कैसे बासमती बेचने वाले भारतीय व्यापारी को एक पाकिस्तानी ने FBI के जाल में फंसाया?
गुजरात से व्यापार करने लन्दन पहुंचा हेमंत लखानी अमेरिका में आतंकियों को मिसाइल बेच रहा था.

साल 2003. अगस्त का महीना. चंद हफ़्तों बाद 9/11 की दूसरी बरसी है. अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य स्थित एक होटल में मीटिंग चल रही है. रहमान नाम का एक आदमी हेमंत लखानी नाम के एक आर्म्स डीलर से कहता है, देखिए मैंने आपसे कहा था न, ये अमेरिका है, यहां कुछ भी लाना असंभव नहीं.
लखानी जवाब देता है, हां. अब काम शुरू हो सकता है.
उसके हाथ में एक डब्बा था, जिसे वो सर के ऊपर उठा कर हिला रहा था, मानो चेक कर रहा हो कि सब ठीक है.
रहमान पूछता है, सोचो अगर 6-7 प्लेन एक साथ गिरा दें तो, इनकी इकॉनमी बर्बाद हो सकती है?
हां, लेकिन अगर 10-15 जगह एक साथ हमला हो तो, लखानी बात पूरी करता है.
दोनों हां में हां मिलाते हैं. रहमान कहता है, ये काम मंडे या फ्राइडे को होना चाहिए, जब एयरपोर्ट सबसे बिजी होते हैं. इसके बाद दोनों की गर्दन मुड़कर सामने सोफे की तरफ घूम जाती है. वहां रखी थी एक मिसाइल. ये असाइनमेंट का का सिर्फ एक सैंपल था. आने वाले दिनों में 200 मिसाइलें अमेरिका पहुंचने वाली थी. जिसके बाद 9 /11 की बरसी पर अमेरिका में एक और बड़ा आतंकी हमला होता.
रूस से ये मिसाइल अमेरिका कैसे पहुंची. उससे भी दिलचस्प कहानी है, इसके आगे की. मीटिंग पूरी होती ही होटल का दरवाज़ा खुलता है और रहमान और लखानी दोनों बाहर निकल जाते हैं.
लॉबी में कुछ कदम जाते ही लखानी का सामना दो FBI एजेंट्स से होता है. लखानी गिरफ्तार हो चुका था. उसी शाम जेल में कुसुम उससे मिलने आती हैं. उसकी पत्नी. लखानी कहता है, रहमान कहां है?
तब कुसुम जो जवाब देती है उसे सुनकर हेमंत उसकी सिटी पट्टी गुम हो जाती है.
सामने रह जाते हैं कुछ सवाल.
रहमान की असली पहचान क्या थी?
रूस से मिसाइल अमेरिका के एक होटल तक कैसे पहुंची?
और भारत में चावल का धंधा करने वाला एक आदमी, जो दावा करता था कि एक घंटे में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को अपने कमरे में बुला सकता है, जो कहता था कि मुअम्मर गद्दाफी उसका दोस्त है, अमेरिका का सबसे बड़ा गुनाहगार कैसे बन गया?
ये बात तब की है जब साल 2001 में 9 /11 आतंकी हमले के बार अमेरिका आतंकियों के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़े हुए था. उसी साल दुबई में हेमंत लखानी की मुलाक़ात होती है अब्दुल कयूम से, जिसका नाम मुंबई बम धमाकों से जुड़ा हुआ था और उसे अमेरिका ने अपनी टेरर लिस्ट में भी डाल रखा था. लखानी एक तेल रिफाइनरी खरीदना चाहता था, और इस धंधे के लिए उसे कुछ लोगों की तलाश थी, जो पैसा लगा सकें. ये मीटिंग भी इसी सिलसिले में हुई थी. कयूम ने लखानी से कहा कि हाजी नाम का एक आदमी है. जो अमेरिका में रहता है और उसके पास काफी पैसा है. मुमकिन है
कि वो पैसा लगाने के लिए तैयार हो जाए.

इसके बाद जनवरी 2002 में लखानी और हाजी की न्यू यॉर्क में मुलाक़ात होती है. बात तेल से शुरू होकर हथियारों तक पहुंच जाती है. लखानी हाजी को बताता है कि गुजरात से शुरू कर उसने लन्दन में कपड़ों का धंधा बनाया और आज वो लन्दन में काफी रसूख रखता है. वो ब्रिटेन के शाही परिवार से अपने रिश्तों का जिक्र करता है. और बताता है कि वो टोनी ब्लेयर के साथ प्रधानमंत्री आवास में डिनर कर चुका है. इसके अलावा वो गद्दाफी और बेनजीर भुट्टो से अपनी दोस्ती का जिक्र भी करता है.
इसी दौरान लखानी बताता है कि उसने हथियारों की डील भी की है. और कुछ साल उसने अंगोला की सरकार को कुछ हथियार बेचे थे. ये सुनते ही हाजी अपने असली मकसद पर आ जाता है. वो लखानी से कहता है कि उसे कुछ हथियार चाहिए. लखानी कहता है कि वो एंटी एयरक्राफ्ट गन से लेकर मिसाइल तक सब कुछ डिलीवर कर सकता है. हाजी पूछता है और क्या-क्या मिल सकता है. लखानी कहता है कि बेचने वाला प्लूटोनियम से लेकर न्यूक्लियर सबमरीन तक, सब कुछ दे सकता है, बशर्ते पैसा वाजिब हो.
हाजी कहता है, पैसे की चिंता मत करो. इसके बाद लखानी को पता चलता है कि हाजी के सम्बन्ध एक सोमालियाई आतंकी गुट से थे, जो अमेरिका में जिहाद शुरू करना चाहते थे. अप्रैल महीने में दोनों की एक और मुलाक़ात होती है. अबकी हाजी कहता है कि उसे 200 मिसाइल का आर्डर देना है. लखानी तैयार हो जाता है. इस पर हाजी एक और शर्त रखता है. उसे एक कम से कम एक मिसाइल अभी चाहिए थी, ताकि भरोसा हो सके कि हाजी मिसाइल डिलीवर कर सकता है. वो लखानी को एक महीने का वक्त देता है.
रूस से मिसाइल अमेरिका पहुंचीएक महीना गुजरते गुजरते एक साल में बीत जाता है. मिसाइल का कहीं अता-पता नहीं था. लखानी बार-बार हाजी से कह रहा था कि जल्द ही मिसाइल मिल जाएगी. लेकिन असलियत में उसे खुद नहीं पता था कि मिसाइल कब आएगी. उसका एकमात्र स्त्रोत यूक्रेन की एक कंपनी थी, जिससे उसके ताल्लुकात थे. लेकिन वहां से हथियार खरीदने के लिए सरकारी दस्तावेजों की जरुरत थी, और ये काम इतना आसान था नहीं, जितना लखानी मान कर चल रहा था.
इसके बाद लखानी ने रूस में बात चलाई. यहां उसे मिस्टर व्लादिमीर नाम का एक आर्म्स सप्लायर मिला. और अगस्त 2003 में एक रशियन मेड Igla SA-18 मिसाइल और लॉन्चर अमेरिका पहुंच गए. होटल के जिस कमरे ये ये मिसाइल और लॉन्चर मिले थे, वहीं से, उसी दिन लखानी को FBI ने गिरफ्तार कर लिया. लखानी जेल पहुंचा. FBI ने जब पूछताछ शुरू की तब लखानी को एक लम्बे गेम का पता चला.

दरअसल पूरी कहानी ही ढकोसला थी. न कोई आतंकी संगठन था. न कोई हमले का प्लान. हाजी मुहम्मद हबीब रहमान, जिसे अब तक वो एक आतंकी मान रहा था. वो असल में FBI का इन्फॉर्मॅट था. लखानी शिकार बना था अमेरिका की इंटरनल पॉलिटिक्स और लालच का. परदे के पीछे क्या हुआ था, ये समझने के लिए इससे दो दशक पीछे चलते हैं.
वॉर ऑन ड्रग्स90’s का दौर. अमेरिका तब एक दूसरी जंग में लगा हुआ था. वॉर ऑन ड्रग्स, और ड्रग्स की बड़ी खेप पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से आती थी. उसी दौर में चार्ल्स ली नाम का एक अमेरिकी एजेंट लाहौर में तैनात था. उसकी मुलाक़ात हाजी रहमान से हुई. रहमान ने ड्रग्स के कारोबार से जुड़ी जानकारी दी और ली के बड़े काम का साबित हुआ. लेकिन फिर कुछ साल बाद हाजी रहमान की पहचान उजागर हो गई. उसकी जान को खतरा था. इसलिए ली उसे और उसके परिवार को अमेरिका ले आया. यहां आकर हाजी रहमान ने FBI के मुखबिर के तौर पर काम करना शुरू किया. हालांकि पाकिस्तान में अपनी पहचान के चलते वो जानकारी इकठ्ठा करता था, और अमेरिका में ये सब मुश्किल था. इसलिए कुछ ही साल काम करने के बाद वो नाकारा साबित हुआ. ली और FBI ने उससे अपने रिश्ते तोड़ लिए. उस पर बहुत क़र्ज़ भी चढ़ गया था, इसलिए उसने एक दो बार धोखाधड़ी की कोशिश भी की.
हाजी रहमान की किस्मत चमकी 2001 के आतंकी हमले के बाद. अमेरिका में आतंकी संगठनों की जानकारी रखने वाले, भाषा पहचानने वालों की बहुत मांग हो गई थी. रहमान को इसी का फ़ायदा मिला. वो दुबारा FBI के मुखबिर के तौर पर काम करने लगा. उस पर अभी भी काफी क़र्ज़ बाकी था, इसलिए वो जल्द से जल्द FBI के काम आकर कुछ पैसे जुगाड़ना चाहता था. उसी साल किस्मत से उसकी बात हेमंत लखानी से हुई. लखानी तेल का धंधा शुरू करना चाहता था, लेकिन रहमान ने उसे हथियारों के धंधे का लालच देकर फंसा लिया. दोनों की बीच जितनी भी मीटिंग हुई, सब FBI रिकॉर्ड कर रही थी.
वो रहमान को 200 मिसाइल देने को भी तैयार हो गया, जबकि उसके पास असल में इन हथियारों को खरीदने का कोई सोर्स नहीं था. सोर्स क्या, उसके पास पैसे भी नहीं थे. फिर भी उसने एक मिसाइल खरीदने की कोशिश की. पहले उसने यूक्रेन में बात चलाई. वहां बात नहीं बनी तो उसने रशिया में कोशिश की. इसी दौरान वो रूस की सुरक्षा एजेंसी FSB की नजरों में आ गया. अमेरिका और रूस के रिश्ते तब आज जैसे नहीं थे. बाकायदा तब रूस ने अमेरिका के वॉर ऑन टेरर पर समर्थन का वायदा किया था. इसलिए FSB को जैसे ही पता चला कि लखानी हथियार खरीदने की कोशिश कर रहा है, उन्होंने ये बात अमेरिका तक पंहुचा दी.
अमेरिका ने अमेरिका को हथियार बेचेFBI लखानी की फील्डिंग बैठाने की फिराक में थी. लेकिन इसके लिए एक पुख्ता सबूत की जरुरत थी. और ये सबूत तभी मिलता जब लखानी मिसाइल भेजने में सफल हो पाता. इसलिए अमेरिकी ने FSB से कहा कि वो एक आर्म्स डीलर बनकर लखानी को एक फ़र्ज़ी मिसाइल बेच दें. FSB ने मिस्टर व्लादिमीर नाम का एक फ़र्ज़ी आर्म्स विक्रेता बनाया और लखानी को मिसाइल बेचने के लिए तैयार हो गए.

ये सब तो हो गया लेकिन एक दिक्कत अभी भी थी. लखानी की हालत खस्ता थी, उसके पास मिसाइल खरीदने के भी पैसे नहीं थे. अब सोचिए ये पैसे कहाँ से आए होंगे. ये पैसे लखानी को हाजी रहमान ने दिए, और रहमान को ये पैसा खुद अमेरिकी सरकार से मिला.
यानी FBI खुद ही हथियार बिकवा कर, खुद ही खरीद रही थी. लेकिन लखानी को इसका कुछ अता-पता नहीं था. असल में वो 70 साल का एक चुका हुआ व्यापारी था. जैसा कि वो बताता था, वो लन्दन का कोई रईस नहीं था, उसका धंधा चौपट हो चुका था. और वो सिर्फ करोड़ो डॉलर की डील सुनकर इस लालच में फंस गया था. उसका इससे पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं था, न ही आतंकी संगठनों से कोई रिश्ता. फिर भी पैसों के लालच में उसने कहानियां बनाई. मीटिंग की रिकॉडिंग में उसे ओसामा बिन लादेन और कश्मीर में जिहाद की तारीफ़ करते हुए पाया गया.
बहरहाल लखानी की मिस्टर व्लादिमीर की जून 2003 में मुलाक़ात हुई और उसने मिसाइल खरीद ली. जो कि असल में एक डमी मिसाइल थी. FSB ने उसके सामने मिसाइल को एक जहाज में चढ़ाया और बताया कि ये पानी के रास्ते अमेरिका पहुंच जाएगी. असलियत में मिसाइल को अमेरिकी सरकार के एक प्लेन के जरिए अमेरिका लाया गया और न्यू आर्क के उस होटल में रखवा दिया गया. जहां लखानी और हाजी रहमान की आख़िरी मुलाक़ात हुई. लखानी चकित था कि इतनी आसानी से सब कुछ हो गया. लेकिन असलियत तब पता चली जब वो गिरफ्तार हुआ. पूछताछ में उसने सारी सच्चाई उगल भी दी. 12 अगस्त को उसकी गितफ़्तारी हुई और आज ही के दिन यानी 18 अगस्त, 2003 को उस पर मुक़दमे की शुरुआत हुई. इस मामले में लखानी को 47 साल जेल की सजा सुनाई गई और साल 2013 में जेल में ही उसकी मौत हो गई.
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