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नेहरू ने गोवा की आजादी में 14 साल क्यों लगाए?

19 दिसंबर 1961 के दिन गोवा 450 साल पुराने पुर्तगाली शासन से आजाद हुआ था. नेहरू ने गोवा की आजादी में 14 साल क्यों लगाए और 1961 में ऐसा क्या हुआ जो, नेहरू अचानक गोवा पर एक्शन के लिए तैयार हो गए?

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19 दिसंबर 2022 (अपडेटेड: 16 दिसंबर 2022, 11:00 PM IST)
Nehru Goa Liberation
19 दिसंबर 1961 के दिन गोवा पुर्तगाली शासन से आजाद हुआ था (तस्वीर-Wikimedia commons/livemint.com)
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1965 में महमूद की एक फिल्म आई थी. जौहर महमूद इन गोवा. इसी फिल्म के एक गीत की लाइने हैं, 

हलाकू रहा है न हिटलर रहा है
मुसोलिनी का ना वो लश्कर रहा है
नहीं जब रहा रूस का जार बाकी
तो कैसे रहेगा सालाजार बाकी

यहां पढ़ें-1987 में भारत ने चीन को सबक सीखा दिया था!
यहां पढ़ें-तवांग भारत का हिस्सा कैसे बना?

हिटलर, मुसेलिनी, रूस का ज़ार. इन नामों से आप वाकिफ होंगे. हलाकू चंगेज़ खान के एक खूंखार जनरल का नाम था. और बाकी बचा सालाजार. - ये नाम है यूरोप में सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले तानशाह का. पूरा नाम - अंटोनियो डी ऑलिविएरा सालाजार(António de Oliveira Salazar). सालाजार ने पुर्तगाल पर 36 साल तक राज किया. और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब पूरे यूरोप में तानाशाह मक्खियों की तरह झड़ रहे थे. सालाजार 1968 तक पुर्तगाल की सत्ता पर काबिज़ रहा. हम इनकी बात क्यों कर रहे हैं. इसका कारण है आज की तारीख और एक बयान. 
साल 2022, फरवरी का महीना. 3-4 दिन के अंतराल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी(Narendra Modi) ने पहले संसद में और फिर एक चुनावी रैली के दौरान कहा,

“नेहरू ने अपनी इंटरनेशनल इमेज बचाने के लिए गोवा को 14 साल तक गुलाम रहने दिया”.

ये तो था बयान. अब तारीख की बात कर लेते हैं. 19 दिसंबर, 1961 की तारीख थी, जब गोवा आजाद हुआ (Goa Liberation). गोवा पर 450 साल तक राज करने वाले पुर्तगालियों का शासन मात्र 36 घंटों में ख़त्म हो गया. 

गोवा पर पुर्तगाली शासन की शुरुआत 

गोवा पर पुर्तगालियों के शासन की शुरुआत हुई साल 1510 में. जब अल्फोंसो डी ऐल्बकर्की नाम के एक पुर्तगाली गवर्नर ने बीजापुर की आदिलशाही से गोवा को जीत लिया. इसके लगभग 270 साल बाद पहली बार गोवा की आजादी की पहली कोशिश हुई. इस घटना को पिंटो कॉन्सपिरेसी(Conspiracy of the Pintos) के नाम से जाना जाता है. कंडोलिम के एक गांव में पिंटू परिवार रहता था. इस परिवार के लोगों पादरी नियुक्त होते थे. लेकिन पुर्तगालियों के शासन में इन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता था. चर्च के ऊच पदों पर स्थानीय लोगों के बजाय पुर्तगालियों और यूरोपियन लोगों को तरजीह दी जाती थी. पिंटो परिवार ने इसके खिलाफ आवाज उठाई. लेकिन जब इनकी नहीं सुनी गई तो पिंटो परिवार ने मैसूर के टीपू सुल्तान से हाथ मिला लिया.

Afonso de Albuquerque
गोवा का पहले ड्यूक अल्फोंसो डी ऐल्बकर्की (तस्वीर-Wikimedia commons)

योजना के अनुसार इन लोगों को पुर्तगाली सैनिकों के खाने में जहर मिलाना था. जिसके बाद टीपू की फौज गोवा पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लेती. लेकिन योजना शुरू होने से पहले ही फेल हो गई. पिंटो परिवार ने एक स्थानीय बेकर से सेना की ब्रेड में ज़हर मिलाने को कहा, लेकिन उसने पुर्तगालियों के सामने इस षड्यंत्र का भांडा फोड़ दिया. पुर्तगालियों ने नजीर पेश करने के लिए 15 लोगों को सरेआम मौत की सजा दे दी.

गोवा की आजादी की अगली कोशिश 1910 के आसपास हुई. 1910 में पुर्तगाल में राजशाही का खात्मा हुआ. गोवा के लोगों में उम्मीद जगी कि अब उन्हें भी अब पुर्तगालियों की तरह ज्यादा अधिकार मिलेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उसी दौर में गोवा में पहले पुर्तगाली अख़बार की शुरुआत हुई थी. ‘ओ हेराल्डो’ नाम के इस अख़बार ने पुर्तगाली शासन की खूब मुखालफत की. जिसके नतीजे में 1917 में पुर्तगाल ने नया क़ानून पास कर पहले से भी ज्यादा सख्ती लागू कर दी. 1930 में पुर्तगाल ने एक और क़ानून पास किया. जिसके तहत पुर्तगाल की सारी कोलोनियों में राजनैतिक सम्मेलन और रैली पर पाबंदी लगा दी गई.

इस क़ानून से एक असर ये भी हुआ कि पहली बार पुर्तगाल ने आधिकारिक तौर पर गोवा को कॉलोनी का स्टेटस दिया. 1938 में गोवन कांग्रेस की स्थपाना हुई. और 1940 से 1946 के बीच गोवा में लगातार सत्याग्रह चलाया गया. जिसे लीड कर रहे थे राम मनोहर लोहिया(Ram Manohar Lohia). पुर्तगाली प्रशासन ने 1946 में सारी सत्याग्रहियों को जेल में डाल दिया, जिससे आंदोलन ठंडा पड़ने लगा. आंदोलनकारियों को लग रहा था कि भारत की आजादी के साथ ही गोवा भी आजाद हो जाएगा. लेकिन पुर्तगाल के तानाशाह सालाजार का ऐसा कोई इरादा नहीं था. आगे बढ़ने से पहले थोड़ा सालाजार के बारे में जान लीजिए.

Ram Manohar Lohia
राम मनोहर लोहिया (तस्वीर-Facebook)
वो तानाशाह जो WW2 के बाद भी सत्ता में बना रहा 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी सालाज़ार अपनी सत्ता बनाए रखने में कामयाब रहा था. जबकि यूरोप में तमाम तानाशाह सत्ता से हटाए जा रहे थे. सालाज़ार की इस सफलता का कारण था उसकी न्यूट्रल रहने की रणनीती. सालाजार हिटलर विरोधी था, लेकिन वो जानता था कि जर्मनी के खिलाफ युद्ध करने की उसकी हैसियत नहीं है. इसलिए पुर्तगाल ने युद्ध के दौरान तटस्थ रहने की रणनीति अपनाई. इस बीच मित्र राष्ट्रों ने भी सालाज़ार पर ज़्यादा दबाव नहीं डाला. वो नहीं चाहते थे कि पुर्तगाल ऐक्सिस पावर्ज़ की तरफ़ झुके, क्योंकि ऐसा होने की स्थिति में स्पेन भी ऐक्सिस पावर्ज़ की तरफ़ झुक जाता. युद्ध की समाप्ति के बाद पुर्तगाल को, या कहें कि सालाज़ार को इसका फ़ायदा भी मिला.

मार्शल प्लान के तहत उसके अमेरिका से फंड मिला, उसे NATO की सदस्यता दी गई, और इस सबके बीच सालाज़ार की तानाशाही भी बरकरार रही. यानी चारों ऊंगलियां घी में और सर कढ़ाही में. अब इसी संदर्भ में गोवा को देखिए. NATO का मेम्बर होने के चलते पुर्तगाल को सुरक्षा की गारंटी मिली हुई थी. हालांकि NATO के नियमों के अनुसार ये सुरक्षा कोलोनियों को नहीं मिलती थी. लेकिन सालाज़ार ने यहां पर एक चाल चलते हुए गोवा को पुर्तगाल का हिस्सा घोषित कर दिया. जिसके चलते भारत की सिचुएशन जटिल हो चुकी थी. नेहरू कई बार कह चुके थे कि गोवा भारत का अभिन्न अंग है. उन्होंने पुर्तगाल से बातचीत की कोशिश भी की. सालाज़ार ने जवाब दिया, गोवा हमारा हिस्सा है, कोई दान या तोहफ़े में देने की चीज़ नहीं.

António de Oliveira Salazar
पुर्तगाल के तानाशाह अंटोनियो डी ऑलिविएरा सालाजार (तस्वीर-Wikimedia commons)

इस बीच गोवा में आजादी की कोशिश लागातार जारी थी. गोवन कांग्रेस सत्याग्रह से कोशिश कर रही थी, वहीं आज़ाद गोमांतक दल और गोवा लिबरेशन आर्मी जैसे दल सशस्त्र संघर्ष से गोवा को आज़ाद कराने में लगे थे. 1953 में इस मुद्दे पर पुर्तगाल और भारत के संबंधों में इतना तनाव आ गया कि दोनों देशों ने अपने राजनयिक सम्बंध तोड़ लिए. ठीक इसी समय पुर्तगाल के साथ साथ फ़्रेंच कोलोनियों का मुद्दा भी सामने था. 1954 तक पांडिचेरी को भारत में विलय करा लिया गया. ये विलय कमोबेश शांतिपूर्वक हुआ था क्योंकि भारत को अपनी सेना नहीं भेजनी पड़ी थी. नेहरू(Jawaharlal Nehru) को लग रहा था, गोवा में भी सेना के बिना काम चल जाएगा.

नेहरू ने सत्याग्रहियों की मदद नहीं की 

पुर्तगाल के खिलाफ नेहरू UN में गए. इधर देश में उन पर लेफ्ट और राइट दोनों तरफ से दबाव पड़ रहा था. जनसंघ के नेता जगन्नाथ राव(Jagannath Rao) ने 3000 हजार लोगों को साथ लेकर गोवा में घुसने की कोशिश की. इस दौरान हुए लाठीचार्ज में कई लोग घायल हुए, और कई लोगों पर गोलियां भी चलाई गईं.  वहीं 1955 में कम्युनिस्ट पार्टी ने देशभर के कार्यकर्ताओं की टुकड़ियां गोवा भेजना शुरू कर दी. जत्थे के जत्थे गोवा में जाने लगे, जिसके नतीजे में कई बार गोलियां भी चलीं. हजारों को जेल भी जाना पड़ा. ये देखकर पुर्तगाल ने इंटरनेशनल कम्युनिटी के सामने कहना शुरू किया कि भारत उनकी सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ कर रहा है. नतीजतन नेहरू को बयान जारी कर कहा,

“कुछ लोग हमें सेना भेजने पर मजबूर करना चाहते हैं. लेकिन जो सत्याग्रह करना चाहते हैं वो सत्याग्रह के सिद्धांत याद रखें. सत्याग्रहियों के पीछे सेना नहीं जाती.”

हालांकि नेहरू पूरी तरह मिलिट्री एक्शन में विरोध में नहीं थे. एस गोपाल अपनी किताब, जवाहरलाल नेहरू: अ बायोग्राफ़ी में लिखते हैं, नेहरू का मानना था कि पुर्तगाली उन्हें फंसाने की कोशिश कर रहे हैं. इस पर नेहरू ने कहा था,

“मिलिट्री एक्शन, कब और कैसे होगा, ये मैं नहीं कह सकता लेकिन मुझे बिलकुल शक नहीं कि ऐसा होगा ज़रूर.”

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नेहरू अहिंसक तरीकों से पुर्तगाल को गोवा सौंपने के लिए राजी करना चचते थे लेकिन ये तरीका नाकामयाब रहा (तस्वीर-Wikimedia commons)

इस बीच गोवा का मुद्दा इंटरनेशनल बनता जा रहा था. 1955 में सोवियत प्रीमियर निकोलाई बुलगानिन ने भारत का दौरा किया. उन्होंने गोवा पर भारत के दावे का समर्थन किया. कोल्ड वॉर का जमाना था. इसलिए अमेरिका का रिएक्शन आना लाजमी था, जो आया भी. अमेरिकी स्टेट सेक्रेटरी फ़ॉस्टर डलस ने एक बयान जारी किया. जिसमें उन्होंने गोवा को पुर्तगाल का हिस्सा बता दिया. भारत में इस बयान के खूब निंदा हुई. नेहरू ने कहा,

“अमेरिका जितनी मदद देना चाहता है, उससे ज़्यादा नुक़सान उनके इस बयान ने किया है ”

अमेरिका ने कहा, जनमत संग्रह कराओ  

इस मुद्दे पर 1955 में अमेरिका और पुर्तगाल के बीच एक मुलाक़ात का ज़िक्र मिलता है. 30 नवंबर को हुई इस मुलाक़ात में पुर्तगाल के विदेश मंत्री पावलो कुन्हा और अमेरिकी स्टेट सेक्रेटरी फ़ॉस्टर डलस के बीच गोवा को लेकर चर्चा हुई थी. कुन्हा गोवा के मुद्दे पर सोवियत दख़ल से बातचीत की शुरुआत करते हैं. इस पर डलस उन्होंने मशवरा देते हुए कहते हैं, आपको प्लेबिसाइट यानी जनमत संग्रह के बारे में सोचना चाहिए. डलस का इशारा था कि अगर जनमत संग्रह के लिए पुर्तगाल तैयार हो जाए, तो अमेरिका खुलकर पुर्तगाल की सिफ़ारिश कर पाएगा. कुन्हा ने जवाब दिया, “अगर कल अलास्का या फ़्लोरिडा जनमत संग्रह करना चाहें तो क्या अमेरिका इसके लिए तैयार होगा”. साथ ही उन्होंने कहा, नेहरु पहले ही कह चुके हैं, जनमत संग्रह से भारत के दावे को कोई असर नहीं पड़ेगा.

Kennedy & Nehru
अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन ऍफ़ केनेडी के साथ नेहरू (तस्वीर-sundayguardianlive.com)

इस समय पर अमेरिका के आक्रामक रुख़ को देखते हुए ये कहना कठिन है कि अगर भारत सैन्य हस्तक्षेप की कोशिश करता तो इस पर NATO का क्या रिएक्शन होता. NATO चार्टर के आर्टिकल 5 के तहत NATO देशों को पुर्तगाल की सहायता के लिए आना पड़ता. शायद इसी कारण से भारत ने सैन्य हस्तक्षेप से परहेज़ किए रखा. फिर एक सवाल खड़ा होता है कि 1961 में ऐसा क्या हुआ कि नेहरू सैन्य हस्तक्षेप के लिए राजी हो गए. 1961 में जॉन ऍफ़ केनेडी(John F. Kennedy) अमेरिका के राष्ट्रपति बने. केनेडी अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले भारत के प्रति सॉफ्ट कार्नर रखते थे. 16 दिसंबर 1961 नेहरू को लिखे एक खत में केनेडी लिखते हैं,

“हम भारत से संयम बरतने की अपेक्षा रखते हैं. अमेरिका कोशिश करेगा कि पुर्तगाल दीवार पर लिखे सत्य को स्वीकार करे, और उस जगह से निकल जाए, जहां उसकी स्वीकार्यता नहीं है”

हालांकि नेहरू ने इस बार किसी की नहीं सुनी. 17 दिसंबर 1961 को भारत की सेना ने गोवा में एंट्री की और 36 घंटे के अंदर गोवा को आजाद करा लिया गया. इस मुद्दे पर अमेरिका ने नाराजगी जताई. केनेडी ने भारतीय राजदूत को बुलाकर कहा, 

"पिछले 14 से आप हमें नैतिकता सिखा रहे हो. और आखिर में आपने भी वही किया जो कोई आम देश करता है. ये ऐसा है मानो कोई नीति उपदेशक वैश्यालय से बाहर निकलते पकड़ा गया हो”

1961 में नेहरू मिलिट्री एक्शन के लिए क्यों तैयार हुए? 

1961 में अमेरिका के सॉफ्ट रिएक्शन के और भी कई कारण थे. उसी साल अमेरिका क्यूबा पर होने वाले ‘बे ऑफ पिग्स’ इन्वेजन की तैयार में लगा हुआ था. वहीं अफ्रीकी महाद्वीप, सऊदी अरब और सोवियत संघ जैसे देश गोवा के मुद्दे पर भारत के समर्थन में थे. वहीं पुर्तगाल में सालाजार की लोकप्रियता भी लगातार घटती जा रही थी. NATO देश एक तानशाह को अपने बीच पाकर ज्यादा सहज भी नहीं थे. इन्हीं कारणों के चलते अमेरिका ने भारत के एक्शन पर ज्यादा सख्त प्रतिक्रिया नहीं दी. 1962 में अमेरिका ने भारत को मिलने वाली फॉरेन ऐड पर 25% की मामूली कटौती कर इस मुद्दे से हाथ धो लिया.

Goa Liberation
17 दिसंबर 1961 के दिन भारत की सेना ने गोवा को आजाद करा लिया (तस्वीर-indiansingulf.in)

ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी भारत के कदम की आलोचना की लेकिन कोई बड़ा कदम नहीं उठाया. वहीं भारत के इस कदम से पुर्तगाल में मातम का माहौल हो गया. लिस्बन की सड़कों पर सन्नाटा छा गया. उस साल पुर्तग़ालियों ने क्रिसमस नहीं मनाया. लिस्बन की सड़कों पर एक मातम जुलूस निकला. सालाजार ने प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय ब्रिगेडियर सगत सिंह के सर पर 10 हजार डॉलर का इनाम रख दिया. सगत सिंह गोवा में पैराशूट रेजिमेंट को कमांड कर रहे थे, और वहीं सबसे पहले लोगों में एक थे जिन्होंने गोवा की राजधानी पणजी में लैंड किया था.

गोवा पर कब्ज़े के साथ ही भारत और पुर्तगाल के सम्बन्ध पूरी तरह ठन्डे हो गए. 1974 में जब पुर्तगाल में क्रांति के तहत तानशाही का अंत हुआ, तब जाकर दोनों देशों के संबंध दोबारा बहाल हुए. 31 दिसंबर 1974 को दोनों देशों के बीच एक ट्रीटी साइन हुई, जिसमें पुर्तगाल ने दमन दीव, दादरा-नागर हवेली सहित गोवा को भारत का अभिन्न हिस्सा स्वीकार कर लिया. 1990 में भारत के राष्ट्रपति ने पुर्तगाल का दौरा किया, और 1992 में पुर्तगाली राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आए, जिस दौरान उन्होंने गोवा का दौरा भी किया. 
इसी के साथ आज का तारीख यहीं पर समाप्त होता है. आज के लिए इतना ही.

तारीख: 1987 में भारत ने ऐसा क्या किया कि चीन घबरा उठा!

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