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बांग्लादेश के बहाने POK छीनने वाली थीं इंदिरा गांधी? प्लान जानते ही अमेरिकी राष्ट्रपति की हवाइयां उड़ गई थीं

10 दिसंबर, 1971 तक भारत पाकिस्तान युद्ध चरम पर पहुंच गया था. भारतीय फौजें बांग्लादेश में अंदर तक दाखिल हो चुकी थीं. हालांकि युद्ध ख़त्म नहीं हुआ था. पाक फौज ने 16 तारीख को सरेंडर किया. फिर 10 तारीख को ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका को चीन से सीधे मिलिट्री हस्तक्षेप के लिए कहना पड़ा.

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Bangladesh crisis indira gandhi pok
1971 में ही POK वापस लेने वाली थीं इंदिरा गांधी?
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कमल
7 अगस्त 2024 (अपडेटेड: 7 अगस्त 2024, 09:51 PM IST)
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श्रीनाथ राघवन अपनी किताब "1971 : A Global History of the Creation of Bangladesh" में एक किस्सा बताते हैं,

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इस एक लाइन में इतने अगर लगे थे कि हुआंग ने जवाब देते हुए कहा, “मगर, हमारी एक पुरानी कहावत है. जो कहती है, “अगर रौशनी पूर्व से न आए तो पश्चिम से आएगी, अगर दक्षिण में अंधेरा हो तो उत्तर में जरूर प्रकाश होगा.”

चीन के इस जवाब का मतलब था- पाकिस्तान की हार पक्की है. हम अपनी एनर्जी खाली वेस्ट नहीं करना चाहते.

ये वार्ता जिस रोज़ हो रही थी, उस तारीख पर ध्यान दीजिए. 10 दिसंबर तक भारत पाकिस्तान युद्ध चरम पर पहुंच गया था. भारतीय फौजें बांग्लादेश में अंदर तक दाखिल हो चुकी थीं. हालांकि युद्ध ख़त्म नहीं हुआ था. पाक फौज ने 16 तारीख को सरेंडर किया. फिर 10 तारीख को ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका को चीन से सीधे मिलिट्री हस्तक्षेप के लिए कहना पड़ा. 10 तारीख़ को दरअसल अमेरिका के हाथ एक सीक्रेट केबल लगा जिसने वाइट हाउस में खलबली मचा दी. अमेरिका को पता चला कि इंदिरा गांधी ने POK को वापस हासिल करने की तैयारी शुरू कर दी है.

अमेरिका को ये खबर कैसे मिली?

जवाब है CIA. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी, जिसे इंटेलिजेंस सर्कल्स में ‘लैंगली’ भी कहा जाता है. लैंगली में CIA का हेडक्वार्टर है.

शुरुआत करते हैं 1971 से. ये पिंग पोंग डिप्लोमेसी का दौर था. अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन से रिश्ते सुधारने की कोशिश में लगे थे. निक्सन के आदेश पर किसिंजर पाकिस्तान होते हुए चीन पहुंचे. यहां उनकी और चीन के तत्कालीन प्रीमियर झू इनलाई की मीटिंग हुई. पहली ही मुलाक़ात में इनलाई ने दो टूक पूछा, “पहले ये बताइए, क्या CIA ने मुझे मरवाने की कोशिश की थी?”

इनलाई दरअसल 1955 की एक घटना के बारे में बात कर रहे थे. वो हांग कांग से इंडोनिशया जाने वाले वाले थे. और प्रधानमंत्री नेहरू ने उनके लिए एक खास विमान का इंतज़ाम किया था. ये लॉकहीड मार्टिन का L749A- कॉन्स्टेलशन एयरक्राफ्ट था जो अमेरिकन मेड था. भारत ने उस दौर में एयर इंडिया के लिए ऐसे कई सारे एयर क्राफ्ट खरीदे थे. जिन्हे मालाबार प्रिंसेस, हिमालयन प्रिंसेस, बंगाल प्रिंसेस जैसे नाम दिए गए थे. जो प्लेन झू इनलाई को ले जाने वाला था, उसका नाम था कश्मीर प्रिंसेस. 

बहरहाल ऐन मौके पर, इनलाई का प्लान चेंज हुआ, इसलिए वो प्लेन में नहीं गए. लेकिन यही प्लेन उसी रोज़ दक्षिणी चीन सागर में क्रैश कर गया था. इनलाई को शक था कि इसके पीछे CIA की प्लानिंग थी. इसलिए 1971 में जब वो किसिंजर से पहली बार मिले तो उन्होंने सीधे इसी बाबत सवाल किया. किसिंजर ने जवाब देते हुए कहा, “आप CIA की काबिलियत को कहीं ज्यादा करके आंक रहे हैं.”

इंटेलिजेंस की दुनिया में एक रूल ऑफ थम्ब चलता है. Lying is standard Operating Procedure. यानी ख़ुफ़िया एजेंसी में काम करने वालों के लिए झूठ बोलना, सामान्य रूटीन का हिस्सा है. किसिंजर CIA के बारे में जो कह रहे हैं. वो सच था या झूठ, ये जानने के लिए एक और घटनाक्रम की तरफ चलते हैं.

#भारत सरकार में CIA का जासूस
साल 1983 में पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता अमेरिकी पत्रकार सीमोर हर्श की एक किताब पब्लिश हुई. The Price of Power, नाम की इस किताब में हर्श ने दावा किया कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री "मोरारजी देसाई CIA के एजेंट" थे. हर्श की किताब के अनुसार, “मई 1971 में किसिंजर और निक्सन के बीच एक प्राइवेट बातचीत हुई थी. जिसमें किसिंजर ने निक्सन को बताया- “हमें भारतीय सरकार के एक विश्वसनीय सोर्स से जानकारी मिली है कि इंदिरा इजरायल की तरह ईस्ट पाकिस्तान में एक लाइटनिंग स्ट्राइक प्लान कर रही हैं.””

किताब में हर्श ने आगे दावा किया कि ये रिलायबल सोर्स और कोई नहीं, 'मोरारजी देसाई' थे, और इसके एवज में उन्हें “20 हजार डॉलर” दिए गए थे. हर्श से पहले एक और पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता लेखक थॉमस पावर्स ने भी ऐसा ही दावा किया था. उनकी किताब: The Man Who Kept the Secrets के अनुसार इंदिरा की कैबिनेट में शामिल एक मंत्री CIA का जासूस था. पावर्स ने हालांकि अपनी किताब में किसी का नाम नहीं लिया था. ये मंत्री कौन था?
इसे लेकर कई नाम चले, बाबू जगजीवन राम, यशवंत राव चह्वाण और पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई. 

देसाई के मामले में हालांकि सीमोर हर्श का दावा बाद में गलत साबित हुआ था. 1971 में मोरारजी इंदिरा की कैबिनेट में नहीं थे. इसके अलावा भी सीमोर हर्श की किताब में दर्ज कई तारीखों में हेरफेर था. बाकी नामों को लेकर भी कयास चले. RTI दाखिल हुए. लेकिन कभी कुछ पुख्ता साबित नहीं हुआ. हालांकि CIA का जासूस भारतीय इस्टैब्लिशमेंट में मौजूद था, इसका कई किताबों में बार-बार जिक्र हुआ है.

थॉमस पावर्स की किताब के अनुसार इंदिरा और सोवियत राजदूत के बीच हुई मीटिंग के लिखित ब्योरे 48 घंटे में किसिंजर की टेबल पर पहुंच गए थे. श्रीनाथ राघवन अपनी किताब में लिखते हैं, 

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शुरुआत में हमने आपको बताया था कि 10 दिसंबर के रोज़ किसिंजर चीन के रेप्रेज़ेंटेटिव से मिलने गए थे. और उनसे सैन्य हस्तक्षेप की मांग की थी. किसिंजर के हाथ-पांव फूलने की वजह यही रिपोर्ट थी. जो CIA ने पहुंचाई थी. राघवन अपनी किताब में बताते हैं, “8 दिसंबर के रोज़ निक्सन और किसिंजर के बीच वाइट हाउस में एक मीटिंग हुई थी. इस मीटिंग में किसिंजर ने निक्सन से कहा, “भारत का प्लान जाहिर हो गया है. पहले वो ईस्ट पाकिस्तान को अलग करेंगे. फिर कश्मीर (POK) को कब्ज़े में ले लेंगे.””

इतना सुनते ही निक्सन, जो इंदिरा से हद दर्जे की नफरत करते थे, उनकी हवाइयां उड़ने लगीं. निक्सन को ईस्ट पाकिस्तान का डर नहीं था. उसे तो वो हाथ से निकला हुआ ही मान रहे थे. असली डर ये था कि वेस्ट पाकिस्तान भी टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा. किसिंजर ने निक्सन ने कहा, “अगर भारत ने हमला किया, बलूचिस्तान और नार्थ वेस्ट फ्रंटियर में विद्रोह हो जाएगा.”

ये बात सुनते ही निक्सन ने किसिंजर को चीन के पास भेजा. ताकि वो चीन को भारत पर प्रेशर बनाने और मिलिट्री मूवमेंट के लिए मनाएं. किसिंजर हुआंग हुआ से मिले. उनसे कहा,  “आप समझ नहीं रहे. ईस्ट पाकिस्तान भूटान बन जाएगा और पाकिस्तान नेपाल.”

चीन की तरफ से जब कोई ठोस जवाब नहीं मिला, तब अमेरिका ने अपनी सेवंथ फ्लीट हिंद महासागर की तरफ रवाना कर दी. माना जाता है कि ये ईस्ट पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज को बचाने के लिए किया गया था. हालांकि राघवन की किताब के अनुसार, इसका एकमात्र उद्देश्य ये था कि इंडियन आर्मी वेस्ट फ्रंट पर ज्यादा आगे न बढ़े.

वीडियो: तारीख: पिछली बार कैसे बची थीं शेख हसीना? रेस्क्यू करने वाली थी इंडियन आर्मी!

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