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400 साल पहले हिंदुस्तान तक कैसे पहुंचा तंबाकू?

मुग़ल काल के दौरान सबसे पहले भारत में तंबाकू का जिक्र मिलता है

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31 मई 2022 (अपडेटेड: 2 जून 2022, 11:29 PM IST)
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31 मई को हर साल विश्व तम्बाकू निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है
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दरबार रोज़ की तरह रौशन था. बादशाह के आने का ऐलान हुआ और पूरी बारगाह बादशाह की शान में खड़ी हो गई. बादशाह आए और मसनद पर पालथी मारते हुए उन्होंने सबका एहतराम किया. अकबर की तबीयत नासाज़ रहने लगी थी. शाही हकीम ने आराम की सलाह दी थी लेकिन फिर भी अकबर दरबार में पहुंचे. क्योंकि दिन कुछ खास था. बीजापुर से मिर्ज़ा असद बेग एक ख़ुशख़बरी लेकर लौटे थे. शहज़ादे दानियाल का आदिल शाह की बेटी से निकाह तय हो गया था. और मामला तय कर असद बेग बीजापुर से तोहफ़े में मिला ज़ार-ओ-माल लेकर आगरा पहुंचे थे.

तोहफ़ों पर से दस्तरख़ान हटाया गया तो उनमें चांदी और सोने की तश्तरियों में एक से बढ़कर एक सामान रखा हुआ था. बादशाह ने सबका मुआयना किया. जब ये मामला निपट चुका तब असद बेग बादशाह के आगे पेश हुए और एक छोटी सी चांदी की तश्तरी बादशाह के आगे रख दी.

अकबर ने जब पहली बार पिया हुक्का 

तश्तरी में कुछ सामान सजा हुआ था. नक़्क़ाशी किया हुआ एक खूबसूरत पाइप. साथ में एक कलम जो लम्बाई में तीन हाथ थी. उसके दोनों सिरों को रंग कर तामचीनी से सजाया गया था. कलम के साथ एक चांदी की ट्यूब थी और उसे भी बैंगनी मखमल से लपेटा गया था. इस पूरे तामझाम के साथ मसाले जैसी कोई चीज़ भी रखी हुई थी. और साथ में जलाने वाला एक सुंदर सा बर्नर था.

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मुग़ल काल में हुक्का पीते हुए एक अमीर (तस्वीर: Wikimedia Commons)

ये अजीबोग़रीब सामान देखकर अकबर ने असद से पूछा, ये सब क्या है?

असद बेग ने फ़रमाया, ‘हुज़ूर ये तंबाकू है. दवाई के तौर पर बादशाह की ख़िदमत में पेश कर रहा हूं.’

बात पर ज़ोर देने के लिए असद बेग ने आगे कहा, ‘हुज़ूर, मक्का और मदीना में सब लोग तंबाकू से वाक़िफ़ हैं’.

ये सुनकर अकबर ने बेग से उसे तैयार कर पाइप आगे बढ़ाने को कहा. तंबाकू सुलगा कर बादशाह के आगे पेश किया गया. और उन्होंने उसमें से दो-तीन कश मारे. इसके बाद अकबर ने अपने शाही हकीम से तंबाकू के बारे में पूछा. उसने जवाब दिया कि भारत में अभी तक इसके इस्तेमाल की ज़्यादा जानकारी नहीं है लेकिन यूरोप के लोग इस बारे में बहुत कुछ जानते हैं.

बादशाह अकबर ने इसके बाद कभी तंबाकू का सेवन नहीं किया लेकिन मुग़ल भारत में तंबाकू की शुरुआत हो चुकी थी. अगले एक दशक में तंबाकू के सेवन में इस कदर बढ़ोतरी हुई कि मुग़ल बादशाह जहांगीर को एक डिक्री जारी कर तंबाकू पर बैन लगाना पड़ा. आज 31 मई है और आज की तारीख का संबंध है तंबाकू से.

एक ऐसा भी दौर था जब दुनिया को तंबाकू के हानिकारक प्रभावों की जानकारी नहीं थी. लोग एयरप्लेन और यहां तक कि अस्पताल में भी तंबाकू का सेवन करते दिख जाते थे. फिर जैसे-जैसे तंबाकू के ऊपर शोध बढ़ा तो पता चला कि इसके कितने हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं. साल 1987 में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनायज़ेशन ने तय किया कि हर साल 31 मई को ‘नो टोबैको डे’ के रूप में मनाया जाएगा.  इस मौक़े पर हमने सोचा क्यों ना भारत में तंबाकू के इतिहास के बारे में जाना जाए.

अमेरिका से यूरोप पहुंचा तंबाकू 

पुरातत्व शोधों के अनुसार तंबाकू का उपयोग सबसे पहले 12 हज़ार 3 सौ साल पहले हुआ था. नॉर्थ और सेंट्रल अमेरिका में. 1492 में क्रिस्टफ़र कोलंबस जब अमेरिका पहुंचा तो वहां के मूल निवासियों से उसे पहली बार तंबाकू मिला. इसके बाद जहाज़ी तंबाकू को यूरोप ले गए. ये दांत के दर्द और चोटों के इलाज में काम करता था. और तब यूरोप में ये मान्यता बनी कि तंबाकू हर चीज़ का इलाज कर सकता है.

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कोलम्बस ने जब अमेरिका की खोज की तो वहां के मूल निवासियों से उसे तंबाकू भी मिला (तस्वीर: Wikimedia Commons)

माना जाता है कि भारत में तंबाकू पुर्तगालियों के साथ पहुंचा था. ऐतिहासिक रूप से तंबाकू की खेती सबसे पहला ज़िक्र दक्षिण भारत में मिलता है. 1604-05 के आसपास. विलियम मेथवोल्ड नाम का ईस्ट इंडिया कम्पनी का एक एजेंट हुआ करता था. जो उस दौर में बीजापुर सल्तनत का मेहमान था. मेथवोल्ड के अनुसार 17वीं सदी की शुरुआत में कोरोमंडल कोस्ट में तंबाकू की खेती की शुरुआत हुई. और कुछ ही सालों में तंबाकू की खेती में व्यापक पैमाने पर इज़ाफ़ा हुआ. साल 1622 आते-आते कोरोमंडल का तंबाकू ना केवल लोकल डिमांड पूरी कर रहा था बल्कि इसे बर्मा तक निर्यात किया जाने लगा था.

इसके अलावा 17वीं सदी की शुरुआत में सूरत में तंबाकू की खेती का ज़िक्र भी मिलता है. यानी भारत के दो इलाक़ों, आंध्र और सूरत के इलाकों में एक ही दौर में लेकिन अलग-अलग तंबाकू की खेती की शुरुआत हुई.

थामस बाउरी नाम के एक ब्रिटिश मर्चेंट ने 1669 और 1679 के बीच भारत में तंबाकू के उपयोग का ब्यौरा दिया है. एक जगह वो लिखता है, “उत्तर भारत में फ़क़ीरों को बाकी सामान के साथ तंबाकू दान में दिया जाता है. और कोरोमंडल के इलाके में शादियों में पान और सुपारी के साथ तंबाकू देने की प्रथा है.”

तंबाकू टैक्स 

मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के समय तक तंबाकू टैक्स का एक बड़ा सोर्स बन चुका था. वेनिस के यात्री निकोलाओ मनूची ने अपने लिखे में इस बात का ज़िक्र किया है. मनूची के लिखे अनुसार सिर्फ़ दिल्ली से मुग़ल ख़ज़ाने को तब तंबाकू से 5 हज़ार रुपया प्रतिदिन टैक्स का मिलता था. इसके आगे वो लिखता है कि इस बात से आप खुद ही समझ सकते हैं कि पूरे हिंदुस्तान से बादशाह को कितना टैक्स मिलता होगा.

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मुग़ल काल में हुक्के का सेवन करता हुआ एक अमीर (तस्वीर: Wikimedia Commons)

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के फ़ैक्टरी रिकॉर्ड में भी भारत में तंबाकू के व्यापार का ज़िक्र मिलता है. 1619 से 1669 के बीच अंग्रेजों ने तंबाकू की लगातार ख़रीद फरोख्त की. सूरत में पोर्ट था. इसलिए यहां से तंबाकू ख़रीद कर मिडिल ईस्ट तक भेजा जाता. दक्षिण में डच जहाज़ी तंबाकू का व्यापार किया करते थे. और वहां से सुमात्रा और जावा द्वीपों पर तंबाकू का निर्यात किया जाता था. क़ीमत देखें तो आज के हिसाब से तब प्रति किलो तंबाकू की क़ीमत लगभग 920 रुपए पड़ती थी.

ब्रिटिश दस्तावेज़ों के अनुसार तब मिडिल ईस्ट में तंबाकू का कारोबार लागत के हिसाब से चार गुना मुनाफ़ा देता था. इसी कारोबार से अंग्रेज पैसा कमाते. फिर उसी पैसे से भारत से मसाले आदि ख़रीद कर ब्रिटेन भेज देते. तंबाकू के एक जहाज़ के निर्यात से 500 पाउंड के बराबर रक़म मिल जाती थी.

ब्रिटिश और डच ट्रेड भारत में तंबाकू के व्यापार का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा था. जैसा कि हमने पहले बताया जहांगीर के समय से ही भारत में तंबाकू की खपत बहुत बढ़ गई थी. 1630 तक आते-आते खपत इस हद तक पहुंच गई थी कि सूरत के मुग़ल गवर्नर ने सूरत पोर्ट से तंबाकू के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया.

1665 तक बम्बई भी तंबाकू ट्रेड का एक बड़ा सेंटर बैन गया था. पहले ये इलाक़ा पुर्तगालियों के अधिकार में था. पुर्तगाली प्रति साल तंबाकू ट्रेड से 420 पाउंड कमा रहे थे. बाद में अंग्रेजों का इस इलाक़े पर अधिकार हुआ. और 1668 तक ये रक़म बढ़ते-बढ़ते 12 हज़ार पाउंड प्रति वर्ष हो गई. यानी 5 साल में 30 गुना का इज़ाफ़ा. 17 वीं शताब्दी के अंत तक पारम्परिक भारतीय खेती में एक नई फसल की एंट्री हो चुकी थी. तंबाकू फ़ायदे का सौदा था इसलिए तंबाकू ने दूसरी फसलों की जगह ले ली. बिहार उड़ीसा और उत्तर भारत के अधिकतर इलाक़े में तंबाकू की खेती होने लगी थी.

बीड़ी की शुरुआत 

1800 आते आते हुक्के और पान के रूप में पूरे भारत में तंबाकू का सेवन होने लगा था. तंबाकू की एंट्री से दो और इंडस्ट्रीज़ को फ़ायदा मिला. शुरुआत में तंबाकू को हुक्के में डालकर पिया जाता था. इसलिए हुक्के और चिलम की मांग बड़ी तो इसने धातु और मिट्टी के बर्तनों के व्यापार में भी इज़ाफ़ा किया. अभिजात वर्ग के लोग सुंदर नक़्क़ाशी के हुक्कों का उपयोग करते थे. जबकि आम लोग चिलम और बीड़ी का उपयोग करते थे.

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बीड़ी तैयार करते हुए कारीगर (तस्वीर: रयान/wikimedia commmons)

भारत में बीड़ी की शुरुआत सम्भवतः गुजरात के खेड़ा और पंचमहल ज़िलों से हुई. जहां मज़दूरों ने बचे हुए तंबाकू को कचनार की पत्तियों में लपेट कर पीना शुरू किया था. “इंटरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट ट्यूबरकोलोसिस एंड लंग डिजीज” के साथ काम करने वाले प्रणय लाल एक रिसर्च पेपर में बताते हैं कि बीड़ी के व्यापार की शुरुआत गोमतीपुर के मोहनलाल पटेल और हरगोविंद दास ने की थी. 1899 में गुजरात में अकाल पड़ा तो ये दोनों काम के सिलसिले में जबलपुर पहुंचे, यहां उन्होंने बीड़ी के धंधे की शुरुआत की. दोनों ने देखा कि तेंदू के पत्ते बीड़ी बनाने के लिए ज़्यादा मुफ़ीद थे. और तेंदू जबलपुर के आसपास बहुतायत में मिलता था. 1899 में रेलवे का इक्स्पैन्शन हुआ तो बीड़ी के व्यापार और फैला.

बम्बई के हरिभाई देसाई ने 1901 में बीड़ी का पहला ट्रेडमार्क हासिल किया. और मोहनलाल और हरगोविंद ने 1903 में. 1912 से 1918 के बीच विदर्भ तेलंगाना और हैदराबाद में बीड़ी का व्यापार खूब फला फूला. 1920 में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई तो बीड़ी उद्योग को और ताक़त मिली. बीड़ी के मुक़ाबले सिगरेट को विदेशी माना जाता था. इसलिए बीड़ी का इस्तेमाल और बड़ा. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बीड़ी भारतीय सैनिकों के राशन का हिस्सा हुआ करती थी.

1960 में जब भारत में पावरलूम आया तो हथकरघा उद्योग के कई कारीगर बेरोज़गार हो गाए. इनमें से अधिकतर को बीड़ी उद्योग में काम मिला. जब आधुनिक विज्ञान ने तंबाकू के हानिकारक प्रभावों को उजागर किया तो धीरे-धीरे भारत में भी इसको लेकर जागरूकता फैली. 1975 में पहला सिगरेट ऐक्ट लाया गया. जिसके तहत सिगरेट पर वैधानिक चेतावनी की शुरुआत की गई. समय-समय पर इस एक्ट में सख़्ती बढ़ाई गई. और सरकार ने तंबाकू के उपयोग को कम करने के लिए और कई तरीक़े के प्रतिबंध लगाए.

आंकड़ों की बात करें तो ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे इंडिया 2016-17 के अनुसार भारत में 15 साल की उम्र से अधिक के 29% लोग तंबाकू का सेवन करते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति वर्ष भारत में 13 लाख लोगों की तंबाकू के सेवन से मृत्यु होती है. तम्बाकू के इतिहास के बारे में और जानना चाहते हैं तो आप इयान गेटली की किताब "टोबेको: अ कल्चरल हिस्ट्री ऑफ हाउ एन एक्सॉटिक प्लांट सेड्यूस्ड सिविलाइजेशन" पढ़ सकते हैं.

वीडियो देखें- उपनिषद कैसे पहुंचे भारत से यूरोप तक?

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