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कभी भारतीय लोकतंत्र के कसीदे पढ़ने वाला, कैसे बना सबसे बड़ा अलगाववादी

तीन बार विधायक रह चुका यह शख्स आज लोगों को वोट न डालने की हिदायत देता है.

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29 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 29 सितंबर 2017, 12:19 PM IST)
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सैयद अली शाह गिलानी
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ये 1949 का साल था. अंग्रेज भारत से जा चुके थे. कश्मीर कबाइलियों के हमले को झेल चुका था. शेख अब्दुल्ला और नेहरू की दोस्ती पर किवदंतियां गढ़ी जा रही थीं. ठीक इसी समय एक 20 साल का नौजवान लाहौर से बारामुला के अपने गांव 'जूरी मुंज' लौटा. यहां आने पर उसे पास ही एक गांव की मस्जिद का इमाम बना दिया गया.
शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता हुआ करते थे, मौलाना मोहम्मद सैयद मसूद. एक सियासी दौरे पर उनका जूरी मुंज आना हुआ. दिन था शुक्रवार. दोपहर की नमाज़ का वक़्त था. मौलाना मसूद भी गांव की मस्जिद पहुंचे. यहां नमाज़ के बाद वो नौजवान इमाम अपनी तकरीर पेश कर रहा था. मौलाना मसूद को नौजवान के बोलने का ढंग पसंद आया. श्रीनगर लौटते वक़्त वो इस नौजवान को अपने साथ ले आए.
पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला
पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला

श्रीनगर में नौजवान का पहला ठिकाना था 'मुजाहिद मंजिल'. नेशनल कॉन्फ्रेंस के इस दफ्तर में नौजवान चार साल तक रहा. अपना खर्च चलाने के लिए पास ही एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में पारसी पढ़ा दिया करता. कश्मीर में कांग्रेस के मुखपत्र 'डेली खिदमत' में भारत के लोकतांत्रिक और सेकुलर स्वरूप की तारीफ में लेख लिखा करता. इमाम होने की वजह से पांचों वक़्त का नमाज़ी था. इस सिलसिले में अक्सर कम्युनिस्ट पार्टी के कारकूनों के साथ बहस करता पाया जाता. इन बहसों के दौरान जब कोई कम्युनिस्ट इस नौजवान से कहता, "कोई ईश्वर नहीं है." तो वो उसके साथ एक लाइन और जोड़ देता. "सिवाय अल्लाह के."
किसे पता था कि लोकतंत्र और सेकुलरिज्म में भरोसे के चलते सियासत में उतरा यह नौजवान साढ़े तीन दशक बाद कश्मीर का सबसे बड़ा अलगाववादी नेता बनकर उभरेगा. इस नौजवान का नाम था सैयद अली शाह गिलानी, जिसे कश्मीर की गलियों में सुरक्षाबलों पर पत्थर चलाने वाले नौजवान 'बाब' के नाम से पुकारते हैं.
सैफुद्दीन की संगत में गिलानी कट्टरपंथी इस्लाम के करीब होते चले गए.
सैफुद्दीन की संगत में गिलानी कट्टरपंथी इस्लाम के करीब होते चले गए.

1954 में गिलानी की मुलाकात हुई कारी सैफुद्दीन से. सैफुद्दीन कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक सदस्यों में से थे. जमात शरियत को लागू करने की बात करती, जिहाद का समर्थन करती थी. सैफुद्दीन की संगत में गिलानी जमात से जुड़ गए. वो श्रीनगर से वापस अपने गांव लौट आए. यहां वो जुम्मे की नमाज के बाद मस्जिदों में जाकर जमात की विचारधारा का प्रचार करते.
1972 के विधानसभा चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया. गिलानी को सोपोर से टिकट दी गई. सामने थे कांग्रेस के गुलाम रसूल कार. भारतीय संविधान को कोसने वाले गिलानी माननीय विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद वो दो बार और यहां से विधायक चुने गए.
1987 का वो चुनाव
मार्च 1987. कश्मीर में विधानसभा के चुनाव थे. गिलानी के नेतृत्व में अलगाववादी संगठनों का एक अम्ब्रेला संगठन बना, "मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट". श्रीनगर की अमिरा कदल से एमयूएफ के उम्मीदवार थे सैयद युसूफ शाह. नतीजे घोषित हुए. युसूफ शाह चुनाव जीत गए. उनसे जीत के सर्टिफिकेट पर दस्तखत भी करवाए गए. कुछ समय बाद रेडियो कश्मीर पर नतीजों की घोषणा हुई. इसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के गुलाम मुइनुद्दीन शाह को विजेता बताया गया. चुनाव में हुई इस धोखाधड़ी के खिलाफ युसूफ शाह ने आवाज उठाई तो उन्हें उनके पोलिंग एजेंट के साथ बिना कोई मुकदमा दर्ज किए जेल में डाल दिया गया. जेल से छूटने के बाद युसूफ शाह सरहद पार करके पीओके चला गया. यहां उसने नए-नए बने संगठन 'हिजबुल मुजाहिद्दीन' की सदस्यता ले ली. युसूफ को 12 वीं सदी के मुजाहिद्दीन सलाद्दीन के नाम पर नया नाम दिया गया, "सलाहुद्दीन".
हिजबुल कमांडर सैयद सलाहुद्दीन
हिजबुल कमांडर सैयद सलाहुद्दीन

चुनाव में हुई धांधली के चलते कश्मीर में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए. 1989 के साल में यह प्रदर्शन हथियारबंद संघर्ष में बदल गया. 1987 के चुनाव में गिलानी सोपोर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे. 1989 में इमरजेंसी के शुरुआती दौर में उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. गिलानी के इस कदम ने उन्हें अलगाववादियों के नेता के तौर पर स्थापित कर दिया.
गिलानी को नजरबंद करने के विरोध में प्रदर्शन
गिलानी को नज़रबंद करने के विरोध में प्रदर्शन

1993 में 26 अलगाववादी संगठनों ने मिलकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस नाम का अम्ब्रेला संगठन बनाया. सैयद अली शाह गिलानी इसके अध्यक्ष बनाए गए. 2002 में आते-आते इस संगठन की तस्में ढीली पड़ने लगीं. 2002 के विधानसभा चुनाव में लोन बंधुओं (बिलाल लोन और सज्जाद लोन) पर प्रॉक्सी कैंडिडेट खड़े करने के आरोप लगे. ऐसे में हुर्रियत दो टुकड़ों में बंट गई. पहले धड़े को मोडरेट या नरमपंथी कहा गया. इसका नेतृत्व मिला मीर वाइज़ को. दूसरा कट्टरपंथी धड़ा बना गिलानी के नेतृत्व में.
28 अगस्त 1962 को अशांति फैलाने के आरोप में गिलानी को पहली बार हवालात का मुंह देखना पड़ा. वो 13 महीने जेल में रहे. इस जेल यात्रा के दौरान उन्होंने अपने पिता को खो दिया. वो मातमपुर्सी के लिए घर भी नहीं जा पाए. यह गिलानी के जेल यात्रा की शुरुआत थी. तब से अब तक गिलानी तकरीबन 16 साल से ज्यादा जेल में रह चुके हैं. 2010 में उन पर देशद्रोह का मुकदमा लग चुका है. फिलहाल वो पाकिस्तान से अवैध फंडिंग के सिलसिले में नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी की जांच के दायरे में हैं.



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