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हिन्दू का दिल मुसलमान को लगाया और रिकॉर्ड बन गया

साल 1995 में एक हिन्दू महिला का दिल ट्रांसप्लांट कर एक मुस्लिम महिला के सीने में लगाया गया और इस काम को अंजाम देने वाला था एक ईसाई डॉक्टर

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KM Cherian
पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर चेरियन अब तक 40 हजार से ज्यादा सर्जरी कर चुके हैं
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कमल
6 जुलाई 2022 (अपडेटेड: 4 जुलाई 2022, 06:41 PM IST)
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डॉक्टर KM चेरियन की आत्मकथा, “हैंड ऑफ गॉड” में एक किस्से का है, 
साल 2001 की बात है, एपीजे अब्दुल कलाम अभी राष्ट्रपति नहीं बने थे. एक समारोह के दौरान चेरियन और डॉक्टर कलाम की मुलाक़ात हुई. मिसाइलों वाले डॉक्टर ने इंसानी शरीर के डॉक्टर से पूछा, “क्या हिन्दू और मुसलमान के खून में कोई अंतर होता है?” 
डॉक्टर चेरियन ने जवाब दिया, नहीं, दोनों के खून का रंग एक ही होता है, लाल. तब डॉक्टर कलाम ने उनसे कहा, “ये एक ऐसी बात है जो भारत के सारे राजनेताओं को बताई जानी चाहिए” 
इस सवाल का जवाब यूं तो हममें से कोई भी दे सकता है. लेकिन डॉक्टर चेरियन से ये सवाल क्यों पूछा गया, इसके पीछे एक खास कहानी है. जिससे विज्ञान, इतिहास और धर्म, तीनों जुड़े हुए हैं. 

चूंकि बात दिल की है. इसलिए शुरुआत करते हैं अहमद बरेलवी के एक शेर से. बरेलवी लिखते हैं, 

अक़्ल के मदरसे से उठ इश्क़ के मैकदे में आ
जाम-ए-फ़ना व बेख़ुदी अब तो पिया, जो हो सो हो

बरेलवी कह रहे हैं कि दिमाग की सुनना छोड़ो और दिल की सुनो. दिल, जिसे तमाम आशिकों ने मुहब्बत का ठिकाना बताया और सूफियों ने खुदा का घर कहा, उसकी दिमाग से लड़ाई सदियों पुरानी है. लेकिन बात सिर्फ रूमानियत तक सीमित नहीं है. बायोलॉजी के फील्ड में भी कई दशकों तक दिल और दिमाग के बीच लड़ाई रही. सवाल जिंदगी और मौत का था. किसी को कब मरा हुआ माना जाए?

सदियों तक यही माना जाता रहा कि दिल धड़कना बंद हो जाए तो आदमी मर जाता है. लेकिन दिमाग का क्या? अगर दिमाग काम करना बंद कर दे तो क्या इंसान जिन्दा माना जाएगा? आधुनिक विज्ञान ने इसे ब्रेन डेथ का नाम दिया है. अब एक और सवाल ये कि मौत के मामले में दिल और दिमाग का सवाल उठा ही क्यों?

दुनिया की पहली हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जरी 

इसके लिए थोड़ा विज्ञान के इतिहास पर चलते हैं. जैसे-जैसे विज्ञान ने तरक्की की, डॉक्टरों को समझ आया कि अंग प्रत्यर्पण से किसी की जान बचाई जा सकती है, या किसी की जिंदगी बेहतर की जा सकती है. मसलन किसी के दोनों गुर्दे काम करना बंद कर दें तो किसी का एक गुर्दा लगाकर काम चलाया जा सकता है. इसके अलावा आंखें दान कर देने से भी किसी को नई आंखें मिल सकती हैं. लेकिन दिल का क्या? किसी का दिल सही से काम करना बंद कर दे तो उसके शरीर में किसी और का दिल लगाया जा सकता है?

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और डॉक्टर चेरियन (तस्वीर: न्यू इंडियन एक्सप्रेस) 

जवाब है हां. लेकिन दिल निकालने और लगाने में एक खास दिक्कत है. जब तक कोई व्यक्ति जिन्दा है, गुर्दे या किसी अन्य अंग की तरह उसे निकाला नहीं जा सकता. और मरने के बाद निकाला जाए तो दिल ज्यादा देर तक बचा रह नहीं सकता. यानी एक मृत मरीज़ से दिल को ट्रांसफर करने के लिए सिर्फ चंद मिनटों का ही वक्त मिलता है. जो कि लोजिस्टिक्स के हिसाब से एक बड़ी दिक्कत है. साल 1967 में डॉक्टरों ने पहली बार हार्ट ट्रांसप्लांट करने में सफलता पाई. इस ऑपरेशन को दक्षिण अफ्रीका में किया गया था. 24 साल की डेनिस डारवॉल का दिल एक दूसरे मरीज पर लगाया गया. डारवॉल को डॉक्टरों द्वारा ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था. 

धीरे धीरे आधुनिक विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच रहा था कि दिमाग काम करना बंद दे तो मरीज को वापस नहीं लाया जा सकता. चूंकि सांस की क्रिया भी दिमाग द्वारा संचालित होती है इसलिए ब्रेन डेड हो जाने के बाद व्यक्ति सांस भी नहीं ले सकता. हालांकि मशीनों के माध्यम से सांस को चलायमान रखा जा सकता है. लेकिन ऐसा व्यक्ति कभी भी दोबारा चेतन नहीं हो सकता. चूंकि बात जिंदगी और मौत से जुड़ी थी, इसलिए ब्रेन डेड व्यक्ति को कानूनी तौर पर मृत मानने में काफी समय लगा. यहां तक कि साल 2022 में भी कई देशों में ये बहस कायम है कि ब्रेन डेड हो जाने की स्थिति में क्या किसी व्यक्ति को मरा हुआ माना जा सकता है या नहीं. ये इसलिए क्योंकि ब्रेन डेड हो जाने पर भी दिल काम करता रह सकता है. और मशीनों से माध्यम से सांस भी चलाई जा सकती है.

भारत में 1968 में पहली कोशिश हुई  

बहरहाल दुनिया के पहले हार्ट ट्रांसप्लांट ऑपरेशन के अगले ही साल भारत में भी इसको लेकर कोशिश की गई. और इसका श्रेय जाता है डॉक्टर प्रफुल्ल कुमार सेन को. सेन 1964 से ही कुत्तों पर हार्ट ट्रांसप्लांट की कोशिश कर रहे थे. लेकिन इंसानों पर इस प्रक्रिया को आजमाने में एक अड़चन थी. भारत में ब्रेन डेथ लीगल नहीं थी. इसलिए मरीज के दिल को तब तक नहीं निकाला जा सकता था, जब तक वो धड़कना बंद न कर दे. इसके लिए डॉक्टर सेन ने एक नई तरकीब आजमाई. शुरुआत कुत्तों पर परिक्षण से की गयी. डॉक्टर सेन चेक करना चाह रहे थे कि एक बार दिल धड़कना बंद कर दे तो उसके कितनी देर बाद उसे दोबारा शुरू किया जा सकता है.

डॉ प्रफुल्ल कुमार सेन अक्टूबर, 1977 में मुंबई में पेसमेकर और पेसिंग पर पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए। (फोटो साभार: कार्डियोथोरेसिक सर्जरी विभाग, केईएम अस्पताल, मुंबई)

इसके लिए कुत्ते को बेहोश करने वाली दवा दी गई. इतनी कि उसकी सांस थम जाए. इसके बाद एक बिजली के झटके से उसका दिल रोक दिया गया. जब ECG पर लाइनें सपाट हो गई तो कुछ देर बाद शॉक देकर दिल को दोबारा शुरू किया गया. इस तरह डॉक्टर सेन को पता चला कि एक बार थम जाने के 15 से 30 मिनट बाद तक दिल को दोबारा शुरू किया जा सकता है.

इसके बाद साल 1968 में ये तरीका इंसान पर आजमाया गया. जिस मरीज का दिल निकाला जाना था, उसे डोनर कह लीजिए और जिसे लगाया जाना है उसे रिसीवर. तो जब डोनर पेशंट को लाया गया वो ब्रेन डेड हो चुका था. लेकिन अभी उसका दिल नहीं निकाला जा सकता था. डॉक्टर सेन और उनकी टीम डोनर की लगातार निगरानी कर रही थी. जैसे ही दिल की धड़कने पूरी तरह थम गई, डॉक्टरों ने डोनर के दिल को निकालकर एक ठन्डे सेलाइन मिश्रण में डाल दिया. इसके बाद रिसीवर मरीज के दिल को उसके शरीर से अलग किया गया. इस दौरान एक मशीन, जिसे आम भाषा में हार्ट-लंग मशीन कहते हैं, शरीर में खून को दौड़ाती रही और सांस को चलाती रही. जिसके बाद डोनर के दिल को रिसीवर के शरीर में अटैच कर दिया गया. 

डॉक्टर सेन ने हार्ट ट्रांसप्लांट करने में सफलता तो हासिल कर ली, लेकिन फिर भी ये ऑपरेशन फेल रहा. ट्रांसप्लांट किए गए दिल ने कुछ देर में ही काम करना बंद कर दिया गया और मरीज की मौत हो गई. इसके बाद भारत को पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट करने के लिए 26 साल का वक्त और लगा. एक बड़ा कारण था, इम्यूनो सप्रेसेंट दवाओं की कमी. जब किसी दूसरे का दिल किसी और के शरीर में लगाया जाता है, तो शरीर इसे एक फॉरेन बॉडी की तरह देखता है, और शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र उस पर हमला शुरू कर देता है. इसे रोकने के लिए इम्यूनो सप्रेसेंट दवाओं की जरुरत होती है, जो 1980 तक भारत में नहीं नहीं आ पाई थीं. दूसरा कारण ये भी था कि भारत का क़ानून एक ब्रेन डेड व्यक्ति को मृत नहीं मानता था. इसलिए ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया और भी जटिल साबित हो रही थी. 

26 साल बाद मिली सफलता 

परिस्थिति में चेंज आया साल 1994 में. उस साल संसद ने एक क़ानून पास कर ब्रेन डेड व्यक्ति के अंग प्रत्यर्पण की मंजूरी दे दी. क़ानून काफी वक्त से संसद के पटल पर था, लेकिन इसे पास होने में सात साल का वक्त लग गया. कई लोगों को इस बात का डर था कि इस प्रक्रिया का उपयोग मानव अंगों की तस्करी के लिए हो सकता है. 

डॉक्टर पी वेणुगोपाल (तस्वीर: PTI)

बहरहाल, डॉक्टर पी वेणुगोपाल, जिनका जन्म आज ही दिन यानी 6 जुलाई 1942 को हुआ था, तब एम्स में ह्रदय रोग विभाग के हेड हुआ करते थे. 1994 में बिल पास होने के तीन साल पहले से ही डॉक्टर वेणुगोपाल और उनकी टीम ट्रांसप्लांट की तैयारियों में लगे हुए थे. जैसे ही बिल पास हुआ, 3 अगस्त, 1994 को उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर भारत का पहला सफल हार्ट ट्रांसप्लांट किया. एक महिला जिसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया जा चुका था, उसके परिवार वालों ने हार्ट डोनेट करने की मंजूरी दे दी. इसके बाद इस महिला के दिल को एक 45 वर्षीय पुरुष के सीने में ट्रांसप्लांट कर दिया गया. जिसे इस ऑपरेशन की बदौलत 17 साल जिंदगी के और मिल गए. 

इसी दौरान दक्षिण भारत में एक और सर्जन थे, जो हार्ट ट्रांसप्लांट की कोशिश में लगे हुए थे. डॉक्टर KM चेरियन. लेकिन डोनर के लिए जरुरत थी ऐसे ब्रेन डेड मरीज की, जिसके परिवार वाले दिल डोनेट करने के लिए तैयार हो जाएं. साथ ही जिन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत थी उन्हें भी इसके लिए मनाना मुश्किल होता था. क्योंकि दिल को भावनाओं से जोड़कर देखा जाता था, इसलिए लोगों को लगता था कि दिल बदल जाने पर व्यक्ति भी बदल जाएगा. साथ ही लोगों की धार्मिक भावनाएं भी इसके आड़े आ रही थीं. 22 सितम्बर, 1995 के रोज़ चिन्नई में एक घटना हुई. 

ब्राह्मण का दिल मुसलमान के अंदर 

33 साल की हेमलथा सौंदरराजन पल्लवरम के नजदीक एक रोड क्रॉस कर रही थीं. जब सामने से आती एक गाड़ी उन्हें टक्कर मार देती हैं. हेमलथा को हॉस्पिटल लाया जाता है. जहां डॉक्टर उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर देते हैं. हेमलथा के पति रेलवे में काम करते थे. वो हेमलता के अंगों को किसी जरूरतमंद को देने को तैयार हो जाते हैं. ये बात डॉक्टर चेरियन तक पहुंचाई जाती है. हेमलथा का दिल किसी ही वक्त काम करना बंद कर सकता था, इसलिए चेरियन कोचीन, त्रिवेंद्रम और हैदराबाद के तमाम अस्पतालों में संपर्क करते हैं, ताकि कोई सूटेबल रिसीवर मिल जाए. आखिरकार उन्हें जनरल हॉस्पिटल चिन्नई से एक कॉल आता है.

मैमून बीवी और डॉक्टर चेरियन (तस्वीर: दन्यूज़मिनट)

38 साल की मैमून बीवी दिल की मरीज थीं और उन्हें जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की जरुरत थी. लेकिन रेलवे प्लेटफार्म पर रुमाल बेचने वाली मैमून बीवी के पास न इतना पैसा था, न उनकी कोई पहुंच थी. हॉस्पिटल में भी वो सिर्फ इसलिए भर्ती हुई थीं कि तीन वक्त का खाना मिल जाए. उनके ऑपरेशन की सारी जिम्मेदारी डॉक्टर चेरियन ने अपने ऊपर ली. इसके बाद शाम 9 बजे डॉक्टर चेरियन ऑपरेशन की शुरुआत करते हैं. रात का समय इसलिए रखा गया था क्योंकि चेरियन नहीं चाहते थे, मामला मीडिया की नजर में आए. हेमलथा एक ब्राह्मण थी, जबकि मैमून बीवी एक मुसलमान, इस बात पर भी हंगामा हो सकता था. इसलिए रात ही रात में डॉक्टर चेरियन ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया और इस प्रोसेस में उनकी टीम को 5 घंटे का वक्त लगा. रात 2 बजे जाकर ऑपरेशन पूरा हुआ. 

ढाई बजे मैमून बीवी को ICU में भर्ती किया गया हुए इसके बाद डॉक्टर चेरियन को फूल माला पहनकर केक काटा गया. भारत में पहली बार किसी प्राइवेट अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जरी को अंजाम दिया गया था. 
ये केस धार्मिक सद्भावना की एक अनूठी मिसाल था. एक ब्राह्मण महिला का दिल एक मुस्लिम महिला के सीने में लगाया गया, और ऐसा करने वाला एक ईसाई डॉक्टर था. जब तक मैमून बीवी जिन्दा रही, हेमलता के बच्चे हर साल उनके जन्मदिन पर मैमून बीवी से मिलने जाते रहे, ये सोचकर कि उनकी मां का दिल अभी भी ज़िंदा है. 6 साल तक हेमलथा के दिल के सहारे जिन्दा रहने के बाद मैमून बीवी की मृत्यु हो गई. हालांकि उनकी मृत्यु यूरिनरी ट्रैक्ट में हुए इंफेक्शन से हुई थी, और इस बीमारी का दिल से कोई लेना-देना नहीं था.

वीडियो देखें- 1971 के युद्ध की वो कहानी जो 48 साल बाद बाहर आई

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