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क्या है गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तानी दावे की हक़ीक़त?

1947 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान के हालात का फ़ायदा उठाकर किया था क़ब्ज़ा.

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महाराजा हरि सिंह (बाएं से दूसरे), शेख अब्दुल्ला (दायें से दूसरे) बलदेव सिंह, जवाहरलाल नेहरू के साथ (तस्वीर: wikimedia commons)
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कमल
26 अक्तूबर 2021 (Updated: 26 अक्तूबर 2021, 03:02 PM IST)
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90’s के किड्स 2000 की शुरुआत में हॉलीवुड से रूबरू हुए. तब फ़िल्में देखने का एक ही चारा हुआ करता था, पाइरेटेड CD.
हाई-फ़ाई एक्शन फ़िल्में देखने के चक्कर में मेट्रिक्स और टर्मिनेटर की पाइरेटेड CD धड़ल्ले से बेची और ख़रीदी गई. पुरानी फ़िल्में तो यदा कदा केबल पर दिख जाती थीं. लेकिन नई रिलीज़ हुई अंग्रेज़ी फ़िल्मों को देखने का यही तरीक़ा हुआ करता था. ऐसी ही एक फ़िल्म ‘वर्टिकल लिमिट’ सन 2000 में रिलीज़ हुई. फ़िल्म में दो भाई बहन माउंट K2 पर चढ़ने की कोशिश करते हैं.
हम बचपन से पढ़ते आए कि भारत की सबसे ऊंची चोटी K2 है. लेकिन फ़िल्म की शुरुआत में अपना GK चकराया जब मुए अमेरिकन मदद मांगने फ़ौज के पास पहुंचे. अपन सोचे कि अब तो किसी भारतीय को दिखाया जाएगा. लेकिन फ़ौज के अफ़सर की जैकेट में पाकिस्तान का बिल्ला चमक रहा था.
प्रोटेस्ट दर्ज़ होता. लेकिन तब तक अमेरिकन हीरो 30-30 फुट बर्फ़ की दरारों को उछलकर पार करने लगा. वो भी अकेले और बिना रस्सी के. उसकी कलाकारी पर ये 12 साल का लड़का ऐसा रीझा कि पाकिस्तानी बिल्ले और K2, दोनों को भूल गया. गिलगित-बाल्टिस्तान की कहानी थोड़ा अलग याद आया कई साल बाद. जब पता चला कि ये K2 तो गिलगित-बाल्टिस्तान में है. और पाकिस्तान 1947 से उस पर क़ब्ज़ा जमाए बैठा है.
जब कभी कश्मीर मुद्दे की बात होती है तो गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर से जोड़कर बताया जाता है. लेकिन इस शो में हम इतिहास की बात करते हैं. और इतिहास के हिसाब से कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान की कहानी थोड़ा अलग है. कैसे? आइए जानते हैं.
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महाराजा रणजीत सिंह (तस्वीर: wikimedia commons)


पहले क्रोनोलॉजी समझते हैं. 1839 में महाराजा रणजीत सिंह दुनिया से रुखसत हुए और उत्तर-पश्चिम भारत में सिखों का साम्राज्य सिमटता चला गया. 1845 में पहला एंग्लो-सिख युद्ध हुआ. अंग्रेज जीते और 1846 में लाहौर ट्रीटी पर दस्तख़त हुए.
इसके अनुसार कश्मीर अंग्रेजों में कब्जे में चला गया. लेकिन अंग्रेज इस पहाड़ी और ठंडे इलाक़े में अपने क़ीमती समय और पैसे की खपत नहीं करना चाहते थे. लिहाज़ा वही तरीक़ा अपनाया गया जैसा बाकी और कई रियासतों के साथ आज़माया गया था. कुछ ही हफ़्ते के अंदर अंग्रेजों ने 75 लाख रुपए लेकर कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान का इलाक़ा महाराजा गुलाब सिंह के हवाले कर दिया.
लेकिन इसके बावजूद अपने पोलिटिकल एजेंट्स की मदद से उन्होंने इस इलाक़े पर बाहर से कंट्रोल बनाए रखा. इसी दौरान रशिया सेंट्रल एशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश में था. जिसका रास्ता गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर खुलता था. अंग्रेज किसी हाल में ऐसा होने देना नहीं चाहते थे. लिहाज़ा 1877 में अंग्रेजों ने गिलगित के उत्तरी इलाक़ों को जोड़कर एक नया नाम दिया, गिलगित एजेन्सी. गिलगित स्काउट्स 1913 में अंग्रेजों ने इस इलाक़े की देखरेख के लिए एक पैरामिलिट्री फ़ोर्स बनाई. नाम था गिलगित स्काउट्स. इसमें लोकल लोग शामिल थे लेकिन कमांड ब्रिटिश अफ़सरों के हाथ में थी. नाम याद रखिएगा क्योंकि इन्हीं की इस कहानी में मुख्य भूमिका है.  1935 में दूसरे विश्व युद्ध के आसार नज़र आने लगे तो अंग्रेजों ने गिलगित को राजा हरि सिंह से 60 साल की लीज़ पर ले लिया. तब से ये इलाक़ा ‘फ़्रंटियर एजेन्सी’ के नाम से जाने जाना लगा.
फिर आया 1947. अंग्रेजों ने भारत से जाने की ठानी तो उनके लिए सवाल ये नहीं था कि कश्मीर कहां जाएगा. उनके हिसाब से कश्मीर हरि सिंह की रियासत थी. और सभी रियासतों को हक़ था कि वो किसे चुने. लेकिन जैसे हमने पहले बताया गिलगित का इलाक़ा तब हरि सिंह के कब्जे में तो था नहीं. अंग्रेजों ने लीज़ पर उठाया हुआ था.
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गिलगित स्काउट्स (तस्वीर: इंडिया डिफ़ेंस रिव्यू)


इसलिए इस इलाक़े के प्रशासन को किसी ना किसी को तो सौंपना ही था. भारत पाकिस्तान की रस्साकशी से बचने के लिए अंग्रेज सरकार ने तय किया कि गिलगित का इलाक़ा हरि सिंह को सौंप दिया जाएगा. इसके लिए तारीख तय हुई थी 1 अगस्त. गिलगित का प्रशासन हाथ में लेने के लिए हरि सिंह ने ब्रिगेडियर घनसारा सिंह को गिलगित का गवर्नर नियुक्त किया. घनसारा गिलगित पहुंचे तो मालूम चला कि वहां अलग ही खेल चल रहा है.
वहां के लोकल नौकरशाहों ने आपदा में अवसर खोज़ मारा था. उन्होंने कहा कि जब तक उनकी तनख़्वाह ना बढ़ाई जाएगी, वो किसी हुक्म की तामील नहीं करेंगे. तब घनसारा सिंह ने श्रीनगर को कई संदेश भेजे कि गिलगित में हालात काबू से बाहर जा सकते हैं. तब कश्मीर स्टेट फ़ोर्स के चीफ ऑफ़ स्टाफ़ हुआ करते थे, जनरल एच. एल. स्कॉट. घनसारा के साथ वो भी गिलगित पहुंचे हुए थे. राजा हरि सिंह की कश्मकश 1 अगस्त का दिन आया और गुजर भी गया. कहां हरि सिंह गिलगित की आस लगाए बैठे थे, और कहां उन्हें पता चला कि कश्मीर की गद्दी भी ख़तरे में पड़ सकती है. एच. एल. स्कॉट. गिलगित के हालात से रूबरू करवाने श्रीनगर पहुंचे तो हरि सिंह ने उनकी बात को तवज्जो ही नहीं दी. हरि सिंह खुद इस राउंड रॉबिन में फ़ंसे थे कि किसकी तरफ़ जाएं. सबसे आसान ऑप्शन था कि कश्मीर भारत या पाकिस्तान, दोनों में से किसी को ना चुने ताकि उनकी रियासत बरकरार रहे. पाकिस्तान में जाना वो अफ़ॉर्ड कर नहीं सकते थे. और भारत का नरम रवैया देखकर उन्हें लगा कि उनके पास निर्णय लेने के लिए अभी काफ़ी दिन हैं.
उधर गिलगित में अपनी पैठ बनाने के लिए घनसार सिंह ने लोकल कबीलों को कांटैक्ट किया. लेकिन देने के लिए ना उनके पास पैसे था और ना ही उनका कोई रसूख़ था. ऊपर से गिलगित के 75% इलाक़े पर स्काउट्स का क़ब्ज़ा था. जो दिन पर दिन गवर्नर की अथॉरिटी को धता बताते जा रहे थे.
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27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना ने कश्मीर में प्रवेश किया (फ़ाइल फोटो)


कुल मिलाकर कहें तो बारूद का ढेर तैयार था. सिर्फ़ एक चिंगारी की ज़रूरत थी. चिंगारी गिरने में ज़्यादा दिन नहीं लगे. अंग्रेज़ी में कहते हैं कि ‘आइ हेट यू’ गाते हुए आया एक अंग्रेज ऑफ़िसर, विलियम ब्राउन. अधिकतर अंग्रेज अफ़सर भारत-पाकिस्तान से निकलने की तैयारी में थे. लेकिन ब्राउन पर देशभक्ति का जोश क़ायम था. वो भी पाकिस्तान की तरफ़. उसने ठानी थी कि जब तक गिलगित पाकिस्तान से नहीं मिल जाता, वो गिलगित से निकलेगा नहीं.
अक्टूबर आते आते राजा हरि सिंह का ‘फ़ेस द ट्रूथ’ मोमेंट आ चुका था. पाकिस्तान ने लिखित में वादा किया था कि वो स्टेटस क्वो बनाए रखेगा. हरि सिंह से उन्हें कोई ख़ास उम्मीद नहीं थी. लेकिन शेख़ अब्दुल्ला को लेकर उनका भरोसा था वो कश्मीर की आवाम को पाकिस्तान के पक्ष में कर लेंगे. शेख़ अब्दुल्ला का सुर भी बदलता जा रहा था. कभी वो भारत के पक्ष में नज़र आते तो कभी अलग आज़ाद कश्मीर के. ऑपरेशन गुलमर्ग इसे देखते हुए 22 अक्टूबर के दिन पाकिस्तान ने कश्मीर में ऑपरेशन गुलमर्ग की शुरुआत कर दी.
200 से 300 लॉरी में भरकर आए पाकिस्तानी कबीलाइयों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया. वो श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे थे. राजा की फौज के काफ़ी सिपाही भी हमलावरों के साथ हो लिए थे. इन्होंने ऐलान किया कि 26 अक्टूबर को वो श्रीनगर फतह करके वहां की मस्जिद में ईद का जश्न मनाएंगे.
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ब्रिगेडियर घनसारा सिंह और अंग्रेज ऑफ़िसर विलियम ब्राउन (तस्वीर: wikimedia commons)


बात हाथ से निकलते दिखी तो 24 अक्टूबर की रात हरि सिंह ने दिल्ली से मदद मांगी. नाज़ुक हालात को देखते हुए अगली सुबह माउंटबेटन की अध्यक्षता में डिफेंस कमिटी की बैठक हुई. तय हुआ कि वी के मेनन कश्मीर पहुंचेंगे. कश्मीर पहुंचकर उन्होंने राजा हरि सिंह से मुलाक़ात की. हरि सिंह के पास अब कोई चारा नहीं बचा तो वो भारत में विलय के लिए तैयार हो गए. इसी के बाद आज ही के दिन यानी 26 अक्टूबर 1947 को राजा हरि सिंह ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसन’ पर साइन किया. और आधिकरिक रूप से कश्मीर का भारत में विलय हो गया.
फिर मदद की अपील करते हुए हरि सिंह ने गवर्नर जनरल को चिट्ठी लिखी. इसमें लिखा कि वो तत्काल एक अंतरिम सरकार का गठन करना चाहते हैं. इसमें शासन की जिम्मेदारी निभाएंगे नैशनल कॉन्फ्रेंस के शेख अब्दुल्ला और रियासत के वजीर मेहर चंदर महाजन. दोनों चीजें लेकर मेनन दिल्ली लौटे. फिर से डिफेंस कमिटी की मीटिंग हुई. नेहरू का कहना था कि अगर भारत ने फौज नहीं भेजी, तो जम्मू-कश्मीर में भयंकर मारकाट होगी. तय हुआ कि विलय की अपील मंजूर की जाए. ये भी तय हुआ कि जब वहां कानून-व्यवस्था की हालत सामान्य हो जाएगी, तो जनमत संग्रह करवाया जाएगा. 27 अक्टूबर को भारतीय सेना हवाई रास्ते से कश्मीर में लैंड हुई और पाकिस्तानी कबीलाइयों के साथ जंग की शुरुआत हो गई. गिलगित में क्या हुआ? ये तो था कश्मीर का हाल. इसके बाद कैसे पाकिस्तान पीछे हटा और LOC बनी, ये हम जानते ही हैं. लेकिन इस दौरान गिलगित में कुछ और ही खेल चल रहा था. वहां अब तक पाकिस्तान की एंट्री नहीं हुई थी.
कश्मीर में भारत एंटर हुआ तो विलियम ब्राउन को अंदेशा हुआ कि अब कुछ ना किया तो भारत गिलगित भी पहुंच जाएगा. 31 अक्टूबर की रात वो 100 से ज़्यादा गिलगित स्काउट्स को लेकर गवर्नर निवास पहुंचा और उसे घेर लिया. उसने गवर्नर से सरेंडर करने को बोला. लेकिन वो सरेंडर पर ही नहीं रुका. उसने कश्मीर लाइट infantry डिविज़न के सिख सैनिकों को भी मौत के घाट उतार डाला.
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कश्मीर का भारत में विलय करने के लिए इसी इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर साइन हुए थे (फ़ाइल फोटो)


इसके चार दिन बाद गिलगित में पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया गया. ये सब ब्राउन की कारिस्तानी थी लेकिन अपने सीनियर्स को रिपोर्ट करते हुए वो इसे आवाम का विद्रोह करार दे रहा था. ये बात पाकिस्तान के हक़ की थी. वो नहीं चाहते थे कि इसमें उनका कोई हाथ दिखे. पाकिस्तान आज भी यही दावा करता है कि गिलगित का विद्रोह आवाम का विद्रोह था. जबकि विलियम ब्राउन ने अपनी किताब ‘The Gilgit Rebellion’ में इस बात की तसकीद की है कि गिलगित में जो हुआ वो उसके इशारे पर हुआ था और इसमें गिलगित स्काउट्स का हाथ था.
जनवरी 1948 में ब्राउन ने गिलगित स्काउट्स की कमान कर्नल असलम ख़ां के हाथ में दे दी. ये कौन थे? ये वही थे जो कश्मीर में घुसे क़बीलाई लड़कों का नेतृत्व कर रहे थे. अगले कुछ महीने में पाकिस्तान ने गिलगित में अपनी सेना भेजकर वहां पूरी तरह से क़ब्ज़ा जमा लिया. पाकिस्तान आज भी इसे कश्मीर का हिस्सा ना कहकर ‘Northern Areas’ बुलाता है. और तब से लेकर अब तक पाकिस्तान K2 को अपनी चोटी बताता रहता है और अपन सिर्फ़ किताबों में इस पर चढ़ाई कर रहे हैं. पाकिस्तान का दावा एक बार फ़ाइनल समरी देखें कि पाकिस्तान का दावा क्या है?.
पाकिस्तान का कहना है कि चूंकि राजा हरि सिंह लोगों द्वारा चुने नहीं गए तो गिलगित पर उनका हक़ कैसा. इस लॉजिक के लिहाज़ से जितनी रियासतों ने पाकिस्तान को चुना, उनमें कोई शासक लोगों का चुना हुआ तो था नहीं. तो इस लिहाज़ से किसी भी रियासत पर पाकिस्तान का हक़ कैसे.
ग़लत था कि सही था. तब जिसकी लाठी उसकी भैंस हुआ करती थी. गिलगित को अंग्रेजों ने लीज़ पर लिया था और लौटा भी दिया था. केवल मुंह ज़बानी नहीं. बाक़ायदा पूरी कलम-दवात और पोथी के साथ लिखकर.
तो क़ानून और दस्तावेज़ों के हिसाब से गिलगित-बाल्टिस्तान का निर्णय राजा हरि सिंह को करना था. और हरि सिंह के दस्तख़त इस बात की गवाही देते हैं कि उन्होंने गिलगित का भारत में विलय होना चुना था. दस्तख़त के मामले में पाकिस्तान का दावा है हरि सिंह ने दबाव में हस्ताक्षर करे थे. अब मुद्दा ये कि सेना के आने से पहले ही अगर दस्तख़त हो चुके थे तो दबाव था किस बात का.
हमारी या आपकी बात से पाकिस्तान को कोई फ़र्क नहीं पड़ना है. लेकिन जैसा हमने पहले बोला. इतिहास का मतलब है रिकॉर्ड और रिकॉर्ड जैसा था वैसा हमें आपके सामने पेश कर दिया है.

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