भारतीय पहलवान जो नाश्ते में गोल्ड और सिल्वर खाता था!
कहानी गोबर गुहो और बसंता सिंह की, दो भारतीय पहलवान जिन्होंने 1920's में अमेरिका में खूब नाम कमाया.

साल 1929 जुलाई का महीना. अमेरिका के राज्य टेक्सस के एक शहर एल पासो में कुश्ती का आयोजन हो रहा था. आमने-सामने थे एशिया से अमेरिका आए दो पहलवान.‘मंजिरो मत्सुदा’, जिसका रिंग नेम मैटी था, जापान से अमेरिका आया था. वो जूडो और जुजिस्तु स्टाइल में माहिर था. उसका सिग्नेचर मूव था, सामने वाले को हवा में उछाल के चित करना. अपने इस मूव से वो लगातार 124 मैच जीत चुका था.
सामने था भारत से आया बसंता सिंह (Basanta Singh). बसंता कुश्ती के अलावा बाकी समय में फलों के बाग़ में मजदूरी किया करता था. घंटी के साथ मैच की शुरुआत हुई. मैटी ने पारम्परिक जुजिस्तु स्टाइल की नुमाइश करते हुए बसंता को दबोचने की कोशिश की. लेकिन बिजली सी फुर्ती दिखाते हुए बसंता ने मैटी को पटक डाला. अगले कुछ मिनटों के बीच दोनों में जोड़तोड़ चलती रही. कभी मैटी बसंता को अपनी कोहनी में फंसा लेता तो कभी बसंता उसकी टांग पकड़ लेता. आखिर में मैटी ने बसंता को अपनी टांगो के बीच फंसा लिया. दोनों जमीन पर थे. लग रहा था कि मैच बसंता के हाथ से गया. लेकिन देखते ही देखिए बसंता ने मैटी को “बियर हग” यानी भालू की तरह सामने से जकड़ लिया. मैटी की सांस उखड़ने लगी. तभी बसंता ने मैटी को हवा में उछालते हुए उसी के स्टाइल में पटखनी दे दी. मैच वहीं पर खत्म हो गया. लेकिन कहानी यहीं पर ख़त्म न हुई.
इस मैच में मैटी मत्सुदा को इस कदर चोट लगी कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. जहां तीन हफ्ते बाद उसकी मौत हो गई. इस घटना ने बसंता को रातों-रात फेमस कर दिया. रेसलिंग तब सिर्फ खेल न होकर जुआं खेलने का शगल हुआ करता था. जिसका जितना नाम, उसके मैच में उतनी भीड़ और उतना ही पैसा. इसलिए प्रमोटर खेल से ज्यादा पहलवानों को प्रमोट करते थे. जब बसंता के साथ मैच में मत्सुदा की बुरी हालत हुई, तो प्रमोटर ने बसंता के नाम से अफवाहें फैला दी कि वो पूरब से आया एक रहस्यमयी हिन्दू पहलवान है. अखबार में लिखा जाने लगा कि बसंता का शरीर ऐसा है मानो किसी ने आसमान से गिरती बिजली में ग्रीस लगा दी हो.

हालांकि बसंता ऐसा पहला पहलवान नहीं था जिसके नाम पर ऐसी अफवाहें उड़ी हों. इससे कुछ साल पहले एक भारतीय पहलवान अमेरिका आया जिसके बारे में कहा जाता था कि वो नाश्ते में सोना खाता है. इस पहलवान का नाम था गोबर गुहो (Gobar Guho). गोबर गोहो, और बसंता सिंह (Basanta Singh), इन दोनों ने कैसे अमेरिका में भारतीय कुश्ती की धूम मचाई. कहानी इसी बारे में है.
भारत से अमेरिका पहुंचे दो पहलवानबसंता सिंह का जन्म 1890 में हुआ था. 20 साल की उम्र में उन्होंने गुरदासपुर छोड़ दिया और कनाडा चले गए. वैंकूवर में कुश्ती होती थी. और प्रमोटर पहलवानों की स्टाइल प्रमोट किया करते थे. मसलन बॉक्सिंग स्टाइल, जुडो स्टाइल आदि. ऐसी ही एक स्टाइल थी पूरबी यानी हिन्दुस्तानी. बसंता ने यहां कुश्ती शुरू की और कुछ ही महीनों बाद अमेरिका शिफ्ट हो गए. ओरेगॉन राज्य में तब लकड़ी का काम हुआ करता था. जिसमें भारतीय, चीनी, पोलिश आदि लोग मजदूरी करते थे. यहां शौकिया तौर पर कुश्ती खेली जाती थी. और बसंता भी उसमें हिस्सा लिया करते थे.
फिर साल 1913 में ऑरेगोन में ग़दर आंदोलन की पहली मीटिंग हुई. और ऑरेगोन से कई भारतीय ग़दर में हिस्सा लेने के लिए भारत चले गए. बसंता ने भी ऑरेगोन छोड़ दिया और कैलिफ़ोर्निया चले गए. कुछ साल तक वो मेलों में हिन्दू फ़कीर के तौर पर प्रदर्शनी दिखाने लगे. 1920 के आसपास बसंता ने प्रोफेशनल बॉक्सिंग की शुरुआत की. और जैसे ही उनका थोड़ा नाम हुआ, ठीक उसी समय एक और भारतीय रेसलर अमेरिका आया और अमेरिकी रेसलिंग सीन में तूफ़ान की तरह छा गया. इनका नाम था जतिंद्र चरण गुहो.

जतिंद्र चरण गुहो की पैदाइश 1982 में हुई थी. कलकत्ता में. उनके पिता-दादा बड़े पहलवान थे. और बंगाल में कुश्ती को आगे बढ़ाने में उनके परिवार का अहम रोल था. स्वामी विवेकांनद अपने लड़कपन के दिनों में उन्हीं के अखाड़े में कुश्ती लड़ने आते थे. और उनके चाचा खेत्रकरण ने ही विवेकानंद को कुश्ती सिखाई थी. जतिंद्र चरण गुहो को प्यार से घर में गोबर बुलाया जाता था. कारण ये भी था कि भीमकाय काया होने के बावजूद उनका दिल कुश्ती में नहीं लगता था. उन्हें शास्त्रीय संगीत में रूचि थी.
1901 में उनके पिता की मौत हुई तो जतिंद्र चरण गुहो को परिवार का नाम रखने के लिए कुश्ती में उतरना पड़ा. अखाड़े में भी सब उन्हें गोबर गुहो कहकर बुलाते थे. साल 1910 में उन्हें कुश्ती टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए ब्रिटेन जाने का मौका मिला. और अगले तीन सालों में उन्होंने यूरोप में कई मुकाबले लड़े. कुश्ती का असली खेल अमेरिका में था, जहां दुनिया के सबसे बड़े रेसलर कुश्ती लड़ रहे थे. इसलिए गोबर गुहो ने अमेरिका जाने के निर्णय किया.
1920 के आसपास की बात होगी. अमेरिका में तब एशियाई लोगों के आने पर सख्ती लगा दी गयी थी. गोबर गुहो 5 डॉलर लेकर अमेरिका पहुंचे थे. एयरपोर्ट में उतरे तो अधिकारियों ने सवाल पूछ-पूछ कर नाक में दम कर दिया. क्यों आए हो, कहां जाओगे, क्या करोगे. इन सवालों का जवाब नाकाफी था. गुहो को पता चला कि एक्टर्स के आने पर छूट मिल जाती है. इसलिए उन्होंने झूठ बोला कि एक्टर हूं और एक्टिंग के नाम पर अमेरिका में इंटर हो गए. अगले 5-6 सालों तक उन्होंने अमेरिका में कुश्ती लड़ी.
नाश्ते में गोल्ड खाने वालाअडोल्फ अर्नेस्ट नाम के एक रेसलर हुआ करते थे. जिनका रिंग नेम ‘एड सेंटल’ था. सेंटल तब अमेरिका के सबसे बड़े रेसलर माने जाते थे और कई सालों से वर्ल्ड लाइट हैवीवेट चैम्पियन थे. माना जाता था कि सेंटल को कैच रेसलिंग में कोई नहीं हरा सकता. फिर 1921 में आज ही दिन यानी 30 अगस्त को एक मैच हुआ. सैन फ्रांसिस्को के कोलेजियम अखाड़े में हजारों की भीड़ के सामने गोबर गुहो ने सेंटल को पटखनी दी और वर्ल्ड लाइट हैवीवेट चैम्पियन बन गए. ऐसा करने वाले वो पहले एशियाई थे.

इस जीत से गुहो के चर्चे हर तरफ फ़ैल गए. कैनसन के एक अखबार ने लिखा, ”Invasion of Hindu menace breeds fear among matmen”. यानी हिन्दू पहलवान ने बाकी पहलवानों में दहशत फैला दी है. ख़बरें उड़ने लगी कि गोबर घंटों तक अपनी सांस रोक सकता है.
तब लेजेंड्री अमेरिकी कार्टूनिस्ट रॉबर्ट रिप्ली का अख़बार में एक कॉलम छपा करता था. “रिप्लीज बिलीव इट ऑर नॉट”. रिप्ली ने गोबर गुहो का एक कार्टून बनाया, जिसका शीर्षक था, “द गोल्ड ईटर”. यानी सोना खाने वाला. कार्टून में गोबर गुहो को सोने की पत्तियां खाते हुए दिखाया गया था. साथ ही गुहो को वर्जिश करते हुए भी दिखाया गया, जिसमें गुहो एक पत्थर का चक्का लेकर सीढ़ियां चढ़ रहे थे. अखबार में लिखा जा रहा था कि वो सोने और चांदी का पावडर शहद में मिलाकर खाते थे.
बहरहाल इस मुकाबले के कुछ महीनों बाद एक और मुकाबला रखा गया. अबकी बार गोबर का मुकाबला एड लुइस नाम के एक अमेरिकी रेसलर से था, जिनका निक नेम स्ट्रेंगलर था. स्ट्रेंगलर यानी गला दबा देने वाला. इस मुकाबले में गोबर की हार हुई. लेकिन कई घंटो चले इस मुकाबले में एड लुइस ने चीटिंग की थी, ऐसा भी कई जगह कहा गया.
रहस्यमयी हिन्दू पहलवानइस मुकाबले के बाद भी गोबर ने कई लड़ाइयां लड़ी. अमेरिका में उन्हने एक रहस्यमयी हिन्दू पहलवान की तरह देखा जाता था. वो भारतीय पोशाक पहनते थे. उनकी वेशभूषा को देखकर उनके नाम पर और कई बातें भी चलने लगी थीं. अखबारों में लिखा जाता था कि वो ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़े हैं. कोई लिखता था कि वो भारत के राजकुमार है. तो कोई कहता था कि वो गांधी के विचारों पर भाषण दे सकते हैं. बहरहाल 1927 तक अमेरिका में कुश्ती लड़ने के बाद गोबर गुहो भारत आ गए और अपने पारिवारिक अखाड़े को संभालने लगे.

उनके बरअक्स बसंता सिंह ने अमेरिका में ही रहना चुना. 1940 तक कुश्ती लड़ने के बाद बसंता ने कुश्ती छोड़ दी और हॉलीवुड फिल्मों में काम करने लगे. उन्होंने ‘राउंड द वर्ल्ड इन 80 डेज", ‘द टेन कमाण्डेन्ट्स' और ‘द ग्रेटेस्ट स्टोरी एवर टोल्ड’ जैसी कई फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए. 1965 में उनकी मृत्यु हो गई.
जहां तक गोबर गुहो की बात है, वो 1944 तक कुश्ती में एक्टिव रहे और उसके बाद कुश्ती की ट्रेनिंग देने लगे. अपने समय में उन्होंने लगभग 5000 लोगों को कुश्ती सिखाई. साल 1972 में उनकी भी मृत्यु हो गई.
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