेशनल गैलेरी(National Gallery of Australia) को 5 मिलियन डॉलर में बेचा गया. ऐसे ही पांडिचेरी के पास एक गांव से चोरी गई मूर्ति को सुभाष ने 8 मिलियन डॉलर में बेचा था.

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हेरिटेज एक्टिविस्ट विजय कुमार की किताब “द आइडल थीफ”(तस्वीर-Amazon)

मूर्तियों को विदेश कैसे भेजा जाता था? इसके लिए भी सुभाष ने पूरा इंतज़ाम कर रखा था. अपनी आर्ट गैलेरी के साथ-साथ उसने इम्पोर्ट एक्सपोर्ट की अपनी खुद की कम्पनी खोली हुई थी. मूर्तियों को पहले भारत से हॉन्ग-कॉन्ग पहुंचाया जाता, वहां से लन्दन और फिर न्यू यॉर्क. 2001 में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका में सामान की चेकिंग पर काफी सख्ती हो गई थी, लेकिन फिर भी आर्ट्स गैलरी के सामान पर उतना शक नहीं किया जाता था. सुभाष इस बात का ध्यान रखता था कि उसने सभी कागज़ात तैयार कर रखें हों. साथ ही देखकर इस बात का पता लगाना आसान नहीं था कि मूर्तियां चोरी की हैं. इस तरीके से सुभाष ने कई दशकों तक मूर्तियां स्मगल की और मोटा पैसा कमाया.

प्रेमिका ने कराया गिरफ़्तार

सुभाष का ये धंधा यूं ही रोकटोक चलता रहता अगर नवंबर 2009 में वो शिंवलिंग न पकड़ा जाता, जिसके बारे में हमने शुरुआत में बताया था. तमिलनाडु में सालों से मूर्ति चोरी की तहकीकात के लिए पुलिस की एक विशेष टीम काम कर रही थी. सालों से उनकी नज़र संजीवी असोकन(Sanjeevi Asokan) पर थी. मार्च 2009 में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उसके कम्प्यूटर्स की तलाशी ली लेकिन उसके पास से कुछ न मिला. इसके कुछ महीने बाद जब नवम्बर में शिवलिंग पकड़ा गया तो पुलिस उन दो लोगों के माध्यम से असोकन तक भी पहुंच गई. यहां पुलिस असोकन पर पेंच कस रही थी. ठीक उसी समय अमेरिका में सुभाष कपूर अपने प्रेम प्रसंगों के चलते पुलिस के शिकंजे में फंसे जा रहा था. हुआ यूं कि सुभाष सिंगापोर में आर्ट गैलरी चलाने वाली एक लड़की से प्यार करने लगा.

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ऑस्ट्रेलिया ने स्मगल की गई बहुत सी मूर्तियां भारत को लौटा दी (तस्वीर-indiatimes.com)

दोनों साथ-साथ आर्ट एक्सपोर्ट का धंधा करते थे. लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि दोनों में तनातनी हो गई. और दोनों एक दूसरे के खिलाफ कोर्ट पहुंच गए. दोनों एक दूसरे पर पैसों की धोखाधड़ी का इल्जाम लगा रहे थे. लेकिन कोर्ट ने फैसला सुभाष के पक्ष में दिया. सुभाष की इस प्रेमिका ने उससे बदला लेने की ठानी.अप्रैल 2009 में उसने ब्रुकलिन म्यूजियम की वेबसाइट पर मौजूद एक कलाकृति की तस्वीर पर कमेन्ट करते हुए लिखा, क्या ये मूर्ति सुभाष कपूर के जरिए यहां पहुंची है? जल्द ही इंटरनेट फोरम्स पर ऐसे सवालों की झड़ी लग गई.सुभाष अब जांच एजेंसियों के रडार पर था.जल्द ही इन्टरपोल ने उसके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी किया और सुभाष अमेरिका से फरार हो गया.साल 2011 में उसे जर्मनी के फ्रैंकफर्ट हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया.तब भी सुभाष की प्रेमिका ने ही उसकी शिनाख्त में इंटरपोल की मदद की थी.उसे प्रत्यर्पण कर भारत लाया गया.सालों चले मुक़दमे के बाद 1 नवंबर 2022 को उसे 10 साल जेल की सजा सुनाई गईं.

मूर्तियों का क्या हुआ?

20 सालों में सुभाष ने 2000 से ज्यादा मूर्तियों की स्मगलिंग की थी. सरकार ने इन मूर्तियों को वापिस हासिल करने की कोशिश की. और उन्हें इसमें सफलता भी मिली. 2014 में ऑस्ट्रेलिया ने स्मगल की गई ऐसी कई मूर्तियों को वापस लौटा दिया. वहीं अक्टूबर 2022 में अमेरिका ने 307 के आसपास ऐसी मूर्तियां और कलाकृतियां वापस लौटा दीं.

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