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हिटलर भारतीयों से नफरत क्यों करता था?

हिटलर की भारतीयों से नफरत का कारण थी उसकी मान्यता कि आर्यन नस्ल सब नस्लों में श्रेष्ठ है. उसके गुरु स्टीवर्ट चेंबरलिन ने थियोरी दी कि जर्मनी से भारत पहुंचे आर्यों ने ही उपनिषद जैसे महान ग्रंथों को जन्म दिया था. उन्होंने खुद को भारत के मूल निवासियों से अलग रखने के लिए जाति प्रथा की शुरुआत की थी. लेकिन फिर धीरे-धीरे नस्ल में मिलावट हुई और भारतीय आर्य लुप्त हो गए. इन्हीं विचारों के चलते हिटलर भारतीयों को कमजोर नस्ल मानता था. और ब्रिटिश शासन के हिंसा प्रयोग को इसी नाते जायज ठहराता था.

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हिटलर की भारतीयों से नफरत का कारण थी उसकी मान्यता कि आर्यन नस्ल सब नस्लों में श्रेष्ठ है. उसके गुरु स्टीवर्ट चेंबरलिन ने थियोरी दी कि जर्मनी से भारत पहुंचे आर्यों ने ही उपनिषद जैसे महान ग्रंथों को जन्म दिया था. (तस्वीर: getty)
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पड़ताल
20 अप्रैल 2022 (अपडेटेड: 15 जून 2022, 06:56 PM IST)
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1928 में हिटलर की आत्मकथा मेन काम्फ भारत में पब्लिश हुई. और तब से लेकर अगले 90 सालों तक बेस्ट सेलर्स का हिस्सा बनती रही. दुनिया भर में हिटलर के प्रशंसकों की कमी नहीं. लेकिन विशेष रूप से भारत में हिटलर के संदर्भ में एक मिथ बहुत काम करता है. मिथ ये कि हिटलर भारत और भारतीयों का समर्थक था. इस मिथ को बढ़ावा मिलता है तीन कारणों से. पहला हिटलर की नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मुलाक़ात. दूसरा स्वास्तिक चिन्ह का प्रयोग. और तीसरा ये कि हिटलर आर्यों को ( हेंस भारतीयों को) सबसे श्रेष्ठ नस्ल मानता था. चलिए जानते हैं इस बात में कितनी सच्चाई है.

शक्ति और नस्लवाद

आज ही के दिन यानी 20 अप्रैल 1889 को हिटलर का जन्म हुआ था. पहले विश्व युद्ध के बाद, जनवरी 1920 में उसे जर्मन वर्कर पार्टी का प्रोपोगेंडा चीफ बनाया गया. आने वाले महीनों में उसने पार्टी का नाम नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर पार्टी यानी नाज़ी पार्टी रख दिया. अप्रैल 1920 में उसने म्यूनिक के एक हॉल में पार्टी वर्कर्स के सामने एक स्पीच दी. यहां उसने एक सवाल पूछा?

मुट्ठी भर ब्रिटिशर्स ने आधी दुनिया पर राज क़ायम कर लिया. कैसे?

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सवाल का जवाब मिलता इससे पहले ही वो आगे बोला, हमें यानी जर्मनी को भी यही करना है. इससे एक महीने पहले एक दूसरी मीटिंग में हिटलर ने कहा था, भारत से कपास और रबर के निर्यात से भारतीयों को चूसा और उन्हें भूखा रहने पर मजबूर किया. क्या उन्हें ऐसा करने का हक़ है?

दोनों बातें विरोधाभाशी थीं. पार्टी वर्कर को समझ नहीं आया कि वो कहना क्या चाहता है. तब उसने अपने दोनों सवालों का जवाब दिया एक शब्द से. पावर यानी ताक़त. उसने कहा, सारा मामला ताक़त का है. अंग्रेजों के पास ताक़त थी इसलिए वो भारत के लोगों पर राज कर पाए. और उन्हें ऐसा करने का हक़ भी है. क्योंकि जिसके पास ताक़त नहीं, उसे अधिकार की बात करने का कोई हक़ नहीं.

इसके बाद उसने कहा, जर्मनी के पास कोई अधिकार नहीं है. क्योंकि हमारे पास शक्ति नहीं है. मेन काम्फ में वो इसी विचार को एक दूसरे तरीक़े से कहता है. वो लिखता है,

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म्यूनिक पार्टी मीटिंग में उसने एक और सवाल किया, अंग्रेजों के पास शक्ति आई कहां से? इसका जवाब देते हुए उसने कहा, नस्ल. ब्रिटिश भारत पर इसलिए राज कर पाए, क्योंकि वो बेहतर नस्ल के लोग थे.  अब ये बात थोड़ा चौंकाने वाली है. सबको मालूम है कि हिटलर आर्यन नस्ल को सबसे बेहतर मानता था. और तब अधिकतर इतिहासकार मानते थे कि भारत के लोग भी आर्यन नस्ल के हैं. तो फिर हिटलर भारतीयों को अंग्रेजों से नीची नस्ल का क्यों बता रहा था?

हिटलर के गुरु ने उपनिषद पढ़े

इसके लिए हमें हिटलर के दो सहयोगियों के विचार समझने होंगे. पहला स्टीवर्ट चेंबरलेन और दूसरा अल्फ़्रेड रोजनबर्ग. स्टीवर्ट चेंबरलेन नाज़ी शासन में एक बड़ा दार्शनिक माना जाता था. और वही हिटलर का बौद्धिक गुरु था. नस्लीय श्रेष्ठता का विचार हिटलर को चेंबरलेन से ही मिला था. चेंबरलेन के पास ये विचार कहां से आया?

दरअसल चेंबरलेन और उसके जैसे कई दार्शनिक तब समाज में भोगवाद और भौतिकवाद के सवाल से जूझ रहे थे. औद्योगिक क्रांति ने जीवन स्तर को बेहतर कर दिया था. चर्च और धर्म की शक्ति कम होने लगी थी. नीत्शे का कथन ‘गॉड इज़ डेड’ फ़ेमस हो चुका था. और एथिक्स और मॉरलिटी को साइंस से चुनौती मिलने लगी थी. चेम्बरलिन को इस सबका हल मिला नस्लवाद में.

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ह्यूस्टन स्टीवर्ट चेंबरलिन (तस्वीर: Wikimedia Commons)

हालांकि चेंबरलेन बहुत पहले से ही नस्लवाद का समर्थक रहा था. लेकिन जब 1888 में उसे भारतीय धर्म शास्त्र पढ़ने का मौक़ा मिला तो उसने इसी नज़र से भारतीय दर्शन को देखना शुरू किया. यूं कि थियोरी वो पहले ही डिवेलप कर चुका था, बस दूसरे सोर्स से अपनी बात को प्रूव करने की कोशिश में था.

19वीं सदी के मध्य में विलियम जोन्स नाम के एक ब्रिटिश स्कॉलर ने अपने शोध में संस्कृत, ग्रीक और लैटिन भाषा में बहुत सारी समानताएं पाई थी. और इन भाषाओँ को बोलने वाले लोगों को उसने नाम दिया आर्य. ये शब्द जो अब तक भारत में वैदिक परंपरा से जुड़ा था. वो एक नस्लीय पहचान बन गया. धीरे-धीर बाकी स्कॉलर्स ने पाया कि 40 और ऐसी भाषाएं थी जिनमें समान गुण थे. इनमें जर्मन और इंग्लिश भी शामिल थी. तब से ये सवाल उठा कि भारत और यूरोप के लोग एक जैसी भाषा कैसे बोल रहे थे?

संस्कृत भाषा भारोपीय परिवार की भाषा थी. ये विचार भी आम हो चला था कि कुछ 1500 साल पहले आर्य भारत में सेंट्रल एशिया से आए थे. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए चेंबरलिन ने दावा किया कि भारत में पहुंचे पहले लोग असल में जर्मन थे. और नॉर्डिक नस्ल के ये लोग फादर लैंड यानी जर्मनी से निकलकर एशिया के अलग-अलग इलाक़ों में बस गए थे.

आर्यन नस्ल

भारतीय ग्रंथों को पढ़ने के लिए चेंबरलिन ने संस्कृत सीखी. वेद और उपनिषद पढ़कर वो बड़ा प्रभावित हुआ. लेकिन इनमें मौजूद कई अच्छी बातों को छोड़कर उसने जाति प्रथा को पकड़ा. नस्लीय बंटवारे के रूप में जाति प्रथा उसे बड़ा लॉजिकल सिस्टम लगा. जिसमें श्रेष्ठ नस्ल के लोग सबसे ऊपर और कमतर नस्ल के लोग नीचे थे. उसने दावा कि श्रेष्ठ आर्य लोगों ने वेदों और उपनिषदों को लिखा. और दुनिया को भौतिकवाद से आगे बढ़ने का दर्शन प्रदान किया. चेंबरलिन ने इसके उदाहरण में कालिदास, आचार्य शंकर के लिखे का जिक्र किया.

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अल्फ्रेड रोजनबर्ग (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जिस दूसरे व्यक्ति ने हिटलर को प्रभावित किया. वो था अल्फ्रेड रोजनबर्ग. 1920 में हिटलर की रोजनबर्ग से मुलाक़ात हुई. और हिटलर ने उसे नाजी पार्टी के मुखपत्र का एडिटर नियुक्त कर दिया. इसी मुखपत्र के जरिए नाजी पार्टी ने नस्लीय श्रेष्ठता के विचार का प्रचार प्रसार किया. चेंबरलिन की ही भांति रोजनबर्ग भी भारतीय इतिहास और संस्कृत भाषा में रूचि रखता था. उसने भी वही सिद्धांत आगे बढ़ाया कि घोड़ों में बैठकर नीली आंखों वाले जर्मन लोग भारत में घुसे. और वहां काले लोगों पर अपना आधिपत्य कायम किया.

उसने फ्रेंच डिप्लोमेट जोसफ आर्थर की बात दोहराते हुए कहा,

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रोजनबर्ग ने जाति व्यवस्था को लेकर दावा किया कि काले मूल निवासियों से खुद को अलग रखने के लिए आर्यों ने वर्ण व्यवस्था की शुरुआत की. वर्ण शब्द का एक अर्थ जाति था और एक अर्थ रंग. वर्तमान (1920 के) भारतीयों के लिए रोजनबर्ग ने लिखा कि भारत में आर्यों से एक गलती हो गई. वो आध्यात्म के चक्कर में इतना डूब गए कि नस्लीय शुद्धता बनाए रखने को लेकर असावधान हो गए. और आगे चलकर उनका खून काले मूल निवासियों से मिल गया जिसके चलते नस्लीय श्रेष्ठता समाप्त हो गई.

भारतीय चल भी नहीं सकते

भारत गुलाम क्यों बना इसका कारण भी नस्लीय हीनता को दिया गया. रोजनबर्ग ने लिखा, नस्लीय मिलावट के चलते सिर्फ ज्ञान बचा, और उसके लिए जरूरी नस्लीय श्रेष्ठता खत्म हो गई. इसके बाद जाति प्रथा भी कमजोर होती चली गई. और इसके फलस्वरूप आर्य भी कमजोर हो गए.

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उपनिषदों और वेदों को पढ़कर स्टीवर्ट चेंबरलिन ने जातिवाद को जातिवाद के जरिए जायज ठहराया (तस्वीर: Wikimedia Commons)

मॉडर्न भारतीयों (1920-30 के) के लिए वो लिखता है, Those poor bastards are no more aryans. और वो अपने अपंग अस्तित्व के घाव भरने के लिए सिर्फ गंगा में डुबकी लगा सकते हैं.

भारतीयों को लेकर हिटलर के विचार में हम इन नस्लवादी बातों का प्रभाव देख सकते हैं. 1936 में एक राजनैतिक रैली को सम्बोधित करते हुए वो कहता है, “भारतीय चल भी नहीं सकते, अंग्रेज़ों ने उन्हें सिखाया कि चलना क्या होता है ”

इसके अलावा समय-समय पर उसने भारतीयों के लिए नस्लवादी टिप्पणी का इस्तेमाल किया. 1936 की रैली में उसने कहा, “भारत में ब्रिटिश राज जर्मनी के लिए एक मॉडल है, और इंडिया इस बात का उदाहरण है कि एक गुलाम नस्ल के साथ कैसे व्यवहार किया जाता है.” आजादी के आंदोलन को लेकर उसका मत था कि ये बेहतर नॉर्डिक नस्ल के खिलाफ नीची नस्ल के लोगों का विद्रोह था. इंडियन प्रॉब्लम के बारे में बात करते हुए उसने वाइसरॉय लॉर्ड इर्विन को सलाह दी थी, “गांधी को गोली क्यों नहीं मार देते.” बात गांधी की नहीं थी. हिटलर मानता था कि भारतीय नीची नस्ल के थे. इसलिए उनके खिलाफ कोई भी हिंसा जायज थी.

नेताजी सुभाष से हिटलर की मुलाकात

अब आख़िरी सवाल सुभाष चंद्र बोस से मुलाक़ात का. तर्क ये दिया जाता है कि हिटलर ने भारतीयों की मदद की थी. मई 1942 में नेताजी बोस और हिटलर की मुलाक़ात हुई थी. इससे पहले भी नेताजी कई बार कोशिश कर चुके थे, लेकिन हिटलर उनसे मुलाक़ात को तैयार नहीं हुआ. भारत की आजादी से उसे कोई विशेष लगाव नहीं था, लेकिन जब अमेरिका युद्ध में उतरा तो ब्रिटेन को उलझाए रखने के लिए उसने भारतीय आजादी के आंदोलन पर ध्यान दिया. 

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस अडोल्फ हिटलर से मुलाकात करते हुए (तस्वीर: getty)

नेताजी बोस के साथ मुलाक़ात के दौरान भी अधिकतर समय वो ही बात करता रहा. और नेताजी को इस मीटिंग के दौरान अहसास हुआ कि हिटलर उनके थ्रू प्रोपोगेंडा वॉर जीतना चाहता है बजाय कि मिलिट्री वॉर के. विश्व युद्ध के अंतिम दिनों का एक किस्सा है, जिसे सुनकर आपको बेहतर समझ आएगा कि वो भारतीयों के प्रति क्या विचार रखता था.

1945 का साल. जर्मनी हार की कगार पर खड़ा था. और हिटलर के सहायक भारत के राष्ट्रीय आंदोलन पर नजर गढ़ाए हुए थे. उन्हें अब भी लग रहा था कि अगर भारत में विद्रोह चरम पर पहुंच जाए, तो ब्रिटेन कमजोर हो सकता है. मार्च महीने में हुई एक कांफ्रेंस में हिटलर के सामने एक जनरल ने इंडियन लीजन यानी आजाद हिन्द फौज का जिक्र किया. इंडियन लीजन यूरोप में भारतीय युद्धबंदियों से बनी एक यूनिट थी जो तब जर्मन सेना का हिस्सा  हुआ करती थी. इसे नेताजी बोस ने गठित किया था. तब हिटलर ने जवाब दिया,

“इंडियन लीजन एक मजाक है. भारतीय एक कीड़े को भी नहीं मार सकते. अंग्रेज़ों को तो कतई नहीं मार पाएंगे. इसलिए उन्हें अंग्रेज़ों के सामने खड़ा करना मैं एक मजाक समझता हूं. इससे बेहतर तो है कि उनसे मजदूरी कराई जाए. वो इसी लायक हैं.”

अगली बार हिटलर को लेकर किसी की लार टपकते देखें तो ये जरूर याद दिलाएं कि हिटलर असल में भारत के लिए क्या सोच रखता था.

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